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मंगलवार, 12 मई 2009

आजकल

आजकल
कहाँ कर पाता हूँ
कुछ भी ठीक से

जुलूस में होता हूँ
तो किसी पुराने दोस्त सी
पीठ पर धौल जमा
निकल जाती है कविता

कविता लिखते समय
किसी झगडालू पडोसी सी
चीखती हैं
अख़बार की कतरने

डूबता हूँ अख़बार में
तो किसी मुंहलगी बहन सी
छेडने लगती है कहानी

कहानियों के बीच से
अपना ही कोई पात्र
खींच ले जाता जुलूस में


आजकल
कहाँ कर पाता हूँ
कुछ भी ठीक से…

27 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

सुंदर कविता।

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

गलत

यह लत का प्रकोप है

जो नेट की जल रही ज्‍योत है

यह सब ठीक से न सही

पर बाकी सब तो ठीक है

टिप्‍पणियां मिल रही हैं बदस्‍तूर

पसंद क्लिका दी है हजूर

इतना तो हो रहा है ठीक से

बेनामी ने कहा…

kya baat hai ashok ji ,, padhkar to ek naya hi andaaz mila mujhe aapka ..
waah aapne to saari vidhao ka istemaal kar diya hai ji , aur kya behtar kiya hai ji ..

dil se badhai ho
vijay kumar sapatti

neeshoo ने कहा…

वास्तविक रचना बहुत ही जबरदस्त रची है आपने । सशक्त प्रस्तुति के लिए बधाई

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

अविनाश जी
टिप्पणी ले लिये धन्यवाद।
लेकिन रचना का उद्देश्य सिर्फ़ टिप्पणी या चर्चा बटोरना तो नहीं हो सकता ना भाई!

बेनामी ने कहा…

हां एक उधेडबुन अभिव्‍यक्‍त हुयी है इस कविता में , ठीक है
कुमार मुकुल

Shikha .. ( शिखा... ) ने कहा…

Bahot Bahot Khoob...
Bahot achhi lagi aapki rachna..

neera ने कहा…

भीतर और आसपास का हाल कितनी सहजता और सुन्दरता से अभिव्यक्त किया है कविता के माध्यम से...
आजकल
कहाँ कर पाता हूँ
कुछ भी ठीक से

'उदय' ने कहा…

... sundar rachanaa !!!

Udan Tashtari ने कहा…

उहापोह को बहुत ही जीवंत चित्रण..बेहतरीन रचना.

Uday Prakash ने कहा…

''डूबता हूँ अख़बार में
तो किसी मुंहलगी बहन सी
छेडने लगती है कहानी

कहानियों के बीच से
अपना ही कोई पात्र
खींच ले जाता जुलूस में

आजकल
कहाँ कर पाता हूँ
कुछ भी ठीक से…''
यही वे पंक्तियां हैं जो रचना के भाषिक-पाठ को जीवन और समाज के वृहत्तर यथार्थ से जोड़ती हैं और जो यह संकेत भी देती हैं कि कविता सिर्फ़ शब्दों का प्रचलित कौतुक और बाज़ीगरी ही नहीं है. धूमिल के शब्दों में :यह आदमी के जीवन की पूरी खुराक़ मांगती है.
मई दिवस के आयोजन की रिपोर्ट भी मिली थी.
धन्यवाद !

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

ठीक कहते हैं....आजकल कोई काम ठीक से कहाँ हो पाता है....

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

ashok ji
kya khoob likha hai . hum sab bus aise hi hote jaa rahe hai ... machini maanav bane hue hai .. aapne man ke bheetari dwandh ko acche se darshaya hai


meri badhai sweekar karen..

vijay

सुभाष नीरव ने कहा…

Bahut sunder kavita hai, Ashok ji. Badhayee !

शरद कोकास ने कहा…

"किसी पुराने दोस्त सी पीठ पर धौल जमा निकल जाती है कविता.
"
सम्कालीन कविता के शिल्प में बहुत अच्छी पंक्तियँ हैं भाई
मैने बहुत पहले अपनी एक कविता मे ऐसा ही बिम्ब लिया था"गरम तवे पर छन्न सी बून्द सी उड जाती है कविता" ऐसा ही कुछ... बधाई.भैया पत्रिकाओं में भी कविता भेजो.अभी नेट के कवि ऐसे ही समझे जाते हैं

शरद कोकास

साहिल ने कहा…

yatharth ki kavita. badhai.

साहिल ने कहा…

yatharth ki kavita. badhai.

बेनामी ने कहा…

sundar kavita ek sahas such kahne ka

ek nivedan

aaj ke yuwa ki dagmgati soch pr ager kuch likhe to plz send me

fazalsathiya@gmail.com

sandhyagupta ने कहा…

Bhasha ho,bimb ho ya vishay-vastu har dristi se anuthi kavita.Badhai.

गौतम राजरिशी ने कहा…

मुक्त-छंद के नाम पर जो कुछ भी आजकल परोसा जा रहा, आप उन सबसे भिन्न हो।
एकदम अनूठी कविता, सर।
सही मायने में तारीफ़ भी नहीं कर पा रहा मैं तो।

आपकी रचनाओं को देर से जाना...शुक्र है जान गया..

बोधिसत्व ने कहा…

कितना अच्छा तो कर रहे हैं भाई....

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत बढिया रचना। बधाई।

प्रदीप कांत ने कहा…

बेहतरीन कविता

Bahadur Patel ने कहा…

जुलूस में होता हूँ
तो किसी पुराने दोस्त सी
पीठ पर धौल जमा
निकल जाती है कविता
chhoti si kavita hai par prabhavi.
bahut gahare yatharth bodh ke sath in panktiyon me manaviy rishton se khatm hoti sanvedansheelata ko ek roopak ke roop me umda pakada hai.ab dekho pahala hissa aur antim hissa to kavita ka prarambh aur ant ke liye hai lekin kavita ki taqat ko dekho. jis hisse ko maine upar code kiya hai usase yah hissa kaishe dvndv paida karata hai aur kavita ko vyapak aur mahatvpurn banata hai.
कहानियों के बीच से
अपना ही कोई पात्र
खींच ले जाता जुलूस में
ab ham dekhen ki kavita ki taqat kaise badhati hai.
uday prkashji ne mahatvpurn tippani ki hai.
ashok bhai bahut bahut badhai.

प्रभात रंजन ने कहा…

आप कविता बहुत अछ लिखते हैं अशोक भाई. भाव भी और भाषा भी. सबसे बढ़कर कविताई.

त्रिपुरारि कुमार शर्मा ने कहा…

अपनी भी यही हालत है अशोक जी...कहाँ कर पाता हूँ कुछ भी ठीक से...बहुत पसंद आई कविता !

अरुण देव ने कहा…

'छेडने लगती है कहानी' isse behtar aur ky ho skta hai. jab jeevan hi kavita ban jaye-- kavi ki sambhavnaye badh jatai hain. bdhiyan.. smavrtan ki kavitaon ki prtiksha hai.

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