अभी हाल में

:


विजेट आपके ब्लॉग पर

शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

स्वयं प्रकाश का सफ़र - हिमांशु पण्ड्या

यह लेख वैसे तो  "स्वयं प्रकाश की चुनिन्दा कहानियाँ"न की भूमिका के रूप मे लिखा गया है, लेकिन स्वतंत्र रूप से इसे पढ़ते हुए भी आप स्वयं प्रकाश की कहानियों के विस्तृत परिसर के देखे-अदेखे झरोखों के तमाम पते पा सकते हैं। बहुत कम लिखने वाले आलोचक हिमांशु जब डूब कर लिखते हैं तो वह प्रचलित अर्थों मे समीक्षा नहीं होती बल्कि रचना को आर पार देखने की नज़र देने वाली आलोचना होती है। उनसे यह आग्रह कि इस बहुत कम को कम अज़ कम "कम" मे तब्दील करें। 


प्यारे भाई रामसहाय[1] ,
जीना हराम कर रखा है आपने | स्वयं प्रकाश की ये ग्यारह कहानियां चुनीं आपने, अपने समय की चर्चित-चमकदार-शीर्ष कहानियां, और अब चाहते हैं, मैं इस विकास यात्रा में एक सूत्र तलाशूँ | क्यों भाई ? बिद्यार्थियों हेतु ? आदर्शोन्मुख यथार्थवाद से यथार्थवाद तक प्रेमचन्द का उत्तरोत्तर विकास ! आदर्शोन्मुख प्रेमचंद के उत्तर-ओ-उत्तर यथार्थवादी प्रेमचंद | १८४४ की पांडुलिपियों के मार्क्स या पूंजी के मार्क्स | लुकाच के मार्क्स या लेनिन के मार्क्स | फ़टाफ़ट अब्बी के अब्बी बताइये – युवा मार्क्स या प्रौढ़ मार्क्स? विकास या ह्रास ?
इस प्रकार की प्रविधि में दिक्कत ये है रामसहाय जी कि हम युवा मार्क्स और प्रौढ़ मार्क्स को एक दूसरे के खिलाफ खडा कर देते हैं | या प्रेमचंद को | या किसी भी को | या तो उनका विकास हुआ या ह्रास हुआ | इधर या उधर | आर या पार | इंसान है तो बदलेगा – तो या तो लुढ़केगा या चढेगा | लेकिन इंसान जिस समय में रहता है वह बदल रहा है या नहीं ? क्या यह समय लुढकता और चढता नहीं है ? चढते समय में लुढकता इंसान या लुढकते समय में चढता इंसान – आइन्स्टाइन कुछ बत्ती जलाते हैं कि नहीं दिमाग में ?
कल आपने इतना चमकदार वाक्य बोला, “ ‘नीलकांत का सफर’ के नीलकांत सफर में होते हुए भी एक मुकाम पर पहुँच गए और ‘प्रतीक्षा’ के नायक-नायिका एक मुकाम ( नाटक) हासिल करके भी प्रतीक्षा में हैं.” मैं तो अब तक अश् अश् कर रहा हूँ | फिर मैं सोच में पड गया | क्या आप ये कहना चाहते हैं कि ‘कहाँ जाओगे बाबा?’ और ‘कौन बनेगा उत्तराधिकारी?’ का पाठक अगर ‘सूरज कब निकलेगा?’ और ‘नीलकांत का सफर’ पढेगा तो हैरान रह जाएगा कि क्या ये एक ही कथाकार ने लिखीं हैं/थी ? कि दृढ क्रांतिकारी उद्घोष वाला कथाकार आज अपने पाठकों को दोराहे पर लाकर क्यों छोड़ रहा है ? कि आप या तो इस स्वयं प्रकाश के प्रशंसक हो सकते हैं या उस स्वयं प्रकाश के. कि आप किसी भी पाठक से स्वयं प्रकाश की प्रिय कहानी का नाम पूछकर भविष्यवाणी कर सकते हैं कि उसे उनकी फलाँ फलाँ और फलाँ कहानी पसंद आयेगी और ढिकां ढिकां और ढिकां नहीं आयेगी.
