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रविवार, 12 जनवरी 2014

निराला की कविता वनबेला पर सदाशिव श्रोत्रिय

निराला की कविता वनबेला मनुष्य और प्रकृति के बीच के तादात्म्य और द्वंद्व को चित्रित करती एक अनुपम कविता है जिस पर निराला के आलोचकों ने बहुधा बहुविधि दृष्टिपात किया है. इस लेख में वरिष्ठ कवि और आलोचक डा सदाशिव श्रोत्रिय ने निराला के अपने व्यक्तित्व के द्वंद्वों के साथ इसे जोड़कर कविता को एक नई रौशनी में देखने की महत्त्वपूर्ण कोशिश की है.  

कविता का पूरा पाठ यहाँ क्लिक करके पढ़ा जा सकता है.          
                                  


                           
निराला की ’’वन-बेला’’ एक ऐसी महत्वपूर्ण रचना के रूप में सदैव मेरा ध्यान आकर्षित करती रही है जिसकी प्रासंगिकता हमारे समय में भी समाप्त नहीं हुई है। मैं इसे मानवीय निराशा और अवसाद पर उत्साह और उत्फुल्लता की तथा मानवीय क्षुद्रता पर उसकी महानता की विजय का जयगान करने वाली एक कविता के रूप में देखता हूं। जिस व्यर्थता-बोध और पराजयवादिता का चित्र्ाण इस कविता के पर्सोना के माध्यम से हुआ है उसमें आज पहले की तुलना में   वृद्धि ही हुई है। अफसोस है तो इस बात का कि जिस प्रकृति का सान्निध्य ’’वन-बेला’’ के इस पर्सोना को हताशा और अवसाद की स्थिति से उबारने में मदद करता है उस प्रकृति की गोद आज वैसी मनस्थिति से गुज़रने वालों से निरंतर छिनती जा रही है। ऐसे में निराला की यह कविता ही शायद किसी के लिए तिनके का सहारा बन कभी उसे डूबने से बचाए। कविता की उपयोगिता के संबंध में प्रश्न करने वालों के लिए भी ’’वन-बेला’’ शायद इस तरह एक उत्तर का काम कर पाए।
                           
कविता का आरंभ एक प्रकार के ऋतु-वर्णन से होता है जिसमें सूर्य प्रणयी है और धरती प्रणयिनी। पिक-भ्रमर इस ऋतु में प्रणय-गान रच रहे हैं जिन्हें सुन कर इन यौवनागम-प्राप्त प्रेमियों का प्रणय-आवेग तीव्र से तीव्रतर हो चला है। अपनी प्रिया पृथ्वी द्वारा चुम्बित सूर्य ऐसी ऋतु में स्वयं भी उसेे अपनी बाहों में भर उन्माद से चूमने लगता है। काम-केलि के दौरान कुच-चाप से प्रिया को अनुभव होने वाले सुख-झम्प से लेकर रति-क्रीड़ा में सांसें तेज हो जाने तक का वर्णन निराला ने इस कविता के प्रथम चरण में रीतिकालीन कवियों की सी कामोत्तेजक शैली में किया है:
                             
                           वर्ष का प्रथम,
               पृथ्वी के उठे उरोज मंजु पर्वत निरुपम
                           किसलयों बंधे
               पिक-भ्रमर-गुंज भर मुखर प्राण रच रहे सधे
                           प्रणय के गान,
               सुन कर सहसा 
               प्रखर से प्रखरतर हुआ तपन-यौवन सहसा,
               ऊर्जित, भास्वर
                           पुलकित शत-शत व्याकुल कर भर 
               चूमता रसा को बार-बार चुम्बित दिनकर
                           क्षोभ से , लोभ से ; ममता से,
               उत्कण्ठा से , प्रणय के नयन की समता से,
                           सर्वस्व दान
               दे कर , ले कर सर्वस्व प्रिया का सुकृत मान।
                          दाब में ग्रीष्म ,
               भीष्म से भीष्म बढ़ रहा ताप ,
                          प्रस्वेद कम्प,
               ज्यों-ज्यों युग-उर पर और चाप -
                          और सुख-झम्प ;
                          निश्वास सघन
               पृथ्वी की - बहती लू ; निर्जीवन
                          जड़-चेतन ।

                         
किन्तु कविता के इस प्रथम चरण के अंत तक आते आते कवि अपने दृष्टि-क्षेत्र को संकुचित कर लेता है: उसकी नज़र ऋतु-वर्णन को छोड़ अब उसके सम्मुख उपस्थित संध्या के तात्कालिक दृश्य पर ही केन्द्रित हो जाती है जो पहले की तरह रूमानी न होकर ग्रीष्मकाल की दाहक प्रचंडता से भरा हुआ है:

                          यह सान्ध्य समय
                          प्रलय का दृश्य भरता अम्बर,
                          पीताभ, अग्निमय, ज्यों दुर्जय,
                          निर्धूम, निरभ्र, दिगन्त-प्रसर,
                कर भस्मीभूत समस्त विश्व को एक शेष,
                उड़ रही धूल, नीचे अदृश्य हो रहा देश।

