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बुधवार, 24 जून 2009

तुम्हारी दुनिया में इस तरह

सिंदूर बनकर तुम्हारे सिर पर
सवार नहीं होना चाहता हूं
न बिछुआ बन कर डस लेना चाहता हूं
तुम्हारे कदमों की उड़ान
चूड़ियों की जंजीर में नहीं जकड़ना चाहता
तुम्हारी कलाईयों की लय
न मंगलसूत्र बन झुका देना चाहता हूं
तुम्हारी उन्नत ग्रीवा
किसी वचन की बर्फ़ में
नही सोखना चाहता तुम्हारी देह का ताप
बस आंखो से
बीजना चाहता हूं विश्वास
और दाख़िल हो जाना चाहता हूं
ख़ामोशी से तुम्हारी दुनिया में
जैसे आंखों में दाख़िल हो जाती है नींद
जैसे नींद में दाख़िल हो जाते हैं स्वप्न
जैसे स्वप्न में दाख़िल हो जाती है बेचैनी
जैसे बेचैनी में दाख़िल हो जाती हैं उम्मीदें

31 comments:

ओम आर्य ने कहा…

bahut hi nek khyal hai par der kis baat ki hai ......aamin

mukesh ने कहा…

wah !!
aap apne andar ki stree ko bahut achchhe se pehhan gye hai ashok ji !
khair iski prerna koun hai ?
agar batana chahe to jarur bataye

ओम आर्य ने कहा…

ऐसी श्रद्धा....शब्द नहीं हैं कहने के लिए. वाकई !

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

मेरी दोस्त,कामरेड,प्रेयसी और शरीक़े हयात भाई…वही है …

विभाव ने कहा…

मुझे बहुत दिनों बाद अच्छी कविता पढ़ने को मिली। बधाई। वाकई बहुत अच्छी कविता है। लोग कविता की व्याख्या व्यक्ति सापेक्ष करते हैं। लेकिन यह कविता समाज, विचार एवं उद्देश्य सापेक्ष है। अर्थ की गहराई इन संदर्भों में ही संभव है।
साधुवाद

nidhitrivedi28 ने कहा…

This is really awesome...
It seems that your Mind & Heart is very true.
What u want to say is very clear.
I must say this is Like "Nari Mukti".
Too good...
If every man thinks like this with true heart there where no need to fight for Womens Liberty...

varsha ने कहा…

arddh nareeshwar se aage ka falsafa sakar hota hua..........

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

बहुत सुंदर कविता, जो स्त्री को अपने ही बराबर का सम्मान देती है।

Mired Mirage ने कहा…

बहुत सुन्दर व सही विचार हैं।
घुघूती बासूती

शरद कोकास ने कहा…

चौथी पंक्ति से "को " हटा दो ,नवीं पंक्ति और अंतिम पंक्ति भी हटा दो .कविता बहुत सशक्त है

Udan Tashtari ने कहा…

साधुवाद!! क्या बात है जनाब..आनन्द ही आनन्द आ गया.

आकांक्षा~Akanksha ने कहा…

आप लिख ही नहीं रहें हैं, सशक्त लिख रहे हैं. आपकी हर पोस्ट नए जज्बे के साथ पाठकों का स्वागत कर रही है...यही क्रम बनायें रखें...बधाई !!
___________________________________
"शब्द-शिखर" पर देखें- "सावन के बहाने कजरी के बोल"...और आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाएं !!

neera ने कहा…

बहुत सुंदर!
स्त्री का अस्तित्व लौटाती, सार्थक करती, सम्पूर्णता देती,
हमेशा याद रहनी वाली कविताओं में से एक है.

‘नज़र’ ने कहा…

प्रेम और आत्मा के मिलाप से जन्मी कविता

आशुतोष दुबे "सादिक" ने कहा…

बहुत सुन्दर व सही विचार हैं।

"हिन्दीकुंज"

Sushila Puri ने कहा…

अशोक जी !
इतनी सुन्दर रचना के लिए बधाई ........

shikha varshney ने कहा…

Bahut hi khubsurat rachnayen hain Ashok ji..bahut achcha laga padkar

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

ashok ji ,

namaskar ...

aapki ye kavita bahut hi saartakh hai...stree ke prati aadar darshati hui ,unka maan badathi hui ..aur unhe ek gauravshaali staan deti hui ye rachna hai ..

