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बुधवार, 15 जुलाई 2015

यह समर्पण ध्वनि है -तूर्य की सी बुझती हुई

आज अपनी एक कविता जो तद्भव के ताज़ा अंक में प्रकाशित हुई है. 



(शुक्लाष्टमी)[1]

रात का वक़्त है नहीं है यह
बहुत मुमकिन है कि जो देख रहा हूँ वह स्वप्न हो कोई दुस्वप्न सा
पर वक़्त नहीं है रात का

देखो
साफ़ दिख रहा है आसमान में सूरज
जैसे किसी लाश की खुली रह गयी आँख
आसमान वीभत्स और विवस्त्र कि जैसे किसी ने झटके से खींच दिया हो चाल का परदा फटे टाट वाला
और उसमें मुचमुचाया सूर्य जैसे भौंचक ताकता कोई बूढ़ा अपाहिज
बादलों के मटमैले टुकड़े कि जैसे उसके वस्त्र हों कीचट
हवा की सांय-सांय जैसे अर्धनग्न बच्चियों की चीत्कार, भाग-दौड़

वक़्त नहीं है रात का यह
अंधेरों पर नहीं थोप सकते अपने अंधत्व का दोष हम.

नीम उजाला भी नहीं चमकती रौशनी में चला आ रहा है राजा का रथ काले अरबी घोड़ों से जुता लहू के कीचड़ में दौड़ता चीरता धरती के सीने को रोज़ नए जख्म बनाता गूंजता है स्वर विजयी तूर्य का भयावह ध्वजा पर देवता सवार सारे पुरोहितों के मंत्रोच्चार से भयभीत पक्षियों की चीत्कार से भर गया है आकाश तांत्रिक शहरों के बीच-ओ-बीच पढ़ रहे उच्चाटन कर रहे हवन

ॐ लोकतंत्राय स्वाहा
ॐ मनुष्यताय स्वाहा
ॐ सत्याय स्वाहा
ॐ प्रकाशाय स्वाहा
ॐ एम हवीं क्लीं स्वप्नाय नमः स्वाहा

कर रहे समिधा में समर्पित जीव-अजीव-सजीव-निर्जीव उठ रही अग्नि, धुएँ से भरी दसो दिशाएँ, चीत्कार से भरी, भरी आर्तनाद से हाहाकार से जयकार से विलाप से परिहास से अट्टाहास से! 

वर्तमान, भूत और भविष्य के स्वप्न
रौंदते हुए सब
अश्व हैं कि भागते ही चले जाते हैं 


(दो)

राजा के पीछे खड़ी
चतुरंगिणी फौज़ बड़ी
तोप और बन्दूक लिए
भरे हुए संदूक लिए
टीवी के चैनल हैं
दफ्तर अखबार के
झुज झुक के गाते हैं
गीत सब दरबार के

राजा के पाँव को
राजा की छाँव को
राजा के नाम को
मुख को मुखौटे को
कुत्ते-बिलौटे को
चूमते-चाटते
रेंगते केंचुए सा
फुंफकारते नाग से
भेडिये से काटते

पीछे-पीछे भागते हैं हाथ में कलम लिए
भाषा के कारीगर जादू बिखेरते
कला कला गा गा के सिक्के बटोरते
नोच नोच फेंकते हैं चेहरे पर के चेहरे
आँसू बहाते हैं, रोते हैं, गाते हैं, चीखते चिल्लाते हैं

कोट काला टांग कर
आला लहराते हुए
प्रेस क्लब का नया पुराना
बिल्ला चमकाते हुए
कविता सुनाते हुए
कहानी बनाते हुए
एकेडमी से कालेज से
पार्टी मुख्यालय से
मल मल के आँख जागे सब
दिन के उजाले में
भागे सब भागे सब

जय श्रीराम, हनुमान जय
जय जय भवानी  
जय अक्षरधाम जय
हम भी हैं हम भी है हैं हम ही हैं..हम 
बम बम बम बोल बम 
एक नज़र देखो तो
राजाजी नहीं अगर सारथि जी देखो तो
देखो न कर दो न हम पर भी ये करम
जय जय अमेरिका सी आई ए की जय जय
वर्ण की व्यवस्था जय आप ही की सत्ता जय