                          
इससे और आगे बढ़ने पर कवि पाठक का ध्यान इस वर्तमान बाह्य दृश्य से भी हटा कर पर्सोना के विचारों पर ही केन्द्रित कर देता है जो अब बहिर्मुखी न रह कर पूरी तरह अंतर्मुखी हो गया है:

                           मैं मन्द-गमन,
                घर्माक्त, विरक्त पाश्र्व-दर्शन से खींच नयन
                चल रहा नदी-तट को करता मन में विचार - 
                           ’’ हो गया व्यर्थ जीवन,
                             मैं रण में गया हार !
                             सोचा न कभी -
                अपने भविष्य की रचना पर चल रहे सभी।’’
                             इस तरह बहुत कुछ।

                            
पर्सोना यहां अपने भाग्य को इस बात के लिए कोस रहा है कि उसने उसे किसी राजा का बेटा  नहीं बनाया। वह उन लोगों के प्रति ईष्र्या से भर उठता है जो महज उच्च वर्ग में जन्म के कारण साहित्यिक या राजनीतिक दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण हो गए जबकि प्रतिभा में वह भी उनसे किसी तरह कम नहीं था:

                               ’’ मैं भी होता
             यदि राजपुत्र- मैं क्यों न सदा कलंक ढोता,
             ये होते-जितने विद्याधर-मेरे अनुचर,
             मेरे प्रसाद के लिए विनत-सिर उद्यत-कर ;
             मैं देता कुछ , रख अधिक , किन्तु जितने पेपर,
             सम्मिलित कण्ठ से गाते मेरी कीर्ति अमर,
             जीवन-चरित्र
             लिख अग्रलेख अथवा छापते विशाल चित्र

’’वन-बेला’’ के इस पर्सोना को इस बात का भी अफ़सोस है कि वह किसी ऐसे धनिक का पुत्र न हुआ जो उसे विदेश में शिक्षा दिला पाने के साथ हीे पूंजीपति होने के बावजूद अपने आप के साम्यवादी होने का प्रचार कर पाता और इस तरह आम जनता के साथ साथ सारे साहित्यकारों की भी प्रशंसा अर्जित कर लेता:
               
               इतना भी नहीं, लक्षपति का भी यदि कुमार
               होता मैं, शिक्षा पाता अरब-समुद्र-पार,
               देश की नीति के मेरे पिता परम पंडित
               एकाधिकार रखते भी धन पर , अविचल-चित
               होते उग्रतर साम्यवादी, करते प्रचार,
               चुनती जनता राष्ट्रपति उन्हें ही सुनिर्धार,
               पैसे में दस राष्ट्रीय गीत रच कर उन पर
               कुछ लोग बेचते गा-गा गर्दभ-मर्दन-स्वर,
               हिन्दी-सम्मेलन भी न कभी पीछे को पग
               रखता कि अटल साहित्य कहीं यह हो डगमग,

                              
डाॅ. रामविलास शर्मा ने निराला से संबंधित उनकी प्रसिद्ध कृति निराला की साहित्य साधना के प्रथम खंड में जो लिखा है उसे पढ़ कर हमें पता चलता है कि ’’वन-बेला’’ के इस भाग की रचना में  निराला के व्यक्तिगत सोच और जीवन की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण रही है। डाॅ. शर्मा की पुस्तक के कुछ अंशों को  इस दृष्टि से यहां उद्धृत करना प्रासंगिक होगा:

            
 ’’ निराला के मन में बड़ी साध थी कि उनका लालन-पालन, शिक्षा आदि का प्रबन्ध राजकुमारों-जैसा हो। बचपन की यह साध उनके मन में कभी मिटी नहीं। शुरू में वह इतना ही कहते थे कि राजा और उनके भाई उन पर कृपा रखते थे। फिर उन्होंने जोड़ा कि उनकी शिक्षा का प्रबन्ध राजपरिवार की ओर से हुआ। क्रमशः राजा के भाई  उन्हें गोद लेना चाहते थे, राजकुमारों की धाय ने उन्हें दूध पिलाया , वह वास्तव में राजकुमार थे, किसी शोचनीय घटना में उनकी मां की मृत्यु हुई- इस तरह वह कहानी में नित नया परिवर्धन-परिष्कार करते रहे। जिन दिनों उनका अंग्रेज़ी-प्रेम ज़ोरों पर था, उन्होंने यह भी जोड़ा कि राजा के छोटे भाई किसी कान्वेन्ट में उनकी शिक्षा का प्रबंध करने वाले थे ; पिता ने रोक दिया वर्ना वह भी जवाहरलाल नेहरू की तरह फर्राटे से अंग्रेज़ी बोलते। ’’                                              
                                                                            (1435)