रामसहाय जी, मैं इस रैखिक सूत्रीकरण से बाहर निकलकर आपसे बात करूँगा | कोशिश करूँगा कि इस परिवर्तन और परिवर्तन के साथ साथ नैरंतर्य पर निगाह डाल सकूं | शुरुआत हाल की कहानियों से करेंगे |
‘गौरी का गुस्सा’ – स्वयं प्रकाश की सबसे कम समझी गयी कहानी है | अतिलोकप्रियता के बावजूद | उपभोक्तावाद, अंतहीन दौड, संतोष परम धरम- रहने दीजिए ये सारा वाग्जाल | स्वयं प्रकाश पंचतंत्र के विष्णु शर्मा नहीं हैं | इस कहानी का इससे बड़ा सरलीकरण नहीं हो सकता कि यह संतोष का महत्त्व बताने के लिए लिखी गयी है | ‘गौरी का गुस्सा’ में पार्वती यदि – यदि रतनलाल अशांत की अंतिम मांग भी मान लेती, उसे एक अच्छी दुनिया भी दे देती, तो क्या होता ? आपका जवाब सही है कि रतनलाल अशांत तब भी अशांत ही बना रहता क्योंकि उसे जो चाहिए था वह संतोष था, धनदौलत नहीं, पर यह जवाब अधूरा है | यदि रतनलाल अशांत को उसकी मनचाही दुनिया मिल गयी होती तो उसके समानांतर एक और दुनिया होती – रोटी, झींकती, कलपती, बदबू भरी, बजबजाती, दाने दाने को तरसती, हलकान होती दुनिया | जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से, पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से |
पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में वैयक्तिक प्रगति एक छलावा है | वह सदा ही किसी ‘अन्य’ को उपनिवेशित कर उसकी पीठ पर सवार होकर ही पायी जा सकती है | इस प्रक्रिया में सदा ही आपके लिए दो अन्य होंगे – एक आपसे ऊपर वाला, जो आपकी अब तक की प्रगति को फिजूल साबित करता रहेगा और एक अन्य नीचे वाला, जो आपको डराता, बेचैन करता रहेगा, आपको रतनलाल अशांत बनाता रहेगा | आप सदा ही रतनलाल अशांत की तरह छलांग लगाकर उस ऊपरवाले अन्य में शामिल होना चाहते रहेंगे ताकि आप इस निचले अन्य से दूर जा सकें | पर वह कभी नहीं होगा क्योंकि इस निचले अन्य के कारण ही आप, आप हैं | आपकी सारी दौलत , ऐशो-आराम इस निचले अन्य का हक मारकर ही हासिल किया गया है |
सबको वैयक्तिक प्रगति का पूर्ण अवसर देने का पूंजीवादी दावा धोखे की टाटी है | भैया रामसहाय, जब पार्वती मैया नहीं कर पायी तो पूंजीवाद क्या कल्लेगा ! यकीनन एक और दुनिया संभव है लेकिन वह सिर्फ और सिर्फ सामूहिक पहलकदमी से ही संभव है | ‘हम बदलेंगे, जग बदलेगा’ बकवास है | आपके अच्छे होने से कुच्छ नहीं होगा | आपको अपने चारों ओर का कूड़ा कचरा साफ़ करने के लिए कमर कसनी ही होगी और जिनके दिमागों में ये कबाड़ भरा है उनकी नज़रों में बुरा बनना ही पडेगा |
इससे बड़ी दुर्घटना कुछ नहीं हो सकती कि प्रबंधन की कक्षाओं में स्ट्रेस मैनेजमेंट पढ़ाने वाले आधुनिक मोरारी बापू ‘गौरी का गुस्सा’ को अपना रीडिंग मैटिरियल बना लें | व्यक्तिवादी उत्कर्ष के सुनहरे सपने दिखाने वाले उदारवाद की व्यर्थता को जिस कहानी ने दिखाया हो , वह उसी की खिदमत में लगा दी जाए | ‘गौरी का गुस्सा’ सीधे सीधे पूंजीवाद की हार की कहानी है और उसका सन्देश बहुत साफ़ है – मुक्ति के रास्ते अकेले नहीं मिलते |
