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गुरुवार, 17 मार्च 2011

मैं बस डरता हूँ तुम्हारे खतरनाक इरादों से.


शमशाद इलाही अंसारी "शम्स" की ये कवितायें अपने कथ्य से गहरे प्रभावित करती हैं. इनमे एक सतत विद्रोह है जो अपनी स्थूलता के बावजूद प्रभावित करता है. धार्मिक कट्टरपन और पूँजी के तमाशे के बरक्स ये उम्मीद जगाने वाली कवितायें हैं


मुझे स्वीकार नहीं
===========
मुझे वो गुंबद मत दिखा..
वो मीनारें
वो इबादतगाहें
उनसे जुडी कहानियाँ
युद्ध के किस्से
मज़हब की खाल में घुसे
वो सियासी हमले
वो फ़ौजी छावनियाँ
वो फ़ौज़ी अभियान

घोडों की टापों से रौंदा गया
धरती का एक बडा भू-भाग
जिसे नाम दिया था
तुम्हारे दंभ ने - दुनिया

उद्घघोषित किया था तुमने अपने से पूर्वकाल को
अंधकार और जहालत..

मैं डरता हूँ उन खूनी किस्सों से
सीना पीटती सालाना छातियों से
गली-चौराहों पर इंसानी खून बहाते जवान खू़न से
कभी खत्म होने वाली इस रिवायत से
बढती हुई दाढ़ियों से

वक्त को बदलने से रोकने की
तुम्हारी दुस्साहसी कवायद से
तुम्हारे अंहकार से
तुम्हारे अंतिम सत्य से
तुम्हारी कब्र की प्रताड़ना के प्रवचनों से
मृत्युपरांत तुम्हारे ईश्वर के पैशाचिक रुप से
उसके यातना-शिविर, उसकी लहु-पिपासा से

मैं नहीं डरता तुमसे
मैं डरपोक नहीं
मैं बस डरता हूँ तुम्हारे खतरनाक इरादों से.

तुम्हारे चलाए ये डर के उद्योग कब तक चलेंगे ?
कब समाप्त होंगे ये जहालत, ये अज्ञान ?
घमण्ड, भ्रम का दुष्प्रचार ?
घिनौनी सियासत का खोटा सिक्का कब तक चलेगा..?

ये आदिकालीन मूर्छा कब टूटेगी जिसके तहत
सजा रखे हैं तुमने
दुनिया को जीत लेने के ख़्वाब..?

पीढी-दर-पीढी सौंप रहे हो
इस दिवास्वप्न की छड़ी
जिसे ढोते-ढोते इंसान के जहन में

बन चुका है नासूर
ये सिलसिला, ये दुष्चक्र
अब मुझे स्वीकार नहीं
.
क्योकि फ़तह सियासत है
और फ़न्हा होना है मज़हब
तुमने इस सार्वभौम मर्म को उलट दिया है
यह, मुझे स्वीकार नहीं.
Sep 9,2010


जिज्ञासा
उस खामोश
सन्नाटे से भरी
कोठरी में
कुम्लाही सी रोशनी के बीच
अपने नाखूनों वाले पंजों से
फ़र्श को
कई कई बार खुरच कर
वह देख चुका था

जिसके एक कोने में
रत्ती रत्ती भर
राख़ टपकती रहती
क्योंकि, ठीक उसके ऊपर
एक अगरबत्ती जलती
......ज़िन्दगी के डिब्बे में
और कितनी अगरबत्तियाँ शेष हैं

इस कोशिश में, इस जिज्ञासा में
वह बेजान हो चुका है.

जीवन
जीवन से जुड़े
प्राय: समस्त प्रश्नों पर
अत्याधिक सचेत रहने की
आवश्यकता नहीं
क्योंकि
तुम इसके प्रवाह को
कदाचित, नहीं कर सकते
नियंत्रित, व्यवस्थित
अथवा मोड़ सकते इसका रुख

तुम, सर्वथा इतने ही अर्थहीन हो
कमजोर और असहाय
किसी सुन्दरम पत्थर की मूर्ति की भाँति
जो, नहीं उड़ा पाती
अपने सिर पर बैठे किसी पक्षी को
और चुपचाप, अभिशिप्त
झेलती रहती उनका मल-मूत्र

....जीवन से जुड़े
कई महत्वपूर्ण प्रसंगों के समक्ष
तुम एक पत्थर की
सुंदर मूर्ति के अतिरिक्त
कुछ और नहीं हो.

