अभी हाल में

:


विजेट आपके ब्लॉग पर

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

विमल चन्द्र पाण्डेय की नई कहानी


 जाने-माने युवा कथाकार विमल चन्द्र पाण्डेय की यह कहानी इलाहाबाद से निकलने वाली पत्रिका अनहद में प्रकाशित हुई है.



सातवां कुआँ

उसके दिन की शुरूआत ही ख़राब हुयी थी। उसकी नींद सुबह पांच बजे की बजाय चार बजे एक सुबह का सपना देखकर टूट गयी थी जिसमें पानी के गिलास में नाखून डालने की वजह से उसे नौकरी से निकाल दिया गया था। अगले एक घण्टे तक वह बिस्तर पर करवट बदलता रहा था और सुबह के सपने के सच हो जाने की आशंका से ग्रस्त रोटी कमाने के नये तरीके सोचता रहा था। वह अपनी सोचों में इतना भीतर तक उतर चुका था कि जब उसकी बीवी अपने कपड़े संभालते बिस्तर पर आयी तो उसने कहां थी इतनी देर सेकी बजाय पूछा कि क्या गांव में किसी के सुबह के सपने सच हुये हैं

रामदयाल पत्नी, कुत्तों और दुनिया यानि तीन चीज़ों से परेशान था। सभी कुत्तों को वह खत्म नहीं कर सकता था, पत्नी का क्या करना है उसे समझ नहीं आता था और दुनिया को बदला भी जा सकता है, यह उसके विकल्प से बाहर की चीज़ थी। उसकी पत्नी और दुनिया उससे अजनबियों की तरह बर्ताव करते थे। पत्नी के खि़लाफ़ वह जब चाहता सबूत जुटा सकता था और शायद उसकी पत्नी भी यही चाहती थी लेकिन वह उस दिन से बचता था। वह नहीं चाहता था कि अपनी आंखों के सामने वह अपने दुःस्वप्नों को सच होता देखे। दुनिया में उसका गांव था, उसका दफ्तर था और उसके दफ्तर के लोग थे जो उसे बरदाश्त नहीं कर पाते थे। वह एक छोटे से सरकारी ऑफिस में चपरासी था और उसे लगता था कि इस अतिरिक्त योग्यता के कारण लोग उससे जलते थे।
            
पत्नी के लौट आने के बाद उसने बिस्तर छोड़ दिया था और खेतों की तरफ़ चला गया था जहां उसने देखा कि उसका पड़ोसी और चचेरा भाई उसके घर के पीछे वाली ज़मीन में कुदाल से खुदाई कर रहा था।

’’यह क्या कर रहे हो ?’’ उसने यह मेरी ज़मीन हैके बदले में कहा था।

’’मैं पपीते का पेड़ लगा रहा हूं।’’ उसने संक्षिप्त जवाब दिया और फिर से खुदाई में लग गया। उसने देखा कि उसके भाई का छोटा बेटा भी पिता की मदद कर रहा था। उसे याद आया कि उसका बेटा किसी भी काम में उसकी मदद नहीं करता और हमेशा सिर्फ किताबों में खोया रहता है। भले उसके पास बहुत थोड़ी सी ज़मीन है, अगर वे दोनों मिलकर उस पर लगातार मेहनत करें तो अच्छा ख़ासा उपजाया जा सकता है। थोड़ी ज़मीन से उसे फिर कुछ याद आया और उसने अपने भाई को टोका।

’’मगर मेरी जमीन पर क्यों....?’’
उसके भाई ने कुदाल चलाना छोड़ दिया और बीड़ी जलाने लगा। बेटे ने बीड़ी जलाने में पिता की मदद की।

’’जानते हो भाई। पपीता एकमात्र ऐसा फल है जिसमें सभी विटामिन होते हैं। एकमात्र फल पूरी दुनिया में....। सोच सकते हो ? हम खुशकिस्मत हैं कि हमारे पास पपीते के फल जैसी अनमोल विरासत है। है या नहीं ?’’ उसके भाई ने भारी और गंभीर आवाज़ में कहा। साथ में उसने यह भी जोड़ा कि पपीते का फल किसी एक नहीं होता और उस पर सबका अधिकार होता है।

उसने प्रश्नवाचक नज़रों से अपने भतीजे की ओर देखा। भतीजे ने पिता की बात से सहमति जताते हुये बताया कि उसने अपनी कक्षा सात की किताब में पढ़ा है कि पपीते के फल में सभी विटामिन पाये जाते हैं और इससे कई बीमारियों का इलाज होता है। भतीजे ने ही उसे याद दिलाया कि उसे खेत में दिशा मैदान के लिये जाना चाहिये वरना उसे देरी हो सकती है। उसने तुरंत मुस्कराते हुये खेतों का रुख कर लिया था। जब वह अपने दफ्तर के लिये तैयार हो रहा था तो उसकी पत्नी ने उसे ताना मारा कि धीरे-धीरे उसका चचेरा भाई उसका आधा खेत हड़प चुका है और वह डरपोक होने के कारण कुछ नहीं कर रहा है। उसने पत्नी से पूछा कि वह इतनी सुबह-सुबह कहां गयी थी। पत्नी ने कहा कि आज तो हद ही हो गयी जब देवर जी ने घर के पीछे वाली जमीन में अपना पेड़ लगा लिया। उसने पत्नी को समझाया कि पेड़ के फल सब खाते हैं और उन पर किसी एक का हक नहीं होता और खास तौर पर पपीते का जिसमें सारे विटामिन पाये जाते हैं।

दफ्तर के लिये निकलते वक़्त उसने अपने नाखून एक बार फिर चेक किये और अपने छोटे से बैग में रखे गये पत्थर गिने। हर तीसरे दिन काटने के बावजूद उसे लगता था कि उसके नाखून बढ़ गये हैं। कई बार तो वह सायकिल चलाता हुआ उस वक़्त अपने नाखून देखने लगता था जब दफ्तर का गेट सामने हुआ करता था। उसे डर लगता कि घर से काट के चलने के बावजूद कहीं दफ्तर के बाहर पहुंचते-पहुंचते उसके नाखून बढ़ तो नहीं गये। नाखूनों का उसे डांट सुनवाने में अभूतपूर्व योगदान था। शादी के शुरूआती दिनों में जब उसकी पत्नी ने उसे डांटा था तो उस डांट में मीठा उलाहना था। वह देर तक पत्नी के सीने और कंधे पर बने नाखूनों के निशानों को सहलाता और चूमता रहा था। बाद में सालों बाद भी उसे कई बार अपने नाखूनों की वजह से डांट सुननी पड़ती थी और उसकी पत्नी उसे जंगली कहती थी, एक कमज़ोर जंगली। उसे समझ नहीं आता था कि अगर वह जंगली है तो कमज़ोर कैसे हो सकता है और कमज़ोर है तो उसे जंगली किस हिसाब से कहा जा सकता है। उसे लगता था एक दिन उसकी पत्नी उसे छोड़ कर चली जाना चाहती है और उसी दिन के लिये उसने यह कमज़ोर वाला जुमला उछाला है ताकि समय पड़ने पर वह इसे हथियार की तरह प्रयोग कर सके।

वह कुत्तों से बहुत डरता था और अपने छोटे से बैग में कुछ कागज़ों और कलम के अलावा आठ-दस छोटे आकार के पत्थर ज़रूर रखता था। कुत्ते, जो उसे पहली बार भी देखते थे, पहचान लेते थे कि इस आदमी के बैग में छोटे पत्थर रखे हुये हैं, और वे उस पर भौंकने या उसे ध्यान से देखते पूंछ हिलाने लगते थे। वह तुरंत अपने बैग से पत्थर निकालता और कुत्तों पर आक्रमण कर देता। कुत्ते आखि़रकार वहां से भाग जाते। अपनी जीत के बाद वह सारे पत्थर दुबारा वहां से इकट्ठा करता और बैग में भर लेता और किसी दीवार के सहारे खड़ी या फिर पास में गिरी सायकिल उठा कर घर की राह लेता। उसके डर का कारण क्या था वह नहीं जानता था लेकिन उसके गांव में कहा जाता था कि हर कुत्ते का एक दिन आता है और वह किसी कुत्ते के उस दिन से डरता था। उसका मानना था कि उसके बड़े और छोटे साहब भी दो कुत्ते हैं और क्या पता उनका भी कभी दिन आ जाय। नाखून और कुत्ते उसके दुश्मन थे और ऑफिस में वह जब भी छोटे साहब से अपने बेटे की पढ़ाई के बारे में कोई सलाह मांगने की हिम्मत जुटाता था उसका साहब उससे कहता कि पहले वह अपने नाखून काटे, बाल सही करे उसके बाद बेटे को बड़ा आदमी बनाने का सपना देखे।
            
दफ्तर में आखिर शाम तक बचाने के बावजूद छोटे साहब ने, जो बड़े साहब से डांट खाने के बाद भन्नाया हुआ था, उसकी क्लास ले ली थी। उसे अच्छी तरह याद है कि उसके नाखून गिलास में नहीं थे जब साहब ने पानी मांगा था। नाखून पानी में डूबे हुये हैं, यह कहकर पानी फिंकवाया गया था और गिलास के साथ उसे अपने हाथ भी साबुन से धोने पड़े थे। कई बार उसे लगता था कि उसका उसका लाया पानी तभी पीयेगा जब वह अपने हाथ काट डाले।
            
लौटते वक़्त उसका मन था कि वह अपने दोस्त किशन के यहां थोड़ी देर रुके जो उसी कस्बे में कोठरी लेकर रहता था और बाप से झगड़ा होने के बाद कभी गांव नहीं जाता था। किशन ने अपनी पत्नी से उसके लिये दूध वाली चाय बनवायी थी और वह चाय और पत्नी की मिठास को महसूस करता रहा था। किशन ने घर, समाज और गांव का विरोध करके एक कुजात से शादी की थी और आजकल बहुत ख़ुश था। पहले उसे लगता था कि किशन, जिसने अपने मां-बाप को खून के आंसू रुलाया है, अधिक दिन तक जी नहीं पायेगा। वह खुद चाहता था कि मां-बाप को समाज में जलील करने वाले इस इंसान को ज़रूर दंड मिले जिसने उनके चुने एक अच्छे रिश्ते को ठुकराकर एक कुजात से भाग कर शादी कर ली। लेकिन अब उसे किशन का घर बहुत अच्छा लगता था। किशन दिन पर दिन तंदुरुस्त होता जा रहा था और ऑटो चलाने में आजकल बरकत भी बहुत हो रही थी।

’’तुम इतना परेशान क्यों हो जाते हो ? तुम जानते हो सरकारी दफ्तरों में ये सब चला करता है।’’ किशन ने चाय पीते हुये समझाया था।

’’मेरी नौकरी....।’’ उसने रुंआसा होकर कुछ कहना चाहा था कि किशन की पत्नी नमकीन लेकर आ गयी थी।

’’अरे यार, तुम एक सरकारी ऑफिस में चपरासी हो। तुम्हारी नौकरी छोटा साहब तो क्या बड़ा साहब भी नहीं ले सकता।’’ वह हंसा था तो उसे भी थोड़ी देर के लिये राहत महसूस हुयी थी। वह ख़ुद को इस बात के लिये कोसता था कि वह बार-बार भूल जाता है कि वह एक सरकारी नौकरी में है। यह नौकरी उसे एक चमत्कार की तरह मिली थी और इसके बाद से वह चमत्कारों में विश्वास करने लगा था। गांव के अपने सबसे पढ़े-लिखे मित्र के साथ उसने भी समूह के लिये आवदेन कर दिया था और बिना एक रुपये घूस दिये इस नौकरी का मिल जाना उसकी जि़ंदगी की पहली और अब तक की आखि़री ख़ुशगवार याद थी।


घर लौटते वक्त़ उसे सिर्फ़ एक जगह कुत्ते मिले थे और उसने हमेशा की तरह बहादुरी से उनका मुकाबला किया लेकिन आज उसका दिन ही ख़राब था। वह अपनी सायकिल से एक गली पार कर ही रहा था कि छह-सात कुत्तों ने उसकी सायकिल के पीछे-पीछे भौंकना शुरू कर दिया। उसने एक बार तो सायकिल की गति बढ़ा दी और कुत्तों को पीछे छोड़ दिया था लेकिन फिर उसे लगा कि ये नये कुत्ते हैं जो उसके पत्थरों से परिचित नहीं हैं। अगर आज इनसे डर कर भाग गया तो ये रोज़ फिर इसी तरह परेशान करेंगे। इसलिये उसने गली के मोड़ से अपनी सायकिल तब मोड़ी जब कुत्तों ने उसकी सायकिल के पीछे दौड़ना बंद कर दिया था, यहां तक कि उनकी भौंकने की आवाज़ें आना भी बंद हो गयी थीं। उसने सायकिल धीरे से मोड़ी और कुत्तों ने जहां घेरा था, वहां से थोड़ा पहले अपनी सायकिल को दीवार के सहारे खड़ा कर दिया। फिर उसने कैरियर में से अपना बैग निकाला और उसे खोल कर सबसे बड़ा पत्थर हाथ में ले लिया।

अब वह युद्ध के लिये पूरी तरह तैयार था। वह ऐसे ही थोड़ी दूर तक टहलता चला आया लेकिन कुत्ते अब आराम की मुद्रा में पसर चुके थे और उनका लड़ने भिड़ने का बिल्कुल मूड नहीं था।

उसे लगा यह कुत्तों की कोई चाल है और उसने सबसे बड़ा पत्थर लेटे हुये एक कुत्ते पर चला दिया। कुत्ता इस अचानक हमले से घबरा गया और उसके किंकियाने की आवाज़ दूर तक गूंज गयी जिसके बारे में गांव वालों ने सोचा कि किसी सायकिल वाले ने किसी सोये हुये कुत्ते का पांव कुचल दिया है।
            
रात के ग्यारह बज चुके थे। आमतौर पर गांव के लोग हद से हद नौ बजे तक सो जाते थे लेकिन आज उसके घर पर उसकी खैरियत पूछने वालों का तांता लगा हुआ था। कुत्तों और उसका कोई पिछले जन्म का संबंध है, यह बात सबकी ज़बान पर थी। कई लोगों के इसरार पर उसने कुत्ते द्वारा काटे जाने की घटना का रोमांचक और वर्णनात्मक शैली में चित्र खींचा था जिससे उसकी पत्नी और बेटे को भी अब तक पूरी घटना याद हो चुकी थी। सबसे अंत में उसका चचेरा भाई आया और उसने घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुये कुत्तों को ढेर सारी गालियां दी जिनमें उन्हें कुत्ते से ज़्यादा कहा गया था। उसकी पत्नी ने घूंघट से ही अपने जेठ के जख्मी पांव को देखा और घटना के बारे में जानने के लिये उत्सुकता ज़ाहिर की। रामदयाल के बोलने से पहले ही उसका बेटा बोल उठा, ‘‘बापू जैसे ही सायकिल वापस मुड़ा कर लाये, सारे कुत्ते सहम कर चुप हो गये। उन्हें पता चल गया था कि बापू के हाथ वाला पत्थर इकलौता नहीं है बल्कि उनके झोले में ऐसे ढेर सारे पत्थर भरे पड़े हैं। बापू ने जैसे ही बड़ा वाला पत्थर एक लेटे हुये कुत्ते को मारा.....।’’ ‘‘चुप रह, कितना पकपक पकपक बोलता है।’’ चाची के डपटे जाने पर बेटा चुप हो गया और रामदयाल ने आगे की घटना सुनानी शुरू की।