नहीं, ‘कहाँ जाओगे बाबा?’ का भी गलत पाठ कर रहे हैं आप | ‘कहाँ जाओगे बाबा?’ को परम्परा के पक्ष में झुकी हुई तो आप तभी मान सकते हैं जब आप मास्टर रामरतन वर्मा को नायक मान लें | दरअसल , आपकी गलती नहीं है | आप तो स्वयं प्रकाश जी के पुराने अभ्यस्त पाठक रहे हैं और स्वयं प्रकाश जी कहानी में आपसे लगातार बतियाते आये हैं | ढेर सारे हस्तक्षेप के साथ वे ऐसे किसी शको शुबहे की कोई गुंजाइश ही नहीं रहने देते थे कि वे कहाँ खड़े हैं | ध्यान दीजिये रामसहाय जी, खुलकर अपने विचारों का प्रकटीकरण – यह स्वयं प्रकाश जी के यहाँ लगातार घटता गया है | न ‘कहाँ जाओगे बाबा?’ में, न ‘गौरी का गुस्सा’ में और तो और खुद के एक पात्र के रूप में होने और स्वयं के विचार प्रकट कर सकने की अपार संभावनाएं होने के बावजूद – न ‘प्रतीक्षा’ में | रामरतनीय उवाच और दृष्टिकोण के जरिये आये तमाम परम्परावादी मूल्यों और आग्रहों के बावजूद यह कहानी रामरतन जी के पक्ष में नहीं खड़ी है, इस बात को आप तभी समझ सकते हैं जब आप ‘आनंदी’ कहानी पढ़ लें | क्या आपने नहीं पढी है ? तभी | ओहो ! तो आप आनंदी को पात्र समझ रहे हैं ! अरे नहीं साहब, गुलाम अब्बास की अमर कहानी ‘आनंदी’ – जिसकी प्रेरणा से बाद में श्याम बेनेगल ने ‘मंडी’ फिल्म भी बनायी – में आनंदी तो उस कॉलोनी का नाम है जो शहर के ऐन बीचों बीच खड़ी है और सभ्य सुसंस्कृत शहर को अपनी छवि पर धब्बा लग रही है | लेकिन यह तो आज की स्थिति है, कहानी की शुरुआत तो वहां हुई थी जहां इस बदनाम मोहल्ले को सर्वसम्मति से शहर के सभ्य नागरिकों द्वारा शहर के बाहर ठेला गया था और धीरे धीरे बसता बसता फिर शहर उसके चारों ओर बस गया था | जहां जहां शहर वहां वहां आनंदी बल्कि ज्यादा सही यह क्रम – जहां जहां आनंदी वहां वहां शहर | अब इस कहानी को फिर पढ़िए | “तुम कैसे कह सकते हो कि आनंदी वहां भी नहीं पहुँच जायेगी?” कहने वाले रामरतन जी क्या आनंदी यानी ‘मायामहाठगिनी’ को दोष दे रहे हैं ? शायद नहीं, क्योंकि उन्होंने गुलाम अब्बास की ये कहानी पढी है और वे ये जानते हैं कि आनंदी हमारा प्रतिबिम्ब मात्र है, उसे दोष देना आईने में दिख रही अपनी सूरत से चिढने जैसा है |
‘हर आज बीते कल से बेहतर है’ लिखने वाले स्वयं प्रकाश पुरातनपंथी हो ही नहीं सकते | बेशक, उनकी सहानुभूति रामरतन जी के साथ है लेकिन एक त्रासदी के रूप में चित्रित ये कथा रामरतन जी के पुरातन मूल्यों के शनैः शनैः अप्रासंगिक होते जाने की ही कथा है | एक ड्राइवर के अपनी कॉलोनी में मकान बना लेने पर आश्चर्य व्यक्त करते रामरतन जी को क्या इत्ती सी बात समझ नहीं आ गयी होगी कि उनका एक जमाने का एकमात्र और भव्य मकान आज इस क्षेत्र का सबसे छोटा और पुराना मकान था | एक सुखद भविष्य की आकांक्षा में रामरतन जी लगातार अपने वर्तमान को स्थगित करते रहे और जब उस भविष्य की दहलीज पर पहुंचे तो पाया कि वह कमबख्त तो अपने नाम के अनुरूप फिर आगे चला गया था | अपने बेटे के साथ असंवाद की खाइयां अपने हाथों खोदने वाले रामरतन जी अंत में खुद संवादहीनता के टापू पर अकेले रह गए | मास्टर रामरतन वर्मा की सादगी, सादगी नहीं है, वह शुचिता है | प्रत्येक शुचिता अनिवार्यतः अवसाद की ओर जाती है क्योंकि वह अपने परिवेश के प्रति एक अनिवार्य हिकारत से भरी होती है जो मानती है कि किसी इच्छित कालखंड में इच्छित परिवेश उसका इंतज़ार कर रहा होगा | ऐसा थोड़ेई होता है बाबू रामसहाय, अपने चारों ओर के झाड़- खंखाड को पुट्ठे भिडाकर खुद ही साफ़ करना होता है | इस घर्षण का नाम ही तो जीवन है, बाकी तो सब एकता कपूर के सीरियल हैं, और क्या |
