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रविवार, 3 फ़रवरी 2013

राजेश जोशी की कवितायें


राजेश जोशी हमारे समय के बेहद ज़रूरी कवि हैं. विचारधारा के क्षय के इस दौर में पिछले चार दशकों से वह जिस ज़िद और जिस उत्साह के साथ कविता को परिवर्तन के हथियार की तरह बरतने की कोशिश कागज़ से सड़क तक करते रहे हैं, वह मुझ जैसे युवा कलमकारों के लिए एक प्रेरणा की तरह काम करता है. ज़ाहिर है कि वे लोग जिन्होंने विचारधारा को प्रगति की सीढियों की तरह उपयोग करने के बाद अब उससे पीछा छुडाना चाहते हैं, उन्हें उनकी कविता असुविधा की तरह लगती है, चुभने वाली, तीखी. खुद को स्थापित करने की शर्मनाक कोशिश में लगे लोगों को कभी नहीं समझ आएगा कि "डायरी लिखना एक कवि के लिये सबसे मुश्किल काम है". खैर, पाठकों के बीच राजेश जोशी की स्वीकृति और सम्मान असंदिग्ध है. हमारे अनुरोध पर उन्होंने अभी हाल में 'पक्षधर' तथा 'पहल' में प्रकाशित कवितायें असुविधा के लिए उपलब्ध कराई हैं.   




यह समय

यह मूर्तियों को सिराये जाने का समय है ।

मूर्तियाँ सिराई जा रही हैं ।

दिमाग़ में सिर्फ़ एक सन्नाटा है
मस्तिष्क में कोई विचार नहीं
मन में कोई भाव नहीं

काले जल में बस मूर्ति का मुकुट
धीरे धीरे डूब रहा है !




डायरी लिखना

डायरी लिखना एक कवि के लिये सबसे मुश्किल काम है ।

कवि जब भी अपने समय के बारे में डायरी लिखना शुरू करता है
अरबी कवि समीह-अल-कासिम की तरह लिखने लगता है
कि मेरा सारा शहर नेस्तनाबूत हो गया
लेकिन घड़ी अब भी दीवाल पर मौजूद है ।

सारी सच्चाई किसी न किसी रूपक में बदल जाती है
कहना मुश्किल है कि यह कवि की दिक्कत है या उसके समय की
जो इतना उलझा हुआ , अबूझ और अंधेरा समय है
कि एक सीधा सादा वाक्य भी साँप की तरह बल खाने लगता है ।
वह अर्धविराम और पूर्ण विराम के साथ एक पूरा वाक्य लिखना चाहता है  
वह हर बार अहद करता है कि किसी रूपक या बिम्ब का
सहारा नहीं लेगा
संकेतों की भाषा के करीब भी नहीं फटकेगा ।
लेकिन वह जब जब कोशिश करता है
उसकी कलम सफ़े पर इतने धब्बे छोड़ जाती है
कि सारी इबारत दागदार हो जाती है ।

हालांकि वह जानता है कि डायरी को डायरी की तरह लिखते हुए भी
हर व्यक्ति कुछ न कुछ छिपा ही जाता है
इतनी चतुराई से वह कुछ बातों को छिपाता है
कि पता लगाना मुश्किल है कि वह क्या छिपा रहा है
कवि फ़क़त दूसरों से ही नहीं ,
अपने आप से भी कुछ न कुछ छिपा रहा होता है
जैसे वह अपनी ही परछाई में छिप रहा हो।

एक कवि के लिए डायरी लिखना सबसे मुश्किल काम है ।
भाषा को बरतने की उसकी आदतें उसका पीछा कभी नहीं छोड़तीं
वह खीज कर कलम रख देता है और डायरी को बंद कर के
एक तरफ़ सरका देता है ।

एक दिन लेकिन जब वह अपनी पुरानी डायरी को खोलता है
तो पाता है कि समय की दीमक ने डायरी के पन्नों पर
ना समझमें आने वाली ऐसी कुछ इबारत लिख डाली है
जैसे वही कवि के समय के बारे में
लिखा गया सबसे मुकम्मिल वाक्य हो ।


   
संग्रहालय

वहाँ बहुत सारी चीज़ें थी करीने से सजी हुई
जिन्हे गुजरे वक़्त के लोगों ने कभी इस्तेमाल किया था ।