‘‘मैंने जैसे ही एक को पत्थर मारा, बाकी के सारे कुत्ते मुझे घेर कर मेरे ऊपर भौंकने लगे। मैंने अपने बैग में से पत्थर निकाल कर सबको मारना शुरू कर दिया। मेरे बैग में दस से ज़्यादा पत्थर थे और कुत्ते सिर्फ़ चार-पांच थे। मैंने सबको मार कर भगा दिया था और कहीं कोई कुत्ता अब नज़र नहीं आ रहा था। मैंने जैसे ही सारे पत्थर सड़क से उठा कर अपने बैग में भरे और सायकिल पर बैठने ही वाला था कि पास की नाली में से निकल कर एक मरियल सा कुत्ता आया और मेरे पैर को ज़ोर से पकड़ लिया। मैंने जितना ही अपना पैर छुड़ाने की कोशिश की वह उतना ही ज़ोर से अपने दांत गड़ाता गया और अब तो तुम....।’’ उसकी आंखों में नमी सी आ गयी और उसने एक वाक्य और जोड़ा, ‘‘एक सबक मिला कि जिससे खतरा कभी दिखायी नहीं देता, दरअसल असली ख़तरा उसी से होता है।’’ उसके यह कहने पर उसका भाई जो अपनी भाभी की ओर देख कर मुस्करा रहा था, खिड़की की ओर देखने लगा। खिड़की का एक पल्ला टूट कर निकल चुका था और दूसरे को बड़ी मुश्किल से से खिड़की की दीवार पर टिकाया गया था जो जूट की रस्सी से खिड़की की सलाखों से बंधा था।

भाई की पत्नी ने सारी कहानी सुनी और फिर चिंतित स्वर में कुछ कहानियां सुनायीं और कुछ रहस्योद्घाटन किये जिसका सार यह था कि कुत्ते का काटना सदी की सबसे भयानक घटना होती है। उसकी कहानियां सुनने से साफ़ ज़ाहिर था कि उसकी नज़र में जितने लोगों को कुत्तों ने काटा है वे सब कुत्तों की तरह भौंक-भौंक कर कुत्ते की मौत मरे हैं। रामदयाल और उसके घर वालों के चेहरे पर जब डर साफ़ दिखायी देने लगा तो भाई की पत्नी ने बताया कि ये सारी मौतें इसीलिये हुयी हैं कि इन लोगों ने सुइयां तो लगवायीं लेकिन पुरानी मान्यताओं को बेवकूफ़ी समझ कर भूल गये और इसकी सज़ा इन्हें मिली। पुरानी मान्यताओं के अनुसार कुत्ते के काटने पर सात कुओं में झांकना ज़रूरी है और अगर डाक्टर फाक्टर के चक्कर में ना भी पड़ा जाये तो यह इलाज अपने आप में पर्याप्त है। इस ज्ञान रूपी लम्बे चैड़े भाषण को देने के बाद भाई की पत्नी ने एक साथ ख़ुद को काफी हल्का भी महसूस किया और काफी थका हुआ भी। उसे लगा कि उसकी बात को हल्के ढंग से नहीं लिया गया है और इस बात से उसे लगा कि अब चलकर सो जाना चाहिये। भाई ने चलते वक्त पहले अपनी पूज्यनीया भाभी के पांव छुये और उसके बाद भाई के। उसके बेटे ने यह भी बताया कि कुएं झांकने वाली बात में वैज्ञानिक तथ्य भी शामिल होते हैं क्योंकि कुत्ते के काटने से पानी से डर लगने वाली बीमारी होती है और कुएं झांकने पर अपने आप इस बीमारी का एडवांस में इलाज हो जाता है। चचेरे भाई ने पांव छूते वक़्त भाई को चेताया कि हमारी परम्पराओं में बहुत शक्ति है और वह डाक्टर फाक्टर के चक्कर में पड़कर समय बर्बाद न करे और जितनी जल्दी हो सके सात कुंएं झांकने का इंतज़ाम करे। उसने चचेरे भाई की बात पर ध्यान देना चाहा लेकिन उसकी पत्नी का कहना था कि चचेरे भाई हमेशा गलत सलाहें देते हैं और उन पर अमल करना अपने पैर पर हथौड़ा मारना है। उसने कहावत में कुल्हाड़ी की जगह हथौड़ा मारने के प्रयोग पर बुरा नहीं माना और चचेरे भाई द्वारा पूर्व में दी गयी सलाहों और उनके असर के बारे में सोचने लगा। पत्नी कहावतों में अक्सर गलती करती थी और उन दिनों सौ सुनार की एक लुहार कीउसकी पसंदीदा कहावत थी जिसका वह दिन में कम से कम आठ से दस बार प्रयोग करती थी।
            
चचेरे भाई चाचा के लड़के हुआ करते थे और ज़मीन से बहुत प्यार करते थे। उनका सबसे ज़रूरी काम अपने चचेरे भाई की जड़ खोदना हुआ करता था और वे पूरे गांव के लिये भले सुहानुभूति रख लें, अपने चचेरे भाई के प्रति भीतर से नफ़रत का भाव रखते थे। चचेरे भाई के परिवार की बढ़त और तरक्की से इन्हें क्रोध आता था और ये कहते थे कि आज के दौर में कमीने लोग ही ज़्यादा उन्नति करते हैं। सभी भाइयों के चचेरे भाई बहुत ही गंदी सोच वाले और भितरघात करने वाले थे और ये भाई दुनिया से सबसे अच्छे लोग थे जो कभी किसी का बुरा नहीं सोचते थे। सभी भाइयों को ये याद नहीं आता था कि वे भी अपने चचेरे भाइयों के चचेरे भाई हैं और वे अपने-अपने चचेरे भाइयों के कृत्यों से दुखी रहते थे। वे अपने चचेरे भाइयों के बारे में उसी चैपाल पर बैठ कर बुराइयां करते थे जहां से थोड़ी देर पहले उनका चचेरा भाई उनको जी भर कोसने के बाद बाज़ार की ओर चला गया होता था। चचेरे भाई अपनी पत्नियों की हर बात मानते थे और भाइयों की पत्नियों को इस बात का बहुत कष्ट हुआ करता था जिसका ताना वे अपने पतियों को अक्सर दिया करती थीं। चचेरे भाइयों के बेटे भी अपने पिता में पड़े होते थे और उनकी माताएं उन्हें उनके साथ खेलने से मना करती थी। रामदयाल इन अर्थों में चचेरा भाई होने के बावजूद चचेरे भाई की परिभाषा पर खरा नहीं उतरता था लेकिन उसकी पत्नी ज़रूर चचेरे भाई की पत्नी की हर योग्यता रखती थी। अगली सुबह जब रामदयाल उठा तो उसकी पत्नी की साड़ी वह नहीं थी जो पहन कर वह रात में सोयी थी। उसने इसका कारण पूछा तो पत्नी ने कहा कि रात से उसका पेट खराब है और वह तीन बार खेत को दौड़ चुकी है। तीसरी बार वाला दबाव तो इतना ख़तरनाक था कि उसने साड़ी ही ख़राब कर दी। उसने अपने दफ़्तर में छुट्टी के लिये एक दरख़्वास्त लिखी और अपने बेटे से बाहर के कुछ पत्थर चुन कर लाने को कहा। बेटा अपनी हिंदी की किताब पढ़ रहा था जिसमें वह कुछ लाइनों पर अटका हुआ था, ‘‘हे ग्राम देवता ! नमस्कार ! सोने चांदी से नहीं किंतु तुमने मिट्टी से किया प्यार।’’ उसने पिता की तरफ़ पत्थर लेने जाने से पहले प्रश्नवाचक नज़रों से देखा और पंक्तियां एक बार फिर दोहरा दीं। ‘‘ग्राम देवता मतलब क्या ?’’ उसने पूछा। गा्रम उसने सिर्फ़ गणित की किताब में पढ़ा था और उसे अच्छी तरह याद था कि एक किलोग्राम में एक हज़ार ग्राम होते हैं। रामदयाल सीधा हो गया और पत्थर गिनने वाले कार्यक्रम को उसने थोड़ी देर के लिये स्थगित कर दिया, ‘‘देखो ग्राम देवता का अर्थ होता है गांव के देवता।’’ बेटे ने बात काट दी, ‘‘तो हमारे गांव के देवता कौन हैं ? मुखिया जी या चाचा...या फिर....?’’ उसने बेटे को समझाने की कोशिश की, ‘‘ये सब नहीं, गांव खुद एक देवता है जिसमें कई तरह के देवता निवास करते हैं। जो लोग मिट्टी से प्यार करते हैं और मिट्टी के लिये कुछ भी कर सकते हैं।’’ ‘‘लेकिन लोग मिट्टी से क्यों प्यार करते हैं ? मिट्टी तो गंदा कर देती है ?’’ लड़के की जिज्ञासा मिटाना आसान नहीं था। उसे उदाहरण देकर समझाना आसान हुआ करता था और रामदयाल हमेशा उसे कोई न कोई उदाहरण देकर समझाया करता था लेकिन आज उसे कोई उदाहरण सूझ नहीं रहा था। ‘‘मिट्टी से ही हर आदमी पैदा हुआ है और उसे फिर मिट्टी में ही मिल जाना है। मिट्टी से ही प्यार करना चाहिये और उसके लिये किसी और चीज का लालच छोड़ देना चाहिये।’’

‘‘सहर में तो मिट्टी नहीं होती है ना ?’’ बेटे की जिज्ञासाएं अनंत थीं।

‘‘किसने कहा ? हर जगह मिट्टी होती है। सहर में थोड़ी कम होती है क्योंकि वहां की सड़कें पक्की होती हैं।’’

‘‘अंजोरी ने बताया है कि सहर में कहीं मिट्टी नहीं होती और किसी को चाहिये तो दुकान से खरीदनी पड़ती है।’’ बेटे ने अपने किसी काबिल दोस्त की दलील पेश की।

‘‘हां लेकिन होती है....कम भले हो....।’’ रामदयाल शहर को पूरी तरह परिभाषित करने में नाकामयाब साबित हो रहा था।

‘‘हमारे कई दोस्त सहर घूम आये हैं। हमको कब घुमाओगे सहर ?’’ लड़के के इस नाज़ुक सवाल पर रामदयाल मौन हो गया और बाहर पत्थर बटोरने बाहर निकल गया।
            
आसपास के सभी गांवों को मिलाकर सिर्फ़ पांच कुंए थे और इलाज सात कुएं झांकने से होता था। रामदयाल के गांव में तो सिर्फ़ तीन कुंएं थे और उनमें से भी आम आदमी सिर्फ़ दो कुंओं में झांक सकते थे। तीसरा कुआँ मंदिर के पुजारी जी के घर में था जिसमें झांकने के लिये आदमी का पंडित होना ज़रूरी था। पंडित के अलावा पुजारी जी सिर्फ़ उन्हीं लोगों को अपने अहाते में घुसने की इजाज़त देते थे जो ठाकुर थे या फिर पुजारी के लिये अपने खेत में उगी कोई तरकारी या फिर फल खंचिया में भर कर ले जाते थे ताकि उसका प्रसाद बनवा का पुण्य अर्जित कर सकें। गांव में और जितने भी कुंए थे, पिछले तीन से चार सालों में सूख चुके थे और अब लोग उन कुओं में कूड़ा फेंकते थे या फिर गांव में पुलिस की रेड होने पर जुआ खेल रहे जुआरी या देसी ठर्रा बना रहे ग्रामीण उसकी शरण लेते थे। गांव के आसपास के भी कई कुएं सूख चुके थे और सरकार की किसी योजना के तहत उनमें पानी फिर से पैदा करने के लिये कुछ लाख रुपये स्वीकृत किये गये थे। सभी गांव में प्रधानों ने अपने मजदूरों से सभी सूखे कुओं में कम से कम सौ बाल्टी पानी डलवाया था और बाद में कुएं में पानी पैदा कर पाने में असमर्थता ज़ाहिर की थी। रामदयाल ने आसपास के सभी गांव घूमने के बाद पाया कि पचास सूखे कुओं की तुलना में सिर्फ़ पांच पानी वाले कुएं थे और उन पांच कुंओं में से भी ज़्यादातर का पानी महक रहा था। फिर भी उसने तीन कुंए झांक ही लिये। जिस हिसाब से उसने तीन कुएं झांके, उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि कुएं झांकना भी किसी के जीवन की सबसे यादगार घटना हो सकती है। तीनों कुंओं से जुड़ी कोई ख़ास याद नहीं रही थी और कुछके छोटी-छोटी बातों ने उसे विचलित किया था। जैसे वह जब पहला कुआँ झांकने अपने गांव के डीह पर गया था तो उसने पाया कि वहां एक बोरी पड़ी हुई है। उसने कुंआं झांका और थोड़ी दूर वापस आ जाने के बावजूद चैन न आने पर वापस गया और बोरी खोली थी। बोरी में हाई स्कूल बोर्ड परीक्षा की न चेक हुयी काॅपियां थीं। रामदयाल ने एक कॉपी निकाली और पढ़ने लगा। नियमानुसार उस पर नाम न लिख कर रोल नं. लिखा हुआ था इसलिये पता नहीं चला कि कॉपी लड़की की है या लड़के की। उस कॉपी के अंत में एक बीस रुपये का नोट नत्थी किया हुआ था और निहायत ही गंदी हैंडराइटिंग में लिखा था - ‘‘गुरू जी, मुझे जरूर जरूर से पास कर देना नहीं तो मेरे बाबूजी मेरी सादी कर देंगे और आगे नहीं पढ़ाएंगे। मैंने आपके लिये बहुत दिन में ये पैसे बचाये हैं, इससे बच्चों के लिये मिठाई लेते जाना।’’
            
उसने वह नोट उखाड़ कर जेब में रख लिया। जब उसने दूसरी कॉपी उठायी तो उत्साहवश पहले पीछे ही खोला लेकिन उसमें कुछ नहीं था। उसने देखा मेरा गांवशीर्षक से एक निबंध लिखा हुआ था। उसने कुछ पंक्तियां पढ़ीं।

‘‘मेरे गांव में बहुत सुख और शांति है। वहां सभी धर्मों और जातियों के लोग प्रेम से रहते हैं और कोई किसी की जमीन पर नजर नहीं डालता। सब एक दूसरे की औरतों को बहन की तरह मानते हैं और रात-बिरात आने पर चुंगी पर किसी को लूट लिये जाने का कोई डर नहीं है। मेरे गांव में कोई मारपीट नहीं होती है और किसी के घर में कोई चाकू या तलवार नहीं है। यहां के नौजवान हमेशा पढ़ने लिखने की बातें करते हैं और कोई कभी अपने गांव की किसी लड़की को खेत में नहीं खींचता। मेरे गांव के पास जो अस्पताल है वहां एकदम असली दवाइयां मिलती हैं जिनकी एक्सपायरी डेट बहुत दूर होती है। हमारे गांव में न तो कोई किसी बीमारी से मरता है और न ही किसी डाॅक्टर के इलाज करने से। हमारे गांव में मंदिर में सभी को घुसने और भगवान का दर्शन करने की इजाजत है और किसी के मंदिर छू देने पर उसे गंगाजल से नहीं धोया जाता............।’’ उससे आगे नहीं पढ़ा गया। उसे पंक्तियों के बीच लिखी पंक्तियां साफ दिखायी पड़ रही थीं जिसका अर्थ उसने यही समझा कि कम बुद्धि होने के बावजूद एक उम्र में बहुत कुछ समझ में आ जाता है। उसने बोरा बांधने से पहले एकाध कॉपियां और देखीं कि क्या पता किसी और कॉपी में कोई नोट मिले। कुछ और न मिलने की स्थिति में उसने बोरा बांध दिया कि वह प्रधान जी के यहां पहुंचा देगा फिर वह चाहे जो निर्णय लें। उसे एक पल के लिये चिंता भी हुई कि कितने ही लड़कों का भविष्य किसी की इस हरकत से दांव पर लगा हुआ है।
           