अरे वाह ! आपने तो मेरे मुंह की बात छीन ली | ‘संधान’ कहानी भी सादगी के महिमामंडन की कथा नहीं है | यह इंसान की कल्पनाशीलता, उसकी सृजनात्मकता की पहचान की कहानी है | बस, कभी कभी होता यह है कि हम खुद अपने भीतर के इस सर्जक का संधान नहीं कर पाते, उसके लिए हमें किसी कैटलिस्ट यानी उत्प्रेरक की जरूरत होती है | विश्वमोहन जी के परिवार के लिए ये भूमिका उनके दोस्त के परिवार ने निभाई | अब इसका अर्थ ये भी नहीं है कि स्वयं प्रकाश ऐसा कह रहे हों कि महानगर का जीवन यंत्रणा है और छोटे शहरों में तो – ‘थोड़े में निर्वाह यहाँ है, ऐसी सुविधा और कहाँ है’ | बात सिर्फ इतनी है कि ‘जो है उसमें खुश रहो’ की जवाबी कार्रवाई ‘कर लो दुनिया मुठ्ठी में’ नहीं हो सकती | पहला दर्शन सामंती यथास्थितिवाद का पोषक था तो उसके जवाब में आया दूसरा उदारीकृत अर्थव्यवस्था की मायावी चकाचौंध | रंक से राजा बनने की परीकथाएँ पहले भी थीं लेकिन वे आज जितनी अश्लील पहले कभी नहीं थीं | एक को (सार्वजनिक प्रदर्शन के तहत ) करोडपति बनाकर करोड़ को सपने बेचना आज के दौर में हुआ है | स्वयं प्रकाश ने उस एक पर उपन्यास लिखा और उन करोड़ों पर कहानियां लिखते हैं | लिखते आये हैं, लिखते रहेंगे |
आप को ऐसा लग रहा होगा रामसहाय जी कि जैसे मैं लगातार आपकी बातों को सिरे से काटने का तय करके बैठा हूँ, लेकिन ऐसा नहीं है | सच तो यह है कि मैं आपका आभारी हूँ कि आपने सत्तर के दशक के स्वयं प्रकाश और इक्कीसवीं सदी के इस स्वयं प्रकाश के बीच के फर्क की ओर ध्यान दिलाया | बीसवीं सदी की आख़िरी दहाई से उगे भूमंडलीकरण ने सब उलटपुलटकर रख दिया | परम्परागत टेड यूनियंस की धार भोथरी हो गयी और चुनचुनकर जुझारू-लड़ाकू श्रमिक रास्ते पर ला दिये गए | दुनिया के मजदूर तो क्या एक होते, उसके पहले दुनिया के पूंजीपति एक हो गए और उनकी संयुक्त ताकत के सामने हमारी सरकारें रिरियाने लगीं | अब ऐसे में उत्पादन के साधनों पर काहे का राज्य का नियंत्रण जब राज्य खुद थैलीशाहों के नाड़े में लटका है | अब तो प्राकृतिक संसाधनों की लूट और अंधाधुंध दोहन का दौर है | अपने जंगलों और जमीनों पर हक के लिए खड़े हो रहे आदिवासी, भारत के सर्वहारा हैं | इस बदले हुए समय के यथार्थ को व्यक्त करने के लिए रचनाकार की कलम भी नए तरीके अपनायेगी ही | स्वयं प्रकाश भी नए सवालों से रूबरू होने की चुनौती स्वीकार कर नए तेवर और नयी शैली के साथ आगे आये | कानदांव, गौरी का गुस्सा और जंगल का दाह जैसी कहानियां आयीं |
अगर उदारीकरण हमारे लिए एक ध्रुवीय विश्व, प्रगति का एकायामी सर्वग्रासी रूप और एक सपने की असम्भाव्यता लेकर आया तो रचनाकार उसके प्रतिकार में गप्प, लोककथा, फैंटेसी और स्मृतियों की ओर गया | ‘प्रतीक्षा’ कहानी जोशीले नौजवानों की एक टोली द्वारा सैमुअल ब्रैकेट के अब्सर्ड के क्रांतिकारी भाष्य की कथा है | नाटक का क्रांतिकारी तेवर और नाटक के बाहर परिस्थितियों के मारे नौजवानों का ये हताशा भरा अहसास कि वे या तो दीवार पर सर मार सकते हैं या ‘उदयवीर के पिताजी के स्वर्गीय होने’ की प्रतीक्षा कर सकते हैं | यह ब्रैकेट के साथ ब्रेख्त की जुगलबंदी है और फिर इसी जुगलबंदी के तहत कहानी समाप्ति से ठीक पहले सैंतीस साल की छलांग लगाकर लौटती है | नायक और उसका दोस्त बतिया रहे हैं | दुनिया वैसे बिलकुल नहीं बदली जैसा चाहा था पर इस बात का संतोष है कि अपनी निष्ठाओं और प्रतिबद्धताओं के लिए जिए और लडे भी | यह मानों दो दोस्तों की बातचीत नहीं है, यह प्रगतिगामी ताकतों की ‘विफलता’ का ऐतिहासिक मूल्यांकन है | ‘विफलता’ – क्योंकि प्रतिपक्ष सिर्फ पूर्णकाम हो चुके लोगों को ही प्रणम्य मानता है | निरर्थकता/सार्थकता के अर्थ ग्रहण से पहले ये देखना जरूरी होता है कि आखिर आप कहाँ खड़े होकर इसका आकलन कर रहे हैं | वरना सैमुअल ब्रैकेट को देखने की कोशिश तो मत ही कीजिये, भेंगापन होने का खतरा है | आपका कहना बिलकुल ठीक है रामसहाय जी, अगर स्वयं प्रकाश जी ने ये कहानी तब लिखी होती, जिस कालखंड का इसमें चित्रण है तो