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शनिवार, 3 मार्च 2012

हरिया जाएगा मन का कोना अंतरा



राकेश पाठक पेशे से पत्रकार हैं. नई दुनिया के ग्वालियर के संपादक. ज़ाहिर है कि इनसे परिचय तमाम कार्यक्रमों के दौरान मेल-मुलाकातों के दौरान ही हुआ था. मेधा प्रकाशन से प्रकाशित उनके संस्मरण "काली चिड़ियों के देश में" पढते हुए लगा कि इस पत्रकार के भीतर कहीं गहरे एक कवि बैठा है. फिर मिलने-जुलने के साथ-साथ उस कवि की कारगुजारियां भी सामने आईं. 

राकेश पाठक की कवितायें एक परिपक्व प्रेमी और सहृदय पुरुष की कवितायें हैं जहां राजनीतिक रूप से सही होने पर उतना जोर नहीं जितना एक मनुष्य के रूप में ईमानदार और सहज बने रहने पर है. यहाँ प्रेम है, स्मृतियाँ हैं और मनुष्यता का एक  भरा-पूरा संसार. असुविधा पर आ रही उनकी ये कवितायें नेट पर छपी पहली कवितायें हैं. हम इसे अपनी एक और उपलब्धि के रूप में दर्ज कर रहे हैं.




  • लौट  आना


लौट आना इस बार भी
जैसे  लौटती रही हो  अब तक
लेकिन  लौट आना
वसंत के पहले दिन से पहले

लौट आना
सावन की पहली बारिश में
मिट्टी की सौंधी गंध से पहले
पूस के महीने में जब आसमान
से चांदी की तरह झरने वाली हो ओस
ठीक उससे पहले  लौट  आना.

जेठ में जब सूरज से
बरसने लगे आग और सुलगने लगे धरती
कुछ भी हो जाए उससे पहले
तुम  लौट  ही आना.

हमें साथ-साथ ही तो
चुनने हैं वसंत में पहली बार खिले फूल
पहली बारिश के बाद
गीली मिट्टी पर बनाने हैं
दो जोड़ी पांव के निशान
ठिठुरती सर्दी में बरोसी के पास बैठ
करनी हैं ढेर सारी कनबतियां
और जेठ की तपती दुपहरी में
तुम्हारे सुलगते होठों पर
रखनी है गुलाब की पंखुड़ियां

जीवन की वही आस
और चेहरे पर हास लिए
मेरे विश्वास की तरह
तुम जरूर  लौट  आना.

  • लड़की हंसना भूल गई है
उसने कहा लड़की से
संभलकर चला कर
बहुत टेढ़े-मेढ़े हैं, जिंदगी के रास्ते
लड़की ने कहा
मैं तो हिरनी हूं
कुलांचे मार नाप लूंगी पृथ्वी
और जोर से हंस दी

उसने समझाया लड़की को ¨
छत की मुंडेर पर यूं न बैठे
तब लड़की बोली
मैं तो गौरैया हूं
पंख फैला, उड़ जाऊंगी
आसमान में
और खिलखिलाती रही देर तक

उसने ताकीद की
कि अंधेरा घिरने पर
न आए-जाए सूने रास्तों पर
वह  तुनक कर बोली
चांद-सितारे तो  मेरी सहेलियां हैं
मैं आकाशगंगा की सैर कर आऊंगी

उसने टोका लड़की को
शहर एक जंगल है जिसमें
आदमी का चेहरा लगाकर
घूमते हैं वनैले पशु
वह  कहने लगी
तो क्या हुआ मैं तो  गिलहरी हूं
फुदक कर चढ़ जाऊंगी
पेड़ की सबसे ऊंची टहनी पर
हमेशा हंसती और
खिलखिलाती रही लड़की

एक दिन-
जब सूरज छिप रहा था
पश्चिम में पहाड़ के पीछे
शहर से दूर पुरानी पुलिया के पास


लड़की उदास कदमों से ठहरी
लड़के के पास
उसके चेहरे पर फैला था
आसमान का सूनापन
आंखों में उगा हुआ था कटीला जंगल
देर तक खामोश रही वह
फिर, जैसे धरती के गर्भ से
आवाज आई-
तुम ठीक कहते थे.