दूसरा कुआँ झांकना अपेक्षाकृत अधिक आसान था और वह कुआँ प्रधान जी के घर के पीछे था। उसने जब प्रधान जी को बोरा सौंपा तो उस समय न झांक कर उसने रात का समय चुना। वह अपनी जाति के कारण कोई अप्रिय स्थिति नहीं पैदा होने देना चाहता था और प्रधान जी जातपांत का बहुत ध्यान रखते थे। वह जब रात में प्रधान जी के घर के पीछे वाले कुंए पर पहुंचा तो उसने देखा कि प्रधान जी के घर के सामने बीडीओ साहब की गाड़ी आकर रुकी है। वह डर गया। उसे लगा प्रधान जी को उसने जो बोरा दिया था उसमें वह उसी का हाथ न मान लें। उसने कुआँ झांका और धीरे से प्रधान जी के कमरे की खिड़की के पास पहुंच गया। उसने सोच लिया कि अगर प्रधान जी उसका नाम लेकर उसे जि़म्मेदार ठहरा रहे होंगे तो वह अंदर घुस कर बीडीओ साहब के पांव पकड़ लेगा और उनसे कहेगा कि उसकी कोई ग़लती नहीं है। उसने जो सुना उससे उसका डर और बढ़ गया। प्रधान जी बीडीओ साहब के सामने चापलूसी वाले अंदाज़ में बात कर रहे थे और उन्हें समझा रहे थे कि उनकी कोई गलती नहीं है। बीडीओ साहब ने कहा कि अगर उनका नाम आया तो वह किसी को नहीं छोड़ेंगे। रामदयाल ने सोचा कि उसके दिये हुये बोरे की वजह से कुछ गड़बड़ हुयी है लेकिन जितना उसने सुना और उसमें जितना उसकी समझ में आया, उससे यह पता चला कि दोनों लोगों में किसी योजना को लेकर बात हो रही थी जिसमें प्रधान जी बीडीओ साहब से कुछ और पैसे देने की मांग कर रहे थे और बीडीओ उन्हें धमका रहे थे। उसे बीडीओ साहब की ताक़त का अंदाज़ा हुआ। उसे लगा कि प्रधान जी उनके सामने कितने कमज़ोर हैं। वह धीरे से वहां से निकल आया।

अगले दिन जब वह तीसरा कुआँ झांकने ब्लॉक पर पहुंचा तो दोपहर का समय था। एसडीएम साहब के दफ्तर वाले अहाते में ही कुंआं था। कुंआं झांकने के बाद वह लौटने वाला था कि उसकी नज़र बीडीओ साहब के दफ्तर के बाहर खड़ी एक मोटरसायकिल पर पड़ी जिस पर प्रेस लिखा हुआ था। बोरे और उत्तर पुस्तिकाओं वाला डर उसके भीतर तारी था इसलिये उसने दरवाज़े पर खड़े होकर भीतर की बातें सुनने का जोखि़म उठाया। उसने दरवाज़े पर कान सटाये और थोड़ी देर तक भीतर की बातें सुनीं। दरवाज़े की झिरी से उसने देखा एक युवक बीडीओ साहब से तल्ख़ आवाज़ में बातें कर रहा था। उसने थोड़ी देर तक रुक कर पूरी बात सुनने की कोशिश की कि कहीं उसके बोरे की बात तो नहीं हो रही। उसे एक पल को लगा कि उसी योजना की बात हो रही है। थोड़ी देर तक सुनने के बाद उसे पता चला कि वे दोनों ही बातें नहीं हो रहीं बल्कि किसी दोपहर के भोजन की बात हो रही है और उसे लेकर वह नवयुवक बीडीओ साहब को हड़का रहा है। बीडीओ साहब उसे कोई ख़बर रोकने के बदले कुछ पैसे देने की बात कर रहे थे। युवक कीमत बढ़ाने की बात कर रहा था। उसे लगा कि उस युवक के सामने बीडीओ साहब कितने कमज़ोर हैं। रामदयाल आश्वस्त हुआ कि उसकी बात नहीं हो रही है। वह वहां से निकल गया।
           
इस घटना का जि़क्र जब उसने अपने मित्र शम्भू से किया तो उसने अपना पुराना रोना रोया कि गांव रहने के लिहाज से बहुत गंदी जगह है और वह जल्दी ही इस गंदी जगह को छोड़ कर कहीं चला जायेगा। शहर ही उसकी पहली और अंतिम प्राथमिकता थी। कुंएं झांकना रामदयाल की सबसे पहली प्राथमिकता थी।

इसके बाद के दो कुओं में झांकने में उसे परेशानी हुयी थी। अपने गांव में और ब्लॉक के पहले तीन कुओं के बाद जब वह चौथे कुंएं के पास पहुंचा तो उसके पांव में कांटे चुभ चुके थे और उसकी धोती कंटीली झाडि़यों में फंसने से एकाध जगहों से चिर गयी थी। यह चौथा कुआँ उसके गांव से बाहर दो गांव छोड़ कर छह कोस की दूरी पर था। यह काली जी के मंदिर के पास था और इसके बारे में कहा जाता था कि वह अभिशप्त मंदिर था। यहां दर्शन करने वाला इंसान जिंदा नहीं बचता था। दरअसल किसी ने बहुत पहले दूषित ज़मीन पर यह मंदिर बनवा दिया था और काली मां ने उसे सपने में आकर दूसरी जगह पर मंदिर बनाने का आदेश दिया था। मंदिर फिर गांव में दूसरी जगह बनाया गया था और यहां की मूर्ति वहां स्थापित कर दी गयी थी। यह मंदिर खाली था और वहां की हवा में एक अजीब सी सरसराहट रहती थी जिसे सुनने पर पेशाब की हाजत लग जाने का भ्रम होता था। रामदयाल ने गांव के एकाध लोगों को अपने साथ आने के लिये मनुहार की थी लेकिन सबने कोई न कोई बहाना बना दिया था। डर उसे भी लग रहा था लेकिन जो असली डर था उसके सामने इस डर की कोई बिसात नहीं थी। जैसे ही वह कुएं की मुंडेर तक पहुंचा एक ज़बरदस्त बदबू का भभका उसकी नाक से टकराया। दुर्गन्ध इतनी भीषण थी कि वह अपनी नाक बंद करने पर मजबूर हो गया। एक हाथ से नाक बंद कर जब उसने कुंएं में झांका तो उसकी चीख निकल गयी। अंदर एक क्षत-विक्षत लाश पड़ी थी जो सिर्फ इस लिहाज से लड़की की कही जा सकती थी कि उसने फ्रॉकनुमा कोई पोशाक पहन रखी थी। ख़ौफ़ और हैरानी से उसकी उंगलियां नाक से हट गयीं और देर से सांस रोक कर रखने की बात भूल कर उसने घबराहट में एक ज़ोर की सांस खींची। बदबू का एक भभका उसके फेफड़े में समा गया और सुबह का खाया हुआ पूरा अचार और भात एक उबकाई के साथ बाहर आ गया।
            
पुलिस द्वारा जब लाश बाहर निकाली गयी तो पता चला कि वह सिरपत की आठ साल की बेटी की लाश थी जिसका सामूहिक बलात्कार किया गया था। सिरपत और उसकी पत्नी छाती पीट-पीट कर रो रहे थे और पूरा गांव सकते में था। क्योंकि वहां एकाध अख़बारवाले भी आ गये थे, पुलिस ने दावा किया कि दस दिन के अंदर अपराधी को पकड़ लिया जाएगा और उसको कड़ी सज़ा दी जाएगी। सिरपत की पत्नी को उसकी बेटी की लाश नहीं देखने दी गयी क्योंकि वह बर्दाश्त नहीं कर पाती। रामदयाल जानता था कि सिरपत को अब कभी रात को नींद नहीं आयेगी क्योंकि जैसे ही उसे नींद आने वाली होगी, उसे अपनी बेटी की विक्षत लाश दिखायी दे जाएगी। उसकी पत्नी हर रात रोयेगी और उससे पूछेगी कि उसने बेटी की शक्ल क्यों नहीं देखने दी। वह अपनी पत्नी को चुप कराने की कोशिश में ख़ुद भी रोने लगेगा और मन ही मन सोचेगा कि अगली सुबह वह थाने जाकर पूछेगा कि अपराधी कब तक पकड़े जाएंगे। अगली सुबह दारोगा उससे सुहानुभूति जताएगा और कहेगा कि गुनाहगार जल्द ही पकड़े जाएंगे। कुछ सबूत मिले हैं जिनके आधार पर तलाश की जा रही है और हफ्ते दस दिन में हत्यारे को पकड़ लिया जाएगा। वह सोचेगा कि वह जब अगले हफ्ते थाने जाएगा तो थाने में कुछ हत्यारों को पकड़ कर पुलिस ने हथकड़ी लगा कर रखा होगा। वह उनके गिरेबान पकड़ कर पूछेगा कि कैसे कोई इतना हैवान हो सकता है। गांव का प्रधान कुएं के आसपास के स्थान से झाडि़यां कटवा कर कुंएं की सफ़ाई करवा देगा। फिर किसी को कुत्ता काटेगा तो उसे इतना दहशतनाक और वीभत्स दृश्य नहीं देखना पड़ेगा।
            
पुजारी जी का कुआँ जब वह झांकने पहुंचा था तो उसे नहीं पता था कि कुएं झांकना भी इतना बड़ा और ख़तरनाक काम साबित हो सकता है। जितनी आसानी से उसने पहले तीन कुएं झांके थे, उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि आगे के कुएं उसकी जि़ंदगी का सबसे ख़तरनाक अनुभव साबित होने वाले हैं। जब वह पहुंचा तो पुजारी जी संध्या कर रहे थे और उसे आंखों से इशारा किया कि वह उनके लकड़ी के दरवाज़े से दूर रहे। उसने पूरी आपबीती पुजारी जी को सुनायी तो पुजारी जी ज़ोरों से हंसने लगे।

‘‘करे दयलवा, दुनिया कहां से कहां जा रही है अउर तूं कुक्कुर काटने पर कुआँ झांक रहा है ? अरे पागल इंटरनेट का जमाना है रे...देख प्रधान जी अपने लड़का से कम्पूटर पर बतियाते हैं फोटो के साथ। जो सूई लगवावऽऽ।’’
            
रामदयाल पुजारी जी की आधुनिकता पर थोड़ा हैरान हुआ। इस बात का कुत्ते के काटने से कुछ मतलब नहीं था लेकिन पुजारी जी ने उसे कुछ और भी बातें बतायीं जैसे उनके बेटे की याद में मंदिर में अगले हफ्ते एक भण्डारे का आयोजन किया जायेगा जिसमें आस-पास के सभी गांवों के लोगों के लिये भोजन और मिठाई की व्यवस्था होगी। उसने फिर से कुआँ झांकने वाली बात कही तो पुजारी जी ने उसे झिड़क दिया।

‘‘अरे पागल, तुमको एकदम बुद्धि नहीं है का, तुम हमारे घर में घुसोगे ? अरे कुआँ बाहर रहता तो हमको परेशानी नहीं होता लेकिन उ आंगन में है न....।’’
            
उसने फिर बहस नहीं की। पुजारी जी अच्छे और मिलनसार आदमी थे और कभी किसी से ऊंची आवाज़ में बात नहीं करते थे। उनके बेटे की अभी हाल ही में ट्रेन से कट कर मौत हो गयी थी और पुजारी जी काफ़ी उदार से रहने लगे थे। उसने मन से इच्छा न होने के बावजूद सोचा कि अपने मित्र शम्भू की सलाह अनुसार रात को जब पुजारी जी मंदिर में कीर्तन में होंगे तो वह रात को चुपचाप उनके आंगन में जाकर कुआँ झांक आयेगा।
           
जब वह रात को पुजारी जी के घर पहुंचा तो लगभग आधा गांव मंदिर पर कीर्तन में व्यस्त था। शम्भू बाहर खड़ा था ताकि कोई आये तो वह सियार की आवाज़ निकाल कर उसे होशियार कर सके। चूंकि पुजारी जी के घर में सिर्फ उनकी पत्नी थी इसलिये रामदयाल को ज़्यादा फि़क्र नहीं थी। बहू कीर्तन के समय मंदिर में प्रसाद की व्यवस्था देखती थी। जब वह दरवाज़े से भीतर घुसा तो लालटेन पता नहीं क्यों बुझायी जा चुकी थी और घुप्प सन्नाटा था। जैसे ही उसने कुएं की तरफ पहला कदम बढ़ाया कि उसे किसी के कराहने की आवाज़ सुनाई दी। उसके कदम अपने आप आवाज़ की दिशा में उठ गये। पुजारी जी के कमरे से लगी जो भूसा रखने वाली कोठरी थी उसमें से किसी आदमी के कराहने की आवाज़ आ रही थी। रामदयाल ने चांद की रोशनी में देखा की दरवाज़े की सांकल चढ़ी हुयी है। भीतर से कांपती हुयी रोने की आवाज़ रात को रहस्यमय बना रही थी। हवा ठंडी थी और रामदयाल की गर्दन पर पसीने की बूंदें मोतियों की तरह चमक रही थीं। उसके पांव धीरे-धीरे कांप रहे थे क्योंकि वह कराहने की आवाज़ उसे पहचानी हुयी लग रही थी। उसने पवनसुत हनुमान का नाम लेकर सांकल उतार दी और भूसे भरे कोठरी में बाहर से ही खड़ा आंखें फाड़ कर देखने लगा।
           
शम्भू को यह तो पता नहीं चला कि रामदयाल भीतर से भागता हुआ क्यों आ रहा है लेकिन वह समझ गया कि मामला ज़रूर कुछ गड़बड़ हो गया है। शायद पंडिताइन ने उसे कुआँ झांकते देख लिया है। दोनों भागते रहे और तालाब के पास जाकर रामदयाल धम्म से ज़मीन पर बैठ गया।

‘‘काहे भाग रहे हो ? भूत देख लिये क्या ?’’ शम्भू ने हांफते हुये टूटी आवाज़ में पूछा।
           
रामदयाल ने जवाब में जो कहा उसे सुनकर शम्भू पहले तो मुस्कराया कि रामदयाल पागल हो गया है। फिर वह हंसने लगा कि रामदयाल को कुत्ते काटने से जो बीमारी होती है वह हो गयी है और वह उलजुलूल बक रहा है। थोड़ी देर हंसने के बाद वह अचानक गंभीर हो गया और उसके चेहरे पर भयानक चिंता और सुरसुराते डर के भाव हावी हो गये।

‘‘जोगलाल जिंदा है ?’’

‘‘हां, हमने अपनी आंखों से देखा। अधमरे जैसा....पहले हमने सोचा कि वह जोगलाल का भूत है। हम डर के मारे वहीं चक्कर खाकर गिर जाते लेकिन फिर हमारी नजर उसके माथे पर गयी। वहां से खून चू रहा था।’’

‘‘बाप रे....।’’ शम्भू डरता-डरता अचानक कहने लग रहा था कि उसे डर तो लग रहा है लेकिन पूरी तरह से विश्वास अभी भी नहीं हो रहा।

‘‘हम जब दरवाजा खोले तो वह कहने लगा कि हमको बचा लो। हमको बाबू ने दो महीने से बांध कर रखा है। हमारा हाथ-पांव खोल दो। उसकी आवाज बहुत भयंकर थी। वो ऐसी बात बोला कि हम कांप उठे....। हम अभी सोच ही रहे थे कि क्या करें कि पंडिताइन की आवाज सुनायी दी और हम सांकल चढ़ा कर वहां से भाग लिये।

‘‘क्या बात बोला...?’’ शम्भू ने पूछा। ‘‘और भागते हुये कुंआं झांके कि नहीं ?’’