’’ लाड़-प्यार में बिगड़े हुए निराला अपने को सहज ही औरों से श्रेष्ठ मानते थे। पहले महिषादल के लड़कों में , फिर बंगला और हिन्दी साहित्य में , अंत में विश्व-भर में और हर क्षेत्र में । अनियंत्रित महत्वाकांक्षा उन्हें कुश्ती, दर्शन,साहित्य, राजनीति - सभी में आगे बढ़ कर बाजी़ मारने के लिए प्रेरित करती। यह आकांक्षा उनके विवेक को ढक लेती; क्या उनके लिए संभव है ,क्या असंभव, इसका उन्हें ध्यान न रहता। उनमें प्रतिद्वंद्विता का भाव इतना तीव्र था कि संन्यासी भी उससे न बचे थे। रवीन्द्रनाथ के लिए तो सन् ’22 में ही वह कहने लगे थे - बड़े बाप के बेटे होने से बड़े हो गए, वर्ना वैसी प्रतिभा मुझमें भी है। उनका अहंभाव उनसे दो मिनट बात करने वाले की निगाह में स्पष्ट हो जाता। यह अहंभाव परिवेश से टकराता, मन की चाहें पूरी न होतीं, निराला विरोध से उत्तेजित होते। उनका मन अधीर हो उठता। जो ख्याति मिलनी है , अभी मिले, भविष्य के लिए कौन उसका हिसाब छोड़े? फिर जिन्हें ख्याति मिली है , वे प्रतिभा में निराला से बड़े नहीं हैं। मार्ग की कठिनाइयां जितना ही बढ़तीं, निराला का विक्षुब्ध मन उतना ही अधीर हो उठता। वह बराबर अपने परिवार, अपनी सामाजिक स्थिति को दोष देते जिसने उन्हें उनकी प्रतिभा के उचित फल से वंचित रखा। वह अपने को छिपाते , वेश बदलते, नया नाम रखा, बड़े-बड़े बाल रखाये, फिर भी रामसहाय का दिया हुआ हीन व्यक्तित्व प्रेत की तरह उनका पीछा करता था।
                                                                          (1428)

’’ मतवाला में निराला ने जब पन्त की प्रशंसा में लेख लिखा,  तब वह अपने व्यक्तित्व के एक भाग को सुसभ्य, अभिजात और परिष्कृत देखकर प्रसन्न हुए थे। वह उसके अभिभावक, मार्गदर्शक, आचार्य बन कर आगे आये। उस व्यक्तित्व के टुकड़े ने निराला पर ही आघात किया, अपने स्वच्छंद छंद की मौलिकता घोषित की, निराला के मुक्त छंद को बंगालियों की नकल कहा। निराला को बड़ा सदमा पहुंचा। पंतजी और पल्लवमे उन्होंने दुखी-मन से पन्त पर छुरी चलाई, फिर भी पन्त की लोकप्रियता ख़त्म होने के बदले और बढ़ती गयी- कुछ समय के लिए। निराला इसे हिन्दी संसार का अन्याय समझ कर बहुत नाराज़ हुए। उनके मन में एक पन्त-ग्रंथि का निर्माण हुआ।
                    
’’ वह जवाहरलाल की भी बहुत इज्जत करते थे। युवकों के हृदय-सम्राट, साम्राज्य-विरोधी योद्धा, विलायत में लार्ड खानदान के लाड़लों के साथ पढ़े हुए, एकदम अभिजातवर्गीय। फिर जवाहरलाल ने हिन्दीवालों की दीनता-हीनता बयान की, उन्हें यह करने वह करने का उपदेश दिया। निराला को यह सरासर अपना अपमान जान पड़ा। उनके मन में एक जवाहर-ग्रंथि का भी निर्माण हुआ।.......
                    
’’ रवीन्द्रनाथ ठाकुर भी अभिजातवर्गीय, विश्वप्रसिद्ध, बंगला के साथ अंग्रेज़ी में भी बोलने-लिखनेवाले। जितने ही अपने मोहक चित्रों से वह निराला का मन खींचते, उतना ही तुलसीदास के ज्ञान की लाठी से वह उन पर - अपने मुग्ध मन पर प्रहार करते। यह हुई रवीन्द्र-ग्रंथि। 
                     
 ’’ निराला के मन में बहुत-सी ग्रंथियां, बहुत से तनाव, अनेक अंतर्विरोध, अनेक निषेध-भावनाएं, एक दूसरे से उलझी हुई, सतत क्रियाशील, उन्हें बैचेन करती रहती थीं।’’
                                                                         (1431)

’’ सन् ’37 की गर्मियों में उन्होंने वनबेलालिखी। संध्या का समय, आकाश में प्रलय का दृश्य, गोमती के तट पर टहलता हुआ, धूप में चलते-चलते थका हुआ कवि सोचता है -
                           हो गया व्यर्थ जीवन,
                           मैं रण में गया हार।

                    
सुधामें राजपुत्रों के बड़े-बड़े चित्र प्रकाशित हुए थे। कवि-सम्मेलन में राजाओं की पूछ है। जहां निराला मौजूद थे, वहां महाराजाओं को सभापति बनाया गया था। निराला ने लिखा -
                           मैं भी होता यदि राजपुत्र,-