कोई नहीं सुनता कोई कान भी देता नहीं
सडक किनारे खड़ा जन ध्यान भी देता नहीं

देखते ही देखते क्या हुआ ग़ज़ब हुआ
कलम लिए लिए जोंक बन गए सारे
जाकर चिपक गए अश्वों की पीठ से पूँछ से पैर से लिंग से अंड से
कुछ जो चतुर थे जा चिपके राज दंड से

और अश्व हैं कि भागते ही चले जाते हैं 







(तीन)


ये कौन सी औरतें हैं अर्धनग्न खड़ीं राह में
?

कौन ये वनवासिनें जिनके हाथ में जयमाल नहीं पुष्पगुच्छ नहीं
जिनकी आँखों में भय नहीं क्रोध है संताप है
चीत्कार सी लगती है जिनके विलाप की ध्वनि
फटी बिवाई वाले पैरों वाली यह कैसी औरतें खड़ी हैं राह में?
कैसी शक्लें कुरूप कैसा स्वर रुक्ष!

इन्हें दूर करो चीखता है सारथी और अश्व चींथते चले जाते हैं उनका अस्तित्व
रौंदते हुए उनका क्रोध उनकी चीत्कार उनका विलाप

यह धरती पर बिछे पलाश के फूल नहीं हैं
उन आवाजों का रक्त है
उन विलापों का रक्त
संतापों का रक्त
भागते हैं अश्व तीर से चुभते हुए जंगल के सीने में
चीखते हैं मोर, मणि, वनदेवी स्वर में समवेत
कहता है सारथी उन्मत्त से स्वर में
यह समर्पण ध्वनि है -तूर्य की सी बुझती हुई

विजय मद में मदमस्त राजा
चीखता है, गाता है, अपने ही गले को बाजे सा बजाता है
बांस की फुनगियों को नोचता है
खखोर डालता है धरती का गर्भ अतिथियों को बांटता है
पदवियां समेटता है भाल पर सजाये हुए तिलक रक्ताभ अपनी धुन में गाता है
और अश्व हैं कि भागते ही चले जाते हैं  ...

वहाँ जहाँ पहियों के निशान छूट गए हैं विजय चिन्ह की तरह
वहीँ पाँव के निशान कुछ उभरते हैं,
वहाँ जहाँ बज गयी है विजय ध्वनि
कुछ पुरानी आवाजें ठिठकी हुई हैं वहाँ
वहीँ जहाँ धरती के
गर्भ में घाव है हो रही है हलचल कुछ
 गीत कुछ विचित्र धुनों में बज रहे हैं
घायल से सैनिक कतारों में सज रहे हैं

औरतें वे फिर से उठकर खड़ी हुईं
और उनके हाथ में फूल नहीं बन्दूक है
लाशों के बीच रखतीं संभल संभल के क़दम
थर-थर-थर कांपती नसों में संकल्प प्रतिघात का
संकल्प एक युद्ध का नई शुरुआत का
भय का निशान नहीं 
चेहरे की चोटों में गुस्सा अकूत है 
गाँवों में, खेतों में, बंजर मैदानों में
भूख से भरे हुए दक्खिन टोले, सहरानों में

दृश्य में..
स्वरहीन कंठ हैं रुंधे हुए, नीली नीली लाशें, कीचड़ भरी आँखों से देखते हैं वृद्ध जन भागते हैं पीछे पीछे, भागती हैं औरतें, भागते हैं बच्चे, जानवर भागते हैं. खेतों की मेढ़ों पर, भूतिया से डेरों पर, सूखे हुए कूपों में, ख़ाली बखारों में, मंदिर के ओटले पर, मस्जिद में, गिरजे में और गुरद्वारों में, ऊंघते बेकारों में मची हाहाकार है..

दृश्य में...
राजा के रथ, अश्व, तूर्य, ध्वजा
भव्य सैन्य दल अस्त्र-शस्त्र से सजा
नेपथ्य में अन्धकार घोर है
शांति नहीं, संगीत नहीं, संभावना है
शोर है!

