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रविवार, 21 दिसंबर 2008

मैं चाहता हूँ

मैं चाहता हूं
एक दिन आओ तुम इस तरह कि जैसे
यूं ही आ जाती है ओस की बूंद
किसी उदास पीले पत्ते पर
और थिरकती रहती है देर तक





मैं चाहता हूं
एक दिन आओ तुम
जैसे यूं ही किसी सुबह की पहली अंगड़ाइ के साथ
होठों पर आ जाता है
वर्षों पहले सुना कोई सादा सा गीत
और देर तक चिपका रहता है
पहले चुम्बन के स्वाद सा




मैं चाहता हूं
एक दिन यूं ही पुकारो तुम मेरा नाम
जैसे शब्दों से खेलते-खेलते
कोई बच्चा रच देता है पहली कविता
और फिर गुनगुनाता रहता है बेखयाली में





मैं चाहता हूं
यूं ही किसी दिन ढूंढते हुए कुछ और
तुम ढूंढ लो मेरे कोई पुराना सा ख़त
और उदास होने से पहले देर तक मुस्कराती रहो





मै चाहता हूँ
यूँ ही कभी आ बैठो तुम
उस पुराने रेस्तरां की पुरानी वाली सीट पर
और सिर्फ एक काफी मंगाकर
दोनों हाथों से पियो बारी बारी





मैं चाहता हूँ
इस तेजी से भागती समय की गाड़ी के लिए
कुछ मासूम से कस्बाई स्टेशन

20 comments:

DREAM ने कहा…

main chahta hun main padhta rahun aapki ye kavita bar bar , jo mujhe le jaaye bhooli yaadon ke dwar aur main doob jaun un yaadon mein aur kuch der ke liye bhool jaaon apne aapko.

yogesh swapn

प्रशांत मलिक ने कहा…

मैं चाहता हूं यूं ही किसी दिन ढूंढते हुए कुछ और तुम ढूंढ लो मेरे कोई पुराना सा ख़त और उदास होने से पहले देर तक मुस्कराती रहो

badhiya likha hai

संगीता पुरी ने कहा…

सुंदर चाहतें लिए बहुत अच्‍छी रचना...बधाई।

शोभा ने कहा…

मैं चाहता हूं

एक दिन आओ तुम इस तरह कि जैसे

यूं ही आ जाती है ओस की बूंद

किसी उदास पीले पत्ते पर

और थिरकती रहती है देर तक
बहुत भावभरी अभिव्यक्ति।

बेनामी ने कहा…

its very good..keep it up...keep writing
असीम नाथ त्रिपाठी

seema gupta ने कहा…

एक दिन यूं ही पुकारो तुम मेरा नाम

जैसे शब्दों से खेलते-खेलते

कोई बच्चा रच देता है पहली कविता
'दिल को भा गयी ये पंक्तियाँ वाह "

regards

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

bhaiya , is baar kamal kiya hai .. poori kavita mein kuch beete palo ka ehsaas hai ..

pad kar maza aa gaya .

badhai ..

vijay
Please visit my blog : http://poemsofvijay.blogspot.com/ for some new poems .

रश्मि प्रभा ने कहा…

bahut hi achhi rachna hai,
aapki chah ka har rup aakarshit karta hai.......badhaai ho

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

शुक्रिया दोस्तो।
मैने बहुत कम प्रेम कविताये लिखी हैं ,यह उन्मे से एक है…साक्षात्कार मे आयी थी। आप सबने पसन्द की तो विश्वास बढा।

bahadur patel ने कहा…

ashok bhai,
kya badhiya kavita hai.padhkar maza aa gaya.
kya prem kavita hai, main chahata hoon aur bhi prem kavitayen apako likhani chahiye.
varshon pahale suna koi sada geet. bilakul usi ki tarah ka jise ham yaad kar rahe hain. bilakul sade wala visheshan bahut prabhavi hai.
sadagi hi hame apani aur khinchati hai jaise is kavita ki sadagi.phir usapar bhi kya yaad kiya hai apane ki pahale chumban ka swad.
bhai pahale chumban ka swad aaj bhi hame bhitar tak lahuluhan kar deta hai. aur us lahu ka lal rang hame jivan me ek sachchi rah dikhata chalata hai.
bahut badhai mere bhai.
aur likho...........likhate raho...