तब ये विद्वान्
                          सम्मिलित कण्ठ से गाते मेरी कीर्ति अमर,
                                    जीवन-चरित्र
                          लिख अग्रलेख अथवा, छापते विशाल चित्र।

राजा का बेटा न सही, किसी लखपति का पुत्र ही होता तो भी विलायत में शिक्षा पाता, पिता धन के स्वामी होने के अलावा साम्यवाद का प्रचार करते, जनता उन्हें राष्ट्रपति चुनती, कवि उन पर राष्ट्रीय गीत रचते, हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन उनका सम्मान करता। दरिद्र निराला तब लार्ड घराने के युवकों के साथ दावतें खाने के बाद भारत लौटते, कैमरा लेकर लोग फोटो खींचते, वह साम्यवाद की उदारता का बखान करते।
                   
निराला ने पिछले छह साल में हिन्दी साहित्य के प्रति कांग्रेसी नेताओं का जो रवैया देखा था, लखनऊ कांग्रेस से लेकर इलाहाबाद के प्रोग्रेसिव राइटर्स तक समृद्ध घरानों के नवाबज़ादों के साम्यवाद का जो रूप देखा था, उससे मन बहुत कड़वा हो गया।
                  
 प्रेमा होटल में निराला, ब्रजमोहन तिवारी और दुलारेलाल भार्गव, जवाहरलाल के एक लेख पर बहस कर रहे थे। यह लेख हरिजन सेवकसे 8 जून ’37 के भारतमें उद्धृत किया गया था। निराला का विचार था कि नेहरू साहित्यकारों के सामने बहुत हेकड़ी से बोलते हैं। इसलिए वह उन पर बहुत नाराज़ थे। तिवारीजी ने कहा - इन्हें जवाहरलाल-मेनिआ हो गया है ; जब देखो तब उन पर गर्म हो जाया करते हैं। दुलारेलाल भार्गव ने हामी भरी। मैंने कहा - जवाहरलाल राजनीति पर हिन्दी में क्यों नहीं लिखते ? निराला ने कहा- मैं लखपति का बेटा होता तो लोग मेरा भी बहुत आदर-सम्मान करते। मैंने कहा- कम से कम मैं तो नहीं करता।
                                                                                  (1299-300) 

’’उनके मन में कभी-कभी भयंकर ऊब उठती थी। साहित्य रचना व्यर्थ हैै। क्या रखा है इस हाय-हाय में ? किसके लिए लिखें ? साहित्य की वृद्धि व्यापक सहयोग चाहती है। साहित्य का निर्माण समष्टि के लिए होता है। जो संपन्न व्यक्ति हैं , वे अपने वैभव-विलास पर हज़ारों खर्च करते हैं, लेखकों के यहां फाके होते हैं।’’
                                                                (1209)

                                      
पर वस्तुतः किसी साहित्यिक रचना में महत्वपूर्ण यह नहीं होता कि उसका कोई अंश रचनाकार के व्यक्तिगत जीवन का कोई भाग रहा है अथवा उसका स्रोत किसी अन्य का अनुभव या कोई अन्य ग्रंथ रहा है। महत्वपूर्ण तो यह है कि अपनी कच्ची सामग्री का उपयोग करके अंततः वह रचनाकार कितनी सशक्त और प्रभावी रचना भविष्य के लिए छोड़ जाता है।
                           
फिर भी इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि निराला के व्यक्तित्व का जैसा सूक्ष्म विश्लेषण डाॅ. रामविलास शर्मा ने उनकी जीवनी में किया है वह हमारे साहित्य की एक अमूल्य निधि है। डाॅ. शर्मा ने हमें निश्चय ही निराला के व्यक्तिगत जीवन के उस भाग से परिचित करवाया है जिसने ’’वन-बेला’’ को  ’’वन-बेला’’ बनाया।

                   
कविता को पढ़ते हुए जब हम आगे बढ़ते हैं तो हम पाते हैं कि अपने भाग्य और अब तक की असफलता के बारे में सोचते हुए पर्सोना का माथा गर्म हो गया है। यहां पैथेटिक फैलेसी का उपयोग करते हुए कवि पर्सोना की इस मनस्थिति को एक विशिष्ट काव्यात्मक रूप दे देता है:

                             तप-तप मस्तक
                    हो गया सान्ध्य-नभ का रक्ताभ दिगन्त-फलक,

अपनी काव्य-कुशलता से कवि अपने वर्णन को यहां उस बिन्दु तक ले आता है जहां पर्सोना और प्रकृति में एक अंतर्सम्बन्ध कायम हो जाता हैं। और तभी इस कविता में हठात् एक अप्रत्याशित मोड़ आता है: सुगन्ध का पीछे से आता हुआ एक झोंका अचानक पर्सोना का ध्यान आकर्षित करता है। यह स्निग्ध सुगंध ऐसी है जैसी पर्सोना अब तक अपनी किसी प्रेयसी की अलकों में उसके द्वारा लगाए जाने वाले किसी सुगन्धित द्रव्य के कारण अनुभव करता रहा है। वह सोचता है कि वह तो अकेला ही इधर आया था ; फिर यह विशिष्ट सुगंध किधर से आ रही है ? क्या उसके पीछे-पीछे कोई और भी उसके साथ यहां तक आया है ?

