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गुरुवार, 27 अगस्त 2009

मै अर्जुन नही हूँ

अर्जुन नहीं हूं मैं
भेद ही नहीं सका कभी
चिडिया की दाहिनी आंख

कारणों की मत पूछिये
अव्वल तो यह
कि जान गया था पहले ही
मिट्टी की चिडिया चाहे जितनी भेद लूं
घूमती मछ्ली पर उठे धनुष से
छीन लिया जायेगा तूणीर

फिर यह कि रुचा ही नहीं
चिडिया जैसी निरीह का शिकार
भले मिट्टी का हो
मै मारना चाहूंगा किसी आदमखोर को

और मेरी नज़र हटती ही नहीं थी
बाईं आंख की कातरता से
मुझे कोई रुचि नहीं थी
दोस्तों से आगे निकल जाने में
भाई तो फिर भाई थे

मै तो सजा कर रख देना चाहता था
उस मिट्टी की चिडिया को पिंजरे में
कि आसमान में देख सकूं एक और परिंदा
मै उसकी आंखों में भर देना चाहता था उमंग
स्वरों में लय, परों में उडान

और ख़ुश हूं अब भी
कि कम से कम मेरी वज़ह से
नहीं देना पडा
किसी एकलव्य को अंगूठा।

14 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

अर्जुन के चरित्र पर व्यवस्था की छाप है। पर वह बदरंग हो गया है। उसे चमकना चाहिए था। उसे गंदगी पर व्यवहार करना चाहिए था। युद्ध के लिए प्रेरित व्यक्तित्व। पर इस अर्जुन के लिए एक नई गीता के सृजन की आवश्यकता है।

Suman ने कहा…

nice

Bahadur Patel ने कहा…

achchhi kavita hai. badhai.

neera ने कहा…

आह! कितना गहरा! कितना सटीक!

varsha ने कहा…

मुझे कोई रुचि नहीं थी दोस्तों से आगे निकल जाने में
vakai gahra satwik bhav.

अजित वडनेरकर ने कहा…

व्यवस्था और परम्परा पर करारा व्यंग्य

शरद कोकास ने कहा…

इस मिथक पर इतना कुछ लिखा जा चुका है फिर भी एक नई बात कवि ढूँढ ही लाता है अच्छी लगी यह कविता , बधाई ।

प्रदीप कांत ने कहा…

और ख़ुश हूं अब भी
कि कम से कम मेरी वज़ह से
नहीं देना पडा
किसी एकलव्य को अंगूठा।

दिनेश जी ने सही कहा है -
इस अर्जुन के लिए एक नई गीता के सृजन की आवश्यकता है।

Harkirat Haqeer ने कहा…

मै तो सजा कर रख देना चाहता था
उस मिट्टी की चिडिया को पिंजरे में
कि आसमान में देख सकूं एक और परिंदा
मै उसकी आंखों में भर देना चाहता था उमंग
स्वरों में लय, परों में उडान

और ख़ुश हूं अब भी
कि कम से कम मेरी वज़ह से
नहीं देना पडा
किसी एकलव्य को अंगूठा।


वाह..... आज तो एक से एक शानदार कवितायें पढ़ने को मिल रही हैं अभी शरद जी की कविता ने हतप्रद कर कर दिया और अब आपकी .....!!

रवि कुमार, रावतभाटा ने कहा…

परंपरागत सोच पर एक नया दृष्टिकोण देती अनूठी कविता...

रंगनाथ सिंह ने कहा…

sahi samay par aayi hai ye kavita.... adhunik dron prabhas joshi fir se eklavya kaangutha mang rhe hai...

मीनू खरे ने कहा…

और ख़ुश हूं अब भी
कि कम से कम मेरी वज़ह से
नहीं देना पडा
किसी एकलव्य को अंगूठा।

बहुत साहस है इस व्यंग्य में.

Apoorv ने कहा…

और ख़ुश हूं अब भी
कि कम से कम मेरी वज़ह से
नहीं देना पडा
किसी एकलव्य को अंगूठा।

इतिहास सिर्फ़ कुछ लोगों की जीत और हार की दास्तान ही नही बल्कि उन लोगों की अनुभूतियों और उनके व्यक्तित्व की रचना प्रक्रिया का दस्तावेज भी है..ऐसा ही कुछ बोध कराती है आपकी अद्भुत कृति..बधाई.

मुकेश कुमार तिवारी ने कहा…

अशोक जी,

कविता बहुत ही अच्छी लगी, महाभारतकालीन पात्रों के माध्यम से वर्तमान व्य्वस्था से सीधा संवाद करती हुई।

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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