ये कहानी ऐसे बिलकुल नहीं ख़त्म होती | लेकिन – तब शायद इस अनुभव को कहानी का विषय बनाने का विचार भी स्वयं प्रकाश जी के मन में नहीं आता | किसी रूमानी आशावाद पर ख़त्म होने की जगह यह कहानी ‘निरर्थक ही था’ के पैरोकारों को सार्थकता के आयाम और उससे भी बढ़कर सार्थकता/निरर्थकता में बसे अर्थ की अर्थछवियाँ दिखाती है | घुप्प दिशाहीन अँधेरे अंत पर ख़तम कहानी में क्या आपको सिर्फ मजलूमों का पराभव और उदारवाद का अट्टहास दिखाई देता है ? मुझे तो ब्रैकेट का एक घुटना मोड सर झुकाए बैठे रहना याद आता है और ये समझ आता है कि अगर आधी सदी पहली की ऐब्सर्दिती आज भी असंगत- अप्रासंगिक नहीं है बल्कि नए अर्थ पा रही है तो सामने लिखी इबारत बहुत साफ़ है – आज भी लड़ने की जरूरत बरकरार है बल्कि पहले से कहीं ज्यादा |
इसी इक्कीसवीं सदी ने हमारी कुछ और परम्परागत धारणाओं को बदल दिया | परम्परागत मार्क्सवाद यही मानता आया था कि निम्नवर्ग के लोगों में वर्गचेतना का उदय न हो इसलिए सत्ताधारी वर्ग द्वारा साम्प्रदायिकता , जातिवाद जैसी मिथ्या चेतनाएं फैलाकर उनकी वर्गीय एकता को लामबंद होने से रोका जाता है | यह कुछ बने बनाए खांचों का निर्माण करता था, अभिजन वर्ग को नाभिनालबद्ध दिखाया जाता था, साम्प्रदायिक तनाव के पीछे वर्गीय हितों को चिह्नित किया जाता था और अक्सर कोई बाहरी शत्रु होता था जो हमारे गंगा-जमुनी ताने बाने को तहसनहस करता था | ( इसका सबसे प्रतिनिधि उदाहरण है असगर वजाहत की यों बहुत उम्दा कहानी – ‘सारी तालीमात’ ) अयोध्या चेतावनी लेकर आया और फिर गुजरात ने सब छिन्न भिन्न कर दिया | चुन चुन कर आर्थिक रूप से सक्षम- संपन्न अल्पसंख्यकों को निशाना बनाकर एक समुदाय को घुटनों पर आने को मजबूर किया गया | बाहर वाले नहीं, अपने ही पडौसी – हमेशा के सुखदुख के साथी- हमनिवाला , जान के दुश्मन बन गए | प्रगतिगामी शक्तियों को धीरे धीरे अहसास हुआ कि वर्गीय सवालों पर गोलबंदी करने मात्र से सांस्कृतिक सवाल हल नहीं होंगे, कि उन्होंने हमारी संस्कृति, हमारे राष्ट्रवाद में बसी गैरबराबरी, वर्चस्ववाद को आमतौर पर प्रश्नचिह्नित नहीं किया, प्रश्नचिह्नित करने लायक गौर ही नहीं किया, कि धर्मनिरपेक्ष जनशिक्षा और मूल्यों के विकास का महती काम उन्होंने यों ही छोड़ दिया था ( जिसे शिशु मंदिरों और विद्या निकेतनों ने हथिया लिया ) |
इसलिए रामसहाय जी, मैं ‘पार्टीशन’ को अपने समय से आगे की कहानी मानता हूँ और आप लाख कहें कि स्वयं प्रकाश उसी वैचारिक जमीन पर खड़े हैं जो सांस्कृतिक मुद्दों पर पृथक लड़ाई को ‘मूल सवाल’ से भटकाव मानती है, मैं तो यही कहूंगा कि पार्टीशन और इस जैसी अन्य कई कहानियों में रचनाकार स्वयं प्रकाश, चिन्तक स्वयं प्रकाश की सारी सीमाओं को लांघ गए हैं | यह यथार्थ की विजय है | पार्टीशन हिन्दी की पहली कहानी थी जिसने वक्त की आहट सुनकर खतरे की घंटी बजायी थी कि जिस ‘मौन बहुमत’ को हम सब अपने साथ मानते हैं, उसमें साम्प्रदायिकता के विषाणु किस तरह घुस गए हैं |
ठीक यही बात हम लैंगिक प्रश्नों पर स्वयं प्रकाश की कहानियों में आये मूलभूत अंतर में नोटिस कर सकते हैं | ‘अशोक और रेनू की असली कहानी’ लिखने वाले स्वयं प्रकाश ही ‘अगले जनम’ और ‘मंजू फालतू’ तक पहुंचे | ‘अशोक और रेनू की असली कहानी’ अशोक के परिप्रेक्ष्य से लिखी गयी थी | लेखक ने अंत में पूछा था, “अशोक क्या करेगा ? वह रेनू के माँ और दासी बन जाने पर छुट्टी पा लेगा ? या कुछ ऐसा करेगा, जिससे रेनू एक सार्थक जीवन की दिशा में प्रवृत्त हो सके ? तो क्या ऐसा....?”