                    खोली आंखें आतुरता से, देखा अमन्द
                    प्रेयसी के अलक से आती ज्यों स्निग्ध गंध
                    ’’ आया हूं मैं ही यहां अकेला, रहा बैठ’’
                          सोचा सत्वर,

और फिर जब वह मुड़ कर देखता है तो वहां अपनी किसी प्रेयसी के बजाय एक वन-बेला को खड़ी पाता है:

                    देखा फिर कर, घिर कर हंसती उपवन-बेला

                    
निराला ने जिस नाटकीय अंदाज़ में वन-बेला को यहां प्रस्तुत किया है उससे वह अनायास ही पर्सोना द्वारा प्रशंसित उसकी किसी प्रेयसी के रूपक का स्थान ले लेती है।
                   
पर जब पर्सोना अपनी मनस्थिति की तुलना अपनी इस दिव्य प्रेयसी की मनस्थिति से करता है तो उसे तुरंत उसकी तुलना में अपनी क्षुद्रता का एहसास हो जाता है। उसे लगता है कि वे दोनों ही एक जैसी कठिन परिस्थितियों से घिरे हुए हैं पर जहां पर्सोना उनसे घिर कर अपना हौसला खो रहा है वहां उनसे घिरी होने के बावजूद वन-बेला हंस रही है। वन-बेला के जीवन में भी इस प्रचंड ग्रीष्म-ऋतु का यही ताप-त्रास भरा है। किन्तु एक लता के शिखर पर झूमती हुई वन-बेला कवि को एक ऐसी परम सिद्धि जैसी लगती है जो अतल की अतुल सांस को अपने मस्तक पर लेकर वहां से  इस मत्र्य-लोक में उठ आई हो। कर्मजीवन के दुस्तर क्लेशों को भेद कर वह अपने सुषम रूप में ऐसे ऊपर आई है मानो वह किसी क्षार-सागर को पार करके आई कोई सिक्त-तन-केश, सुघर अप्सरा हो और जो विश्व के इस चकित करने वाले दृश्य के दर्शन रूपी शर से विद्ध इसकी सैंकड़ों लहरों पर कांपती हुई खड़ी हो:

                           जीवन में भर
                           यह ताप, त्रास
                    मस्तक पर लेकर उठी अतल की अतुल सांस,
                           ज्यों सिद्धि परम
                    भेद कर कर्मजीवन के दुस्तर क्लेश, सुषम
                           आयी ऊपर,
                    जैसे पार कर क्षार सागर
                           अप्सरा सुघर
                    सिक्त-तन-केश, शत लहरों पर
                    कांपती विश्व के चकित दृश्य के दर्शन-शर।

                  
 वन-बेला के प्रति गहरे प्रशंसा-भाव से भर कर पर्सोना उससे कहता है कि लोगो को उस जगह का कोई ध्यान ही नहीं है जहां वह इस समय एक वन्य गान बन कर खड़ी है। जब यह भूमंडल प्रखर ताप से तप रहा है तब वह अपने पुष्प-रूपी लघु प्याले में उस अतल की ( जिससे उठ कर वह आई है ) सुशीतलता भर कर इस सुगंध-सुरा का सबको पान करा रही है। इस ताप-त्रास से उसके इस तरह अप्रभावित रहने के कारण ही संभवतः उसकी ओर से दिए जाने वाले आनंद में  कहीं कोई कमी नहीं आई है। बीते क्षणों में जहां वह उस ताप-त्रास से प्रभावित होकर अपने भाग्य का रोना रोता रहा है वहां:
                           
                           जब ताप प्रखर,
                    लघु प्याले में अतल की सुशीतलता भर कर
                    तुम करा रही हो यह सुगन्ध की सुरा पान !

                    
इस बिन्दु तक आते आते हमारे लिए ’’वन-बेला’’ के पर्सोना और  निराला को अलग करके देखना मुश्किल हो जाता है क्यांेकि इसे पढ़ते हुए हमें अब पर्सोना के एक कवि होने के संकेत भी काफी स्पष्टता से नज़र आने लगते हैं। पर्सोना अब यह सोच कर विचलित है कि वह एक सच्चे कवि के अपने धर्म का पालन करने में असमर्थ रहा है। एक सच्चा कवि वही हो सकता है जिसकी कविता उसकी हर स्थिति में पाठक-श्रोता को काव्यानंद की अनुभूति कराने में समर्थ रहे। उस ऊंचाई तक पहुंच कर ही एक कवि के रूप में वह वन-बेला जैसी अलौकिक सुंदरतायुक्त प्रेयसी के प्रेम का सच्चा अधिकारी हो सकता है। जिस प्रकृति ने वन-बेला को ऐसे दिव्य सौन्दर्य और आकर्षण से युक्त बनाया है वह प्रकृति उसी कवि की कविता में वैसा चमत्कारिक सौन्दर्य व आकर्षण पैदा कर सकती है जो जीवन के ताप-त्रास के प्रति वन-बेला जैसा ही निस्संग और अप्रभावित रह कर अपना कवि कर्म करते रहनेे में समर्थ हो।
                   