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

बहादुर भाई
धन्यवाद यार मै तुम्हारी टिप्पणी का इन्तज़ार कर रहा था…डर भी रहा था। पर तुमने तो ना केवल हिम्मत बढा दी बल्कि वो दिन याद दिला दिये जब हम गले तक प्यार मे डूबे थे।

सुशील कुमार ने कहा…

सच कहते हैं,प्रेम ही विद्रोह की जननी है। अशोक कुमार पाण्डेय के अक्ख्ड़, सामंत-विरोधी जनवादी तेवर को देखकर मैं सपने में भी नहीं सोच सकता था कि मन के किसी कोने उनमें प्रेम की हिलोरें भी उठती रही है और वह अवसर पाकर अभिव्यक्त भी हो सकती हैं। यह मुझे श्रेष्ठ प्रम-कविताओं में से एक लगता है। प्रतीत होता है,जीवन के उबड़-खाबड़,टीले-टप्पर-पत्थर भरे रास्ते से गुज़रते हुये जीवन के अंतर्द्वंद्व और संधर्ष के बीच एक बेहद खूबसूरत-कोमल और हृदय को ताजा़,नूतन भाव से भरने वाला अनुभव भी अशोक जी के पास है जहाँ क्षणभर ठहरकर वे अपनी आत्मा को विश्राम देना चाहते हैं। एक खिड़की खुली है प्रेम की, उनकी समय की कठिनता के बीच बेज़ार होती जिन्दगी में,जो जीवन को शिद्दत से जीने का संकेत देता है। यहाँ न अभिव्यक्ति का फूहड़पन है,न आलिंगन-मिलन की बेचैनी। बस है तो सिर्फ़ यह कि अशोक का कवि अपनी धूल-धक्क्कड़ भरी इस रेत के दयार में एक फूल उगाना चाहता है।

प्रस्तुत कविता में इन्द्रिय-बोध इतना प्रखर, और भाषिक संरचना इतनी सरल-तरल बन पडे हैं कि वे कविता की अंतर्वस्तु को पाठक के अंतस में गहरे धँसाकर कविता को न सिर्फ़ संप्रेषणीय बनाने में सक्षम है,अपितु प्रेम के भाव-जगत की सृष्टि में काफी हद तक सफल भी हुआ है।- सुशील कुमार,दुमका(झारखंड) से।

सुशील कुमार ने कहा…

हाँ,एक बात छूट गयी थी, वह कि इस कविता प्रयुक्त बिम्ब-विधान। आजकल सपाटबयानी के शगल में लिखी कविताओं में अलंकार और छंद-योजना की तरह बिम्ब-योजना को भी बिना गहराई से विचार किये प्राय: उपेक्षा की जाती है और कविता में प्रयुक्त बिम्बों को एक तरह से पिछड़ेपन की निशानी माने जाने लगी है,परंतु यह विचार कविताघाती है। इससे कविता का भला नहीं होगा। यहाँ अशोक की कविता को देखिये। कविता में बिम्ब ही कविता के वस्तु और रूप दोनों का साक्षात्कार करा रहे हैं,जैसे पीले पत्ते पर ओस की थिरकती बूँदें, ...बूँद भी स्थिर नहीं... हिलती हुई। पुराना सा खत का देखना ,रेस्तराँ की पुरानी सीट पर बैठ चाय पीना ,कस्बाई स्टेशन का भागती गाड़ी से विहंगावलोकन इत्यादि बिम्ब कवि की आत्मगत भाव को वस्तुगत करने में कितने सहाय्य हुये हैं!।इसलिये मैं बार-बार कहता रहा हूँ कि बिम्ब-योजना कविता की प्राण है। पर अगर कवि का लक्ष्य स्पष्ट न हो तो चित्रात्मकता हर बार अंतर्वस्तु का प्रकटीकरण नहीं कर पाती, क्योंकि वह बिम्ब का रुपाकार नहीं ले पाती। नतीजा, कोरी वाग्विदग्धता का शिकार हो जाती है। इससे कविता का अनिष्ट होता है। नि:संदेह अशोक की यह प्रेम -कविता भी बिम्ब -प्रयोग का अन्यतम उदाहरण बन सकता है।

पुरुषोत्तम कुमार ने कहा…

यह कविता तो बहुत अच्छी है भई।

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

sunder bhavabhivyakti ke liye badhai...

Abhishek ने कहा…

एक दिन यूं ही पुकारो तुम मेरा नाम
जैसे शब्दों से खेलते-खेलते
कोई बच्चा रच देता है पहली कविता
और फिर गुनगुनाता रहता है बेखयाली में
मैं चाहता हूं
dil ko chu gayin panktiyan aapki. Aabhar aur Swagat.

rahul kumar ने कहा…

bahut saari puraani yaden taja kar di hain aapki kavita ne.. bahut pyaara ahsaas hain

बेनामी ने कहा…

beautiful....कुछ मासूम से कस्बाई स्टेशन....wah kya baat hai!!!

neera ने कहा…

वाह! क्या प्रेम है, क्या भाव है, क्या कविता है!
ऐसी कविता पढ़ने को अक्सर आयेंगे भागकर आपके ब्लॉग पर ...

प्रदीप कांत ने कहा…

मैं चाहता हूं
एक दिन आओ तुम इस तरह कि जैसे
यूं ही आ जाती है ओस की बूंद
किसी उदास पीले पत्ते पर
और थिरकती रहती है देर तक

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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