अभी हाल में

:


विजेट आपके ब्लॉग पर

रविवार, 26 दिसंबर 2010

इस ज़िंदां में कितनी जगह है


सुना है हाकिम सारे दीवाने अब ज़िंदां के हवाले होगे
सारे जिनकी आँख ख़ुली है
सारे जिनके लब ख़ुलते हैं
सारे जिनको सच से प्यार
सारे जिनको मुल्क़ से प्यार
और वे सारे जिनके हाथों में सपनों के हथियार
सब ज़िंदां के हवाले होंगे!

ज़ुर्म को अब जो ज़ुर्म कहेंगे
देख के सब जो चुप न रहेगें
जो इस अंधी दौड़ से बाहर
बिन पैसों के काम करेंगे
और दिखायेंगे जो उनके चेहरे के पीछे का चेहरा
सब ज़िंदां के हवाले होंगे

जिनके सीनों में आग बची है
जिन होठों में फरियाद बची है
इन काले घने अंधेरों में भी
इक उजियारे की आस बची है
और सभी जिनके ख़्वाबों में इंक़लाब की बात बची है
सब ज़िंदां के हवाले होंगे

आओ हाकिम आगे आओ
पुलिस, फौज, हथियार लिये
पूंजी की ताक़त ख़ूंखार
और धर्म की धार लिये
हम दीवाने तैयार यहां है हर ज़ुर्म तुम्हारा सहने को
इस ज़िंदां में कितनी जगह है!

कितने जिंदां हम दीवानों के
ख़ौफ़ से डरकर बिखर गये
कितने मुसोलिनी, कितने हिटलर
देखो तो सारे किधर गये
और तुम्हें भी जाना वहीं हैं वक़्त भले ही लग जाये
फिर तुम ही ज़िंदां में होगे!

* ज़िंदां- कारावास

9 comments:

राजेश उत्‍साही ने कहा…

हम सबको इसके लिए तैयार रहना होगा।
समकालीन परिदृश्‍य यही कहता है।
*
कल मैंने विनायक सेन को आजीवन कारावास की सजा पर कहा था कि यकीन नहीं होता हम हिन्‍दुस्‍तान में रह रहे हैं। किसी मित्र ने प्रत्‍युत्‍तर में कहा मुझे तो यकीन हो गया है कि हम हिन्‍दुस्‍तान में ही रह रहे् हैं। अब मैं भी उसकी बात से सौ प्रतिशत सहमत हूं।

prkant ने कहा…

अच्छी कविता.
व्यवस्था एक ऐसी दिशा में जा रही है जिसका अंत सोचकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं.
असहमति देशद्रोह का पर्याय बना दी गयी है.
सही के साथ खड़े होना 'व्यवस्था बिगाडना' बताया जाता है.
बात करने पर पहरेदारी है.
सोचने पर प्रतिबन्ध लगाकर शायद लोकतंत्र के स्वर्णकाल की घोषणा की जानी बाकी है.

मनोज पटेल ने कहा…

हम देखेंगे...........

उपेन्द्र ' उपेन ' ने कहा…

अशोक जी , कविता निश्चय ही व्यवस्था के बुराईयों के खिलाफ हिम्मत दे रही है.....
फर्स्ट टेक ऑफ ओवर सुनामी : एक सच्चे हीरो की कहानी

रवि कुमार ने कहा…

तोड़ने ही होंगे गढ़ और मठ सब....

neera ने कहा…

नए वर्ष की शुरुआत और चारों और अन्धेरा रोंगटे खड़े करने वाली सच्चाइयों का! यही उम्मीद की ... इस ज़िंदा में जगह बनी रहे....

firoj khan ने कहा…

ummeed karta hu ki sarkaren ese logon k liye aur zinda banayeN. yah zaruri he....
hum sabke liye.

rashmi ravija ने कहा…

कविता से उपजा आक्रोश भीतर तक उतर जाता है....अब और क्या क्या देखना बाकी रह गया है.

असीम ने कहा…

एक निर्भीक और ज़रूरी प्रश्न.! जो युगों से चला आ रहा है और जिसका जवाब समय समय पर ढूढने में कोशिश की गयी - गांधी,आज़ाद, भगत सिंह,जय प्रकाश नारायण, अंग सां सू की, मंडेला .और अनगिनत बेनाम लोगों द्वारा

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

फेसबुक से आये साथी

 
Copyright (c) 2010 असुविधा.... and Powered by Blogger.