‘‘कुएं की बात तो दिमाग से एकदम निकल गयी थी लेकिन कुएं की जगत छोटी है इसलिये भागते हुये उसके बगल से भागे तो हमारी परछांई उसमें बनी और अपने आप झांकना हो गया।’’

‘‘क्या कहा जोगलाल ने...?....अउर ऊ जिंदा कइसे हो सकता है ?’’ शम्भू अब भी संशय में था। पंडित जी ने दो महीने पहले ट्रेन से कट कर मरे जोगलाल की ख़ुद पुलिस थाने में पहचान की थी और पूरे सम्मान से उसका अंतिम संस्कार किया था।

‘‘जोगलाल ने कहा कि बाबूजी ने कजरी को रख लिया है और चाहते हैं कि हम खुद मर जाएं ताकि उनको पाप न लगे।’’ बोलते हुये रामदयाल के शरीर में फिर एक बार वही झुरझुरी दौड़ गयी।

‘‘बकवास है..........।’’ शम्भू चिल्लाया और झटके से खड़ा हो गया मगर थोड़ी देर बार अपने आप में भुनभुनाने लगा। ‘‘आधी बात तो हम मान सकते हैं लेकिन अपने बेटे को.....अपने सगे बेटे को....हे शिवशंकर...एक औरत के लिये.....हे विधाता....हे दीनदायल....हे रघुनंदन।’’ रामदयाल समझ गया कि शम्भु को इस बात का गहरा सदमा पहुंचा है। जोगलाल उसका अच्छा मित्र था और पंडित ठाकुरों वाले चोंचले उसके भीतर बिल्कुल भी नहीं थे। वह मस्त रहता था और हमेशा हंसी मज़ाक करना उसकी आदत में शामिल था। जब वह दूसरे गांव से कजरी को अचानक एक दिन ब्याह लाया था तो पूरा गांव उसका परियों जैसा रूप-रंग देखकर भौंचक था। पंडित जी पहले तो बहुत चिल्लाये थे और उसे घर से निकाल दिया था लेकिन जब कजरी ने रोकर उनके पांव पकड़ लिये तो उनका मन पसीज गया था। कजरी ब्राह्मण न होने के बावजूद बहुत बहुत धार्मिक निकली थी और पंडित जी के लिये यह बहुत बड़ाई वाली बात थी। धीरे-धीरे वह कजरी को मानने लगे थे। लेकिन अभी दो महीने पहले जब जोगलाल शहर से काम की तलाश कर वापस आ रहा था कि उसकी ट्रेन से कटने से मौत हो गयी थी। कहा गया था कि वह कान में इयरफोन लगाये अपने मोबाइल पर गाना सुन रहा था इसलिये ट्रेन की सीटी नहीं सुन पाया। पंडित जी बहुत रोये थे, कजरी दहाड़ें मार-मार कर चीखती रही थी लेकिन पंडिताइन बुत बनी बैठी रही थीं। लाश इंजन में फंस कर दूर तक घिसटती गयी थी और लाश की हालत ऐसी हो गयी थी कि उसे अंदाज़े से सिर्फ़ मां-बाप पहचान सकते थे या फिर पत्नी। शिनाख्त पंडित जी ने की थी और पूरा गांव इस बात पर हैरान था कि पंडिताइन इतनी कठकरेजिन निकली थीं कि उन्होंने एक आंसू नहीं बहाया था। जोगलाल के बाद ससुर और बहू पूरी तरह से धार्मिक बन गये थे और दिन का बड़ा हिस्सा मंदिर में ही बिताया करते थे। कजरी हमेशा सफे़द साड़ी पहनती और गुमसुम रहती थी लेकिन उसका सौंदर्य दिन प्रति दिन निखरता जा रहा था।
            
शम्भु ने आक्रोशित होकर कहा कि वह पंडित जी के घर में आग लगा देगा तो रामदयाल उसका कंधा सहलाने लगा।
‘‘गांव नरक हो गया है यार...। एकदम नरक...रहने लायक नहीं रहा।’’ शम्भू ने भरे गले से कहा। रामदयाल ने हामी भरी। शम्भू बोलता रहा।

‘‘सहर कुछ भी हो गांव से बहुत अच्छा है भाई...बहुत अच्छा। सब खुलेआम होता है कम से कम...इतनी गंदगी नहीं है वहां...उफ्फ...घिन आ रही है गांव से....।’’ शम्भू बहुत कुछ कहता रहा और दोनों बीडि़यां पीते रहे।

दोनों ने नौ-नौ करके अठारह बीडि़यां पी और अपने घरों की ओर चले गये। रात पूर्णमासी की थी और उनकी परछाइंया दूर से देखने पर ऐसी लग रही थी जैसे दो दानव रात पर कब्ज़ा करने जा रहे हों।
            
अगले दिन उसने अपने दफ्तर में छुट्टी की दरख्वास्त जमा की और फिर से किशन के घर पहुंचा। उसने छठवां कुंआं किशन की मदद से झांकने की सोची थी और पहुंचने पर किशन ने उसकी पूरी मदद करने का निश्चय किया। यह तय रहा कि कल चल कर डॉक्टर के यहां किशन पहले उसे कुत्ते के काटने पर लगवायी जाने वाली सुई लगवायेगा फिर कुओं के बारे में सोचा जायेगा।
            
अगले दिन डॉक्टर से सुई लगवाने के बाद किशन उसे लेकर उस छोटे से कस्बे में इधर-उधर कुएं खोजता रहा। कस्बा आधुनिक होने के लिये मचल रहा था और उसने कुओं को अपने पेट में कहीं छिपा लिया था। हर जगह कोई इमारत बनती दिखायी देती थी और कुआँ तो दूर कहीं नल तक नहीं दिखायी देता था। जल्दी ही यहां पानी के ठेले वाले एक रुपये में ठंडा शीतल जल पिलाने के लिये अवतार लेने वाले थे।

‘‘मैंने इस एरिये में कुआँ देखा था एकाध साल पहले लेकिन सही जगह नहीं याद आ रही है।’’ थक कर एक चाय की दुकान पर बैठते हुये किशन ने कहा। वह भी साथ में बैठ गया। उसे लगा कि वह बेकार में अब तक किशन को भाग कर शादी करने के लिये मन में कोसता रहा है। वह कितना अच्छा इंसान है, उसकी कितनी मदद कर रहा है। उसने चाय वाले से कुंए के बारे में पूछा तो उसने अनभिज्ञता ज़ाहिर की और बताया कि वहां से सात-आठ किलोमीटर दूर एक मंदिर है जहां पहले एक कुआँ था जो अब जादुई कुआँ बन गया है जिसमें झांकने से सारे पाप धुल जाते हैं और सारी बीमारियां ठीक हो जाती हैं।
            
दोनों ने पहली बार इस कुएं के बारे में सुना था। किशन को आश्चर्य हुआ कि इसी कस्बे में रहकर कभी उसने इस कुएं के बारे में क्यों नहीं सुना। दोनों ने वहां के लिये जीप पकड़ी और किशन ने कहा कि अगर वाकई ऐसा है तो वह अपनी पत्नी को भी ले आयेगा ताकि उसके श्वेत प्रदर की बीमारी ठीक हो जाये। रामदयाल को श्वेत प्रदर का अर्थ नहीं पता था लेकिन उसने सोचा कि वह कुएं में झांकने के बाद इसके बारे में पूछेगा।
            
जिस मंदिर के पास वह कुआँ था वहां दूर-दूर तक मेला लगा हुआ था। कुएं की जगत को झंडियों और झालरों से सजाया गया था और लाउडस्पीकर पर रामकथा चल रही थी जिसमें कोई ज्ञानी गा-गाकर बता रहा था कि राम और भरत सगे भाई न होकर भी दुनिया के सबसे अच्छे भाई थे और वैसे भाई आजकल मिलना मुश्किल है। मंदिर के पुजारी जी मंदिर के द्वार पर एक चैकी पर बैठे थे और अपने चेले इंद्रासन तिवारी से, जो कि बलात्कार के आरोप में जमानत पर छूटने के बाद एकदम धार्मिक और वैरागी हो गया था, पर्चियां कटवा रहे थे। पर्चियों के अनुसार व्यक्ति का नाम पुकारा जाता और वह अपने साथ वाले मरीज़ को लेकर पंडित जी के पास आता। उनके साथ नरोत्तम नाम का पंडित जी का दूसरा शिष्य जो सावन और नवरात्रि में मांस, मदिरा, छिनैती और वेश्याओं की पूरी तरह उपेक्षा करता था, जाता और कंटीली बाड़ से घिरे कुएं के क्षेत्र में मरीज़ और उसके साथ के व्यक्ति को प्रवेश कराता। इस समय उसकी ख़ास जि़म्मेदारी होती कि कुएं में सिर्फ़ मरी़ज़ ही झांक पाए जिसके नाम पर दो हज़ार रुपये के शुल्क की पर्ची कटवायी गयी होती थी। अक्सर बिना पर्ची कटवाए ही मरीज़ के साथ आया व्यक्ति भी उचक कर कुएं में झांककर अपनी बीमारी का इलाज़ कर लेना चाहता था। यहां से नरोत्तम की दूसरी भूमिका शुरू होती थी। वह समझ जाता था कि गठिया या मिर्गी के रोगी के साथ आये इस व्यक्ति को ज़रूर कोई गुप्त रोग है जिसका इलाज़ तो उसे चाहिये लेकिन किसी से बताना नहीं चाहता। वह बाहर निकलते समय उस व्यक्ति को भरोसे में लेता था और कुछ ही दिनों बाद वह व्यक्ति भी पर्ची कटवाने पहुँच जाता था। कुएं के पास एक व्यक्ति चौबीसों घण्टे बैठा रहता था जो रस्सी में बंधा लोटा कुएं में डालकर एक लोटा पानी निकालता था और उसमें से एक चुल्लू निकाल कर मरीज के ऊपर छिड़कता था। मरीज़ के साथ वाले व्यक्ति पर उसके छींटें न पड़े, इसका चिंता पहले से नरोत्तम करता ही था और वह मरीज़ के साथ आये व्यक्ति को पीछे रहिये, पीछे रहिये, बस बस इसके आगे मत जाइयेकह कर और पीछे धकेल कर उसे पानी के छींटों से वंचित कर देता था। कुएं के पास बैठे व्यक्ति की ड्यूटी हर आठ घण्टे पर बदलती थी और उनका मानना था कि आठ घण्टे एक जगह बैठने के लिये दो हज़ार रुपये की तनख्वाह काफ़ी कम है। पण्डित जी के इस तर्क की ‘‘यह पैसा तो बस खर्चे पानी के लिये है, असली कमाई तो वह पुण्य है जो मरीज़ों की सेवा से मिल रहा है’’ शिफ्ट में काम करने वाले तीनों कर्मचारियों को अब तक कोई काट नहीं सूझी थी। उनमें से दो तो दुनियादार थे और पण्डित जी को क़ायदे से पहचानते थे और इस काम को कोरम की तरह पूरा करते थे लेकिन तीसरा व्यक्ति कुछ अधिक ही धार्मिक था और हर समय इस जुगत में रहता था कि अगर किसी तरह वह दो हज़ार रुपये बचा सकता तो पर्ची कटवा कर वह भी अपनी बीमारी से छुटकारा पा लेता। वहां कांटेदार बाड़ के पास एक बोर्ड लगा था जिस पर लिखा था - ‘‘बिना शुल्क दीये यदि आप चामत्कारी जल की बुंदे पा भी जायें तो कोई लाभ नहीं। प्रभू के दरबार में बेइमानी न करें, पुर्ण शूल्क देकर ही जल का लाभ प्राप्त करैं - आज्ञा से, पंडित अरुण शीत महाराज पूर्णयोगि’’
            
मंदिर के आसपास मेला लगा हुआ था और वहां गोलगप्पे का भी ठेला लगाने के लिये पंडित जी को कुछ पैसे देने पड़ते थे यानि मंदिर में कुछ दान-पुण्य करके पुण्य अर्जित करना पड़ता था। जो लोग दान-पुण्य करने में कमज़ोर साबित होते थे उन्हें कुछ मरीज़ों को जुटा कर लाना पड़ता था जिन्हें कोई असाध्य टाइप की बीमारी हो। नगर निगम और नगर पालिका जैसे नामों वाली संस्थाओं में काम करने वाले सभी लोग आस्तिक थे और प्रभु की किसी भी लीला में टांग अड़ाकर अपना अहित करवाने की हिम्मत किसी में नहीं थी। मंदिर के बाहर बने तंबुओं में उन अख़बारों की कटिंग लटकाई गयी थी जिसमें इस कुएं की महिमा का वर्णन था। चमत्कारिक कुएं ने किया कैंसर के मरीज़ को स्वस्थ‘, ‘आस्था का केंद्र बना श्रीराम का आशीष प्राप्त कुआँया चमत्कारी कुएं का पानी पीकर बोलने लगा जन्म से गूंगाजैसे शीर्षकों से ख़बरें छपी थीं जो पंडित जी को ख़ासी महंगी पड़ी थीं इसलिये उन्होंने लालची पत्रकारों को ज़्यादा तवज्जो न देकर एक बार में ही सभी अख़बारों में छपवायी गयीं ख़बरें काट ली थीं और मढ़वा कर उस तंबू में लटकवा दिया था जहां पर्चियां कटती थीं। पंडित जी का आरोप था कि पत्रकार जिन्होंने ये ख़बरें छापी हैं, उनमें ज़रा भी शराफ़त (यहां शराफ़त से उनका अर्थ प्रोफ़ेशनलिज़्म था) नहीं है और ये लोग एक बार ख़बर छाप कर कई बार पैसे ऐंठने की जुगत में लगे रहते हैं। ईमानदारी का ज़माना नहीं रह गया था जैसा कि कुछ साल पहले तक था जब पत्रकार कर्मठ और ईमानदार हुआ करते थे। पंडित जी बताते हैं कि अभी कुछ ही साल पहले तक, जब ईश्वर के चमत्कार से एक तालाब में उन्होंने बीमारियां दूर करने वाले गुण खोजे थे, पत्रकार इतने ईमानदार थे कि एक ख़बर के लिये सिर्फ़ एक बार धन की मांग करते थे। कुछ तो इतने ईमानदार थे कि पैसे तक नहीं मांगते थे और ख़ुद मरीज़ ले आने में पंडित जी की सहायता करने लगते थे। बदले में वे ईमानदार लोग सिर्फ़ पंद्रह या बीस प्रतिशत पर आगे भी काम करने को तैयार हो जाते थे। हालांकि कुछ बेईमान नास्तिक पत्रकार तब भी थे जिनमें से एक ने पुलिस को भड़का कर इन नेक काम में बाधा डाल ही दी थी लेकिन पंडित जी को गिरफ्तार करने वाले तीन पुलिकर्मियों में से कोई आबाद नहीं बचा। पंडित जी बताते हैं कि एक का बेटा लापता हो गया और दूसरे की पत्नी उसे छोड़कर प्रेमी के साथ भाग गयी। गिरफ्तारी में जो मुख्य पुलिसकर्मी था, उसके तो पूरे परिवार की सड़क दुर्घटना में मौत हो गयी। इस घटना के बाद से पंडित जी कोई भी चमत्कार करने से पहले सभी पत्रकारों और संबंधित थाने के कर्मचारियों को वशीकरण के द्वारा वश में करके ही काम आगे बढ़ाते थे।
            
रामदयाल और किशन जब यहां पहुंचे तो यहां की भव्यता देखकर चकित हो गये। रामदयाल तो काफ़ी घबरा गया और वहां से चलने की बात करने लगा। किशन ने उससे कहा कि थोड़ी देर देख लेते हैं और पंडित जी के चेले से मिल कर बात करने की कोशिश करते हैं क्योंकि उन्हें कौन सा कुएं का पानी चाहिये। किशन ने एक दो लोगों की मदद से तंबू में घुसने में इसलिये सफ़लता प्राप्त कर ली क्योंकि दो बज गये थे और दोपहर के भोजन का वक़्त हो गया था। कुएं के पास बैठने वाला कर्मचारी तो वहीं बैठा था लेकिन पंडित जी और अन्य कर्मचारी आधे घण्टे के लिये खाना पानी और प्रभु की भक्ति का नशा वगैरह करने चले गये थे। तंबू में पहले तो उन्हें साफ़ मना कर दिया गया लेकिन सौ रुपये देने पर बात इस पर तय रही कि लंच के समय में ही आठ सौ रुपये देने पर रामदयाल को चुपके से कुएं में झांकने का मौका दे दिया जायेगा पर उनके ऊपर जल नहीं छिड़का जायेगा। किशन तुरंत तैयार हो गया। वह वहां की भव्यता देखकर प्रभावित हो गया था लेकिन रामदयाल की जेब में सिर्फ़ छह सौ रुपये थे और वह इन्हें खर्च करने के पक्ष में नहीं था।
‘‘और एकाध जगह देखें तो शायद कोई कुआँ मिल जाये।’’ उसने धीरे से किशन से कहा। किशन ने उसकी बात नहीं सुनी और सारी सेटिंग करते हुये दस मिनट के भीतर ही दोनों कुएं के पास थे। रामदयाल ने कुएं में झांका और किशन ने अपने पैसे मिलाकर आठ सौ रुपये का बिल चुकता किया। बाहर निकल कर वह पूरा समय वहां आये मरीज़ों से यह पूछता रहा कि उनमें से कितने वहां पहले भी आ चुके हैं और कितनों की बीमारी वहां के पानी से ठीक हुयी है। उसके सर्वे का परिणाम अच्छा रहा और उसने तय किया कि कल ही वह अपनी पत्नी को लेकर वहां आयेगा ताकि उसकी श्वेत प्रदर की बीमारी ठीक हो जाय।

