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बुधवार, 17 मार्च 2010

हत्यारे




(एक)

हत्यारा
अब नहीं रहा
रात के अंधेरों का मुहताज

मुक्त अर्थव्यवस्था के
पंचसितारा सैलून में
सजसंवर कर
निःसंकोच घूमता है
न्याय की दुकानो से
सत्ता के गलियारों तक

नये चलन के बरअक्स
पहन लिए हैं
त्रिशूल के लाॅकेट
और
अपने हर शिकार को कहता है
आतंकवादी!


(दो)

टूटते परिवारों के
इस दौर में
हत्यारों ने संभाल कर रखा है
अपना परिवार

एक
हत्या करता है
दूसरा
उसे गिरफ़्तार करता है
तीसरा
अदालत में जिरह करता है
चौथा
बेगुनाही की गवाही देता है
पांचवा
उसे बाईज्ज़त बरी करता है

और फिर
सब मिलकर
निकलते हैं शिकार पर!

( पेंटिंग गूगल से साभार)

18 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

दोनों कविताएँ महत्वपूर्ण हैं। एक कहती है। हत्या कभी जायज नहीं हो सकती, चाहे उसे कोई तर्क क्यों न दे दिया जाए।
दूसरा हत्यारों का परिवार तो अद्भुत है जो इस व्यवस्था के बहुरुपिए छद्म को सामने रखती है।

अरूण साथी ने कहा…

कड़बी सच्चाई को ंशब्दों में पिरोया गया है
वाह वाह, बधाई

varsha ने कहा…

donon ke liye badhayee....

rashmi ravija ने कहा…

दोनों ही कवितायें बिना किसी शब्दजाल के कटु सत्य बयाँ कर रही है...अंग्रेजी का naked truth ज्यादा सही शब्द है....बहुत ही प्रभावशाली अभिव्यक्ति

shikha varshney ने कहा…

wowwwwwwwww...splendid.

Suman ने कहा…

nice

Udan Tashtari ने कहा…

दोनों ही रचनाएँ बहुत प्रभावी लगी..बधाई!

neera ने कहा…

सत्य के भयानक रूप को आईने से निकाल कर खड़ा कर दिया है..

विजयशंकर चतुर्वेदी ने कहा…

अच्छी और बारीक समझ दर्शाती जोरदार कवितायें.

शरद कोकास ने कहा…

यह कवितायें इस ओर साफ इशारा करती हैं कि मनुष्य तो वही है लेकिन यह् व्यवस्था अब अपने चेहरे को उस पर आरोपित कर हर सन्दर्भ को अपने लिये इस्तेमाल कर रही है और क्रूरता को अपने तरीके से परिभाषित कर रही है ।

अमिताभ श्रीवास्तव ने कहा…

हत्यारे का आधुनिकीकरण। यथार्थबोध। मार्मिक भी। इसे यूं कहें हत्यारे का अमेरिकीकरण। या अमेरिकीबोध। मुझे तो पता नही क्यों ग्लोबल दृष्टि से इसमे अमेरिका का अक़्स ही नज़र अता है। पैनी कलम।

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

"नये चलन के बरअक्स
पहन लिए हैं
त्रिषूल के लाॅकेट
और
अपने हर शिकार को कहता है
आतंकवादी!"

बिलकुल यथार्थ ! बेहतरीन कविता । आभार ।
'त्रिषूल' ’त्रिशूल'होना चाहिए न !

श्रीश पाठक 'प्रखर' ने कहा…

कविता बेहद कड़क लगी मुझे..शानदार..!

यथार्थ तो हम सबमें रचा-पगा है पर साक्षी भाव से उसे अपने अलग-विलग कर उसका विश्लेषण कितने लोग कर पाते हैं..रचना उल्लेखनीय है.

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

आज का सच।

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

हिमांशु भाई…शुक्रिया…मैने सुधार कर दिया…

हरे प्रकाश उपाध्याय ने कहा…

Ashok jee, mai aapki kavitaon ka murid hoon.

शहरोज़ ने कहा…

साथियो!
आप प्रतिबद्ध रचनाकार हैं. आप निसंदेह अच्छा लिखते हैं..समय की नब्ज़ पहचानते हैं.आप जैसे लोग यानी ऐसा लेखन ब्लॉग-जगत में दुर्लभ है.यहाँ ऐसे लोगों की तादाद ज़्यादा है जो या तो पूर्णत:दक्षिण पंथी हैं या ऐसे लेखकों को परोक्ष-अपरोक्ष समर्थन करते हैं.इन दिनों बहार है इनकी!
और दरअसल इनका ब्लॉग हर अग्रीग्रेटर में भी भी सरे-फेहरिस्त रहता है.इसकी वजह है, कमेन्ट की संख्या.

महज़ एक आग्रह है की आप भी समय निकाल कर समानधर्मा ब्लागरों की पोस्ट पर जाएँ, कमेन्ट करें.और कहीं कुछ अनर्गल लगे तो चुस्त-दुरुस्त कमेन्ट भी करें.

आप लिखते इसलिए हैं कि लोग आपकी बात पढ़ें.और भाई सिर्फ उन्हीं को पढ़ाने से क्या फायेदा जो पहले से ही प्रबुद्ध हैं.प्रगतीशील हैं.आपके विचारों से सहमत हैं.

आपकी पोस्ट उन तक तभी पहुँच पाएगी कि आप भी उन तक पहुंचे.

गौतम राजरिशी ने कहा…

आज एक अंतराल के बाद आ पाया हूँ अपने प्रिय कवि की कवितायें पढ़ने और हमेशा की तरह शब्द-बाणों के लक्ष्य भेदता देख रहा हूँ।

दोनों ही बहुत ही सशक्त कविता है।

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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