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शनिवार, 26 मई 2012

भगवत ने लोक की आत्मा से हिंदी को समृद्ध किया -विष्णु खरे



वरिष्ठ कवि भगवत  रावत पर यह श्रद्धांजलि आलेख  विष्णु खरे जी ने भेजा है...इस  अनुमति के साथ कि ' किसी भी ब्लॉग या पत्र-पत्रिका में प्रकाशित किया जा सकता है ' तो संभव है यह कुछ और जगहों पर प्रकाशित हुआ हो. 
13 सितंबर 1939- 25 मई 2012 
हिंदी साहित्य जगत बरसों से वाकिफ था कि भगवत रावत गुर्दे की गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे.उनका यह लंबा संघर्ष उनकी ऐहिक और सृजनात्मक जिजीविषा का प्रतीक था और कई युवतर,समवयस्क और वरिष्ठ लेखकों को एक सहारा,उम्मीद और प्रेरणा देता था.पिछले दिनों तो ऐसा लगने लगा था कि उन्होंने रोग और मृत्यु दोनों पर विजय प्राप्त कर ली है.लिखना तो उन्होंने कभी बंद नहीं किया,इधर वे लगातार भोपाल की सभाओं,संगोष्ठियों और काव्य-पाठों में किसी न किसी वरिष्ठ हैसियत से भाग ले रहे थे.उनसे अब उनकी तबीयत के बारे में पूछना चिन्तातिरेक लगने लगा था.जो कई पत्र-पत्रिकाओं में और सार्वजनिक आयोजनों में प्रतिष्ठित कवि और एक हड़काऊ किन्तु स्नेहिल बुजुर्ग की तरह सक्रिय हो,उसकी मिजाजपुर्सी एक पाखण्ड ही हो सकती थी.कम से कम मैं निश्चिन्त था कि अभी कुछ वर्षों तक भगवत का कुछ बिगड़नेवाला नहीं है.इसलिए उनकी मृत्यु अब नितांत असामयिक और एक बड़ा सदमा लग रही है.


सोमदत्त,भगवत रावत,दिनेशकुमार शुक्ल और अष्टभुजा शुक्ल जैसे कवि हिंदी कविता की उस धारा में आते हैं जिसके मूल स्रोत यूँ तो निराला ही हैं लेकिन वह एक ओर मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय तो दूसरी ओर केदारनाथ अग्रवाल,नागार्जुन और त्रिलोचन से भी जीवन-जल और प्रवाह पाती है – यद्यपि निजी तौर पर मैं केदारनाथ अग्रवाल को इन सब से कहीं कमज़ोर पाता हूँ.भगवत का भरोसा हमेशा मार्क्सवाद,साम्यवाद,धर्म-निरपेक्षता और प्रतिबद्धता में रहा,लेकिन वह हमेशा उस कविता का पक्षधर रहा जो आम-से-आम आदमी को ज़्यादा-से-ज़्यादा समझ में आए और उसे निस्संकोच,निर्भय सुनाई जा सके.वह अपनी कविता को तभी पूरी-हुई समझता था जब सबसे पहले उसके उसके श्रोता उसे सुनें-समझें-सराहें  – सहृदय-गुणग्राहक पाठकों का स्थान दूसरे क्रम पर आता था.भगवत की कविता और कविता पर उसके लेखन या साक्षात्कारों में यह प्रतिज्ञा प्रत्यक्ष-प्रच्छन्न रूप में हमेशा मौजूद रही.आज की कविता को जन-स्वीकार्य बनाने का उसका एक निजी,ज़िद्दी अजेंडा था.उसके साथ सार्वजनिक काव्य-पाठ खतरे से खाली नहीं होता था,कुछ उसकी किमाश की कविताएँ अपने पास रखनी पड़ती थीं.



भगवत ( और सोमदत्त ) बुंदेलखंड की जुझारू,समृद्ध और ऐन्द्रिक काव्य-परम्परा से आते थे और उसे सगर्व अपने रक्त-मज्जा में महसूस करते थे.दोनों धाराप्रवाह बुन्देली बोल सकते थे और आल्हा से लेकर रई की पंक्तियाँ उन्हें धुन-सहित कंठस्थ थीं.लेकिन उन्होंने अपने बुंदेले होने को उस तरह साहित्यिक या भाषाई वैधता या रियायत की रिरियाती राजनीति का धंधा नहीं बनाया जैसा हिंदी के विरुद्ध असफल  नमकहराम षड्यंत्र कर रहे, ग़लत-सलत भाषा लिखनेवाले कुछ चालाक,दोमुंहे,प्रतिभाशून्य हुडुकलुल्लू-मार्का  कवि-लेखक लोक-लोक करते हुए अपनी आंचलिक भाषाओँ को बनाए डाल रहे हैं.भगवत ने लोक की आत्मा से हिंदी को समृद्ध किया,उसकी उधेड़ी गयी चमड़ी के दस्ताने पहन कर  पीठ में छुरेबाजी नहीं की.


