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सोमवार, 9 अप्रैल 2012

कुमार मुकुल की कवितायें

परिचय 

जन्म : १९६६ आरा , बिहार के संदेश थाने के तीर्थकौल गांव में। शिक्षा : एमए, राजनीति विज्ञान १९८९ में अमान वूमेन्स कालेज फुलवारी शरीफ पटना में अध्यापन से आरंभ कर १९९४ के बाद अबतक दर्जन भर पत्र-पत्रिकाओं अमर उजाला , पाटलिपुत्र टाइम्स , प्रभात खबर आदि में संवाददाता , उपसंपादक और संपादकीय प्रभारी व फीचर संपादक के रूप में कार्य। किताब : दो कविता संग्रहों का प्रकाशन।  देश की तमाम हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में कविता , कहानी , समीक्षा और आलेखों का नियमित प्रकाशन। कैंसर पर एक किताब शीघ्र प्रकाश्‍य। संपादन : 'संप्रति पथ' नामक साहित्यिक पत्रिका का दो सालों तक संपादन। वर्तमान में 'मनोवेद' त्रैमासिक पत्रिका के कार्यकारी संपादक।

e-mail- kumarmukul07@gmail.com




रावणरंगी

हुसैन साहब
पहले तो आपने देश छोडा
फिर छोड दी दुनिया
पर वे
जो हनुमान का मुखौटा लगाए
घूम रहे इस देश में
वे रावणरंगी
अमर हुए जा रहे
या कि पत्थर हुए जा रहे
राह के पत्थर ... रोडे बस...

परसो की ही तो बात है
वेलेंटाइन के नाम पर भोपाल में
उन्हों ने दौडा मारा दो बहनों को
अपने अपने राम की अराधना में लगी थीं वे
कि पड गयीं हत्यारों की सनक में
और आ गयीं बस के नीचे
चली गयीं रामजी के पास

इन रावणरंगियों का
एक ही काम है इस मुल्क  में
लोंगों को रामजी के पास पहुंचाना
खुद तो वे जा नहीं सकते कहीं
अमर जड पत्थर जो हो गए हैं वे
राह के...
तुम तो मलेच्छ थे उनके लिए
पर वे तो समानधर्मा थीं...

याद करो ब्रेख्त् को ...
पहले वे यहूदियों के लिए आए...

सीता की रसोई उजाड कर
राम की प्राण-प्रतिष्ठा चाहने वाले
इन रावणरंगियों को
क्या पता
कि राम की भी पहले निगाहें मिलीं थीं सीता से
फिर धनुष तोडने को प्रवृत हुए थे वो
पहले व्याह लाए थे सीता को
फिर सूचित किया था परिजनों को
पांडवों ने भी ऐसा ही किया था
किस परंपरा में
किस मर्यादापुरूषोत्तम ने
मां-बाप की मर्यादा रखी है
राह-परंपरा छोड चलने वाले
शायर सिंह सपूतों को ही
इस मुल्क की जनता ने
चढाया है सिर
इन अमर जड पत्थरों को
छोड दिया है
राह की ठोकरों में पलने के लिए...।


लाफिंग चैनल्स


बलात्कार का आरोपी मुस्कुराता है
दंतुरित मुस्कान
कहता है . पहली बार जब उसने चैखटा खोला था
तो बाबा ने गालों पर चुटकी लेते कहा था ------
बच्चा जहीरन एनाही हंसल करही
तोर भभीख उज्जल रहतौ---------

कि तभी टी आर पी का जमाना आ गया .........
तब से जो बत्तीसी अंटकी है
सो अंटकी है
उसी एंगल पर
अब झारखंड में दलित युवती को
नंगा कर दौडाएं दबंग
उसे क्या ...
टी आर पी बढ जाने तक तो वह दिखाएगा ही
उसकी नंगी देह को ... अपने बिलाग पर
लाख कुडकुडाते रहें कुंठावशेष
आखिर जाएंगें कहां
पिछवाडा छोडकर
अगडे की अगाडी कभी चले नहीं....

बलात्कार का आरोपी मुस्कुराता है दंतुरित मुस्कान
और पगडी.साफा बांधे
हत्या का आरोपी
लगाता है ठहाके
वाह बेटटा
चलल.चल एनाही
टी आर पी केर धुन पै।

निरापद ढंग से

यह ऐस समय है साथी
जब कोई कुछ नहीं कर रहा
सब कविता कर रहे
निरापद ढंग से
जैसे-कुत्तों से घिरा
अकेला कुत्ता
दिखलाता है दांत
और सुरक्षित दूरी बनाता
निकल पाता है किसी तरह
कर रहे हैं क्रान्ति
कवि भी
कागज के प्रदेश में।

5 comments:

' मिसिर' ने कहा…

जैसे-कुत्तों से घिरा
अकेला कुत्ता
दिखलाता है दांत
और सुरक्षित दूरी बनाता
निकल पाता है किसी तरह
कर रहे हैं क्रान्ति
कवि भी
कागज के प्रदेश मे

बहुत सशक्त कवितायें ! जितना कविता कर सकती है उतना किया है कविता ने ! आभार और कुमार साहब को बधाई !

Premchand Gandhi ने कहा…

कुमार मुकुल की कविताएं अपने शिल्‍प-सौष्‍ठव में ही नहीं, मारक-व्‍यंग्‍यात्‍मक भाषा और देशज मुहावरे के कारण मुझे बहुत प्रिय है। इन कविताओं में जिस तरह उन्‍होंने बाबा नागार्जुन की पंक्तियों के और ठेठ लोक का आधुनिक के साथ जो संगंम किया है, वह मुकुल भाई का ही कमाल है...धन्‍यवाद, ये कविताएं साझा करने के लिए। ‍

कुलदीप "अंजुम" ने कहा…

जैसे-कुत्तों से घिरा
अकेला कुत्ता
दिखलाता है दांत
और सुरक्षित दूरी बनाता
निकल पाता है किसी तरह
कर रहे हैं क्रान्ति
कवि भी
कागज के प्रदेश मे

आगे क्या कहा जाये .....इसकी मिसाल नहीं दी जा सकती ...!

ramji ने कहा…

मारक व्यंग का देशज प्रयोग कुमार मुकुल की कविताओं की जान है | और हां ...अपनी खबर लेना इतना आसान नहीं होता ...बेहतरीन ...

neera ने कहा…

आज के सत्य की परतें खोलती सशक्त कविताएं...

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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