और उसके बाद कहा था, “ यहीं से अशोक और रेनू की असली कहानी शुरू होती है |”
पर क्या वह कहानी शुरू हुई ? क्या अशोक एक सार्थक दिशा में रेनू के बढ़ते कदमों का हमकदम बना ? तो क्या ऐसा...तो क्या रेनू...ही मंजू फालतू नहीं बन गयी ?
ओके ! ओके ! आप बिलकुल सही हैं, मैं आपकी दोनों बातें मान रहा हूँ | एक, कि स्वयं प्रकाश ने अशोक को भावी पथप्रदर्शक के रूप में नहीं भावी हमकदम के रूप में ही दिखाया था, असली यात्रा-लड़ाई-जद्दोजहद रेनू की ही थी | दो , आपका यह कहना भी बिलकुल सही है कि स्वयं प्रकाश ने उस संकीर्ण अस्मितावाद का हमेशा विरोध किया है ( और सही ही किया है ) जो पहचान के सवालों को स्वानुभूति तक सीमित कर देना चाहता है | उन्होंने अलोकप्रिय होने , गलत समझे जाने का खतरा उठाकर भी इस प्रवृत्ति का हमेशा खुलकर विरोध किया | यह सही है कि ‘अशोक और रेनू की असली कहानी’ के साथ मैं और आप इसलिए तादात्म्य कर पाते थे क्योंकि वह हमें अपनी सुविधाजनक आपराधिक चुप्पी के लिए कचोटती और उसे बदलने के लिए ललकारती थी लेकिन इसका ये अर्थ कतई नहीं था कि स्वयं प्रकाश या आप या मैं रेनू की ओर से नहीं सोच सकते थे, उसके मन की थाह नहीं पा सकते थे | स्वयं प्रकाश ने हमेशा इस संकीर्ण अस्मितावाद का विरोध किया | लेखों में भी और कहानियों में भी | ‘अगले जनम’ और ‘नैनसी का धूड़ा’ जैसी कहानियां रचनात्मकता के सार्वभौम विस्तार का अमिट उदाहरण हैं |
तो फिर ? मैं जिस मूलभूत अंतर की ओर ध्यान दिला रहा हूँ वह मात्र पात्र या उवाच का नहीं है | ( ट्रीटमैंट बॉस ट्रीटमैंट ! ) बात सिर्फ इतनी सी है कि किसी शक्ति संरचना युक्त सम्बन्ध में दमित शोषित का आह्वान किया जाता है कि वो इस गैरबराबरी- शोषण को ख़तम करने के लिए एकजूट हो न कि प्रभुत्त्वशाली की अंतरात्मा को जगाया जाता है कि वह ‘कृपया’ इसे बदले | नहीं, नहीं, बडबडाना बंद कीजिये रामसहाय जी, अगर आपके और मेरे विचार यहाँ सिरे से अलग हैं तो रहें | और ये ‘एक गाडी के दो पहिये’ टाइप बातें अपने पास रखिये | इसी ‘दो पहिया सिद्धांत’ ने बरसों हमारे महान भारतीय परिवारों की गन्दगी को अदृश्य बनाने के लिए टाट के पैबंद का काम किया है | ओहो ! कौन बता रहा है पुरुष को स्त्री का विरोधी ? कम से कम स्वयं प्रकाश तो नहीं | चलिए, ‘अगले जनम’ के रवि को एकबारगी खलनायक मान भी लें तो भी- क्या ‘मंजू फालतू’ का नितिन खलनायक है ? मुझे तो बिलकुल नहीं लगता | साथ- साथ काम करते, एक दूसरे की रुचियों को जानते समझते विवाह करने वाले नौजवान, सादा सुरुचिपूर्ण विवाह, सहकार का जीवन, सुख-दुःख में हमेशा का संग- साथ | इसके बावजूद रेनू फालतू बन ही गयी ना | ओह सॉरी, मंजू !