maatr solah shringaar hi nahi apitu ..ek viswaas aur umeed bhi tiki hoti hai apni stree se ....

aapka ye sandesh ,bahut hi sashakt shabdo me vyakt hua hai ..

aapko bahut abhaar is post ke liye ..

aapka
vijay

रंगनाथ सिंह ने कहा…

वाह क्या बात है !!
कविता की शुरूआती अंश तो गजब का है।
कोकास जी ने जो टिप्पणी की है उस पर ध्यान देते हुए कुछ एडिटिंग कर देंगे तो कविता और भी चुस्त हो जाएगी। खास तौर पर अंत की लाईनें कविता के शरूआती टेंपर से मेल नहीं खातीं।
शानदार कविता के लिए एक बार फिर से बधाई

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

रंगनाथ जी

शरद भाई की सलाह तो पहले ही लागू की जा चुकी है।फिर भी आपकी सलाह पर गौर करुंगा।

आंकाक्षा जी
आप जैसे लोग टिप्पणीयों को मज़ाक बना देते हैं कि एक बार लिखी और कट कापी करके 50 जगह लगा दीं…कारण सब जानते हैं।
या तो गम्भीरता से पढ कर टिप्पणी दें या माफ़ करें। हम 50-60 की दौड मे नहीं।

Abhishek Prasad ने कहा…

kavita achhi lagi... par aapke blog ka naam... thoda aascharya hua... asuvidha... ye kaisa naam hai... shabdon se bhala kaisi asuvidha...
waise aapki kavita padhkar aisa nahi lagta hai ki aapko koi asuvidha hai...

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

अभिषेक भाई
ब्लाग पर आने के लिये धन्यवाद
मेरे लिये कविता लिखना निरन्तर एकालाप की सुविधा नहीं बल्कि ख़ुद से मुसलसल ज़द्दोज़ेहद की असुविधा है … बस इसीलिये

sanjaygrover ने कहा…

भई अशोक जी, पता नहीं था कि ‘असुविधा‘जनक रास्ते से आने से इतनी अच्छी कविताएं पढ़ने को मिलेंगीं अन्यथा हमेशा यहीं से आता। दोनों कविताएं गज़ब की हैं। ‘अच्छे आदमी’ कविता तो लगता है मैंने ही लिखी है।

शोभना चौरे ने कहा…

nari ke shrgar par to aneko kavitaye rachi gai hai kintu nari ke mulbhut shrgar ko samman dekaraapne nari ke prti jo vishvas ko ukera hai vo kabile tareef hai.
ak achi soch aur rchna ke liye badhai swekare.

रवि कुमार, रावतभाटा ने कहा…

आपकी कविताओं से गुजरना एक अनोखा अहसास है...
रूढियों और परंपराओं को वाकई "असुविधा" पैदा कर रहे हैं आप...

sandhyagupta ने कहा…

Achchi rachna hai.

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

आपकी फालोअर बनने के बावजूद अपडेट्स नही आ रही थी मेरे ब्लॉग में इसलिये देर हो गई इस सुंदर कविता को पढ़ने में...! बहुत अच्छा लगा पढ़ कर...! ऐसा पुरुष मिले तो कौन सी स्त्री उसे अपने सिर पर नही रखेगी, पैर की जंजीर नही बना लेगी और गले में डालने को सिर नही झुका लेगी...! बहुत खूब..!

समय ने कहा…

समय को चुनौती देते शब्द।
दृष्टिकोणों में खलबली जरूर मचाएंगे, जो भी इनसे गुजरेगा।

प्रदीप कांत ने कहा…

जैसे आंखों में दाख़िल हो जाती है नींद
जैसे नींद में दाख़िल हो जाते हैं स्वप्न
जैसे स्वप्न में दाख़िल हो जाती है बेचैनी
जैसे बेचैनी में दाख़िल हो जाती हैं उम्मीदें

BAHUT BADHIYA ASHOK BHAI

गौतम राजरिशी ने कहा…

प्रेम का अनूठापन...

leena malhotra ने कहा…

bina shabdo ka bojh uthaye bhavnaao ko sampreshit karti ek kavita jo kavi kee parishkrit soch ko hamare saamne rakhtee hai. ek bahut achhi kavita. stree ka utthan purush ke sambal ke bina sambhav nahi hai. badhai.

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