दीवारों पर सुनहरी फ्रेम में मढ़े हुए उन शासकोे के विशाल चित्र थे
जिनके नीचे उनका नाम और समय भी लिखा था
जिन्होंने उन चीजों का उपयोग किया था
लेकिन उन चीजों को बनाने वालों का कोई चित्र वहाँ नहीं था
न कहीं उनका कोई नाम था ।

अचकनें थीं ,पगड़ियाँ थीं , तरह तरह के जूते और हुक्के थे ।
लेकिन उन दरजियों ,रंगरेजों , मोचियों और
हुक्का भरने वालों का कोई ज़िक्र नहीं था ।
खाना खाने की नक्काशीदार रकाबियाँ थीं ,
कटोरियाँ और कटोरदान थे ,
गिलास और उगालदान थे ।
खाना पकाने के बड़े बड़े देग और खाना परोसने के करछुल थे
पर खाना पकाने वाले बावरचियों के नामों का उल्लेख
कहीं नहीं था ।
खाना पकाने की भट्टियाँ और बड़ी बड़ी सिगड़ियाँ थीं
पर उन सिगड़ियों में आग नहीं थी ।

आग की सिर्फ कहानियाँ थीं
लेकिन आग नहीं थी ।

आग का संग्रह करना संभव नहीं था ।

सिर्फ आग थी
जो आज को बीते हुए समय से अलग करती थी ।




ज़िद

निराशा मुझे माफ करो आज मैं नहीं निकाल पाऊँगा तुम्हारे लिये समय
आज मुझे एक जरूरी मीटिंग में जाना है

मुझे मालूम है तुम भी वही सब कहोगी
जो दूसरे भी अक्सर ही कहते रहते हैं उन लोगों के बारे में
कि गिनती के उन थोड़े से लोगों की बिसात ही क्या है
कि समाज में कौन सुनता है उनकी बात ?
कि उनके कुछ करने से क्या बदल जायेगा इस दुनिया में ?
हालांकि कई बार उन्हें भी निरर्थक लगतीं हैं अपनी सारी कोशिशें
फिरभी एक ज़िद है कि लगे ही रहते हैं वे अपने काम में
कहीं घटी हो कोई घटना
दुनिया के किसी भी कोने में हुआ हो कोई अन्याय
कोई अत्याचार कोई दंगा या कोई दुर्घटना
वे हरकत में आजाते हैं तत्काल
सूचित करने निकल पड़ते हैं सभी जान पहचान के लोगों को
और अक्सर मुफ्त या सस्ते में उपलब्ध किसी साधारण सी जगह पर
किसी दोस्त के घर में या किसी सार्वजनिक उद्यान में
आहूत करते हैं वे एक मीटिंग
घंटों पूरी घटना पर गंभीरता से बहस करते हैं
उसके विरूद्ध या पक्ष में पारित करते हैं एक प्रस्ताव

अपनी मीटिंग की वे खुद ही तत्काल खबर बनाते हैं
खुद ही उसे अखबारों में लगाने जाते हैं
प्रतिरोध की इस बहुत छोटी सी कार्यवाही की खबर
कभी कभी कुछ अखबार सिंगल काॅलम में छाप देते हैं
अक्सर तो बिना छपी ही रह जाती हैं उनकी खबरें

कई बार उदासी उन्हें भी घेर लेती हैं
उन्हें भी लगता है कि उनकी कोई आवाज़ नहीं इस समाज में

निराशा !
मैंने कई कई बार तुम्हें उनके इर्द गिर्द मंडराते
और फिर हाथ मलते हुए लौटते देखा है
मैंने देखा है तुम्हारे झांसे में ज्यादा देर तक नहीं रहते
                                      वे लोग


कभी कभी किसी बड़े मुद्दे पर वे रैलियाँ निकालते हैं


दो 


खुद की ही जेबों को निचैड़ कर
खुद ही रात रात जाग कर तैयार करते हैं
मशालें पोस्टर और प्ले कार्ड
अगर रैली में जुट जाते हैं सौ सवा सौ लोग भी
तो दुगने उत्साह से भर जाते हैं वे

दुनियादार लोग अक्सर उनका मज़ाक उड़ाते हैं
असफलताओं का मखौल बनाना ही
व्यवहारिकता की सबसे बड़ी अक्लमन्दी है
कभी कभी छेड़ने को और कभी कभी गुस्से में
पूछते हैं दुनियादार लोग
क्या होगा आपके इस छोटे से विरोध से ?

