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शुक्रवार, 14 मई 2010

हम नालायक बेटे

कोई नहीं आया दरवाज़े पर
पिता की प्रतिष्ठा बढ़ाने
सारे विवाह गीत मां के होठों में दबे रह गये
नहीं मिला बुआ को जड़ाऊ हार
दोस्तों की सारी रात नाचते रहने की तमन्ना अधूरी रह गयी
भाई तरसता रहा सहबाला बनने को

गहनों की आकांक्षा तो शायद उसको भी थी
जिसके दरवाज़े पर नहीं आई घोड़ों वाली बारात
जिसके पिता को नहीं पूजना पड़ा पांव
उसकी भी मां के सीने से लग अहक-अहक रोने की चाह अधूरी रह गयी

सोहर से शुरु हुए सफ़र में
कितनी उम्मीदें थी हमारे कांधों पर सवार
हर अंकपत्र से बलवती होतीं कितनी आकांक्षायें
एक पूरा समाज था
ईर्ष्या और आकांक्षाओं के रथ पर सवार
कितने ही यज्ञों का अश्व बनना था हमें
कितने ही कृष्णों का अर्जुन
कितने ही किस्सों का नायक … सहनायक

हम पुरुष थे अधिकार और गर्व से भरे
कर्तव्यों का उतना बोझ नहीं था कभी
कितनी वैतरणियां थीं हमारी गर्वीले कांधों के इंतज़ार में
कितनी परंपरायें, पूर्वजों के कितने किस्से
कितने ही धनुष थे हमारे इंतज़ार में और कितनी ही चिड़ियां
हमारी उम्र से भारी कितनी ही उम्मीदों का तूणीर…

सब के सब निराश
सब के सब नाराज़
सब के सब निरुपाय
हम तोड़ आये सारे चक्रव्यूह
और ठुकरा दिया गर्भ में मिला ज्ञान

हम नालायक़ पुत्र अपने पिताओं के
पूर्वजों के माथे का कलंक घोर
हम हत्यारे कितनी उम्मीदों के
हम अपराधी कितनी परंपराओं के

कर्तव्यों के मारे हम
छोड़ी अधिकारों की चाह
और चुनी ख़ुद अपनी राह…

14 comments:

Satya.... a vagrant ने कहा…

क्युँ ऐसा लिख देते हो अशोक कि मन भारी हो जाये... मुझे फिर फिर से ना बताओ कि मैने कितनी आशाये तोडी हैँ........ कि शायद नालायक शब्द भी तुक्छ हो. किस्सा कोताह.. उद्वेलित करती रचना.
सत्य

kunwarji's ने कहा…

ab kya kahe ji.....
prastuti to jabardast hai

kunwar ji,

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

वादा कर के न आई बारात वाले घर की सारी उदासी, टूटे सपनों की राख इस कविता में बोलती है।

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

दिनेश जी शायद मेरे संप्रेषण में कोई समस्या रह गयी…कविता का स्वर दूसरा है…

दिलीप ने कहा…

aaj ki tasveer dikhayi aapne rachna ke maadhyam se ...dhanywaad

rashmi ravija ने कहा…

कर्तव्यों के मारे हम
छोड़ी अधिकारों की चाह
और चुनी ख़ुद अपनी राह…

बस समय की पुकार यही है...उद्वेलित करती हुई रचना...

प्रदीप कांत ने कहा…

हम नालायक़ पुत्र अपने पिताओं के
पूर्वजों के माथे का कलंक घोर
हम हत्यारे कितनी उम्मीदों के
हम अपराधी कितनी परंपराओं के

कर्तव्यों के मारे हम
छोड़ी अधिकारों की चाह
और चुनी ख़ुद अपनी राह…

सत्य ....

CLUTCH ने कहा…

khoob likha hai bohot accha laga yeh pad kar aapse mil kar behad khusi hui...

pankaj srivastava ने कहा…

एक नालायक दूसरे नालायक की तारीफ कैसे करे...बस इतना दावा करना है कि ये कविता अशोक कुमार पांडेय ने नहीं लिखी...ये बेहतर दुनिया की चाह रखने वाले नालायकों का सामूहिक पत्र है..

रवि कुमार रावतभाटा ने कहा…

हम तोड़ आये सारे चक्रव्यूह
और ठुकरा दिया गर्भ में मिला ज्ञान....

सबसे बड़ी बात इस चक्रव्यूह की सही समझ ही है...
कारा तोड़ने के लिए...

गज़ब के शब्द...जो कभी-कभी की ईमानदार चिलकन को बेहतर अभिव्यक्त कर रहे हैं...और प्रतिबद्धता को भी बखूबी बरअक्स रख रहे हैं....

neera ने कहा…

आईने के सामने गुनाह कबूल करता बेटा और मन को विचलित करते शब्द....

सागर ने कहा…

पंकज जी ने जो कहा वही मुझे भी कहना है... एक सामूहिक कविता ... मेरे मन की बात यहाँ कविता बन कर उभरी है...

Aseem ने कहा…

अशोक इस कविता ने मेरे मन तुम्हारा कद और बड़ा कर दिया है.ये कविता नहीं एक साहसिक कन्फेशन है जो तथाकथित भारत के "नालायक बेटों" के अंतरद्वन्द और किंकर्तव्यविमूढता को बखूबी बयां करती है.

ये कविता और पहले आनी चाहिए थी !

Aseem ने कहा…

अशोक इस कविता ने मेरे मन में तुम्हारा कद और बड़ा कर दिया है.ये कविता नहीं एक साहसिक कन्फेशन है जो तथाकथित भारत के "नालायक बेटों" के अंतरद्वन्द और किंकर्तव्यविमूढता को बखूबी बयां करती है.

ये कविता और पहले आनी चाहिए थी !

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