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सोमवार, 4 मार्च 2013

मयंक सक्सेना की कवितायें



मयंक सक्सेना एक्टिविस्ट हैं. एक्टिविस्ट कवि कहें या बेहतर होगा कि एक्टिविस्ट पत्रकार. यह पत्रकारिता उनके जीवन का एक अभिन्न हिस्सा है. इतनी कि कविता लिखते समय भी वह उन विवरणों का मोह नहीं छोड़ पाते. इसीलिए अक्सर बहुत ज़्यादा डिटेल्स में चले जाते हैं. इनमें जो चीज़ आकर्षित करती है वह है कवि का सकारात्मक आक्रोश. उसकी उलझनें और उससे टकराने की कोशिश. आज असुविधा पर पढ़िए उनकी कुछ कवितायें


अग्नि 
हमेशा पवित्र ही होती है...
चाहें जले वह  
47
के बंटवारे में
84
की दिल्ली में
गोधरा में 
नरोडा में 
गुजरात में 
मिर्चपुर में 

हमेशा दैवीय 
महान 
सब कुछ 
शुद्ध कर देने वाली 

अग्नि 
हमेशा पवित्र ही होती है...
 

बलात्कार का प्रशिक्षण

वो अक्सर बाज़ार से लौटते हुए
कहते थे मुझसे 
क्या लड़की जैसे चलते हो 
दो झोले उठाने में 
थक जाते हो तुम

जब कभी किसी गाने पर
मैं नादान
हिला कर कमर
लगता था नाचने
तब अक्सर कहते थे
चारपाई पर खांसते बुज़ुर्ग वो
ये क्या लड़कियों सा
लगते हो नाचने

खाना बनाने के मेरे शौक पर
मां को
अक्सर आ जाती थी
तेज़ हंसी
कहती थी वो
लड़की पैदा हो गई है घर में
खुश रहेगी बीवी तुमसे

क्रिकेट खेलते हुए
जब भी वो देखता था मुझे
खेलते हुए लंगड़ी टांग
लड़की-लड़की कह कर
चिढ़ाता था
मेरा बड़ा भाई

स्कूल में भी
जब नहीं कर पाता था
मैं नाटे कद का
कमज़ोर सा लड़का
उस मोटे तगड़े साथी से
लड़ाई
लड़की सा होने का ही
मिलता था ताना

रक्षाबंधन के दिन
स्कूल के टीचर
ज़बरन बंधवाते थे राखी
उसी सलोनी से
जिसे देख कर लगता था
बेहद अच्छा
अलग अलग रखी जाती थी
लड़कियों और लड़कों की कक्षा
अलग अलग थे गाने
अलग अलग खेल भी

कच्चे आम तोड़ कर
काले नमक के साथ खाना
छुप कर ही होता था
देख लेती थीं तो
छेड़ती थी भाभियां
कि क्या भैया
आपको तो लड़कियों वाले ही
शौक हैं सब

दाढ़ी बनाने के ब्लेड
खरीदते रहे हम
देख कर लड़कियां
चड्ढियों के भी होर्डिंग पर
दिखती थी
लड़की ही बस
टूथपेस्ट दांतों में लगाने का
मक़सद भी एक ही था
वही जो था
खास खुशबू पसीने से तर
बगलों में छिड़कने का
हाल ही में कहा किसी ने
क्यों रगड़ते हो
लड़कियों वाली क्रीम

और फिर जब
दोस्तों ने मेले, बस और
सड़क पर भी
लड़कियों को न घूरने के लिए
कहा कि
तू तो लड़की है बिल्कुल यार

बस वो सब
घर से लेकर
सड़क तक
उस अनजान
सुनसान
आसान पल के लिए
कर चुके थे पूरा
मेरा प्रशिक्षण
मैं तैयार
बलात्कारी बन चुका
बस साब
एक मौके की तलाश थी....

वो कहते थे कि
मेरी बहन को
पढ़ना चाहिए उस स्कूल में
जहां जाती हैं
सिर्फ लड़कियां
उसके लिए
घर पर नहीं आने चाहिए
लड़कों के फ़ोन
उसकी दोस्ती भी क्यों थी
लड़कों से
जब वो जाती है
लड़कियों के स्कूल

बूढ़े बाबा
जो खुद उठते थे
मेरी मां के सहारे से
डांटते थे अक्सर
मेरी बहन को
कि क्या लड़कों के साथ
खेलती है तू
और फैलाए रहती है
हर वक़्त ही किताबें
हंसती है क्यों
ज़ोर ज़ोर से
जा रसोई में
मदद करो मां की
सीखो कुछ घर के काम
लड़कियां ऐसे अच्छी नहीं लगती

दादी मां को
अक्सर रात टोंका करती थी
कैसी कतरनी सी
चलती है तेरी ज़ुबान
हर बात का जवाब
देती है तुरंत
डांट खाती है
किसी रोज़ मार भी खाएगी
सही हुआ पड़ा तेरे
ज़ोर का तमाचा
ससुर के सामने
आदमी से लड़ा रही थी
ज़ुबान
औरत को इतना गुस्सा
ठीक नहीं है...