पर वे किसी से पलट कर नहीं पूछते कभी
कि तुम्हारे चुप रहने ने ही
कौनसा बड़ा कमाल कर दिया है
इस दुनिया में ?
पलट कर उन्होंने नहीं कहा कभी किसी से
कि दुनियादार लोगो ! तुम्हारी चुप्पियों ने ही बढ़ाई है
अपराधों और अपराधियों संख्या हर बार
कि शरीफजादों ! तुम्हारी निस्संगता ने ही बढ़ाये है
अन्यायियों के हौसले
कि मक्कार चुप्पियों ने नहीं छोटी छोटी आवाज़ों ने ही
बदली है अत्याचारी सल्तनतें

वे दुनियादार लोगों की सीमाएँ जानते हैं
उनके सिर पर भी हैं घर गृहस्थी और बाल बच्चों की
जिम्मेदारियाँ
भरसक कोशिश करते हैं कि दोनों कामों में संतुलन बना रहे
पर ऐसा अक्सर हो नहीं पाता
घर में भी अक्सर झिड़कियाँ सुननी पड़ती हैं उन्हें
सब उनसे एक ही सवाल पूछते हैं
कि दुनिया भर की फिक्र
वे ही क्यों अपने सिर पर लिये घूमते रहते हैं
कि उनके करने से क्या बदल जायेगा इस समाज में ?

वे जो दुनिया की हर घटना के बारे में बोलते हैं
इस सवाल पर अक्सर चुप रह जाते हैं !!



गुरूत्वाकर्षण


न्यूटन जेब में रखलो अपना गुरूत्वाकर्षण का नियम
धरती का गुरूत्वाकर्षण खत्म हो रहा है ।

अब तो इस गोलमटोल और ढलुआ पृथ्वी पर
किसी एक जगह पाँव टिका कर खड़े रहना भी म ुमकिन नहीं
फिसल रही है हर चीज़ अपनी जगह से
कौन कहाँ तक फिसल कर जायेगा ,
किस रसातल तक जायेगी यह फिसलन
कोई नहीं कह सकता
हमारे समय का एक ही सच है
कि हर चीज फिसल रही है अपनी जगह से ।

पृथ्वी का गुरूत्वाकर्षण ख़त्म हो रहा है ।

फिजिक्स की पोथियो !
न्यूटन के सिद्धान्त वाले सबक की ज़रूरत नहीं बची ।

पृथ्वी का गुरूत्वाकर्षण खत्म हो रहा है ।

कभी भी फिसल जाती है राष्ट्राध्यक्ष की जबान
कब किसकी जबान फिसल जाएगी कोई नहीं जानता
श्लोक को धकियाकर गिरा देती है फिसलकर आती गालियाँ
गड्डमड्ड हो गये है सारे शब्द
वाक्य से  फिसलकर बाहर गिर रहे हैं उनके अर्थं
ऐसी कुछ भाषा बची है हमारे पास
जिसमें कोई किसी की बात नहीं समझ पाता
संवाद सारे ख़त्म हो चुके है , स्वगत कर रहा है
नाटक का हर पात्र ।

आँखों से फिसल कर गिर चुके हैं सारे स्वप्न ।

करोड़ों वर्ष पहले ब्रम्हाण्ड में घूमती हजारों चट्टानों को
अपने गुरूत्वाकर्षण से समेट कर
धरती ने बनाया था जो चाँद
अपनी जगह से फिसल कर
किसी कारपोरेट के बड़े से जूते में दुबक कर बैठा है
बिल्ली के बच्चे की तरह ।

फिसलन ही फिसलन है पूरे गोलार्ध पर
और पृथ्वी का गुरूत्वाकर्षण खत्म हो गया है !

ओ नींद
मुझे इस भयावह स्वप्न-सत्य से बाहर आने का रास्ता दे !