कोई नहीं देख पाता कि घोड़े के पाँव में गहरा एक घाव है
रुधिर जो जंगल की धरती पर पसरा पलाश सा
कुछ बूंदे गिरकर उसमें मिलती जाती हैं
निःशब्द
टापों के बीच टप-टप-टप
और अश्व हैं कि भागते ही चले जाते हैं  ...







(तीसरा सुत्या दिवस) [2]

राजधानी की सुसज्जित यज्ञशाला
हवन कुंड है धधकता
हविष्य घृत धूप चन्दन
मन्त्रजाप तीव्र, ध्वजा है फहरती
सातों दिशाओं से झुकाए सर खड़े नृप अधिपति कुलाधिपति
इतिहास कंधे झुकाए विज्ञान के संग धो रहा बरतन
बुहारता है राह गीले चश्में से झाँकता वह कृशकाय वृद्ध 
सीने में गोलियों को पुष्पमाल सा सजाये
हंस रहा है गोडसे
तेज़ होते जा रहे हैं अट्टहास
एक बच्चा नींद से उठ रो पड़ा है
डर के शोर से

सोमरस की गंध तीखी
तेज़ मंत्रोच्चार
पारिप्ल्व समाप्त सारे,दीक्षाएं समाप्त, समाप्त उपसद
उपांग याग[3] की प्रतीक्षा में झूमते हैं विप्रवृन्द
बलिगृह से उठ रहीं चीख़ें निरंतर
मन्त्रों में डूबते चीत्कार के करुण स्वर

और उधर वस्त्रावरण में
नग्न महिषी पुरोहित नग्न अश्व घायल
वावाता[4] को गोद में बिठाए राजा उन्मत्त
घायल है अश्व, महिषी घायल पुरोहित कामातुर पढ़ता है मन्त्र करता केलि
            अश्व के पाँवों से रुधिर महिषी की आत्मा से बह रहा है रक्त
                                                                   पुरोहित उन्मत्त
                                                                       राजा उन्मत्त
                                                                    बह रहा है रक्त
                                                               पर्वत शिखर से रक्त
                                                                महासागरों से रक्त
                                                                      जंगलों से रक्त
                                                                    पुरोहित उन्मत्त
                                                                        राजा उन्मत्त
और फिर उठता है खड्ग अंतिम बलिष्ठ
गूंजती जयकार धड़ से अलग सर
लड़खड़ाते पाँव श्लथ रुधिर के भंवर में डूबते हैं
अश्रु स्वेद रक्त सब धरा को चूमते हैं
चौंक कर देखता है उसे राजा और फिर मुंह फेर लेता है
जंगली नदी सी रुधिर की एक धार आती है
और धर्म की ध्वजा और और फहराती है.

उठता हूँ नींद से जाने कि जागरण से
पसीना है कि खून है जाने
अंधेरा इतना कि आँख को कोई रंग नहीं सूझता !




--------
इसे यहाँ सुना भी जा सकता है।



[1] परम्परा में अश्वमेध यग्य का आरम्भ शुक्लाष्ट्मी को ही होता है.
[2] सुत्या सोमरस बनाने की विधि को कहते हैं. अश्व के लौटने के बाद तीन दिनों तक चलने वाले समारोह को सुत्या दिवस कहते हैं.
[3] दान दक्षिणा से अर्थ है
[4] राजा की प्रिय उपपत्नी 

19 comments:

Amit Shukla ने कहा…

"कलम लिए लिए जोंक बन गए सारे
जाकर चिपक गए अश्वों की पीठ से पूँछ से पैर से लिंग से अंड से
कुछ जो चतुर थे जा चिपके राज दंड से"

इतना सच सुनने की आदत नही रही लोगों को, शानदार! बहुत कुछ है इस कविता मे कहने को फिर कभी विस्तार से फेसबूक मे लिखते है ।

Prabhat Ranjan ने कहा…

बहुत खौफनाक कविता है. फैंटेसी, यथार्थ, परम्परा सबको इस लम्बी कविता ने जिस तरह से एकाकार किया है वह बहुत संतुलित है. यही नहीं इस कविता के शिल्प में जिस तरह की नाटकीयता का तनाव है वह काबिले तारीफ है. यादगार कविता.