मां अक्सर
रात को रोती हुई
आती थी बिस्तर पर
पिता जी को
नहीं देखा था
कभी भी ऐसे रोते छिप कर
मां को आंसू भी
छिप कर बहाने पड़ते थे
अमूमन बहन भी
धीरे धीरे
ऐसे ही रोने की
हो गई थी आदी
चाची, भाभी और कभी कभी
दादी भी

स्कूल में
अक्सर लड़कियों की
पीठ सहलाते थे
गणित वाले वो टीचर
गर्दन के पास
रख कर हाथ
हिंदी वाले मास्साब
समझाया करते थे
विद्यापति का
साहित्य में योगदान
भौतिकी के सर
कई बार अश्लील मज़ाक करते थे
रसायन शास्त्र वाली
मैडम के साथ
वो हंसती थीं खिसियानी हंसी
पीटी की टीचर को देख
हंसते रहते थे
कमीनगी से वो दो
इंस्पेक्शन वाले मास्टर

टीवी पर अक्सर
महिलाओं की मदद के लिए
आगे आ जाते थे
फिल्म निर्देशक
जिनकी हर फिल्म में
ज़रूरी था
एक आईटम नम्बर
नौकरानी पर घर में अक्सर
मुग्ध हो कर मुस्कुराते थे
कभी कभी उसकी
खिसकी साड़ी के पल्लू को
निहारते रहते थे वो मामा हमारे
मुंहबोले चाचा न जाने क्यों
मेरी बहन को करते थे
कुछ ज़्यादा ही लाड़
और हां बड़े भाई का वो दोस्त
अक्सर दे जाता था
अखबार का कवर चढ़ी
न जाने कौन सी ज़रूरी किताबें

हां मेले में
बचता था मैं भीड़ से
लेकिन मेरे बड़े भाई
और कहते थे चाचा भी
कि मेले का मज़ा तो
भीड़ में ही है
अस्पताल में डॉक्टर के
होने पर भी
मरीज़ का हाल
उस कुंवारी नर्स से ही लेते थे
मेरे घर के कई मर्द

और हां याद होगा ही
कहते रहते थे वो अक्सर
औरतों के हाथ में गया जो घर
उसको होना ही है बर्बाद
है न याद...
और फिर मर्द होना ही है
शक्ति का पर्याय
शक्ति अपराजित, असीमित
अराजक

दफ्तर में
झाड़ू लगाने वाली
उस चार बच्चों की मां से लेकर
अपनी महिला सहकर्मियों तक
सबसे करता रहा मैं
छेड़खानी
अपनी मातहतों से
करता रहा मैं
फ्रैंडली जेस्चर
न होने की शिकायत
और वो सीधी सी लड़की
याद तो होगी ही न
जिसके प्रमोशन पर फैलाई थी मैंने
उसके बास के साथ
सोने की अफ़वाह...

और फिर सड़कों पर
अक्सर मैं घूरता था
लड़कियों को
देखता था
उनके शारीरिक सौष्ठव को
देह को देख
करता रहा हर रोज़
आंखों से ही
उनका न जाने कितनी बार
बलात्कार
और चूंकि दुस्साहसी होना
प्रमाण था
उसके पौरुष का
मैं करता रहा कभी
शब्द बेधी वार
कभी नयन सुख के उपचार
कभी छेड़खानी
और बसों, मेट्रो, रेल में
अक्सर शामिल हो जाता था
उनको घेर कर
उनके तन से लिपट कर
जगह जगह डसने वाले
सर्पों के झुंड में

देखिए न
घर से बाहर तक
बलात्कार करने का
मेरा प्रशिक्षण कितना पक्का था
हां अब घूमता था
रात को झुंड में कभी सड़कों पर
तो कभी अकेले
शिकार की खोज में
जानता ही था मैं
समाज और परिवार मेरे साथ है
तो इनसे ही उपजे
पुलिस, कानून और सरकार
क्या बिगाड़ लेंगे मेरा...