निम्न- और निम्नमध्यवर्गीय हिंदीभाषी समाज भगवत रावत की कविता के केन्द्र में है.उसमें शोषित बच्चे,लड़के-लड़कियां,स्त्रियां,वंचित,दलित,श्रमजीवी सब शामिल हैं.गाँव-खेड़े से भी भगवत का परिचय निजी और गहरा है.यदि एक ओर साधारणजन के प्रति गहरी करुणा और सहानुभूति उनकी कविता के केंद्र में है तो वे अपने ही आसपास के अपने-जैसे लोगों के पाखण्ड,महत्वाकांक्षा,अवसरवादिता,तोताचश्मी और छल-छद्म को भी खूब जानते-पहचानते हैं और कभी नहीं बख्शते.साथ में यह भी है कि दोस्तों और दोस्ती के जज्बे पर जितनी और जैसी कविताएँ भगवत के यहाँ हैं वैसी शायद शमशेर के अलावा और हिंदी में किसी कवि के पास नहीं हैं.और यह सिर्फ कविता में दिखाने के दाँत नहीं थे – भगवत की इस नावाजिब मौत पर उनके सैकड़ों मित्र और हजारों पाठक शोकार्त्त होंगे.


वह हिंदी के उन विरले कवियों में थे जिन्होंने अपनी कविता के आदर्शों और अपने निजी जीवन के बीच  कम-से-कम दूरी और विरोधाभास रखने की यथासंभव कोशिश की.भोपाल में,जो देखते-ही-देखते दूसरी दिल्ली बन गया है,जिसका अहसास शायद उन्हें ही सबसे ज़्यादा था,भगवत एक कठिनतर होते गए समय में एक नैतिक उपस्थिति भी थे.हम कह सकते हैं कि वे एक अपेक्षाकृत छोटे राजधानी-महानगर के तमाम प्रलोभनों,आकर्षण-विकर्षणों और लगभग आधी सदी के बहुविध निजी परिचयों-संबंधों के बावजूद वहाँ के लेखकीय ज़मीर के एक पहरुए थे.सीमाओं और आलोचनाओं के बावजूद उनकी आवाज़ को सुना और माना जाता था.कमलाप्रसाद के बाद भगवत रावत के चले जाने से यह आशंका प्रबल हो उठी है कि भोपाल का निर्लज्ज और उच्छ्रंखल उपग्रही दिल्लीकरण अब और तीव्रतर तथा दुर्निवार हो उठेगा, जिसका दुष्प्रभाव वृहत्तर हिन्दी विश्व पर पड़े बिना न रहेगा.



भगवत रावत ने एक और उदाहरण प्रस्तुत किया है जिसकी ओर आजकल अमूमन ध्यान नहीं दिया जाता.वे नागार्जुन,शमशेर और त्रिलोचन के अकुंठ प्रशंसक थे लेकिन अपने निजी और पारिवारिक जीवन में उन्होंने अपने इन तीनों वरिष्ठों की औघड़ शैलियों का वरण नहीं किया.एक-से-एक बोहीमियन उनके यहाँ बेरोक-टोक आते-जाते थे,वे खुद भी पुराने भोपाल की यारबाशी में यकीन करते थे,हिंदी का कोई छोटा-बड़ा परिचित-अपरिचित  ऐसा लेखक नहीं जिसे उन्होंने साग्रह अपने यहाँ आमंत्रित न किया हो और वह सहर्ष गया न हो, लेकिन उन्होंने इस सबको अपने अच्छे पति,पिता,मित्र,गृहस्थ और ज़िम्मेदार,प्रतिबद्ध नागरिक होने के आड़े नहीं आने दिया.उनपर कई पारिवारिक संकट भी आए लेकिन उनका कोई विलाप-क्रंदन उनके यहाँ नहीं मिलता.उलटे वे हमेशा दूसरों के संकट के समय हर मदद के लिए खड़े दिखाई दिए.बेशक उनकी कविता और उनके जीवन ने इसी तरह एक-दूसरे को समृद्ध किया.


उन्होंने छोटी-से-छोटी और लंबी-से-लंबी कविताएँ लिखीं,छंद पर भी उनका असाधारण अधिकार था,कविता को संप्रेषणीय कैसे बनाते हैं इसमें उन्हें महारत हासिल थी,उनके कविता-पाठ और भाषण असरदार होते थे,वे लगभग अजातशत्रु थे, लेकिन उनकी समीक्षाएँ और आलोचना भोंथरी नहीं होती थीं.दुर्भाग्य यही है कि उनके कई भाषण अलिखित-असंकलित ही रह गए.अपने सचिव-काल में उन्होंने मध्यप्रदेश साहित्य परिषद को शानी,सुदीप बनर्जी और अपने अभिन्न मित्र सोमदत्त जैसों का उत्तराधिकारी होने के बावजूद एक अलग अस्मिता दी.बहुत कम लोग जानते हैं कि वे कन्नड बखूबी बोल लेते थे और अपने अकादमिक विषय हिंदी के एक बेहतरीन प्राध्यापक थे जिन्होंने स्वयं को गुरुडम और मठाधीशी से कतई दूर रखने में अविश्वसनीय सफलता प्राप्त की.