शाहनाज़ इमरानी ने कहा…

बेहतरीन कविता है _______
ॐ लोकतंत्राय स्वाहा
ॐ मनुष्यताय स्वाहा
ॐ सत्याय स्वाहा
ॐ प्रकाशाय स्वाहा
ॐ एम हवीं क्लीं स्वप्नाय नमः स्वाहा
सभी कविताएँ बहुत बढ़िया हैं।
पुरोहित उन्मत्त
राजा उन्मत्त
बह रहा है रक्त
पर्वत शिखर से रक्त
महासागरों से रक्त
जंगलों से रक्त
पुरोहित उन्मत्त
राजा उन्मत्त
बहुत ही बढ़िया।

Sanjay Jothe ने कहा…

बहुत ही कसी हुई और बहुत विस्तार में झांकती हुई कविता ... एकसाथ बहुत सारे प्रयोग नजर आते हैं... एक बर्बर और उन्मत्त प्रेत द्वारा लोकतंत्र और सभ्यता की बलि दिए जाने का जैसा चित्रण है वह इतना जीवंत है कि पाठक भी अपने खून व पसीने में अंतर न कर पायेगा ... लोकतंत्र के चारों खंभों सहित नींव, धरातल, दीवार, गलियाँ और सब तरह के भविष्य की तरह रखा जाने वाला कलश आदि भी इस प्रेत के कब्जे में हैं ... एक एक करके सब स्वाहा हो रहा है ... सारे संतापो के रक्त और सारे भयों की बर्फ में जैसे आत्मा दबी जा रही ...
यह धरती पर बिछे पलाश के फूल नहीं हैं
उन आवाजों का रक्त है
उन विलापों का रक्त
संतापों का रक्त
भागते हैं अश्व तीर से चुभते हुए जंगल के सीने में
चीखते हैं मोर, मणि, वनदेवी स्वर में समवेत
कहता है सारथी उन्मत्त से स्वर में
‘यह समर्पण ध्वनि है -तूर्य की सी बुझती हुई’

वो सनातन प्रेत जो फिर जाग उठा है उसकी इस तस्वीर से किसे चिंता न होगी ? होनी भी चाहिए ...

Ashok Kumar Pandey ने कहा…

शुक्रिया प्रभात भाई। आपकी सम्मति मेरे लिए क़ीमती है।

अरुण चवाई ने कहा…

एकबारगी लगा कि मुक्तिबोध को पढ़ रहा हूँ...लोकतंत्र की हत्या का दुःस्वप्न पूरी भीषणता से उपस्थित हुआ है। बहुत प्रभावशाली कविता।

Shamshad Elahee "Shams" ने कहा…

अनोखे बिंब,अनोखा शिल्प इस कविता को पढते हुए पाठक किसी दूसरे ही लोक मे पहुंचता ही है कि फौरन कटु यथार्थ के कोडे उसे राजा के अश्वों के समक्ष पटक देते है । उसे अपने चीथड़ों से कीचड धूल साफ करने की सलाहियत से महरूम करती हुई युद्ध मे उतरने को प्रेरित करती है, घायल हथेलियों को किसी बंदूक की बट की तलाश मे धकेलते हुए ।
सशक्त कविता के लिए साधुवाद ।वर्तमान कुहासे पर जनवादी चेतना का प्रतिकार ।

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

भयावह!

सज्जन धर्मेन्द्र ने कहा…

मुझे भी मुक्तिबोध ही याद आए। अच्छी कविता।

अमित श्रीवास्तव ने कहा…

बहुत मारक।
अभी सिर्फ शुरुआत और अंत...