‘‘श्वेत प्रदर कौन सी बीमारी होती है ?’’ रामदयाल ने उससे पूछा तो वह बुरी तरह उदास हो गया।

‘‘ये एक ऐसी बीमारी होती है जिसमें सभी अरमानों पर सफ़ेद पानी फिर जाता है।’’ उसने आसमान में देखते हुये कहा। साथ में उसने यह भी जोड़ा कि आदमी प्रेम करके विवाह करे या घरवालों की मर्जी से, दोनों दरअसल अलग-अगल श्रेणी के चूतियापे ही हैं लेकिन प्रेम विवाह अधिक बड़ा चूतियापा है। प्रेम विवाह वालों जैसी ही राय वह भी रखते थे जिनकी शादी घरवालों की रज़ामंदी से हुयी होती थी। दोनों ने अपने गांव के दिनों को याद किया जब वे खेतों में तम्बाकू पीते हुये गांव के बारे में बातें किया करते थे। रामदयाल अगली फसल में पूरी जीजान लगाने की बात किया करता था और किशन गांव की किसी ताज़ा-ताज़ा जवान हुयी लड़की को भोगने के सपने देखा करता था। छठवां कुआँ झांक लेने के ख़याल से रामदयाल बहुत ख़ुश था और उसने किशन के पीने के प्रस्ताव को मना नहीं किया जबकि इसके पहले पांच बार उसने सिर्फ़ किशन के साथ ही पी थी।
           
दोनों जब कस्बे से बाहर किसी गांव के रास्ते पर एक सूखे कुएं की जगत पर बैठ कर पी रहे थे और आधी माधुरी ख़त्म हो गयी थी, किशन ने एक ऐसी बात कही जिससे रामदयाल का नशा बिना सीढ़ीयों के ही उतरने लगा। पहले उसने अपनी पत्नी के बारे में कुछ बातें कीं और फिर अचानक चिल्लाया।

‘‘दुनिया की सभी औरतें कमीनी होती हैं ?’’

‘‘क्यों ?’’ रामदयाल ने उत्सुकता व्यक्त की।

किशन ने जो रामकहानी सुनायी उसका सारांश यह था कि ऑटो स्टैण्ड पर उससे एक महिला मिली थी जिससे उसकी कभी-कभी मोबाइल पर बात होती थी। उसे वह महिला अच्छी लगने लगी और वह छिप-छिप कर मोबाइल पर कुछ अधिक ही बातें करने लगा था। दोनों कई बार मिल चुके थे और उस महिला को भी उसके साथ वक़्त बिताना अच्छा लगने लगा था। मोबाइल पर बातें करने के बाद वह कॉल डिटेल्स मिटा दिया करता था लेकिन एक दिन जब वह पैखाने में था, उस महिला का कॉल आ गया जो उसकी पत्नी ने उठा लिया और तब से पति-पत्नी के बीच तनाव चल रहा है।

‘‘जानते हो दोस्त, मैं इतना सीधा और सरल हूं कि पकड़ा गया नहीं तो मेरे साथ कितने ऑटो चलाने वालों ने दो-दो रखी हैं और उन्हें उनकी बीवियां कभी नहीं पकड़ सकतीं। इतने चालू हैं वे....।’’ उसे अपने सीधे होने पर दुख हो रहा था और अन्य ऑटो चालकों के चालूपने के कारण वह रुंआसा हो चला था। रामदयाल उसके कंधे पर हाथ रख कर सांत्वना देता रहा। किशन ने अपना दुखड़ा रोना चालू रखा और माधुरी की दूसरी बोतल खुल गयी थी।

‘‘जानते हो, एक तो मैं पड़ जाता हूं सीधा और दूसरे मेरी पत्नी है बहुत तेज। औरतें तीन तरह की होती हैं.....।’’ इसके बाद उसने तीन तरह की महिलाओं की श्रेणी बतायी जिसे सुनते वक़्त रामदयाल सिर्फ़ यह सोचता रहा कि उसकी पत्नी किस श्रेणी में आती है।

‘‘.........और तीसरी तरह की महिलाएं वे होती हैं जो दिमाग से बहुत तेज होती हैं और उनमें भावना नाम की कोई चीज़ नहीं होती जैसी मेरी पत्नी है। उसे अपने पति पर जरा भी विश्वास नहीं....। शर्म आनी चाहिये उसे...।’’ वह बाकायदा रोने लगा और अपनी पत्नी की इस स्थिति का जि़म्मेदार इस कस्बे को बताने लगा।

‘‘जानते हो बिरादर आदमी या तो गांव में रहे या तो सहर में। ये साला हिजड़ों की तरह इस झांटू कस्बे में रहने से ही सब गड़बड़ हुई है। यहां कोई आदमी किसी औरत से बात कर ले बस्स...हो गया बवाल। सहर में कम से कम इस पर कोई रोकटोक तो नहीं और गांव में भी जिसे मन करे वो रात को...।’’

रामदयाल ने प्रतिवाद किया कि उसके हिसाब से कस्बा ही रहने के लिये सबसे मुफ़ीद जगह है तो किशन भड़क गया।
‘‘कस्बों में सबसे बड़ी दिक्कत होती है बिरादर की वे एक पिछड़ी औरत की तरह अपटूडेट होने का नाटक तो करते हैं लेकिन होते नहीं। साला यहां पानी, बिजली, हगना, मूतना हर चीज का पैसा देना पड़ता है लेकिन सुविधा एक नहीं। हवा, पानी, सब्जी आदमी हर चीज में मिलावट...। देखना मैं किसी दिन यह घटिया जगह छोड़ कर अपने गांव चला जाउंगा या फिर किसी बड़े सहर...मेरी बीवी साली...।’’’

 रामदयाल को लगा कि किशन अपनी बीवी से बहुत नाराज़ है तो उसने उसका गम हल्का करने के लिये अपनी पत्नी का विषय प्रस्तुत कर दिया। उसकी पत्नी का नाम सुनते ही किशन, जो कि होश में एकदम गऊ टाइप की चीज़ हुआ करता था, भड़क गया और चिल्लाने लगा।

‘‘तुम तो साले मिट्टी के माधो हो, तुम्हारी बीवी तुम्हारे भाई से फंसी है और तुम्हें ख़बर ही नहीं....।’’ यह कहकर उसने दूसरी ओर मुंह कर लिया। रामदयाल ने सोचा कि अधिक पीने और अपनी पत्नी से दुखी होने के कारण किशन को दुनिया की सारी पत्नियां बेवफ़ा नज़र आ रही हैं। उसने किशन से पूछा कि सातवां कुआँ कहां मिलेगा। किशन ने उसे गाली देने के बाद अपनी बोतल, जिसमें थोड़ी सी माधुरी बची हुयी थी, घुमा कर फेंक दी जो एक पत्थर से टकराकर टूट गयी और पास ही निश्चिंतता से सोया एक खजुहट वाला कुत्ता चिहुंक कर भाग गया। किशन ने बताया कि सातवें कुएं के लिये उसे शहर जाना पड़ेगा क्योंकि उसकी जानकारी में अब कोई कुआँ नहीं बचा। रामदयाल ने कहा कि कल सुबह वह गांव जाकर कुछ पैसों का बंदोबस्त करेगा उसके बाद शहर के लिये निकलेगा।
            
शहर में रामदयाल के गांव के मुखिया का बेटा रहता था जो वहां हर किसी को यही बताया करता था कि उसका पुश्तैनी घर इस शहर से थोड़ी दूर एक कस्बे में है। भूल से भी अपने गांव का नाम वह नहीं लेता था और अपने घर के किसी भी सदस्य को उसने शहर में उसके कमरे पर आने के लिये मना कर रखा था। मुखिया जी से जब रामदयाल ने उनके बेटे का पता मांगा तो उन्होंने सहर्ष दे दिया क्योंकि वह जानना चाहते थे कि उनका इंजीनियर बेटा हाथ से निकला है तो आखि़र कितना निकला है। उसी हिसाब से उन्हें आगे की रणनीति तय करनी थी जिसमें बेटे का विवाह वग़ैरह एक राजनीतिक घर में तय करके उन्हें अगले साल विधायकी का चुनाव लड़ना था।
           
जब वह मुखिया जी के घर से अपने घर पहुंचा तो उसका बेटा दुआर पर पड़े खटिये पर सो गया था और उसकी पत्नी नदारत थी। वह पत्नी को खोजता घर के भीतर गया और पलानी तक में खोज आया। उसका कहीं नामोनिशान न पाकर वह खलिहान की तरफ़ निकल गया। रात का अंधेरा घिर आया था और उसने देखा कि खलिहान के पास जो ट्यूबवेल है उसके हौदे की जगत पर उसकी पत्नी की साड़ी पड़ी है। उसे लगा कि उसकी पत्नी का पेट फिर से ख़राब हो गया है और वह चिंतित हो गया। उसने कदम साड़ी की ओर बढ़ाये ही थे कि ट्यूबवेल के मशीन वाले कमरे से फुसफुसाने की आवाज़ें आने लगीं। यह उसके भाई की आवाज़ थी।

‘‘हमारी आलता की सीसी, तुम आज बहुत नखरे दिखा रही हो। जब तक पूरे कपड़े नहीं उतारोगी हम आज शुरू ही नहीं करेंगे।’’

‘‘तुम तो एकदम जंगली हो जाते हो, पूरे कपड़े उतारने का मतलब है पहनने के लिये कम से कम पंद्रह मिनट चाहियें। इतने में अगर वो आ गये तो....? ऐसे ही करो ना।’’ यह उसकी पत्नी की आवाज़ थी जिसमें मनुहार था।

‘‘नहीं रानी, आज दिये की रोशनी में तुम्हारे एक-एक अंग को निहारना और चूमना चाहता हूं....उतारो ना।’’ भाई ने फिर से मनुहार किया और एक के बाद एक पुच्च-पुच्च की छह सात आवाज़ें आयीं।

‘‘जाओ पहले मेरी साड़ी ले आओ बाहर से, सूख गयी होगी।’’ उसकी पत्नी ने ऐसी आवाज़ में कहा मानो वह सामने वाले को तड़पाना और चिढ़ाना चाहती है और इस प्रक्रिया का ज़रूरत से ज़्यादा आनंद उठा रही है। उसकी ऐसी आवाज़ सुनकर रामदयाल को सबसे अधिक दुख हुआ।

‘‘मैं यहां जो है वह भी उतारने की बात कर रहा हूं और तुम हो कि साड़ी मंगा रही हो....रुक जाओ बताता हूं।’’

इसके बाद जो आवाज़ें आयीं वो भाई के सांसों की ज़ोर-ज़ोर से चलने की थीं, उसकी पत्नी के हंसने की थीं और भाई को बार-बार जंगली और जानवर कहने की थी। थोड़ी देर बाद सारी आवाज़ें बंद हो गयीं और दोनों के हांफने की आवाज़ें आने लगीं। पत्नी के ज़ोर से चिल्लाने की आवाज़ आयी जैसा कि चरम के क्षणों में पहुँचने से पहले वह चिल्लाया करती थी और उसकी चिल्लाहट सुनकर वह अब भी अपनी गति रोक देता था जिसके कारण उसे पत्नी की गालियां सुननी पड़ती थीं। पत्नी चिल्ला-चिल्ला कर कह रही थी, ‘‘धीरे से, धीरे से...’’ लेकिन उसकी कराहट थी कि बढ़ती ही जा रही थी। आखि़र थोड़ी देर में उसके अपनी पत्नी के इतने ज़ोर से कराहने की आवाज़ आयी जैसा उसके साथ कभी नहीं आयी थी। उस कराह में अपूर्व संतुष्टि थी और कुछ पा जाने का सुख। उसे याद आया कि वह पत्नी की बिस्तर पर शीशे के सामान की तरह परवाह किया करता था जिसके कारण पत्नी उसे हमेशा ताना देती थी। उसने पत्नी की साड़ी, जिधर से कम सूखी थी, पलट कर फैला दी ताकि जल्दी सूख जाये और वहां से चला आया।
            
सुबह जब वह खेतों से वापस आ रहा था तो उसने देखा कि उसके भाई ने उसकी ज़मीन में कांटो की बाड़ लगा दी है और गांव के काफी लोग जो वहां एकत्र हैं आपस में खुसर-फुसर कर रहे हैं। वह वहां पहुंचा तो भाई सबको बता रहा था कि गांव के कुछ लोगों की उसके भाई की ज़मीन पर नज़र है इसलिये वह उसकी रक्षा कर रहा है। उसने लोटा हाथ में लिये-लिये भाई से बाड़ लगाने की वजह पूछी। भाई उसका हाथ पकड़ कर किनारे ले गया और फुसफसाहट में बोला।
‘‘भइया आप तो आजकल कुएं झांकने में लगे हैं और आपको पता ही नहीं कि आपके खेत पर कितने हरामजादों की गंदी नजरें लगी हुयी हैं। मैं इसीलिये इसको अपने खेत के साथ जोड़ रहा हूँ कि अपने खेत के साथ-साथ आपके खेत की भी रक्षा करता रहूंगा।’’ वह अपने खेतों की ओर ताकने लगा। उसका पूरा खेत भाई ने घेर लिया था। खेतों की सीमा देखते हुये उसकी नज़र पत्नी पर पड़ी तो उसने देखा कि पत्नी नफ़रत भरी नज़रों से भाई की तरफ़ देख रही है। उसे लगा कि उसने रात कोई बुरा सपना देखा था। उसका ध्यान नहीं गया कि उसकी पत्नी उसके भाई के हिस्से वाले खेत में खड़ी थी।
            
उसका भाई खेती करने के साथ लोहे का काम भी करता था और उसने पत्नी के समझाने पर शहर निकलने से पहले भाई से अकेले में बात करने का निश्चय किया। पत्नी ने कहा था कि आज अगर उसने अपने भाई से साफ़-साफ़ बात नहीं की तो वह उसे छोड़ कर चली जाएगी। वह समझ गया था कि वह कमज़ोर जानवर है और उसकी पत्नी को जंगली जानवर पसंद हैं, इसलिये वह उसके पास अधिक दिन तक नहीं टिकने वाली। वह किसी से भी लड़ने के पक्ष में नहीं था और दूसरे यह कि वह जानता था कि वह किसी से भी लड़ेगा तो हार जायेगा। बचपन से जि़ंदगी की हर लड़ाई में हारते-हारते उसकी फि़तरत कुछ ऐसी हो गयी थी कि लड़ने से पहले ही वह हार मान लेने में ही अपनी भलाई समझता था। जब वह अपने भाई के लोहा कूटने वाले अड्डे पर पहुंचा तो देखा कि उसका बेटा लोहा कूटने में उसकी मदद कर रहा था। धौंकनी चल रही थी और वहां पहुंचते ही उसकी हृदयगति भी धौंकनी की तरह ही चलने लगी। उसने कहा कि थोड़ी देर के लिये वह अपने बेटे को बगीचे में भेज दे क्योंकि उसे कुछ व्यक्तिगत बातें करनी है। चचेरे भाई ने कहा कि उसका बेटा अपनी उम्र से काफ़ी समझदार है और उसके सामने सारी बातें की जा सकती हैं। उसने फिर इस बात के लिये ज़ोर दिया तो उसके भाई ने कहा कि उसका बेटा इस साल सातवीं कक्षा में गया है और दो बार से वह पूरी कक्षा में पहला आ रहा है इसी बात से उसके दिमाग का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। उसने बात शुरू करते हुये कहा कि वह अपने खेतों की रक्षा कर सकता है और उसे उसमें लगायी गयी कांटों की बाड़ हटा लेनी चाहिये। भाई ने कहा कि वह जब भी कहेगा और उसे कुछ बोना या जोतना होगा वह बाड़ हटा लेगा लेकिन तक तक ऐसा ही रहना चाहिये क्योंकि कुछ लोगों की बुरी नज़र उसके खेत पर है। चूंकि वह बहुत सीधा आदमी है, लोग उसके खेत को हड़प सकते हैं। भाई ने अपने बारे में कहा कि वह ताक़तवर है इसलिये उसके खेत पर अगर किसी ने नज़र डाली तो वह रात को सोते में ही उस आदमी के घर में घुस कर हथौड़े से उसको कूंच डालेगा।