अब बात निकली है तो मैं यहाँ वो बात भी कह दूं जो मेरी नज़र में स्वयं प्रकाश का सबसे बड़ा सातत्य है, यानी कितना भी बदल जाएँ पर जो उनमें, उनकी कहानियों में कभी नहीं बदला, कभी नहीं बदलेगा | उनकी कहानियां मध्यवर्ग, चलिए कहें – निम्नमध्यवर्ग से अपार प्रेम की कहानियां हैं | हे भगवान् ! क्या मैंने कोई कुफ्र कर दिया ? चलिए , इस बात को सिरे से पकड़ें |
यह तो हम सभी जानते हैं कि स्वयं प्रकाश की कहानियां वाचिक परम्परा की कहानियां हैं | उनकी ढेरों कहानियों में पाठक की उपस्थिति को प्रत्यक्ष बनाते हुए लेखक द्वारा कभी पाठक से सवाल किया जाता है, कभी उससे हुंकारा भरवाया जाता है, कभी कभी तो उसे लताड़ा भी जाता है | मेरा कहना यह है कि यह इतना स्वाभाविक रूप से इसलिए हो पाता है क्योंकि वह कहानी अमूमन उसी पाठक की कहानी होती है | यानी वो पात्र जिसकी दशा और दिशा पर पाठक से राय माँगी जा रही होती है, वह पात्र पाठक स्वयं ही होता है | इसे पाठक जानता है और स्वयं प्रकाश – जाहिर है, ये जानते होते हैं कि पाठक जान रहा है ! क्योंकि उनकी कहानियों के नायक विशिष्ट नहीं होते हैं – न अच्छाई में, न बुराई में |  वे हमारे विशाल मध्यवर्ग के बेचेहरा लोग हैं | क्योंकि वे अपने पात्र की कमतरी पर उंगली रखने के बावजूद उससे घृणा नहीं करते, न उसके ‘कालिख भरे कारनामों’ को उजागर करने का महान कृत्य करके उसे धरती पर बोझ साबित करते हैं | क्योंकि काला स्याह पात्र रचना आसान है पर उसे पढ़कर पाठक ‘ऐसा भी होता है’ की हैरानगी भर व्यक्त करेगा,खुद को बेचैन करने वाले साधारणीकरण से नहीं गुजरेगा | क्योंकि वे अकेले ऐसे कथाकार हैं जो छाती ठोककर कहते हैं कि उन्होंने वास्तविक लोगों को अपनी कहानियों का पात्र बनाया और कभी कोई उनसे नाराज़ नहीं हुआ | क्योंकि कहानियों में वास्तविक पात्रों (अक्सर समकालीन लेखकों ) को लाकर उनसे उट्ठक बैठक करवाकर या उनपर मनचाहे ढंग से कीचड पोतकर अपनी कहानी में स्कोर सैटल करने वाले कुंठित कथाकारों की भीड़ में वे अकेले हैं | क्योंकि उदात्तता बड़ी रचना का प्राण है |
( बाई गाॅड ! आपसे सच सच कहता हूँ – ‘नीलकांत का सफ़र’ का नीलकांत मैं हूँ | क्या कहा ? ‘संधान’ के विश्वमोहन जी आप हैं ? खूब ! )
भलेई मैंने तय किया था कि मैं इस चिट्ठी/भूमिका में कोई उद्धरण नहीं दूंगा ( भला आपके मेरे बीच उद्धरणों का क्या काम ) पर मैं यहाँ स्वयं प्रकाश जी के एक वक्तव्य को उद्धृत करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ , “रचना अपने पाठकों को सामाजिक क्रान्ति के लिए मानसिक रूप से तैयार करती है | उनके मनोविज्ञान को समझते हुए और बदलने के लिए उन्हें पूरा मौक़ा और समय देते हुए | हम रचना में सामंती- पूंजीवादी मूल्यों का मज़ाक उड़ायेंगे.... अपने और पाठक के संस्कारों में घुसे बैठे साम्प्रदायिकता, कामचोरी, फीटीशिज़्म, मेल शाॅविनिज्म, अवसरवादिता वगैरह के चोरों पर से पर्दा हटाकर उन्हें मारते- मारते रोशनी में लाकर खडा कर देंगे और हताशा की अमानवीय दलदल में धड तक धंसे हुए जन को यह जंचाते रहेंगे कि आखिर जीत उन्हीं की यानी अपनी ही है | हम उसे न आदर्शवाद की खाई में गिरने देंगे, न सुविधाजीविता की काई में रपटने देंगे | उसके घुटनों को, पिंडलियों को, रगपुट्ठों को ( और साथ ही अपने भी ) साबुत- सलामत रखना और मजबूत बनाना, टिकने न देना आज की रचना का सबसे बड़ा और शायद एकमात्र दायित्त्व है |”