  • स्मृतियां 
हमने तय किया कि
सहेज कर रखेंगे
हरेक पहली-पहली स्मृति

पहली बात
पहली मुलाकात
पहला स्पर्श
पहला समर्पण
पहली तकरार
पहली मनुहार
पहला उपहार
और वह सब
जो  हमने जिया एक साथ
पहली-पहली बार

पहली स्मृतियों की गठरी बनाकर
रख देंगे सबसे ऊंची टांड़, पर
या एक काल-पात्र में
करीने से रखकर दबा देंगे
घर के आंगन में

उम्र के किसी पड़ाव पर
ठहर जाएंगे थोड़ी देर
स्मृतियों की गठरी निकालेंगे
बीते दिनों पर जमी धूल को  बुहारेंगे
स्मृतियों का स्लाइड शो  देखते हुए
लौट  जाएंगे पुराने दिनों में
धुंधला रही आंखों को
मिल जाएगी नई रोशनी
हरिया जाएगा मन का कोना अंतरा

फिर एक-एक कर
तह बनाकर रख देंगे
पहली-पहली स्मृति को
उम्र के किसी अगले पड़ाव पर
दुबारा खोलने के लिए.


19 comments:

मोहन श्रोत्रिय ने कहा…

‎"लौट आना", लड़की हंसना भूल गई है" और "स्मृतियां"- तीनों कविताएं प्रचलित मुहावरे से हट कर, एक अलग तरह का शब्द-संसार निर्मित करती हैं. प्रेम की सघनता है,पर ग़नीमत है कि 'लाउड'नहीं हैं. "स्मृतियां" ने ज़्यादा छुआ है, मन को. एक नए कवि का रचनात्मक परिचय पाना सुखद है. बधाई/आभार.

Pratibha Katiyar ने कहा…

तुम लौट ही आना बस...
इस धरती पर प्रेम के ख़त्म होने से पहले...

राकेश जी, प्रेम से भरी कविताओं के लिए बधाई!

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

‎"लौट आना", लड़की हंसना भूल गई है" और "स्मृतियां"- तीनों कविताएं प्रचलित मुहावरे से हट कर, एक अलग तरह का शब्द-संसार निर्मित करती हैं. प्रेम की सघनता है,पर ग़नीमत है कि 'लाउड'नहीं हैं. "स्मृतियां" ने ज़्यादा छुआ है, मन को. एक नए कवि का रचनात्मक परिचय पाना सुखद है. बधाई/आभार.

Mohan Shrotriya

vandana sharma ने कहा…

बहुत अच्छी कवितायेँ शुभकामनाएं..पढवाने के लिए अशोक जी का धन्यवाद ... ग्वालियर को एक बार फिर सलाम

pankaj mishra ने कहा…

ये लाजवाब है और बहुत से जवाब भी ला रही है कि लौट आना वसंत से ठीक पहले याँ जेठ की जानलेवा घाम से पहले क्योंकि सुख दुःख सब साझा है / और लौटना यूँ भी कि बिना लौटे साथ नहीं रहा जा सकता / ये लौटने के इंतज़ार से ज्यादा साथ साथ रहने के उमंग की कविता ......//// इक बार सूरज जब डूब जाता है ....तो कोई भी हो हंसना भूल जाता है /हास और उजास कैसे जुड़े है ऐसे जोड़ती कविता ...प्रथम स्मृति ,क्या कहूँ देर तक सहला रही है ...कोमल कवितायें बहुत भाती है सच!..