 उसने भाई के हथौड़े को गहरी नज़र से देखा और उससे कहा कि देवर और भाभी का संबंध मां और बेटे का होता है। इसके लिये उसने रामचरितमानस नाम की एक लोकप्रिय कहानी की किताब से लक्ष्मण और सीता नाम के दो पात्रों की कहानी सुनायी। यह कहानी की किताब लगभग हर घर में पायी जाती थी और इसकी कहानी को सुनने के लिये लोग दूर-दूर तक भीड़ में जाकर बैठा करते थे लेकिन इसकी कहानियों से कोई कुछ अच्छा ग्रहण करने की कोशिश नहीं करता था। इस किताब का लेखक दुनिया के सबसे प्रतिभाशाली किस्सागो में से एक था। उसकी कहानी में बहुत अच्छी-अच्छी बातें थीं लेकिन लोगों ने प्रचलन के अनुसार उसकी किताब की पूजा करना शुरू कर उसकी अच्छी चीज़ों को भुला दिया। कमज़ोर लोगों ने अपने काम के उदाहरण उस किताब से छांट लिये थे और जगह-जगह प्रयोग करते थे जिसके कारण लोग इस किताब को प्रभुवाणी टाइप की चीज मान चुके थे। उस किताब को लाल पवित्र कपड़े में लपेट कर किसी ऊंची जगह पर रख दिया जाता था जिसकी वजह से लोग इसे पढ़ते नहीं थे और पढ़ने का मन करने पर भी बाद के लिये टाल देते थे।
            
भाई ने थोड़ी देर इधर-उधर की बात की और जब उसने फिर से रामचरितमानस की कहानी को दोहराया तो भाई ने कहा कि वह बड़े भाई के सामने ऐसा बोलना नहीं चाहता लेकिन सच्चाई यही है कि औरतें और आंधी एक ही तरह की चीज़ें होती हैं और उन्हें बस में करने के लिये जांघों में दम होना चाहिये।

वह थोड़ी देर के लिये चुप हो गया और उसने अपने चचेरे भाई के बेटे की ओर देखा जो सिर नीचे करके गरम लोहे पर पानी के छींटे डाल रहा था और होंठ दबा कर मुस्करा रहा था। उसने फिर से कहा कि घर की कोई बात बाहर वालों को पता चले तो बदनामी आग की तरह फैलती है। उसके भाई ने कहा कि जो भी जैसा भी है, उसमें उसकी कोई गलती नहीं है और इस बात के लिये उससे जवाबतलब करने से पहले उसे अपने गिरेबान में झांकना चाहिये था। 
    
 उसने कहा कि उसके थोड़े से खेत हैं और छोटा सा परिवार है जिस पर उसके भाई को बुरी नज़र नहीं डालनी चाहिये। भाई ने कहा कि उसे अपनी नज़र बदलनी चाहिये क्योंकि वह भी उसके परिवार का ही हिस्सा है और उसकी इज़्ज़त अब उसकी भी इज़्ज़त है इसलिये वह निश्चिंत होकर शहर जाए और सातवां कुआँ झांक कर आये। वहां से आने के बाद आराम से इस मुद्दे पर बात की जाएगी और उस समय वह अपने बेटे को घर से बाहर भेज देगा। वह भाई की बातों पर विश्वास करके वहां से आ गया। वह बहुत जल्दी सबकी बातों पर विश्वास कर लेता था और सबकी बातों पर विश्वास करने वालों के बारे में उनके सामने कहा जाता था कि अमुक व्यक्ति बहुत सीधा है और उसकी पीठ पीछे कहा जाता था कि साला बहुत बेवकूफ़ है। रामदयाल के साथ भी ऐसा ही था और वह इस बारे में जानते हुये भी अपनी वर्तमान स्थिति से ख़ुश था। वह बहुत सारे आम इंसानों की तरह चीज़ों को तब तक टालने में विश्वास रखता था जब तक कि उनका सामना करने के अलावा कोई और रास्ता न बचे। उसे अब भी लग रहा था कि उसकी पत्नी की आवाज़ जैसी किसी महिला के उसके भाई से संबंध हैं और उसका भाई आजकल के भाइयों की तरह कलियुगी न होकर उसकी इतनी परवाह करने वाला है कि उसकी खेतों की रक्षा के लिये पूरे गांव के लोगों की आलोचना झेल रहा है।
            
उसका शहर की ओर जाने का अब बिल्कुल मन नहीं था लेकिन एक खटका सा उसे लगातार लगा हुआ था। गांव से शहर जाने का फैसला करने में उसे तीन रातें लगीं और उन तीन रातों में उसे कई काली रातों को अनुभव हुआ। उसे अचानक सपना आता कि वह कुत्तों की तरह चार टांगों पर चलने लगा है और वह चौंक कर जाग जाता। उसकी नज़र अपने बगल में पड़ती को उसकी पत्नी वहां मौजूद नहीं होती। एक रात में पांच के औसत से उसने डरावने सपने देखे और चौथी सुबह यह तय रहा कि सातवां कुआँ झांके बिना उसे मुक्ति नहीं मिल सकती। दूसरी रात तो उसने इतना डरावना सपना देखा कि उसे चिल्ला कर अपने बेटे को बुलाना पड़ा। उसने देखा कि उसके दफ्तर के बड़ा साहब की एक पूंछ निकल आयी है और उसके पंजे नुकीले हो गये हैं। वह रामदयाल के पीछे भौंकता हुआ दौड़ रहा है और उसके फेंके पत्थरों का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है। अचानक वह उछलता है और रामदयाल के पैर में काट लेता है। उसके काटते ही रामदयाल का एक पैर गायब हो जाता है और वह लंगड़ाने लगता है। एक टांग पर घिसटते हुये उसे दिखायी देता है कि उसकी पत्नी हाथ में लोटा लिये उसके भाई के ट्यूबवेल की तरफ जा रही है। उसकी नींद साहब रूपी कुत्ते के काटने से नहीं टूटी बल्कि अपनी पत्नी के भावहीन चेहरे पर एक मुर्दा मुस्कान देखकर डर के मारे टूट गयी। वह चिल्लाता हुआ उठा और पत्नी को बगल में न पाकर बेटे को आवाज़ लगायी। बेटा आया और उसने आते ही सलाह दी कि उसे शहर जाकर सातवें कुएं की तलाश करनी चाहिये।
            
सुबह जब वह घर से शहर के लिये प्रधान जी के बेटे का पता लेकर निकला तो गांव के उसके कई मित्रों ने उसे अलग-अलग सलाहें दीं। सलाहें देने वालों के चेहरे पर यह भाव था कि वह दुनिया की सबसे राज़दार बातें अपने मित्र को बता रहे हैं और लाख रुपये की सलाहें मुफ़्त में इसीलिये दे रहे हैं क्योंकि रामदयाल उनका मित्र है। रामदयाल ख़ुद लोगों को ऐसी ही सलाहें दिया करता था जब वे गांव छोड़कर कहीं बाहर जाया करते थे। उसके बेटे ने जिद की कि वह भी उसके साथ शहर चलेगा लेकिन उसने कहा कि एक बार वह कुआँ झांक आये और शहर देख आये फिर वह दुबारा उसे अपने साथ ले चलेगा।
           
शहर में लोगों के डराने और भयानक कहानियां सुनाने जैसा कुछ भी नहीं हुआ और उसकी शुरुआत बहुत अच्छी हुयी। उसने स्टेशन से रिक्शा पकड़ा और काग़ज़ पर लिखी कॉलोनी में एक ही बार में पहुंच गया। वहां से उसने एक पान की दुकान पर वह काग़ज़ दिखाया तो वहां खाली खड़ा एक आदमी उसके साथ जाकर उसे उस पते तक पहुंचा आया। प्रधान का बेटा जिस कमरे में रहता था उसमें एक कोने में ढेर सारी लम्बे मुंह वाली खा़ली बोतलें पड़ी थीं। प्रधान के बेटे का नाम हरिओम था पर उसने कहा कि उसे सिर्फ ओम पुकारा जाये तो रामदयाल ने उसे बबुआ कहना बंद कर दिया। उसे लगा कि वहां उसे बहुत परेशानी होगी क्योंकि शहर के बारे में उसने बहुत बुरी-बुरी बातें सुनी थीं। लेकिन ओम ने उसके साथ बहुत अच्छा व्यवहार किया और उसके लिये फोन करके किसी बढि़या होटल से अच्छा खाना मंगा कर खिलाया। रामदयाल की पूरी समस्या उसने ध्यान से सुनी और उसे सलाह दी कि उसे कुओं के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिये लेकिन रामदयाल के बार-बार विनती करने पर वह इस बात पर राजी हो गया कि वह कुएं के बारे में पता लगवा कर रामदयाल को ज़रूर झंकवाएगा। उसने कहा कि पहले वह दो-चार दिन आराम करे, थोड़ा शहर घूमे और फिर कुएं की फिक्र करे। रामदयाल ने कहा कि उसे जल्दी से जल्दी कुआँ झांककर गांव वापस जाना है।
            
अगले दिन ओम सुबह जल्दी नये कपड़े पहन कर निकल गया और पूरा दिन नहीं आया। रामदयाल पूरा दिन लेटा-लेटा टीवी देखता रहा और ओम के बताये बटन को दबा-दबा कर पूरी दुनिया के जलवों की सैर करता रहा। एक चैनल पर बताया जा रहा था कि देश के प्रधानमंत्री एक नये किस्म का बैंगन मंगाने जा रहे हैं तो वह रुक गया। उसे पूरा तो समझ में नहीं आया लेकिन वह इतना समझ कर चिंतित हो गया कि बैगन की खेती उस तरह नहीं हो सकेगी जैसे पहले होती थी। एक चैनल पर उसने देखा कि आसमान में किसी ओजोन नाम की परत में छेद हो रहा है और पूरी दुनिया में गर्मी बढ़ती जा रही है। पानी के सभी स्रोत सूखते जा रहे हैं और तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिये होगा। पानी से उसे कुंए की याद आयी और वह बाहर निकल कर बालकनी में टहलने लगा।
           
रात को ओम बहुत देर में आया और आते ही बिस्तर पर पसर गया। रामदयाल ने उसे पानी पिलाया और उसके सुबह जल्दी जाने और इतनी देर से आने की वजह पूछी। वह कुछ नहीं बोला। उसने अपनी बाइक की डिग्गी से एक बोतल और कुछ नमकीन के पैकेट निकाले और भीतर आकर बैठ गया। उसने रामदयाल को भी साथ बैठने के लिये कहा। रामदयाल पहले तो मना करता रहा लेकिन जब ओम को पता चला कि उसने पहले भी अपने एक दोस्त के साथ कई बार पी है तो उसने उसका हाथ पकड़ कर ज़बरदस्ती बिठा लिया। रामदयाल ने बताया कि उसने अपने एक दोस्त के साथ पूरे जीवन में सिर्फ़ छह बार पी है तो ओम ने कहा कि आज आपको ऐसी चीज़ पिलाउंगा कि आप देसी भूल जाएंगे। रामदयाल ने उससे यह वादा लिया कि किसी भी तरह यह बात प्रधान जी के कानों तक नहीं पहुंचेगी।

दोनों ने पीना शुरू किया तो रामदयाल ओम की मेहमाननवाज़ी से बहुत ख़ुश हुआ। वह बार-बार उसे हर घूंट के बाद अपने साथ लाया नमकीन खाने का आग्रह करता। रामदयाल को स्वाद तो इस शराब का भी ख़राब ही लगा लेकिन उसे ओम के साथ पीना अच्छा लग रहा था क्योंकि ओम हर पैग के साथ उससे गांव के बारे में ढेर सारी बातें कर रहा था। ओम ने तीन पैग तो ठीक से पीये और गांव और गांव के लोगों के बारे में ढेर सारी बातें की, लेकिन इसके बाद उसकी आवाज़ आश्चर्यजनक रूप से नम होने लगी और पांचवे पैग में तो वह बाक़ायदा रोने लगा। रामदयाल ने सिर्फ दो ढाई पैग पी थी लेकिन सिर उसका भी तेज़ी से घूम रहा था। ओम ने उसका हाथ पकड़ा और अपने सिर पर रख लिया।

‘‘मुझे आपका आशीर्वाद चाहिये काका...।’’ उसकी इस हरक़त से रामदयाल घबरा गया। वह जिस जाति का था उस लिहाज़ से यह दृश्य उसके ऊपर पंचायत में अभियोग चलाने के लिये बहुत था। अभी वह ओम के सिर से हाथ उठाने की कोशिशें कर ही रहा था कि अचानक ओम ने एक ऐसी हरकत की कि वह डर के मारे पीछे सरक गया। उसने झपट कर रामदयाल के दोनों पांव पकड़ लिये और अपना सिर उसके पांवों पर रगड़ने लगा। इसके साथ ही उसके रोने की आवाज़ भी बढ़ती जा रही थी। रामदयाल यूं घबराने लगा जैसे उससे कोई बहुत बड़ा अपराध हो गया हो, वह बचने के लिये पूरे कमरे में ताक रहा था लेकिन उसे कोई रास्ता नहीं दिखायी दे रहा था। ओम रोये जा रहा था।

‘‘आप बहुत अच्छे हैं काका, आप मेरे बुजुर्ग हैं, मेरे सिर पर आशीर्वाद का हाथ रख दीजिये। अपने गांव की मिट्टी से दूर होकर ही मेरी यह दुर्दशा हुयी है काका। आप सब लोगों का आशीर्वाद ही अब मुझे बचा सकता है। मुझे आशीर्वाद दीजिये काका, अपने बच्चे को अपनी दुआएं दीजिये.....अपने गांव से....अपने स्वर्ग से हटकर मैं यहां इस नरक में आ गया हूं...अब मेरा कहीं ठिकाना नहीं है....।’’ ओम की बातों का मतलब वह नहीं समझ पा रहा था लेकिन अब उसकी घबराहट कुछ कम हो रही थी। थोड़ा नशा उस पर भी हावी था और उसने ओम को अपने पांवों से उठाकर अपने सीने से लगा लिया।

‘‘काहे बबुआ, काहे रो रहे हो ?’’ यह सुनकर ओम और ज़ोर से रोने लगा। ‘‘यहां ऐसे कोई नहीं मुझसे पूछता काका कि मैं जिंदा हूं कि नहीं, यहां तक कि मेरे बाप को भी मुझसे कोई मतलब नहीं है। मैं इस जंगल में कैसे जिंदा हूं, मैं ही जानता हूं। यह शहर नहीं है काका, जंगल है जंगल, यहां ऐसे खतरनाक-खतरनाक जानवर हैं कि का बताएं....हमें गांव ले चलो काका...।’’ उसने ओम का सिर सहलाना जारी रखा और ओम ने बोलना जारी रखा।