यह वक्तव्य १९८२ का है | तब से अब में झेलम में कितना पानी बह गया | रूमानी आशावाद गए जमाने की बात हो गया, भैराराम अपने मन में बसे अन्धकार से तो मुक्त हो गया था पर उस पुराने साहूकार से कहीं ज्यादा क्रूर इस आधुनिक राज्य ने उसे मामा सोन के साथ जिस गहन अंधकारा में धकेल दिया उसका पारावार न था | उदारीकरण ने उस पुराने पूंजीपति शत्रु का चेहरा ही धुंधला कर दिया जिसके खिलाफ दुनिया के मजदूरों को एक होना था | सूरज के निकलने का इंतज़ार – और इंतज़ार – प्रतीक्षा और प्रतीक्षा | सब कुछ बदला पर इस परिवर्तनशील समय में अगर कुछ नहीं बदला तो वो थी मनुष्य की अदम्य जिजीविषा | इसी मनुष्य का जयगान स्वयं प्रकाश की कहानियों में है |
और अब अंत में मैं आपके यक्ष प्रश्न से रूबरू होता हूँ यानी कि लिटमस टेस्ट | स्वयं प्रकाश की सब कहानियों में मुझे जो सबसे–ज्यादा-पसंद है वो है - ... ‘नीलकांत – का – सफ़र’ | समय बदलता है, बदलता रहेगा | नवीन जटिल जीवन परिस्थितियों में पुरानी कहानियां सरल नीति कथाएँ लगाने लग जायेंगी | थर्ड क्लास का डिब्बा तो पहले ही ख़त्म हो चुका, शायद कल तकनीक के विकास के साथ साथ गैंती- फावड़े भी किताबों के चित्र भर रह जायेंगे | लेकिन जो नहीं बदलेगा वो है सर्वहारा की मुक्ति में हम सबकी मुक्ति | अगर मगर यदि किन्तु परन्तु में फंसे हम सब को इस सफ़र से गुजरना होगा और उसकी तलाश रहेगी जो हमारी इस यात्रा में खिड़कियाँ खोले | नहीं, यह किसी मसीहा की तलाश नहीं है, यह तो ‘उसकी’ और अपनी लड़ाई को एक समझने की पहचान है | आपको तो पता है रामसहाय जी, मैंने इस कहानी का चार बार सार्वजनिक पाठ प्रदर्शन किया है – जे.एन.यू., देशबंधु कॉलेज, चित्तोडगढ़ और उदयपुर ( ओह ! आपको तो मेरी भीतरी कसक भी पता है ना | सबसे खराब पाठ मैंने तब किया जब स्वयं प्रकाश जी सामने बैठे थे – चित्तौड़ में | हद तो यह कि बीच में एक बार तो अगली लाइन भूल ही गया और गैलसफा सा आयं बायं झाँकने लगा | क्या सोचा होगा उन्होंने ! ) दिल्ली के युवा विद्यार्थियों से लेकर कस्बों के वकीलों- दुकानदारों- मिस्त्रियों तक सबको एक समान रूप से आनंद आया तो इसलिए क्योंकि अपनी तमाम भिन्नताओं- विशिष्टताओं के बावजूद हम इस विशाल देश के विशाल जनसमूह का हिस्सा हैं और उसके साथ एकाकार होकर ही हम इस भूमंडल में अपनी आवाज़ को सुनवा सकते हैं |
नीलकांत का सफ़र जन में आस्था की कहानी है | ऐसी कहानियां कभी पुरानी नहीं पड़तीं | इस संग्रह का प्रारम्भ भी इसी से हो रहा है | इससे शुरू करने पर स्वयं प्रकाश की चिंताएं, उनके सरोकार, उनका ध्येय यानी कि ‘स्वयं प्रकाश का सफ़र’ आसानी से समझ आता है | शुरू कीजिये, देखिये खिड़की खुल गयी है | ‘थोड़ी देर में ये लोग कोई गीत शुरू कर देंगे | उदासियाँ दूर भाग जायेंगी |’
आपका
हिमांशु






[1]  रामसहाय जी स्वयं प्रकाश के पुराने पाठक हैं | उन्हें इस बात का बड़ा फक्र है कि स्वयं प्रकाश जी की उनसे खतोखिताबत होती रहती है | न हो तो चकमक के पुराने अंक उठाकर देख लीजिए | रामसहाय जी ने स्वयं प्रकाश की सारी कहानियां भी पढ़ रखी हैं और अमूमन उनके बारे में लिखी गयी आलोचना भी | इसके कारण हुआ यह है कि कई आलोचकों के विचार रामसहाय जी के विचार के साथ घुल-मिल गए हैं | यह भूमिका रामसहाय जी से बातचीत के दौरान ही लिखी गयी |

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (15-01-2017) को "कुछ तो करें हम भी" (चर्चा अंक-2580) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
मकर संक्रान्ति की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

HindIndia ने कहा…

बहुत ही अच्छा आर्टिकल है। Very nice .... Thanks for this!! :) :)

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

फेसबुक से आये साथी

 
Copyright (c) 2010 असुविधा.... and Powered by Blogger.