pankaj mishra ने कहा…

ये लाजवाब है और बहुत से जवाब भी ला रही है कि लौट आना वसंत से ठीक पहले याँ जेठ की जानलेवा घाम से पहले क्योंकि सुख दुःख सब साझा है / और लौटना यूँ भी कि बिना लौटे साथ नहीं रहा जा सकता / ये लौटने के इंतज़ार से ज्यादा साथ साथ रहने के उमंग की कविता ......//// इक बार सूरज जब डूब जाता है ....तो कोई भी हो हंसना भूल जाता है /हास और उजास कैसे जुड़े है ऐसे जोड़ती कविता ...प्रथम स्मृति ,क्या कहूँ देर तक सहला रही है ...कोमल कवितायें बहुत भाती है सच!..

pankaj mishra ने कहा…

ये लाजवाब है और बहुत से जवाब भी ला रही है कि लौट आना वसंत से ठीक पहले याँ जेठ की जानलेवा घाम से पहले क्योंकि सुख दुःख सब साझा है / और लौटना यूँ भी कि बिना लौटे साथ नहीं रहा जा सकता / ये लौटने के इंतज़ार से ज्यादा साथ साथ रहने के उमंग की कविता ......//// इक बार सूरज जब डूब जाता है ....तो कोई भी हो हंसना भूल जाता है /हास और उजास कैसे जुड़े है ऐसे जोड़ती कविता ...प्रथम स्मृति ,क्या कहूँ देर तक सहला रही है ...कोमल कवितायें बहुत भाती है सच!..

Premchand Gandhi ने कहा…

निश्‍चय ही बेहद परिपक्‍व प्रेम की कविताएं हैं ये। इन कविताओं से गुजरते हुए लगता है कि एक संवेदनशील पत्रकार की भाषा और सर्जनात्‍मकता कितने गहरे जाती है और एक नया संसार रच सकती हैं। कवि को बधाई और आभार।

प्रभात रंजन ने कहा…

अच्छे कवि से परिचय करवाया अशोक भाई...

Vandana Sharma ने कहा…

फिर,जैसे धरती के गर्भ से
आवाज आई -
तुम ठीक कहते थे :(
ओह बहुत उदास करती कविता ..स्मर्तियाँ भी अच्छी लगी ..शुक्रिया भाई बधाई राकेश जी !

Onkar ने कहा…

wah, ghazab ki kavitayen hain

ramji ने कहा…

कविताएं तो सभी अच्छी हैं लेकिन दूसरी कविता मुझे अधिक झकझोरती है | क्या हमारे समाज में स्त्री की यही नियति है ?...बहुत दुखद है यह ...

ANJU SHARMA ने कहा…

तीनो ही कवितायेँ लाजवाब हैं....मैंने इन्हें पहली बार पढ़ा....सहज और सरल भाषा में मानवीय संवेदनाएं मुखर हुई हैं....बहुत बहुत बधाई और अशोक को धन्यवाद्......

ANJU SHARMA ने कहा…

तीनो ही कवितायेँ लाजवाब हैं....मैंने इन्हें पहली बार पढ़ा....सहज और सरल भाषा में मानवीय संवेदनाएं मुखर हुई हैं....बहुत बहुत बधाई और अशोक को धन्यवाद्......

neera ने कहा…

सुंदर कवितायें! "लड़की हंसना भूल गई" खोलती है राज हर स्त्री की खोई हंसी का और "स्मृतियां" पाठक की स्म्रति में बस जाती है...

ashok banga ने कहा…

Seen once again the gentle inside of you, our Rakesh..... -Ashok Banga

' मिसिर' ने कहा…

भीनी-भीनी खुशबू आती है इन कविताओं से ,सहज प्रेम के फूलों की !न कोई दावा ,न फरियाद ,एक सीधे-सादे भद्र हृदय के उद्गार ! बहुत बहुत बधाई !

विमलेश त्रिपाठी ने कहा…

अच्छी कविताओं के लिए कवि को बहुत-बहुत बधाई....

दीपिका रानी ने कहा…

यदि राकेश पाठक जी का ब्लॉग हो, तो कृपया उसका पता दें..

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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