पर्सोना यहां सोचता है कि वह अब तक एक कवि के रूप में अपनी कविता द्वारा लोगों को आनंदित करने की अपनी प्रमुख भूमिका को भूल कर अपने ताप-त्रास की ही चर्चा करता रहा हैे जबकि बेला आनन्द-दान की अपनी इस भूमिका को एक क्षण के लिए भी नहीं भूली है। वह इसीलिए कवि की तुलना में कहीं बहुत बड़ी है। उसकी सिद्धि की तुलना में कवि की सिद्धि तुच्छ और नगण्य है।
                   
विषम परिस्थिति में भी अपनी प्रसन्नता, बेफ़िक्री, उदारता और विशालहृदयता को कायम रखने की क्षमता में कवि-पर्सोना वन-बेला की तुलना में अपने आपको कमज़ोर पाता है। अपनी इस हीनता के बोध से वह लज्जित हो उठता है। फिर भी एक सच्चे प्रेमी के आत्मविश्वास से वह एक बार अपनी इस दिव्य प्रेयसी की ओर बढ़ता है:

                    लाज से नम्र हो उठा, चला मैं और पास

किन्तु तभी एक और नाटकीय घटना होती है: अचानक सन्ध्याकालीन तेज़ हवा चलने लगती है जिससे वन-बेला की लता तेज़ी से हिलने लगती है:

                    झुक-झुक, तन-तन, फिर झूम-झूम, हंस-हंस झकोर,
                    चिर-परिचित चितवन डाल, सहज मुखड़ा मरोर,
                    भर मुहर्मुहर, तन-गन्ध विकल बोली बेला -

                    
इस भाग के अंत तक आते आते वन-बेला कवि-पर्सोना को न केवल झूमती और सुगंध बिखेरती दिखाई देती है बल्कि वह जैसे उसे कुछ आलोचनात्मक संदेश भी देती लगती है। इस संदेश में कवि के व्यवहार के बारे में एक तरह की फटकार और भत्र्सना है। वह उसे कहती लगती है कि अपने बारे में कुंठित और पराजयवादी सोच के कारण वह इतना अपवित्र और अयोग्य हो गया है कि उसे अब वन-बेला को छूने का अधिकार ही नहीं रह गया है। ऐसा हीन-चरित्र व्यक्ति वस्तुतः एक प्रणयी के रूप में उसके स्पर्श का अधिकारी नहीं हो सकता। बेला के साथ ऐसे कवि का प्रणय असंभव है। यह प्रणय तो उसी प्रणयी के साथ संभव है जो उसी (बेला) की तरह अपना सर्वस्व लुटा सकने में सक्षम हो:

                    ’’मैं देती हूं सर्वस्व, छुओ मत, अवहेला
                    की अपनी स्थिति की जो तुमने, अपवित्र स्पर्श
                    हो गया तुम्हारा, रुको , दूर से करो दर्श।’’

                    
हम देखते हैं कि निराला ने प्रकृति और पर्सोना के बीच जो अंतर्सम्बन्ध कविता के पहले भाग में कायम किया था उस अंतर्सम्बन्ध का विस्तार कविता के इस भाग तक आते आते वे वन-बेला और कविता तक करने में सफल हुए  हंै। यहां कवि-पर्सोना यह स्वीकार करता है कि वह अपनी कविता में वैसा प्रभाव नहीं पैदा कर सका है जैसा वन-बेला के व्यक्तित्व में है। उसका सौन्दर्य, उसकी सुगन्ध, उसकी सबको मोह सकने की शक्ति शायद अपने अहं को पूर्णतः तिरोहित करके ही हासिल की जा सकती है । यह अपलक स्नेह जो वन-बेला की इस छवि में प्रकट है और जो विश्व के प्रणयी-प्रणयिनियों के हृदय-गृह का हार है कहां उसकी कविता में आ पाया है ? यह सहज मंद गति जो वृन्त पर नाचती वन-बेला प्रदर्शित करती है और यह प्रेयसी की बाईं अलक द्वारा चूमी हुई सी जो पुलक-गंध  वन-बेला से आती है उसकी कविता में कहां है ?

                          मैं रुका वहीं
                          वह शिखा नवल
                    आलोक स्निग्ध भर दिखा गयी पथ जो उज्ज्वल ;
                    मैंने स्तुति की  - ’’ हे वन्य वह्नि की तन्वि-नवल
                    कविता में कहां खुले ऐसे दल दुग्ध-धवल ? -
                          यह अपल स्नेह-
                    विश्व के प्रणयि-प्रणयिनियों का
                          हार-उर गेह ? -
                          गति सहज मन्द
                    यह कहां -कहां वामालक-चुम्बित पुलक-गंध !’’