अनुपस्थित-उपस्थित

मैं अक्सर अपनी चाबियाँ खो देता हूँ ।

छाता मैं कहीं छोड़ आता हूँ
और तरबतर होकर घर लौटता हूँ ।
अपना चश्मा तो मैं कई बार खो चुका हूँ ।
पता नहीं किसके हाथ लगी होंगी वे चीजें
किसी न किसी को कभी न कभी तो मिलती ही होंगी
वो तमाम चीजें जिन्हें हम कहीं न कहीं भूल आये ।

छूटी हुई हर एक चीज तो किसी के काम नहीं आती कभी भी
लेकिन कोई न कोई चीज तो किसी न किसी के
कभी न कभी काम आती ही होगी
जो उसका उपयोग करता होगा
जिसके हाथ लगी होंगी मेरी छूटी हुई चीजें
वह मुझे नहीं जानता होगा
हर बार मेरा छाता लगाते हुए
वह उस आदमी के बारे में सोचते हुए
मन ही मन शुक्रिया अदा करता होगा जिसे वह नहीं जानता ।

इस तरह एक अनाम अपरिचित की तरह उसकी स्मृति में
कहीं न कहीं मैं रह रहा हूँ जाने कितने दिनों से ,
जो मुझे नहीं जानता
जिसे मैं नहीं जानता ।
पता नहीं मैं कहाँ ,कहाँ कहाँ रह रहा हूँ
मैं एक अनुपस्थित-उपस्थित !

एक दिन रास्ते में मुझे एक सिक्का पड़ा मिला
मैंने उसे उठाया और आसपास देखकर चुपचाप जेब में रख लिया
मन नहीं माना ,लगा अगर किसी ज़रूरतमंद का रहा होगा
तो मन ही मन वह बहुत कुढत़ा होगा
कुछ देर जेब में पड़े सिक्के को उंगलियों के बीच घुमाता रहा
फिर जेब से निकाल कर एक भिखारी के कासे में डाल दिया
भिखारी ने मुझे दुआएँ दी ।

उससे तो नहीं कह सका मैं
कि सिक्का मेरा नहीं है
लेकिन मन ही मन मैंने कहा
कि ओ भिखारी की दुआओं
जाओ उस शख़्स के पास चली जाओ
जिसका यह सिक्का है ।



अंधेरे के बारे में कुछ वाक्य


अंधेरे में सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि वह किताब पढ़ना
नामुमकिन बना देता था ।

पता नहीं शरारतन ऐसा करता था या किताब से डरता था
उसके मन में शायद यह संशय होगा कि किताब के भीतर
कोई रोशनी कहीं न कहीं छिपी हो सकती है ।
हालांकि सारी किताबों के बारे में ऐसा सोचना
एक किस्म का बेहूदा सरलीकरण था ।
ऐसी किताबों की संख्या भी दुनिया में कम नहीं ,
जो अंधेरा पैदा करती थीं
और उसे रोशनी कहती थीं ।

रोशनी के पास कई विकल्प थे
ज़रूरत पड़ने पर जिनका कोई भी इस्तेमाल कर सकता था
ज़रूरत के हिसाब से कभी भी उसको
कम या ज्यादा किया जा सकता था
ज़रूरत के मुताबिक परदों को खींच कर
या एक छोटा सा बटन दबा कर
उसे अंधेरे में भी बदला जा सकता था
एक रोशनी कभी कभी बहुत दूर से चली आती थी हमारे पास
एक रोशनी कहीं भीतर से , कहीं बहुत भीतर से
आती थी और दिमाग को एकाएक रोशन कर जाती थी ।

एक शायर दोस्त रोशनी पर भी शक करता था
कहता था ,उसे रेशा रेशा उधेड़ कर देखो
रोशनी किस जगह से काली है ।

अधिक रोशनी का भी चकाचैंध करता अंधेरा था ।

अंधेरे से सिर्फ अंधेरा पैदा होता है यह सोचना गलत था
लेकिन अंधेरे के अनेक चेहरे थे
पाॅवर हाउस की किसी ग्रिड के अचानक बिगड़ जाने पर
कई दिनों तक अंधकार में डूबा रहा
देश का एक बड़ा हिस्सा ।
लेकिन इससे भी बड़ा अंधेरा था
जो सत्ता की राजनीतिक जिद से पैदा होता था
या किसी विश्वशक्ति के आगे घुटने टेक देने वाले
गुलाम दिमागों से !
एक बौद्धिक अंधकार मौका लगते ही सारे देश को
हिंसक उन्माद में झौंक देता था ।