अपनी समझ के हिसाब से कहूँ तो -
सूरज के लिए शुरुआत में बहुत सारे बिम्ब एक साथ आ रहे हैं ,हो सकता है कि ये स्थिति की भयावहता के लिए हो या फिर कुछ साफ़ न देख पाने के कारण। इतना तो तय है कि सूरज हैं लेकिन उजाला नहीं है।

अंत में नींद से उठने या जागरण से उठने के बीच भी घना अन्धेरा है।

ये दोनों ही निपट नंगा सच हैं। बीच बीच में कहीं कहीं उजाले के दाग हैं ... 'गाँवों में, खेतो में, बंजर मैदानों में, भूख से भरे हुए दक्खिन टोले, सहरानों में'
और सच भी इतना ही भर रह गया है कि दिन यहीं कहीं से निकलेगा !

अरुण श्रीवास्तव ने कहा…

आपकी बुलंद आवाज में सुना था इसे ! सिहर गया था !! डरावनी कविता !

लक्ष्मी शर्मा ने कहा…

कसी हुई अर्थगर्भित कविताएँ। बधाई आपको

विशाल श्रीवास्तव ने कहा…

यह कविता मैं पढ़ चुका था, आज इसे दोबारा पढ़ा। हर बार यह कविता एक एकांतिक पाठ की मांग करती है, अँधेरे में चुपचाप इसकी पंक्तियाँ दोहराने का दिल करता है

संतोष चौबे ने कहा…

हाँ जहाँ पहियों के निशान छूट गए हैं विजय चिन्ह की तरह
वहीँ पाँव के निशान कुछ उभरते हैं,
वहाँ जहाँ बज गयी है विजय ध्वनि
कुछ पुरानी आवाजें ठिठकी हुई हैं वहाँ
वहीँ जहाँ धरती के
गर्भ में घाव है हो रही है हलचल कुछ
गीत कुछ विचित्र धुनों में बज रहे हैं
घायल से सैनिक कतारों में सज रहे हैं
......'अद्भुत है

sunil ने कहा…

कविता अच्छी है लेकिन उसे कहने का ढंग और अच्छा है

Basant ने कहा…

इसे केवल कविता कोरी कविता नहीं कह सकते| इस कविता में क्रोध है, हताशा है,लोक है, हमारा समय है| शिल्प - बिम्ब - प्रतीक - शब्द और उनसे व्यंजित अर्थ उस कटु यथार्थ को समाने रखते हैं जो हमारा तो है पर बहुत भयावह है| कही - कहीं इसे पढ़ते हुए रीढ़ में एक सिहरन सी दौड़ जाती है| ऐसा लगता है कि यही वर्त्तमान है और यही शायद भविष्य होने वाला है| सूर्य भी है, अँधेरा भी है सो कुछ साफ़ नहीं होना चाहिए लेकिन सब कुछ दीख रहा है और साफ़ दिखा रही है यह कविता| अभी इसे दो बार पढ़ा लेकिन यह कविता अनेक पाठ किये जाने की अपेक्षा रखती है.

भागते हैं अश्व तीर से चुभते हुए जंगल के सीने में
चीखते हैं मोर, मणि, वनदेवी स्वर में समवेत
कहता है सारथी उन्मत्त से स्वर में
‘यह समर्पण ध्वनि है -तूर्य की सी बुझती हुई’

बहुत कसी हुई कविता है अशोक. बहुत दिनों बाद इतना गंभीर कुछ पढ़ा है कविता के नाम पर. इसे सेव कर रहा हूँ ताकि जब - तब पाठ कर सकूं. कभी कोई कमी तलाश सका तो बताऊंगा. अभी तो अभिभूत ही हूँ.

vijay ने कहा…

अति सुन्दर .............

अपर्णा मनोज ने कहा…

यादगार कविता है आपकी. तद्भव में पढ़ी थी, इसके पहले इसे यू ट्यूब पर भी सुना था. आवेग की सभी ध्वनियाँ यहाँ कितने समयों के आरेख खींचतीं है. इस अश्व पर तो भारत के इतिहास में आज भी लम्बी बहसें चल रही हैं और आपने इस कविता में अश्व के न जाने कितने बिम्ब और प्रतीक रच दिए. ऐसी कविता है कि कवि के साथ पतःक भी इसका पाठ करता जाता है. शुभकामनाएँ .

अपर्णा मनोज ने कहा…

'पाठक' की जगह कुछ गलत लिखने में आ गया है.

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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