‘‘हमें गांव ले चलो काका...हम खेती कर लेंगे....हमें नहीं करनी पढ़ाई....हमें कुटिल लोगों के बीच नहीं रहना...बड़े कमीने लोग हैं काका....मेरा गांव कितना प्यारा है....वहां लोग एक दूसरे से कितना प्यार करते हैं....हे प्रभु...मेरा प्यारा गांव....मुझे अपने साथ...।’’ ओम को उसने भरोसा दिलाया कि वह उसे अपने साथ गांव ले जायेगा। फिर उसने पूछा कि उसकी मोटरसायकिल और अन्य सामानों का क्या होगा। ओम ने कहा कि मोटरसायकिल वह अपने दोस्त को बेच देगा और बाकी सामान किसी बाज़ार में आधे दाम में दे देगा। उसने रामदयाल को बताया कि उसकी पी.एचडी. अब कभी पूरी नहीं हो सकती क्योंकि उसने अपने गाइड के कहने पर दूसरे शोधार्थियों के नोट्स लिखने से इंकार कर दिया है। उसके खिलाफ़ एक झूठा मामला बना कर उसके विश्वविद्यालय में उसके खिलाफ़ अनुशासनात्मक कदम उठाये गये हैं। उसने बताया कि जब तक उसके बाप गांव से पर्याप्त पैसे भेजते थे, कमरे पर उसके दोस्तों का तांता लगा रहता था और सब उसके पैसों से ऐश करते थे। जब से गांव आकर शादी करने के सवाल पर अपने पिता से उसकी तनातनी हुयी है और उन्होंने पैसे भेजने बंद किये हैं, उसे अपने सारे दोस्तों की हकीक़त पता चल गयी है।

‘‘यहां सब पैसे के दोस्त हैं काका....मेरा गांव...।’’ वह फिर से रोने लगा। उसने रामदयाल को कहा कि कल वह उसे कुआँ झंकवा देगा और कल ही वह दोनों की परसों की टिकट निकालेगा।

‘‘ले चलेंगे न काका मुझे मेरे गांव....?’’ उसने ऐसी आवाज़ में पूछा कि इस बार रामदयाल भी ज़ोर से रोने लगा। ‘‘हां बेटा चलना मेरे साथ, गांव में सब तुम्हें याद करते हैं। अपना गांव अपना होता है।’’

‘‘पिताजी ने अगर मुझे घर में नहीं घुसने दिया तो मैं कुछ दिन आपके घर में रह लूंगा...काका आप मेरे पिता समान हैं....मैं पिताजी को मना लूंगा...।’’ उसकी बातें सुनकर रामदयाल थोड़ी देर चिंतित रहा फिर उसके सिर पर हाथ फेर कर उसे आश्वस्त किया।

‘‘जब तक जी चाहे मेरे घर रहना बेटा।’’

‘‘काका...आई लव यू...मैं बहुत बेकार आदमी हूं।’’ रामदयाल उसकी बात का मतलब नहीं समझा पर इतना समझ गया कि उसने उसके लिये कोई अच्छी बात ही कही है। उसे खुद पर थोड़ा गर्व भी हुआ। ओम को नींद आने लगी। रामदयाल ने उसे खाने के लिये कहा पर वह ज़मीन पर ही लुढ़क गया। रामदयाल ने देखा कि इतने पैसों में मंगाया गया खाना बेकार होगा तो उसने दो थालियों में थोड़ा-थोड़ा खाना निकाला और ज़बरदस्ती अपने साथ ओम को भी थोड़ा खिलाने की कोशिश की। उसे ओम पर बहुत दया आयी और वह सोचने लगा कि वह उसे इस मतलबी शहर में नहीं रहने देगा। उसे अपने साथ गांव ले जायेगा ताकि वह खुश रह सके।
            
अगली सुबह जब ओम की नींद खुली तो रामदयाल जाग चुका था और नहा धोकर पूजा कर रहा था। उसने एक सिगरेट जलायी और टॉयलेट  में घुस गया। टॉयलेट में घुसने से पहले उसने रामदयाल से कहा, ‘‘तैयार रहिये, हम लोग दस बजे कुआँ खोजने चलेंगे।’’ रामदयाल ने बंडी के ऊपर अपना कुर्ता पहन लिया और पूरी तरह से तैयार हो गया।

ओम भी जल्दी से नहा-धोकर तैयार हुआ और अपनी बाइक कपड़े से पोंछने लगा। पांच मिनट में ही उसने रामदयाल को बुलाया, ‘‘चलिये रामदयाल जी....चला जाये।’’
            
उनकी मोटरसायकिल शहर में दौड़ने लगी। ओम को जहां-जहां कुंओं का अंदेशा था, वह जाकर पता करने लगा। रामदयाल उसके सुबह के नियंत्रित रूप को देखकर थोड़ा आश्चर्य में था। ओम उससे कुछ बात भी नहीं कर रहा था। उसने ही बात शुरू की।

‘‘दुनिया में सबसे खतरनाक जानवर है कुत्ता...किसी भी जानवर से अधिक खतरनाक।’’ उसने ओम की राय चाही।

‘‘कुत्ते से भी ख़तरनाक जानवर है एक दुनिया में....।’’ ओम ने कमज़ोर और थकी आवाज़ में कहा लेकिन शायद रामदयाल ने सुना नहीं।

‘‘कुत्ते का काटा कभी बचता नहीं बबुआ...कुत्ते का विस पांच साल दस साल बाद कभी भी अपना असर जरूर दिखाता है। सायद कुंआं झांकने से हम बच जाएं इस जहर से बबुआ...।’’

‘‘ओम कहिये...मैंने आपको कहा था न ?’’ उसने डपटा तो रामदयाल सहम गया और थोड़ी देर के लिये चुप हो गया।
‘‘सहर में बहुत सुविधा है...गांव में ई सब कहां...?’’ उसने ओम का मन टटोलने के लिये कहा लेकिन वह चुप रहा।

‘‘का हुआ...तबियत खराब है का ?’’ उसने अपनेपन से पूछा।

‘‘हां...सर में बहुत तेज दर्द है। आपका कुंआं झंकवा देता हूं आज कैसे भी ताकि आप कल जा सकें। मुझे भी कल एक सेमिनार में बाहर जाना है।’’

ओम की ठस्स आवाज़ सुनकर उसकी हिम्मत नहीं हुयी कि वह पूछे कि वह कब सारा सामान बेच कर गांव चलेगा खेती करने के लिये। उसके सामने मोटरसायकिल चलाता यह युवक कोई और ही था। वह अपने दिमाग में उमड़ते-घुमड़ते ढेर सारे सवालों को पकड़े बैठा रहा।
            
एक चैराहे पर पूछने पर पता चला कि यहां से थोड़ी दूरी पर एक झुग्गी बस्ती है उसमें एक कुआँ है। ओम ने बाइक उधर ही मोड़ दी। अभी वह चैराहे से थोड़ी दूरी पर ही था कि एक कार ने एक सायकिल सवार को टक्कर मार दी। कार से एक हाथ बाहर निकला और एक लम्बी सी बोतल बाहर फेंकी। कार चलाने वाला बाहर से अपनी नज़र सामने की ओर करता, इससे पहले ही दुर्घटना हो गयी। सायकिल सवार सड़क पार कर रहा था और सामने से आती कार को देखकर उसने सायकिल मुड़ाने की कोशिश भी की लेकिन तब तक उसे धक्का लग चुका था।

रामदयाल के सामने वह आदमी सड़क पर तड़प रहा था और आनन फानन में उसके आसपास सैकड़ों लोगों की भीड़ जमा हो गयी थी। वहां मौजूद हर आदमी आपस में खुसर फुसर कर रहा था लेकिन कोई उस तड़पते आदमी को वहां से उठा कर अस्पताल ले जाने का उपक्रम नहीं कर रहा था। रामदयाल तड़प गया, उसने ओम से कहा कि वह उसे लेकर अस्पताल चले तो ओम ने कहा कि ये काम कार वालों को करना चाहिये क्योंकि उनकी गाड़ी में जगह होती है। कार वाले भी ऐसी ही बातें पैदल और बाइक वालों के बारे में बातें करते थे क्योंकि उनके हिसाब से उनके पास समय होता है। जब रामदयाल ने कई बार ऐसा कहा तो ओम ने सड़क किनारे गाड़ी खड़ी की और इसलिये भीड़ में घुसा क्योंकि वैसे भी उस भीड़ को तुरंत चीर कर निकलना आसान नहीं था।

‘‘मैं देखता हूं, वैसे उसकी हालत देखकर लगता नहीं है कि वह बचेगा लेकिन फिर भी मैं किसी कार वाले से उसे ले जाने की विनती करके देखता हूं। आप यहां से हटियेगा मत और गाड़ी देखते रहियेगा।’’

ओम भीड़ को चीरता हुआ उस घायल के पास पहुंच गया जो शायद अपनी आखि़री सांसें गिन रहा था। भीड़ उसके बारे में कयास लगाने में व्यस्त थी।

‘‘बचेगा नहीं।’’ एक ने कहा।

‘‘सवाल ही नहीं है।’’ दूसरी आवाज़ आयी।

‘‘सिर की चोट बहुत नाजुक होती है...मान लो बच भी गया तो या तो याद्दाश्त चली जायेगी या पागल हो सकता है।’’

‘‘मेरे मामा के ससुर का ऐसा ही एक्सीडेंट हुआ था पिछले साल...ऑपरेशन भी हुआ...लाखों रुपये लगे लेकिन महीने भर के अंदर ही....।’’

‘‘अस्पताल पहुंचाया जाय तो शायद बच जाये....।’’

‘‘अरे छोड़ो यार, अब बचेगा भी तो आगे की ज़िन्दगी नरक है....बेचारा इससे अच्छा मर ही जाये।’’

‘‘कोई इसको अस्पताल पहुंचा दो यार।’’

‘‘अरे अब बचेगा थोड़े...। अस्पताल पहुंचाने में भी बहुत समस्या है। एक बार मेरे भाई ने एक को अस्पताल पहुंचाया था। मारने वाला तो टक्कर मार कर भाग गया, पुलिस वालों ने मेरे भाई को ही पकड़ लिया...। मैंने तो बॉस उसी दिन कसम खा ली कि दूसरे के फटे में टांग नहीं अड़ाउंगा।’’

‘‘नहीं हमेशा ऐसा थोड़े होता है भाई साहब। ये सब तो बहाने हैं।’’

‘‘तो आप ही लेते जाइये न इसे अस्पताल।’’

‘‘अजीब लोग हैं। इंसानियत नाम की चीज़ ही नहीं बची।’’
            
 उसको मरने में देर हो रही थी इसलिये कुछ लोग जो उसके मरने का सीधा प्रसारण देखने के इच्छुक थे, दफ्तर में देर होने की वजह से खिसकने लगे। वह मना रहे थे कि वह जल्दी मर जाता तो वह अपने दफ्तरों में इस पूरी दुर्घटना का आंखों देखा हाल बताते, हालांकि कुछ लोगों ने मान लिया था कि वह मर गया और ऑफिस में घुसते ही इस हृदयविदारक घटना का आंखों देखा हाल बताने के लिये अपने संवाद तैयार कर रहे थे। कुछ धैर्यवान लोग जो अब भी वहां टिके उसके मरने का इंतज़ार कर रहे थे, उनकी बातों की दिशा कुछ भटक रही थी।

‘‘कार वाले आजकल बहुत तेज चलाने लगे हैं।’’

‘‘आदमी को आदमी नहीं समझते ये साले कार वाले..।’’

‘‘एकदम सही बात...इंसानियत नाम की कोई चीज़ ही नहीं रह गयी है।’’

‘‘कारें इतनी सस्ती हो गयी हैं कि सड़क पर आदमी से अधिक कारें ही हो गयी हैं।’’

‘‘सही बात है, नैनो के आने से कोई भी कार खरीद ले रहा है।’’

‘‘वैसे नैनो है बेकार गाड़ी, इंजन बहुत जल्दी गरम हो जाता है। दूर तक जाने के लिये सही नहीं है। थोड़ा और लगाके आदमी इंडिका न ले ले।’’

‘‘अरे तो कीमत भी तो देखिये...इतने कम पैसे में किसी ने सोचा भी था कभी कि कार मिलने लगेगी ? भला हो टाटा का कि हर आदमी कार में चलने लगा है।’’

‘‘आप लोग गलत बात कर रहे हैं। मेरे साढूभाई ने अभी नैनो खरीदी है, उन्हें तो कोई शिकायत नहीं है, उनकी गाड़ी एकदम सही चल रही है। माइलेज भी अच्छा दे रही है।’’

‘‘अरे भाई साहब, शिकायत होगी भी तो आपको बताएंगे थोड़े, उसमें उन्हीं की तो बेइज्जती है....हाहाहाहा।’’

‘‘हा हा हा हा...हां सही बात कही आपने।’’

‘‘अरे मर गया...।’’

‘‘नहीं भाई अभी जि़ंदा है...देखिये हिल रहा है।’’    

‘‘कुछ भी कहिये सैण्ट्रो अच्छी गाड़ी है सबसे....जगह की जगह और आराम का आराम...। शाहरुख खान ऐड करता है उसका।’’

‘‘जगह की बात करेंगे तो इनोवा से अच्छी कोई गाड़ी नहीं...। उसका ऐड आमिर खान करता है।’’

‘‘कुछ भी कहिये शाहरुख ज्यादा हिट है आज भी...।’’

‘‘अरे साहब आमिर की एक फिल्म उठा लीजिये और शाहरुख की सारी फि़ल्में एक तरफ...।’’

‘‘क्यों शाहरुख ने ही हॉकी पर फिल्म बनायी थी चक दे इंडिया....आमिर ने तो लोकप्रिय खेल क्रिकेट का ही दामन थामा था लगान में हिट होने के लिये।’’

‘‘अरे हॉकी हॉकी है भाई और क्रिकेट क्रिकेट...दोनों को एक में मत जोडि़ये।’’

‘‘हॉकी हमारा राष्ट्रीय खेल है भई, हमें उसका सम्मान करना चाहिये।’’

‘‘सम्मान वम्मान अपनी जगह ठीक है बड़े भाई लेकिन पैसा और नाम कहां है ? आप अपने बेटे को कहां भेजेंगे हॉकी में या क्रिकेट में ?’’

‘‘हॉकी भी बहुत सम्मानित थी भाई साहब एक ज़माने में....देश का सिस्टम ही साला इतना करप्ट है। सब लूटने में लगे हैं।’’

‘‘अरे आपके क्रिकेटर कौन से दूध के धुले हैं....सब साले पैसे कमाने में लगे रहते हैं....खेल जाये भाड़ में।’’

‘‘जिसको मौका मिला लूटने में लगा है। किसी को देश की फिक्र ही नहीं।’’

‘‘जिसको देश की जिम्मेदारी है वे नेता मंत्री लोग तो सबसे करप्ट हैं आजकल।’’

‘‘इसीलिये तो देश की लगी पड़ी है। सब लूटने में लगे हैं साले।’’

‘‘देश ज्यादा दिन चलेगा नहीं।’’

‘‘हां ऐसा ही रहा तो खत्म हो जायेगा जल्दी ही।’’

‘‘लगता है खत्म हो गया।’’

‘‘देश ?’’

‘‘नहीं यार, वो आदमी....देखो हिल नहीं रहा।’’

‘‘पुलिस को फोन किया है किसी ने ?’’