भगवत रावत से यह सीखा जा सकता है कि एक सादा,रोज़मर्रा हिन्दुस्तानी जुबान और अनलंकृत शैली में प्रभावी कविता कैसे लिखी जाए.वह यह भी बताते हैं कि हमारे आसपास के जीवन में भी अभी कितनी अक्षुण्ण काव्य-सामग्री बची हुई है.फिर यह कि कवि को हमेशा श्रोताओं का सामना करना चाहिए और ऐसे मुकाबले से कुछ सीखना चाहिए.अदम्य जनोन्मुख जिजीविषा काल से होड़ लेनेवाली सृजनशीलता को जन्म दे सकती है.यह भी कि भले ही अच्छे कवि का अच्छा इंसान और अच्छा गृहस्थ होना हमेशा और हर जगह संभव,वांछनीय और अनिवार्य भले ही न हो,भारत जैसे देश और समाज में उसकी कोशिश करते रहने में आखिर हर्ज क्या है ?

10 comments:

ramji ने कहा…

उन्होंने हमें यह भी सिखाया कि कविता और जीवन दोनों में सरलता और सादगी बरती जा सकती है , और उसके बल पर दोनों को ऊँचा भी उठाया जा सकता है ...उनकी स्मृति को नमन ..

nand lal ने कहा…

रावत जी की एक खूबी यह भी थी कि मुक्तिबोध की कविताओ को बड़े अच्छे ढग से पढ्ते थे । एक बार भोपाल में उन्होने मुझे "भूल-गलती ' सुनाई थी जिसकी अनूगुंग आज भी मेरे कानों में है । वे मानते थे कि इस कविता से मुक्तिबोध ने एक नया टर्न लिया था और अगर वे कुछ दिन और स्वस्थ रहते तो इसी तेवर की कविताएं लिखते । अंत में, रावत जी की ही कविता कि एक पंक्ति से उन्हे श्रद्धाजलि " जाते हुए मैने उसका पीठ नही चेहरा देखा था '

प्रियंकर पालीवाल ने कहा…

अस्सी के दशक में जब कॉलेज में था साप्ताहिक हिंदुस्तान में पोस्टर की तरह छपी उनकी कविता ’तीजन बाई’ से उन्हें सबसे पहले जानना-समझना और उनकी कद्र करना शुरू किया था. साप्ताहिक हिंदुस्तान का वह बीच वाला पन्ना अब भी है मेरे पास . सुरक्षित . खानाबदोशी में चार-पांच शहर बदलने के बाद भी . उसके करीब पन्द्रह वर्ष बाद होशंगाबाद में उनसे पहली मुलाकात हुई -- भवानी भाई पर एक कार्यक्रम में . और मिलने के बाद वे व्यक्तित्व हिस्सा हो गए . गत वर्ष कविता-पत्रिका अक्षर का सलाहकार होना उन्होंने इतनी सहजता से और इतने भरोसे के साथ स्वीकार किया कि मैं अभिभूत था . मेरी विनम्र श्रद्धांजलि !

Arun Aditya ने कहा…

विष्णु जी ने सरल हृदय के विरल कवि का सजीव चित्र बना दिया है। भगवत जी अपनी कविताओं और ऐसे ही चित्रों में जिंदा हैं, जिंदा रहेंगे।

kumar anupam ने कहा…

Bahut Dukh Hai Ki 1 Bade Kavi Ko Hindi Samuday Ne Kho Diya Hai. Ab Dada Ki Aawaz Phon Pr Bhi Sun-ne Ko Nahi Milegi...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

नवनीत पाण्डे ने कहा…

ऎसे जीवट और यादगार-आत्मीय व्यक्तित्व बहुत ही कम देखने को मिलते है, वे लोग बड़भागी रहे हैं जिन्हें भगवत रावत जी का सानिध्य और स्नेह मिला! आलेख साझा करने के लिए असुविधा का आभार!

प्रदीप कांत ने कहा…

एक ही बार भगवत जी से बात हो पाई थी और महसूस हुआ था कि वे अपनी तरह के एक आत्मीय व्यक्तित्व और कवि हैं।

राजेश उत्‍साही ने कहा…

भोपाल में कई बार उन्‍हें सुनना और देखना हुआ। दिल्‍ली को लेकर लिखी गईं उनकी कविताएं अचानक ही याद आ जाती हैं। उनकी कविताएं हमेशा रहेंगी ही।

नंद भारद्वाज ने कहा…

भगवत रावत पर विष्‍णुजी का विवेचन हमेशा संजीदा और विचारणीय रहा है। यह आलेख उनकी रचनाशीलता के विभिन्‍न पक्षों को बेहतर ढंग से उदघाटित करता है।

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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