सबसे गहरी कविताएं,
निरुद्देश्य लिखी गईं
जल्दबाज़ी में उकेरे गए
सबसे शानदार चित्र
हड़बड़ी में गढ़े गए
सबसे अद्भुत शिल्प
सबसे महान अविष्कार
हो गए अनजाने में ही
सबसे पवित्र है
असफल पहला प्रेम

कभी सरल रेखा में
रास्ता नहीं बनाती नदियां
दिन भर आकार बदलती हैं
परछाईयां
हर रोज़ चांद का चेहरा
बदल जाता है
दिन भी कभी छोटा
कभी बड़ा हो जाता है
कभी भी पेड़ पर हर फल
एक सा नहीं होता
ठीक वैसे, जैसे एक सी नहीं
हम सबकी शक्लें

सबसे सुंदर स्त्री भी
सर्वांग सुंदर नहीं होती
सबसे पवित्र लोगों के सच
सबसे पतित रहे हैं
सबसे महान लोगों ने कराया
सबसे ज़्यादा लज्जित
सबसे ईमानदार लोगों के घर से
सबसे ज़्यादा सम्पत्ति मिली
सबसे सच्चा आदमी
उम्र भर बोलता रहा झूठ...

और ठीक ऐसे ही
कभी भी कुछ भी
पूर्ण नहीं है
न तो कुछ भी
सच है पूरा...न झूठ....
पूर्णता केवल एक मिथक है
एक छलावा
ठीक ईश्वर की तरह ही
एक असम्भव लक्ष्य...
जिस पर हम
केवल रुदन करते हैं व्यर्थ
कुछ भी पूर्ण नहीं है
न शब्द और न अर्थ
केवल अपूर्णता ही तो पूर्ण है
अपने अर्थ में....
और वैसे ही हम सब
पूरी तरह अपूर्ण...
 संस्कार

छोटी बच्चियों के लिए
उनके पास थे
नई डिज़ाइन के बुरके
या फिर सलवार कमीज़
और सिर ढंकने के लिए
स्कार्फ़
लड़कों का उपनयन
और लड़कियों के
नकछेदन
कनछेदन के
बहुमूल्य गौरवशाली
संस्कार
बड़ी होती लड़कियों को
घर से बाहर
कम निकलना चाहिए था
लड़कों से बात
कम करना चाहिए था
हंसना और बोलना भी
कम ही चाहिए था
बड़े होते लड़के
अब लड़के ही थे
और जवान खून है
तो सौ खून माफ़ हैं न
इस उम्र में नहीं करेंगे
तो क्या बुढ़ापे में करेंगे...
और फिर छोटी बच्चियां
बड़ी होती लड़कियां
बुढ़ापे तक
क़ैद रहीं बुर्कों, दुपट्टों
और चहारदीवारियों में
छिदे हुए नाक...कान...
और रिसते हुए
दिलों के साथ
और छोटे लड़के
बड़े होते लड़के
करते रहे बुढ़ापे तक
वो ही
जिसे वो बूढ़ा होने पर
नहीं कर सकते थे...

देशभक्ति
"
छोटी बच्चियों के लिए
उनके पास थे
नई डिज़ाइन के बुरके
या फिर सलवार कमीज़
और सिर ढंकने के लिए
स्कार्फ़
लड़कों का उपनयन
और लड़कियों के
नकछेदन
कनछेदन के
बहुमूल्य गौरवशाली
संस्कार
बड़ी होती लड़कियों को
घर से बाहर
कम निकलना चाहिए था
लड़कों से बात
कम करना चाहिए था
हंसना और बोलना भी
कम ही चाहिए था
बड़े होते लड़के
अब लड़के ही थे
और जवान खून है
तो सौ खून माफ़ हैं न
इस उम्र में नहीं करेंगे
तो क्या बुढ़ापे में करेंगे...
और फिर छोटी बच्चियां
बड़ी होती लड़कियां
बुढ़ापे तक
क़ैद रहीं बुर्कों, दुपट्टों
और चहारदीवारियों में
छिदे हुए नाक...कान...
और रिसते हुए
दिलों के साथ
और छोटे लड़के
बड़े होते लड़के
करते रहे बुढ़ापे तक
वो ही
जिसे वह बूढ़ा होने पर
नहीं कर सकते थे...


3 comments:

दिनेश पारीक ने कहा…

बहुत खूब सुन्दर लाजबाब अभिव्यक्ति।।।।।।

मेरी नई रचना
आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
पृथिवी (कौन सुनेगा मेरा दर्द ) ?

ये कैसी मोहब्बत है

vandana gupta ने कहा…

सभी रचनायें शानदार और बलात्कार का प्रशिक्षण
ने तो सब सच कह दिया

mukti ने कहा…

मयंक की कविताएँ मुझे अपनी सी लगीं...सब कुछ कह देने का आग्रह बिना शिल्प की परवाह किये हुए, मुझे खुद के जैसा ही लगा.

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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