अंधेरे से जब बहुत सारे लोग डर जाते थे
और उसे अपनी नियति मान लेते थे
कुछ जिद्दी लोग हमेशा बच रहते थे समाज में
जो कहते थे कि अंधेरे समय में अंधेरे के बारे में गाना ही
रोशनी के बारे में गाना है ।

वो अंधेरे समय में अंधेरे के गीत गाते थे ।

अंधेरे के लिए यही सबसे बड़ा खतरा था ।


पक्की दोस्तियों का आईना


पक्की दोस्तियों का आईना इतना नाजुक होता जाता था
कि जरा सी बात से उसमें बाल आ जाता और
कभी कभी वह उम्र भर नहीं जा पाता था ।

ऐसी दोस्तियाँ जब टूटती थीं तब पता लगता था
कि कितनी कड़वाहट छिपी बैठी थी उनके भीतर
एक एक कर न जाने कब कब की कितनी ही बातें याद आती थीं
कितने टुच्चेपन , कितनी दगाबाजियाँ छिपी रही अब तक इसके भीतर
हम कहते थे ,यह तो हम थे कि सब कुछ जानते हुए भी निभाते रहे
वरना इसे तो कभी का टूट जाना चाहिये था ।

पक्की दोस्तियों का फल
कितना तिक्त कितना कटू भीतर ही भीतर !

टूटने से खाली हुई जगह को भरती थी हमारी घृणा !

उम्र के साथ साथ नये दोस्त बनते थे और पूराने छूटते जाते थे
बचपन के लंगोटिये यार बिछड जाते थे ।
कभी कभी तो महीनों और साल दर साल उनकी याद भी नहीं आती
साल चैमासे या बरसों बाद उनमें से कोई अचानक मिल जाता था
कस कर एक दूसरे को कुछ पलों को भींच लेते थे
फिर कोई कहता कि यूँ तो मैंने सिगरेट पीना छोड़ दिया है
पर आज तेरे मिलने की खुशी में बरसों बाद एक सिगरेट पिऊँगा
दोनों सिगरेट जलाते थे।
अतीत के ढेर सारे किस्सों को दोहराते थे ,जो दोनों को ही याद थे
बिना बात बीच बीच में हँसते थे , देर तक बतियाते थे
लेकिन अचानक महसूस होता था
कि उनके पास सिर्फ कुछ यादें बची हैं
जिनमें बहुत सारे शब्द हैं पर सम्बंधों का ताप कहीं चुक गया है ।

पक्की दोस्तियों का आईना
समय के फ़ासलों से मटमैला होता जाता था।

रात दिन साथ रह कर भी जिनसे कभी मन नहीं भरा
बातें जो कभी खत्म होने का नाम ही नहीं लेती थीं
बरसों बाद उन्हीं से मिल कर लगता था
कि जैसे अब करने को कोई बात ही नहीं बची
और क्या चल रहा है आजकल..... जैसा फ़िज़ूल का वाक्य
बीच में बार बार चली आती चुप्पी को भरेने को
कई कई बार दोहराते थे ।
कोई बहाना करते हुए कसमसाकर उठ जाते थे
उठते हुए कहते थे ........ कभी कभी मिलाकर यार ।
बेमतलब है यह वाक्य हम जानते थे
जानते थे कि हम शायद फिर कई साल नहीं मिलेंगे ।

मुश्किल वक़्त में ऐसे दोस्त अक्सर ज़्यादा काम आते थे
जिनसे कभी कोई खास नज़दीकी नहीं रही ।

पक्की दोस्तियों के आईने में
एक दिन हम अपनी ही शक़्ल नहीं पहचान पाते थे ।

17 comments:

Manik Chittorgarh ने कहा…

(एक दिवास्वप्न-''क्या हम भी कभी इतनी सीधी दिखने वाली टेड़ी कवितायेँ लिख पायेंगे।'')

दिगंबर आशु ने कहा…

सचमुच, राजेश जोशी हमारे दौर के एक जरूरी कवि हैं-
"...अंधेरे से जब बहुत सारे लोग डर जाते थे
और उसे अपनी नियति मान लेते थे
कुछ जिद्दी लोग हमेशा बच रहते थे समाज में
जो कहते थे कि अंधेरे समय में अंधेरे के बारे में गाना ही
रोशनी के बारे में गाना है ।

वो अंधेरे समय में अंधेरे के गीत गाते थे ।

अंधेरे के लिए यही सबसे बड़ा खतरा था । "

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

Suchhit Kapoor ने कहा…

sunder rachnaye..