जीवन की चाबी
-
जीवन रेखा का एक छोर
जन्म
और दूसरा छोर
मृत्यु
दोनों सिरों के बीच,
ज़िंदगी का
पैण्डुलम डोलता है

जिसे हम
धर्म, राष्ट्र, भाषा, जाति और संस्कृति
के नाम की
चाबी घुमा धुमा कर
गति देते..

हज़ारों साल पुरानी इस चाबी में
जंग लगा है.
अब जीवन भी
रोगग्रस्त है.
क्या कोई
इस चाबी को
बदलेगा??

आ मुझे प्यार कर...
मेरे होठों का रंग
तेरे चेहरे पर न छ्प जाये,
इसलिये, मैंने लाली लगाना छोड़ दी.

मेरे गले का हार
तेरे सीने में कोई ज़ख्म न कर दे,
इसलिये, मैंने ये ज़ेवर छोड़ दिया

मेरे पांव के पाज़ेब
तेरी नींद में ख़लल न ड़ालें
इसलिये, मैंने उसे भी छोड़ दिया

मेरे कंगन..
मैं, जब तेरा आलिंगन करुँ
तेरी कमर में न चुभें
इसलिये, मैंने उन्हें भी छोड़ दिया

मेरी नथुनी
मेरी अंगुठियाँ, मेरा झूमर
मेरी बिछुऐं
मेरी तगड़ी
मेरा एक-एक बाज़ारु गहना
जिसे दूसरों ने
मुझे सुंदर बनाने के लिये
गढ़े थे.
मैंने सब छोड़ दिये

मैं, इस वक्त सिर्फ़ मैं हूँ
अपने शुद्ध
प्राकृतिक और नैसर्गिक रुप में
सिर्फ़ अपने बदन की
खुश्बू के साथ
आ...
अब मुझे प्यार कर.

ग़ज़ल
ये अखबार अब और किस काम आयेगा,
चलो शराब में इसे आज नहलाया जाये.
ये काग़ज़ कलम बहस बेकार की बातें,
बस इंसान को सरे परचम चढाया जाये.
जब से गया है बेटा मायूस बाप फ़िक्र मंद है,
चलो उम्मीद का एक और चराग़ जलाया जाये.
टिमटिमाता इक दीया याद का जलता हुआ,
चलो इस ख़्वाब को एकबार फ़िर संवारा जाये.
घर में ही रहकर घर से जो जुदा हो गये,
ऐसी मां से बच्चों को फ़िर मिलवाया जाये.
घर का चराग़ घर में रहे हो चार सू रौशनी,
"शम्स" ऐसी मशाल को फ़िर दहकाया जाये.

15 comments:

' मिसिर' ने कहा…

पहली कविता जहाँ सीधी मगर तर्कपूर्ण बातो से
सीधे इंसानों से संवाद करती है ,उन्हें यथार्थ से
जोड़ने के लिए झंझोड़ती है, वहीं दूसरी कवितायों
में प्रतीक योजना दिखाई देती है ,कथ्य वही
चेतना की जड़ता से मनुयों की मुक्ति ही है !
एक कविता बनाव-सिंगार के सामंतवादी
आडम्बर से स्त्री जाति को विमुख कर ,
नैसर्गिक प्रेम की ओर प्रेरित करती है !
ग़ज़ल में लगता है "शम्स" जी का हाथ
कुछ तंग है ! कुल मिलाकर कवितायेँ
अच्छी और प्रभावशाली हैं !

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत आभार इन रचनाओं को पढ़वाने का..एक अलग सी कसक है इनमें.