‘‘हां वह सामने पान की दुकान वाले ने बुलायी है पुलिस।’’

            
ओम वहीं खड़ा-खड़ा ये देख रहा था और उसे शहर वालों की संवेदनहीनता पर बहुत गुस्सा आ रहा था। उसने एकाध कारवालों से कहा कि वे उसे अस्पताल ले जायें तो उन्होंने कहा कि उनकी कार ने उसे टक्कर थोड़े मारी है। एकाध ने कहा कि वह खुद ले जाये। वह एक तरफ खड़ा होकर पिछली रात की बातें सोचता रहा। उसे लगा कि उसने कुछ ज्यादा ही आंसू गांव के उस गंवार के सामने गिरा दिये हैं। उसे चिंता हुयी कि रामदयाल उसके बारे में पता नहीं क्या सोच रहा होगा।
            
रामदयाल ओम के जाने के बाद बाइक पर बैठ गया। उसे गाड़ी की देखभाल करने का यही एक तरीका समझ में आया। वह भीड़ को देख ही रहा था कि दो लोग उसके पास रोते हुये आये। एक औरत जो 45-50 के बीच की थी और एक लड़का जो 16-17 साल का लग रहा था। दोनों सीधे उसके पास आये और उसका हाथ पकड़ कर रोने लगे। रामदयाल घबरा गया। दोनों ने रोते-रोते उसे बताया कि जिसका एक्सीडेंट हुआ है, वह उनका पति और पिता है और अभी-अभी उसकी मौत हो गयी है। वे लोग बहुत गरीब हैं और वह आदमी मोहल्लों में झाडू लगाने का काम करता था। उसके दाह संस्कार के लिये घर में एक फूटी कौड़ी तक नहीं है और वे लोग भीड़ से उसका क्रियाकर्म करने के लिये पैसे मांग रहे हैं। रामदयाल ने अपनी धोती के फेंटे से एक छोटी सी बरसाती थैली निकाली और उसमें से निकाल कर पैसे गिनने लगा। उसने दस रुपये का नोट देना चाहा तो लड़का ज़ोर से रोने लगा और उस औरत ने कहा कि शहर में बहुत महंगाई है और इतने में कुछ नहीं होगा। रामदयाल ने सौ का नोट हाथ में लिया ही था कि लड़के ने झपट कर उसे अपनी पैंट में रख लिया और बार-बार उसके पांव छूने लगा। वह औरत उसके बगल में अपनी बाइक खड़ी कर उस पर बैठ भीड़ छंटने का इंतज़ार कर रहे एक आदमी के पास गयी और उससे वही बातें दोहराने लगी। उसने कहा कि उसके घर में कुछ नहीं बचा और क्रियाकर्म करने के लिये पैसे चाहियें। आदमी ने पूछा कि घर में कुछ नहीं बचा तो वे खाते क्या हैं।

‘‘कुछ रुखा सूखा बना लेते हैं साहब ?’’

‘‘किस पर बनाती हो ? स्टोव या गैस ?’’

‘‘मट्टी का चूल्हा है साहब।’’

‘‘क्या बनाती हो ?’’

‘‘क्या साहब...गरीब को पूछना क्या...मंडी में जो सब्जी गिरी हुई मिल गयी वही बना लेती हूं।’’

‘‘ये तेरा पति था ?’’

‘‘हां साहब।’’

‘‘बेवकूफ बना रही है ? ये तो कम उम्र का लगता है।’’

‘‘नहीं साहब, मेरा शरीर बीमारी से खराब हो गया है।’’

‘‘अब इतना खराब भी नहीं है तेरा शरीर....क्या उमर है तेरी ?’’

‘‘साहब पैंतालिस साल।’’

‘‘तेरा पति तेरे साथ सोता था अभी भी...?’’ आदमी ने ललचाई नज़रों से उसकी ओर देखते हुये पूछा। औरत थोड़ी शरमा गयी या शायद शरमाने का अभिनय किया।

‘‘कभी कभी साहब...।’’

‘‘आय हाय तू तो शरमा रही है....बोल कितना लेगी ?’’

‘‘साहब कुछ भी दे दो। गरीब का क्रियाकर्म....।’’

‘‘अरे मैं क्रियाकर्म के लिये नहीं....मैं जानता हूं तेरा रोज का है। बोल कितना...।’’

‘‘दो सौ।’’ औरत ने धीरे से कहा।

‘‘ज्यादा है। डेढ़ सौ ?’’

‘‘ठीक है साहब। जगह...?’’

‘‘वहीं...रेलवे यार्ड।’’ आदमी ने धीरे से कहा। औरत ने इधर-उधर देखा और एक ओर जाने लगी। उसे लड़के को इशारा किया। पुलिस आ गयी थी और भीड़ धीरे-धीरे छंटने लगी थी। लड़का पुलिस को देखते ही धीरे से निकल लिया। औरत भी एक ओर जा रही थी। आदमी ने अपनी बाइक मोड़ी और उसकी ओर जाने लगा। रामदयाल ने देखा मरने वाले की उम्र मुश्किल से बीस साल थी।

‘‘मर गया बेचारा।’’ ओम ने आते हुये कहा और अपनी मोटरसायकिल स्टार्ट करने लगा। वह चुपचाप उसकी मोटरसायकिल के पीछे बैठ गया। ओम मोटरसायकिल चलाता रहा और वह ख़ामोश बैठा रहा।

‘‘जिंदा था ना ?’’ उसने धीमी आवाज़ में ओम से पूछा।

‘‘हां...लेकिन अगर अस्पताल ले भी जाते तो बचने की उम्मीद कम ही थी। चोटें गहरी थीं बहुत।’’ ओम ने भी धीरे से 
कहा।

‘‘लगता है सबने उसके मरने से पहले ही तय कर लिया था कि उसे मर जाना चाहिये...ये सिर्फ़ सहर में ही हो सकता है बेटा।’’ रामदयाल की आवाज़ भरी तो नहीं थी लेकिन एक मरूस्थल सा एकाकीपना उसमें साफ़ महसूस किया जा सकता था।

‘‘क्योंकि शहर में लोग ज़्यादा समझदार होत हैं....फालतू इमोशनल नहीं होते। उसे मरना था यह बात सबको पता थी तो क्या फायदा फालतू भागदौड़ का...?’’ ओम ने धीमी आवाज़ में कहा। आवाज़ में अविश्वास था।
            
ओम की बात पता नहीं रामदयाल तक पहुंची या नहीं, वह दूर कुछ बच्चों को एक सरकारी नल के पास छोटे-छोटे बर्तन लिये झगड़ते देख रहा था। कुछ देर में उनमें उसे अपना बच्चा भी खड़ा दिखायी दिया। कुछ समय बाद उसे दिखायी दिया कि उसका बेटा बड़ा हो गया है और दूसरे के हिस्से का पानी भी छीन रहा है। उसके सामने पता नहीं क्यों बहुत सारे ऐसे दृश्य चलने लगे जिनका कोई स्पष्ट मकसद वह समझ नहीं पा रहा था। उसका कुटिल भाई, अपनी उम्र से तेज़ उसके भाई का बेटा, बहुत सारे पैसे, गहने और कपड़ों की

शौकीन उसकी महत्वाकांक्षी पत्नी, हमेशा दूसरों की सम्पत्ति पर नज़र रखने वाला उसका गांव, एक दूसरे से जलन रखने वाला कस्बा, एक अंधी दौड़ में भागता शहर, कुत्तों से डरने वाला वह, आदमियों से कभी न डरने वाला वह, दुनिया के हिसाब से बहुत दब्बू और संकोची वह, दुनिया का सबसे बड़ा बेवकूफ़ वह। उसने आंखें मूंदी और यह सोचने की कोशिश की कि वह क्यों कुत्तों से इतना डरता था, क्यों कुत्ते के काटने पर कुंएं झांकने के लिये दर-दर की ठोकरें खा रहा है। वह मौत से डरता है, वह दर्द से डरता है...क्यों ? जि़ंदगी से प्यार...? किस चीज़ से भाग रहा है वह...किस चीज़ की तलाश में है वह...किस बात से डरता है वह..?.किस चीज़ से डरते हैं सब...? किस चीज़ की तलाश में हैं सब ? उसकी आंखों से गाल तक एक गरम लहर दौड़ गयी। उसने आंखें खोल कर अपना चेहरा पोंछा और एक लम्बी सांस ली। कभी-कभी बहुत सारी चीज़ें कुछ नहीं सिखा पातीं लेकिन अचानक आप सारी चीज़ों को एक क्रम में रख देते हैं और बहुत कुछ स्पष्ट हो जाता है। क्यों नहीं उसने कुछ ठीक करने की कोशिश की ? क्यों नहीं पहली बार में ही पूछ कर पत्नी से सब कुछ साफ़ कर लिया ? कौन सा डर है ये जो न जीने देता है न कुछ करने की कोशिश ? उसे लगा बहुत कुछ ठीक हो सकता था अगर वह कहीं रुक कर कुछ पलों के लिये सुस्ताया होता और पीछे देखा होता। वह कहीं दूर आसमान में उड़ रही पतंगों को देख रहा था। वह स्थिर था, दृढ़ था और शांत था।

‘‘आदमी के रहने के लिये कितनी जगहें होती हैं ओम बबुआ ?’’ उसने वैसी ही आवाज़ में पूछा। ओम उसका मतलब नहीं समझ पाया। उसने अपने हिसाब से काफी सरल शब्दों में ओम को समझाने की कोशिश की तब उसे थोड़ा समझ में आया।

‘‘बहुत जगहें हैं जैसे गांव हैं, कस्बे हैं, शहर हैं, महानगर हैं....और भी हैं बहुत।’’ ओम ने उसकी बात को बहुत वज़न न देते हुये कहा।

‘‘इन जगहों के अलावा भी है कोई जगह ?’’ उसने पूछा तो ओम को थोड़ी झल्लाहट हुयी लेकिन वह दबा गया।

‘‘हां पहाड़ हैं। जिन्हें संन्यासी बनना होता है वे पहाड़ों पर चले जाते हैं।’’

‘‘नहीं पहाड़ नहीं....जिन्हें संन्यासी नहीं बनना हो उनके लिये कोई जगह...इन सारी जगहों के अलावा ?’’ रामदयाल की आवाज़ में अजीब सी शांति और एक अजनबी सा अवसाद था।

‘‘आप के ऊपर उस आदमी के मरने का कुछ ज्यादा ही असर हो गया है। चुपचाप बैठे रहिये। यहां रोज ऐसा होता है। मैं भी बहुत दुखी हूं।’’ ओम ने पीछे मुड़ने की कोशिश करते हुये कहा।

‘‘नहीं वह बात नहीं, उस आदमी को तो मैं भूल गया। मैं उसे जानता तक नहीं तो उसकी बात क्या करूं ? मैं बस ऐसे ही पूछ रहा था कि क्या कोई और जगह होती है ?’’

‘‘हां होती है न....आसमान में।’’ ओम ने बाक़ायदा आसमान की ओर उंगली उठा कर कहा। रामदयाल मुस्कराया। ‘‘आसमान में तो मैं भी जानता हूं। मैं यहीं इसी जमीन की बात कर रहा हूं।’’ मुस्करा कर कही गयी इस बात पर ओम पता नहीं क्यों नाराज़ हो गया।

‘‘आप चुपचाप अपना कुंआं झांकिये और गांव जाइये....ज्यादा सवाल मत करिये। कुआँ पास ही है।’’ ओम की आवाज़ में तुर्शी थी।

‘‘बेटा यहां से रेलवे स्टेशन कितनी दूर है ?’’ रामदयाल के इस प्रश्न पर ओम चैंक गया।

‘‘क्यों ?’’

‘‘मुझे छोड़ दे बेटा स्टेशन तक...मैं अभी गांव जाना चाहता हूं। मुझे कुंआं नहीं झांकना।’’ उसकी आवाज़ में एक दृढ़ निश्चय था जिससे ओम सहम गया। उसने अपनी ऊंची आवाज़ के लिये माफ़ी मांगी लेकिन रामदयाल ने हंसकर कहा कि उसे उससे कोई शिकायत नहीं है। बस वह तुरंत अपने गांव जाना चाहता है। ओम ने मोटरसायकिल मोड़ दी।
            
रामदयाल जब अपने गांव पहुंचा तो अगले दिन की सुबह हो चुकी थी। चालू डिब्बे में रात भर बैठकर आने के कारण उसका शरीर दर्द कर रहा था। वह अपनी झोंपड़ी में पहुंचा तो उसका बेटा खाट पर बैठा एक पुराने टॉर्च से खेल रहा था।

‘‘तेरी मां कहां है ?’’ उसने पूछा।

‘‘वह तो चाचा के यहां चली गयीं। बहुत झगड़ा हुआ चाचा और चाची में...चाचा ने चाची को मारा भी और कहा कि भाभी अब यहीं रहेंगीं।’’ बेटे ने चहकते हुये बताया। ‘‘मुझे चाचा ने दो जोड़ी कपड़े दिलाये हैं।’’ उसकी चहचहाहट पर उसका ध्यान गया तो उसने पाया कि बेटे ने नया कपड़ा पहना हुआ है। उसने बेटे के चेहरे की ओर ध्यान से देखा और पाया कि उसकी शक्ल हूबहू उसके चचेरे भाई से मिलती है, ख़ास तौर से होंठ और नाक। उसे सुकून महसूस हुआ कि उसकी आंखें उसके चचेरे भाई से नहीं मिलतीं। उसने एक झोले में अपना कुछ सामान रखा और कपड़े तह करने लगा।

‘‘मेरे साथ चलेगा ?’’ उसने बेटे से पूछा।

‘‘कहां बापू ?’’ बेटा खुश हो गया। ‘‘सहर ?’’

‘‘नहीं...सहर नहीं...कहीं और...। कोई और जगह खोजने...। गांव और शहर दोनों से अच्छी। जहां प्यार से रहा जा सके। चलेगा ?’’ रामदयाल ने कपड़े तहाना रोक कर पूछा।

बेटा लपक कर गया और अपने कुछ कपड़े लाकर बाप के पास रख दिये। दोनों जब अपनी झोपड़ी से निकले तो शाम का धुंधलका छाने लगा था। रामदयाल ने दरवाज़े पर इससे पहले कभी ताला नहीं लगाया था और आज भी उसका मन नहीं हुआ। उसने दरवाज़े को भिड़का कर छोड़ दिया।

जब दोनों गांव की सीमा के पास यानि डीह पर पहुंचने वाले थे तो रामदयाल ने पीछे देखा। गांव काग़ज़ पर बने एक सुंदर दृश्य की तरह झिलमिला रहा था। उसने अपनी आंखें पोंछीं जिनमें थोड़ी धूल आ जाने से किरकिरी हो रही थी।

‘‘कितना देर लगेगा बापू वहां पहुंचने में ?’’ लड़के ने उत्साह में पूछा।

‘‘पता नहीं...।’’उसने ठंडी आवाज़ में कहा।

‘‘अगर नहीं मिली ऐसी जगह तो....?’’ लड़के के सवाल हमेशा की तरह अनंत थे।

‘‘जहां भी रहेंगे ऐसी जगह बनाने की कोसिस करेंगे बेटा।’’ रामदयाल ने बेटे की हथेली दबाते हुये कहा।

‘‘कैसे...?’’

‘‘फिर से...सुरुआत से सुरू करेंगे एक बार सब कुछ।’’

‘‘क्या करेंगे..सुरू..?’’ बेटे ने सवाल उछाला।

‘‘सब कुछ..।’’

‘‘तुम करोगे...?’’ बेटे ने फिर से सवाल दागा क्योंकि उसे पिता का यह दोस्ताना रुख बहुत रास आ रहा था।

‘‘नहीं तुम करोगे.....।’’ यह कह कर रामदयाल मुस्कराया।

बाप के ये बोलने पर बेटे को बहुत अच्छा लगा। उसे नहीं पता था कि क्या शुरू करना है और कैसे करना है लेकिन एक अजीब सा उत्साह उसके भीतर भर गया। वह एक बार उत्साह से उछला और एक ज़ोर की किलकारी मारी।

अंधेरा घिरने लगा था लेकिन रात इतनी रोशनी वाली थी कि सब कुछ साफ़-साफ़ दिखायी दे रहा था। जब दोनो बाप-बेटे गांव की डीह तक पहुंचे तो कुछ क्षणों के लिये रुक गये। डीह ऊंचाई पर था और पीछे दूर से देखने पर उनकी परछाइयां थीं और सिर्फ़ दूर तक फैला अनंत आकाश।


1 comments:

Neeraj Shukla ने कहा…

ग़ज़ब की किस्सागोई है .कहानी जितनी फैली है उतनी ही गठी हुयी भी ....और फिर भाषा का चुटीलापन। विमल जी ने लाजवाब कर दिया।

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

फेसबुक से आये साथी

 
Copyright (c) 2010 असुविधा.... and Powered by Blogger.