                  
कवि-पर्सोना को ऐसा अनुभव होता है कि एक नवलशिखा के रूप में पुष्पित वन-बेला उसे अपने स्निग्ध आलोक से वह उज्ज्वल पथ दिखा गई हैे जो उसे कविता में भी वन-बेला जैसी सिद्धि की ओर ले जा सकता है: इसके लिए उसका सारी ईष्र्या व निराशा को त्याग कर ,अपने आपको पूरी तरह भूल कर , एक स्थायी आनंद भाव में (खेलते) रहना ज़रूरी है।
                  
हर कविता अंततः कवि के अपने व्यक्तित्व से ही निःसृत होती है और इसीलिए श्रेष्ठ काव्य-रचना संबंधी जिस संदेश को इस कविता का कवि-पर्सोना वन-बेला से प्राप्त करता लगता है वह भी किसी न किसी रूप में निराला के मन में पहले से मौजूद रहा होगा। डाॅ. रामविलास शर्मा को पढ़ते हुए हमें इस बात का पुख़्ता प्रमाण भी मिल जाता है। वे कहते हैं:
                  
                   
मन की सारी कड़वाहट कलात्मक ढंग से उन्होंने वनबेलामें व्यक्त कर दी। पर वेदान्त की सीख यह थी कि ईष्र्या और अहंकार का भाव क्षुद्र है ; मनुष्य को चुपचाप काम करते जाना चाहिए। तपे हुए नभ के रक्ताभ फलक के नीचे मस्तक पर अतल की अतुल सांस लेकर वनबेला उनके सामने आई। मादक गंध के प्रभाव से वह बेला के और पास आये। वह लाज से नम्र हो उठे, ......। वनबेला में कितनी सुगंध है, निराला के जीवन में, काव्य में कितना अहंकार !
                           
                           केवल आपा खोया, खेला
                              इस जीवन में,
                           कह सिहरी तन में वन-बेला।
कवि ने कहा -
                           यही सत्य, सुन्दर !
                           नाचतीं वृन्त पर तुम, ऊपर
                           होता जब उपल-प्रहार प्रखर ! 
 निराला उपल-प्रहार होने पर विचलित क्यों होते हैं ? उन्हें भी पत्थर फेंकने वालों को सहृदयता की सुगंध ही देनी चाहिए। 
                                                      (1299-300) 
              
                  
’’ निराला का उपचेतन प्रशान्त महासागर न था कि समाधि लगाकर वह आनन्द से उसका अनहद नाद सुना करते। उसमें भावों की परस्पर-विरोधी दिशाओं में बहने वाली अंतर्धाराएं थीं, कहीं गहराई में बड़वानल था जिसकी आंच से उनकी चेतना के ऊपरी स्तर तप उठते थे। निराला का विवेक जिन आकांक्षाओं-भावनाओं को नैतिक दृष्टि से अनुचित समझता था, उन्हें सामान्य चेतना की सतह से नीचे ठेल देता था। वहां वे पुष्ट और सवंर्द्धित होती रहतीं और मौका मिलते ही ऊपर उभर कर विवेक को झकझोर डालती थीं। निराला के उपचेतन में बहुत बड़ी रचनात्मक क्षमता थी, उसी परिमाण में उन्हें विचलित करने, उन्हें त्रास देने की अद्भुत क्षमता भी उसमें थी।
                  
अपमान, आत्मग्लानि,अहंकार के भावों को उनका विवेक नीचे ठेल देता था, ऊपर से वे प्रयत्न करते थे कि वनबेला की तरह चुपचाप उपल-प्रहार सहते रहें, दूसरों को सुगन्ध ही दें किन्तु भीतर-ही-भीतर उनका मन आघात-पर-आघात सहता रहा, उनके वज्र-कठोर अंतर में दरारें पड़ती गयीं।’’
                                                    (1461)
                                                                                              
                 
आत्म-साक्षात्कार के इस क्षण में वन-बेला और कवि-पर्सोना का अस्तित्व एकाकार हो जाता है। कविता की पंक्ति ’’ कह सिहरी तन में वन-बेला’’  इसी एकत्व को संकेतित करती है।
                  
कवि-पर्सोना का वन-बेला के साथ यह एकत्व ही एक बार उसे भावनात्मक रूप से पुनर्जीवित कर निराशा व अवसाद से बाहर ले आता है और उसे पुनः उस उत्फुल्लता से भर देता है जिसमें उसे प्रकृति का वह सौन्दर्य फिर से दिखाई देने लगता है जो कविता के प्रथम चरण के अंतिम भाग तक आते-आते उसके लिए विलुप्त हो गया था:

                    ’कूऊ-कूऊबोली कोयल, अंतिम-सुख-स्वर,
                    ’पी कहांपपीहा-प्रिया मधुर विष गयी छहर,
                           उर बाढ़ आयु
                    पल्लव-पल्लव को हिला हरित बह गयी वायु,
                    लहरों में कम्प और लेकर उत्सुक सरिता
                           तैरी, देखती तमश्चिरिता
                    छवि बेला की नभ की ताराएं निरुपमिता,
                           शत-नयन-दृष्टि
                    विस्मय में भर कर रही विविध आलोक सृष्टि।           