नीरज बसलियाल ने कहा…

बेशक एक से एक बढ़कर नगीने हैं ...

neera ने कहा…

मुझे स्वीकार नहीं और जीवन दोनों कविता यथार्थ और मानवता के करीब इसलिए ज्यादा अच्छी लगी...

अरूण साथी ने कहा…

इतनी अच्छी कविता पढ़ाने के लिए आपका बहुत बहुत आभार, वास्तव मंे यह ब्लॉग का सदुपयोेग है।

बहुत प्रभावित किया सारी कविताओं ने

एक एक शब्द सोचने पर मजबूर किया।

जीवन का यथार्थ है यह रचनाऐं

अपर्णा मनोज ने कहा…

शम्स भैया , असुविधा पर आपकी ढेर साड़ी कविताएँ पढ़कर आनंद आ गया . वैचारिक ज़मीन से उठती ये कविताएँ मानवीय संवेदना के सूक्ष्मतम पहलुओं को छूती हैं . हमेशा की तरह सुघड़ ढांचे में ढली नूतन के लिए विद्रोह लिए कविताएँ .. बधाई भैया ..

रवि कुमार ने कहा…

एक अलग ही खनक है इन कविताओं में...

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत आभार इन रचनाओं को पढ़वाने का|
होली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ|

भरत तिवारी ने कहा…

भाई मुबारकबाद !
एक से बड़ कर एक हैं .... मस्त हो गया मैं तो , बिन पिए ही नशे में .......
रब आप को बुरी नज़रों से बचाये !!!
अनुज
भरत

jatavumraosingh ने कहा…

कविता-' मुझे स्वीकार नहीं ' मनोमस्तिष्क को झिंझोड़ देने वाली कृति है। इसे बस आप लिख सकते हैं। काश यह उन तक पहुंचे जिन तक इसे पहुंचना चाहिए और यह भी कि काश वे समझ सकें कि उनकी हनक और सोच ने किस प्रकार इस दुनियाँ को दुखमय बनाया है।

Yograj Prabhakar ने कहा…

"मुझे मंज़ूर नहीं" पड़ने के बाद आपका साहित्यक कद मेरी नज़र में और भी बुलंद हो गया है शम्स भई - सलामत रहें !

Shamshad Elahee Ansari "Shams" ने कहा…

सबसे पहले साथी अशोक जी का धन्यवाद कि वह आप सबके बीच में मेरे पहुँचने के माध्यम बने, दूसरे यह कि जिन सुधी पाठकों ने अपने बेशकीमती समय में से मेरे लिये कुछ समय निकाला और उपरोक्त सामग्री न केवल पढी वरन अपनी अमूल्य प्रतिक्रियाओं से मुझे अवगत कराया. मैं एक बात वाज़े कर दूँ, मैं मूलत: एक एकटिविस्ट हूँ, जब तक भारत में था..यही करता था, अब बाहर हूँ तब दिमाग वही है, तरीका बदला है..अब कलम चलती है, मैं न कवि हूँ न शायर..ग़ज़ल में अगर कोई वैचारिक कमी, भटकाव हो तो मेरे लिये विचारणीय है, मैं उसके लिये अपना सदैव दरवाज़ा खुला रखता हूँ, आपका ताबेदार भी रहूँगा इसके अलावा मीटर,रदीफ़, काफ़िया,बहर आदि-आदि के कहर से मैं नावाकिफ़ हूँ. बस कभी कोई मसला, कोई मुद्दा ज़हन में अटक जाता है, कोई घाव कर जाता है तब कविता हो जाती है..आपका स्नेह बना रहे बस मेरे लिये यही काफ़ी है. सादर

अजेय ने कहा…

इन मुद्दों को बचाए रखिए. शुक्रिया.

अजेय ने कहा…

इन मुद्दों को बचाए रखिए. शुक्रिया.

प्रशान्त ने कहा…

जीवन से जुड़े
कई महत्वपूर्ण प्रसंगों के समक्ष
तुम एक पत्थर की
सुंदर मूर्ति के अतिरिक्त
कुछ और नहीं हो.
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बहुत अच्छी कविताएं. "आ मुझे प्यार कर" - एक जबरदस्त अभिव्यक्ती.

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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