Suchhit Kapoor ने कहा…

sunder rachnaye..dhanywad..

हरीश कर्मचंदानी ने कहा…

बिल्कुल ठीक लिखा भाई -"वे लोग जिन्होंने विचारधारा को प्रगति की सीढियों की तरह उपयोग करने के बाद अब उससे पीछा छुडाना चाहते हैं, उन्हें उनकी कविता असुविधा की तरह लगती है, चुभने वाली, तीखी. खुद को स्थापित करने की शर्मनाक कोशिश में लगे लोगों को कभी नहीं समझ आएगा कि "डायरी लिखना एक कवि के लिये सबसे मुश्किल काम है"

राजेश उत्साही ने कहा…

सचमुच..मैंने कविता लिखना राजेश भाई की कविता उनसे सुनकर ही लिखना शुरू किया था। 1980 में होशंगाबाद की एक शाम को उन्‍होंने अपनी चुनिंदा 25-30 कविताएं सुनाई थीं।

महेश पुनेठा ने कहा…

राजेश जी की कविता और प्रतिबद्धता दोनों बेजोड़ है .

Amit Rana ने कहा…

बेहद शानदार , आज जरुरत है ऐसी ही रचनाओं की , बहुत बहुत धन्यवाद

Amit Rana ने कहा…

बहुत ही शानदार , आज जरुरत है ऐसी ही रचनाओं की , धन्यवाद

अजेय ने कहा…

"डायरी लिखना".... वाली कविता पढ़ कर खुश हुआ . बल्कि एक पुरानी बात पर हो हो कर के हँसने का मन हुआ .मेरे कान मे एक आधुनिक कवि की ही हिदायत गूँजती रहती है कि - कविता को रूपक न बनाओ... माने ; उसी अर्थ मे रहने दो जो उस का सामान्य अर्थ है ..... यह पहली बार सुना था तब विस्मय हुआ था. लेकिन आज वो हिदायत हास्यास्पद लग रही है . वैसे इस पूरी कविता को यूँ भी लिखा जा सकता था कि
" कवि जब डायरी लिखने बैठता है
तो कविता लिख डालता है
और झेंप कर रह जाता है "

ईमानदार कविता . राजेश जोशी जी को इस कविता के लिए बधाई .

Amit sharma upmanyu ने कहा…

बहुत मानीखेज कवितायें! मानिक जी की टिप्पणी से सहमत

Niranjan Shrotriya ने कहा…

Mahatvapurna kavitayen!

बेनामी ने कहा…

adbhut kavitayen hai.shankaranand

******** ने कहा…

वे लोग जिन्होंने विचारधारा को प्रगति की सीढियों की तरह उपयोग करने के बाद अब उससे पीछा छुडाना चाहते हैं, उन्हें उनकी कविता असुविधा की तरह लगती है, चुभने वाली, तीखी. खुद को स्थापित करने की शर्मनाक कोशिश में लगे लोगों को कभी नहीं समझ आएगा कि "डायरी लिखना एक कवि के लिये सबसे मुश्किल काम है".....राजेश जोशी बेजोड़ कवि है.बेहद शानदार बहुत बहुत धन्यवाद.

वर्षा ने कहा…

सारी ही कविताएं दिल को छूती हैं। अंधेरे के बारे में गाना ही रोशनी के बारे में गाना है...कुछ चीजें अदभुत जैसी। पक्की दोस्ती कविता से अपनी एक पक्की दोस्त याद आ गई।

vividha ने कहा…

भवभूति अलंकरण समारोह (१६अक्टूबर)कोprof manimohan ने राजेश जी से परिचय कराया।अद्भुत व्यक्तित्व के जुझारु कवि।

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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