                 
कवि-पर्सोना को आत्मिक रूप से पुनर्जीवित और भावनात्मक रूप से पुनप्र्रफुल्लित (हरा) देख कर वन बेला उसे वह संदेश देती है जो उसे जीवन में सही मूल्यों की पहचान का रास्ता दिखा सकता है। वह कहती है कि भौतिक सफलताओं का लोभ आत्मा की पावन निधि को पत्थर में बदल देता है। बड़े-छोटे और अमीर-ग़रीब का भेद उन्हीं विकृत दृष्टि वालों के लिए है जो आत्मा की इस वास्तविकता को समझने में अक्षम हैं। जहां सच्चा ज्ञान है वहां बड़े-छोटे और समान-असमान का यह ख़याल नहीं आ सकता। ऐसे ज्ञानयुक्त लोगों की आंखों की आभा से ही यह संसार स्वर्ग बन सकता है:

                   भाव में हरा मैं , देख मन्द हंस दी बेला,
                   बोली अस्फुट स्वर से - ’’ यह जीवन का मेला
                   चमकता सुघर बाहरी वस्तुओं को ले कर
                   त्यों-त्यों आत्मा की निधि पावन, बनती पत्थर।
                           बिकती जो कौड़ी-मोल 
                           यहां होगी कोई इस निर्जन में,
                   खोजो, यदि हो समतोल
                   वहां कोई, विश्व के नगर-धन में ।
                           है वहां मान,
                   इसलिए बड़ा है एक, शेष छोटे अजान,
                           पर ज्ञान जहां,
                   देखना - बड़े-छोटे असमान-समान वहां -
                           सब सुहृदवर्ग
                   उनकी आंखों की आभा से दिग्देश स्वर्ग ।’’

                  
 पर्सोना वन-बेला के साथ सहमत होता हुआ कहता है कि जो वह कह रही है वही सच है। श्रेष्ठता बाहरी प्रहारों के बावजूद अविचलित रहने में है। अपनी इस शुचि-संचरिता छवि में वन-बेला को ही यह कवि-पर्सोना अपनी सच्ची कविता के रूप में देखता है और उससे स्थायी रूप से उसके हृदय में निवास करने के लिए प्रार्थना करता है।

                   
कहना न होगा कि 1937 में ’’वन-बेला’’ के रचयिता कवि निराला वही कवि नहीं रह गए थे जिन्होंने 1916 के आसपास ’’जूही की कली’’ की रचना की थी। नारी के सौन्दर्य और आकर्षण के उनके मापदंड भी इस उम्र तक आते आते निश्चय ही बदल चुके होंगे। इस समय के निराला वे निराला थे जो (डाॅ रामविलास शर्मा के अनुसार) न चाहते हुए भी इलाहाबाद के एक कवि सम्मेलन में श्यामकुमारी नेहरू और चन्द्रावती त्रिपाठी के आग्रह पर भंग के हल्के नशे की हालत मे भी मंच पर जाने और कविता सुनाने को तैयार हो गए थे। (निराला की साहित्य साधना (प्रथम खंड), पृष्ठ 288-289)
                    
कविता का अंतिम चरण अपेक्षाकृत सरल है क्योंकि उसमें केवल वन बेला की अंतिम नियति का बाह्य वर्णन है। अगले दिन सुबह किसी ब्राह्मण द्वारा किसी देवता पर चढ़ाने के लिए तोड़ी जाती वन-बेला की आवाज़ को केवल पर्सोना सुनता है जबकि अन्य लोगो का अनुभव केवल बहती हुई प्रभातकालीन वायु के उनका शरीर स्पर्श करने तक ही सीमित रह जाता है:

                           फिर उषःकाल
                    मैं गया टहलता हुआ ; बेल की झुका डाल
                    तोड़ता फूल कोई ब्राह्मण,
                           ’’जाती हूं मैं’’ बोली बेला,
                    जीवन प्रिय के चरणों पर करने को अर्पण -
                            देखती रही ;
                            निस्वन, प्रभात की वायु बही ।                            
                    
                   
’’वन-बेला’’ की प्रथम पंक्ति के साथ कविता और काव्य-रचना के जिस संसार में कवि ने पाठक का प्रवेश करवाया था इसकी अंतिम पंक्ति के साथ ही  वह  पाठक को उस रहस्यमय संसार से पूरी तरह बाहर ले आता है।

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सदाशिव श्रोत्रिय                                                  

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वागर्थ से साभार                                                             



2 comments:

pallav ने कहा…

अच्छे को अच्छा कह रहा हूँ। असल बात यह कि कविता को जिस गहराई से डूब कर पढ़ा-देखा-लिखा गया है,वह इधर कम ही मिलता है।

त्रिलोकी मोहन पुरोहित ने कहा…

'वनबेला" का विलक्षण विवेचन। कविता को स्पोष्ट तो करता ही है, कवि निराला जी के व्यक्तित्त्व को भी उजागर करता है।

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