वे

(दोस्तों ने कहानी का एहतराम तो किया पर साथ ही इसरार भी कि इस ब्लाग को कविता के लिये ही आरक्षित रखा जाय…तो अब कवितायें ही रहेंगी यहां…लीजिये प्रस्तुत है कोई दस साल पहले लिखी यह कविता जो बाद में साखी मे छपी)

वे
सबसे ऊंची आवाज़ में
नारे लगाकर भर देते हैं
सबसे ज्यादा खालीपन
सबसे दहकते लहू में
भर देते हैं बर्फ का ठंढापन

वे
समझौते के ख़िलाफ़
बोलते हुए कर देते हैं
सबकुछ समर्पित

मांग लाते हैं
हड्डियां दधीचि से
और ड्राईंगरूम में
सजाकर रख देते हैं वज्र

वे
ख़तरा टल जाने पर
एकान्त टापू से निकल
करते हैं सावधान

सबसे क्रांतिकारी
सिद्धांतों का परचम लिये
सबसे महफ़ूज़ जगहों पर
लगाते हैं पोस्टर

और इस तरह
धीरे-धीरे
वे बदल देते हैं वह सब
जो नहीं बदलना चाहिये

टिप्पणियाँ

बदलना सब कुछ चाहिए
दल भी और दलदल भी
नहीं तो धंस नहीं जायेंगे
वे होशियार हैं जानते हैं
रंगे सियार हैं, फिर भी
पहचाने जाते हैं .. वे।
बात को संप्रेषित करती अच्छी कविता। मोहन राकेश का नाटक आषाढ़ का एक दिन याद आया रचना पढ़ कर।
neera ने कहा…
कविता सहजता से आँखों के आगे से परदे हटाती है और जो नहीं बदलना चाहिए उसको बदला देख कर आखें मुंदने को कहती है...
बाप रे, दस साल पहले की लिखी और अभी भी उतनी ही सामयिक!

"मांग लाते हैं / हड्डियां दधीचि से
और ड्राईंगरूम में / सजाकर रख देते हैं वज्र" कुछ अजीब ढ़ंग से छुआ है इन पंक्तियों ने...
सागर ने कहा…
धन्य हुआ जनाब... क्या बातें कहीं है... सत्य को लक्ष्य कर कई सारे परतें उधेड़ कर रख दी... मैं कल ही इस ब्लॉग मैं शामिल हुआ... और आज आनंदित... बेहतरीन कविता... प्रकाशनार्थ तो है ही विशेषकर

सबसे ऊंची आवाज़ में
नारे लगाकर भर देते हैं
सबसे ज्यादा खालीपन
सबसे दहकते लहू में
भर देते हैं बर्फ का ठंढापन

और


सबसे क्रांतिकारी
सिद्धांतों का परचम लिये
सबसे महफ़ूज़ जगहों पर
लगाते हैं पोस्टर

... अव्वल दर्जे की उम्दा पोस्ट...
डॉ .अनुराग ने कहा…
सबसे क्रांतिकारी
सिद्धांतों का परचम लिये
सबसे महफ़ूज़ जगहों पर
लगाते हैं पोस्टर

और इस तरह
धीरे-धीरे
वे बदल देते हैं वह सब
जो नहीं बदलना चाहिये





सटीक !
सामयिक आज भी उतना ही लितना १० साल पहले था ..... धमाकेदार लिखा है ........ हालत और समाज का आइना है आपकी कविता ..........
ओम आर्य ने कहा…
यह एक बेहद संजीदा कविता है और मैं प्रतिक्रिया देते हुए उतना हीं संजीदा हूँ जितना कि कविता
anupam mishra ने कहा…
अब अक्समात ही सबकुछ समझ नहीं आता,वे बदलने की कोशिश करते हैं फिर भी बदला नहीं जाता, नियति ये है कि वे, वे हैं, और हम हैं कि हम....
बेहतरीन टिप्पणी

"वे"
दरअसल वे होने के लिये ही तो जरूरत पड़ती है नारों, पोस्टरों और वज्र की।
प्रदीप कांत ने कहा…
सबसे क्रांतिकारी
सिद्धांतों का परचम लिये
सबसे महफ़ूज़ जगहों पर
लगाते हैं पोस्टर

और इस तरह
धीरे-धीरे
वे बदल देते हैं वह सब
जो नहीं बदलना चाहिये

१० साल पहले जितना था उतना ही सामयिक आज भी...
शरद कोकास ने कहा…
अगर तुम न भी बताते तो यह अपने शिल्प की वज़ह से जानी जाती कि दस वर्ष पूर्व की कविता है। अब तुम्हारा डिक्शन बदल गया है । यह कविता सीधे सीधे कोंचने वाली कविता है । बुर्जुआ मानसिकता अभी भी बदली नही है और यह नित नये नये रूप मे सामने आ रही है । प्रतिमान बदल जाने से कई बार यह धोखा होता है कि कुछ बदल रहा है लेकिन यथार्थ अपरिवर्तित है । अपने शिल्प मे अपने समय की यह अच्छी कविता है जो आज भी प्रसंगिक है । कभी कभी लगता है कि प्रहार की भाषा यही होनी चाहैये ।जैसे कि कभी जनगीतों मे होती थी ।

यह विचार ठीक है कि इस ब्लॉग को कविता के लिये रखा जाये । मैने भी ब्लॉग शरद कोकास को कविता के लिये सुरक्षित( या आरक्षित) कर दिया है ।
Harkirat Haqeer ने कहा…
वे
सबसे ऊंची आवाज़ में
नारे लगाकर भर देते हैं
सबसे ज्यादा खालीपन
सबसे दहकते लहू में
भर देते हैं बर्फ का ठंढापन

सुभानाल्लाह.....दस साल पहले लिखी कविता आज भी यूँ ही धधक रही है .....!!
अनिल कान्त : ने कहा…
बेहद सटीक कविता
दस साल पहले भी और आज भी एकदम चुस्त दुरुस्त है ये कविता
Pradeep Jilwane ने कहा…
बधाई अशोकजी बधाई ढेर सारी बधाई...
छोटी-छोटी किंतु बहुत धारदार और असरदार कविताएं हैं.
- प्रदीप जिलवाने, खरगोन

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