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रविवार, 18 जनवरी 2009

मत करना विश्वास




मत करना विश्वास
अगर रात के मायावी अन्धकार में
उत्तेजना से थरथराते होठों से
किसी जादुई भाषा में कहूं
सिर्फ़ तुम्हारा हूँ मैं

मत करना विश्वास
अगर सफलता के श्रेष्ठतम पुरस्कार को
फूलों की तरह गूँथते हुए तुम्हारे जूडे मे
उत्साह से लडखडाती हुई भाषा में कहूं
सब तुम्हारा ही तो है!

मत करना विश्वास
अगर लौट कर किसी लम्बी यात्रा से
बेतहाशा चूमते हुए तुम्हे
एक परिचित सी भाषा में कहूं
सिर्फ़ तुम आती रही स्वप्न में हर रात
हालांकि सच है यह
कि विश्वास ही तो था वह तिनका
जिसके सहारे पार किए हमने
दुःख और अभावों के अनंत महासागर
लेकिन फ़िर भी पूछती रहना गाहे बगाहे
किसका फ़ोन था कि मुस्करा रहे थे इस क़दर ?
पलटती रहना यूं ही कभी कभार मेरी पासबुक
करती रहना दाल में नमक जितना अविश्वास!

हंसो मत
ज़रूरी है यह
विश्वास करो
तुम्हे खोना नही चाहता मैं

27 comments:

राजीव रंजन प्रसाद ने कहा…

बेहद नाजुक संबंध पर बेहद प्रभावी कविता। शायद इस विषय पर मेरी पढी उन कविताओं में से एक जो भुलायी नहीं जा सकती।

अनिल कान्त : ने कहा…

अशोक जी बहुत अच्छी रचना लगी मुझे ... मत करना विश्वास ...सही कहा आपने ....सहमत हूँ मैं

shyam kori 'uday' ने कहा…

एक परिचित सी भाषा में कहूं
सिर्फ़ तुम आती रही स्वप्न में हर रात
... कुछ अलग व प्रभावशाली है।

Bahadur Patel ने कहा…

ashok bhai bahut badhiya kavita hai.

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा भाव!! बेहतरीन.

बेनामी ने कहा…

bhaiyya ,

is baar to gazab kar diya aapne .. jabardasht poem , mera salaam kabul karo yaar... kya gahrai hai .. wah ji wah ...

maza aa gaya .... do baar pad chuka hoon ...

kudos dear

vijay kumar sapatti

(mail par prapt)

Arvind Mishra ने कहा…

adbhut bhav , sachhe abhivyakti !1 isliye hee kabhee shresth kavitaaon ke vashtigat bhaav maanon samshti ke swar ban jate hain !

सुशील कुमार ने कहा…

अपने चरित्र के पूरे खुलेपन के साथ अशोक का कवि अपनी प्रेयसी के विश्वास को अर्जित करता है इस कविता में अविश्वास का विश्वास के अंतर्द्वंद्व के साथ। यही प्रेम के भरतीय चित्त लक्षण है जो उनकी इस कविता में अनुभव में समाया है। यह प्रेम की उन रागालाप करती कविताओं से अलग और विलक्षण है जिसे देखकर लगता है कि प्रेम कविताओं में अगर आत्मबद्धता कपूर की तरह उड़कर वह प्रेम की सच्ची अभिव्यक्ति बन जाये तो वह पाठकों को प्रभावित किये बिना नही रह सकती।

आशेन्द्र सिंह ने कहा…

ati sudho saneh ko marag hai , yaha sayan pan bank nahi tum koun si pati padhe ho lalaa man leo ,dehu chatank nahi...bahut hi saral or hraday sparshee bayangee hai . badhai

neera ने कहा…

Wow! gazab ki kavita!

Krishna Patel ने कहा…

bahut achchha likha apne.

jayram ने कहा…

kawita pasand aayi .........

'Yuva' ने कहा…

Bahut sundar...!!
___________________________________
युवा शक्ति को समर्पित ब्लॉग http://yuva-jagat.blogspot.com/ पर आयें और देखें कि BHU में गुरुओं के चरण छूने पर क्यों प्रतिबन्ध लगा दिया गया है...आपकी इस बारे में क्या राय है ??

कुमार मुकुल/ अरूणा राय ने कहा…

are yaar aap bahut accha likhte hain

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

शुक्रिया दोस्तों

आप सबका उत्साह सँवर्धन मेरा प्रेरणास्रोत बनेगा।

naveen ने कहा…

bahut hi badhiya bhaisahab ,kamaal likha hai. punah bahut umda

saloni ने कहा…

aapki kavita lajawab hai.

Nirmla Kapila ने कहा…

pehli baar apke blog ko dekha hai bahut sunder abhivyakti hai

MARKANDEY RAI ने कहा…

mera comment swikar kare naya bloggy hoon

MARKANDEY RAI ने कहा…

i want to know more about blogging what can do.

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

नवीन जी, सलोनी जी,निर्मला जी तथा मार्कण्डेय जी आप सबका आभार।

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

kya baat hai....! bahut bahut bahut khoob....! naveenata..! bhavparavanata...! man ko chhoo gai...!

rahul kumar ने कहा…

sach kahu to mere paas shabd nhi hain aapki rachna ko dene ke liye ......

rahul kumar ने कहा…

shabd nhi hai,, kuch kanhe ho,, bahut khoob......

साहिल ने कहा…

gulab ki tarah nazuk,
usi ki tarah sugandhit hai,
sochta hoon apne rishte me bhi
kuchh kante hote to achha hota.

aapki rachna padhkar ruk nahin saka ye panktiyan likhne se.

vijay gaur/विजय गौड़ ने कहा…

apne par yakeen karo bhai ashok
jadui bhasha me nahi hakikat me pukaro wah naam jise vishvash dilana chahte ho.
achchhi hai.

पारूल ने कहा…

bahut acchey..

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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