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सोमवार, 19 जुलाई 2010

तौलिया, अर्शिया, कानपुर

मेरे सामने जो तौलिया टंगा है
अर्शिया लिखा है उस पर और कानपुर

न कानपुर को जानता हूं मैं
न किसी अर्शिया को जानता हूं जानने की तरह
वे कविताओं में आती हैं जैसे कभी-कभार
ज़िंदगी में भी अक्सर नितांत अपरिचित की ही तरह

जिस इकलौती परिचित सी लड़की का नाम था उसके सबसे करीब
कालेज़ के दिनों में थी वह मेरे साथ
प्रणय निवेदन के जवाब में कहा था उसने
बहुत ख़तरनाक हैं मेरे ख़ानदान वाले
कभी नहीं होने देंगे हमारी शादी
हो भी गयी तो मार डालेंगे हमें ढ़ूंढ़कर

मैं बस चौंका था यह सुनकर
शादी तब थी भी नहीं मेरी योजनाओं में
और अख़बारों में इज़्जत और हत्या इतने साथ-साथ नहीं आते थे…

उन दिनों तौलिये एक कहानी थी किसी कोर्स की किताब की
जिससे शिक्षा मिलती थी
कि परिवार में हरेक के पास होनी ही चाहिये अपनी तौलिया

मुझे नहीं याद कि उस कहानी के आस-पास था किसी तौलिये का विज्ञापन
यह भी नहीं कि क्या थी उन दिनों तौलिये की क़ीमत

आज सबसे सस्ता तौलिया बीस रुपये का मिलता है
और रोज़ बीस रुपये से कम में ही पेट भर लेते हैं
सबसे देशभक्त सत्तर फीसदी लोग
उनके बच्चे यक़ीनन नहीं पढ़ेंगे वह कहानी



कानपुर तक जाता रहा हूं तमाम रास्तों से
भगत सिंह के पीछे-पीछे
शिवप्रसाद मिश्र[1] की रोमांच कथाओं सी स्मृतियों के रास्ते
कमाने गये रिश्तेदारों की कहानियां जोड़ती-घटाती रही इसमें बहुत कुछ
सींखचों के पीछे क़ैद सीमा आज़ाद[2] की रिपोर्ट
थी आख़िरी मुलाकात उस शहर के साथ मेरी
जिसमें कथा थी उसके धीरे-धीरे मरते जाने की
और नाम था हत्यारों का

पता नहीं उनके आरोप पत्र में
शामिल था भी कि नहीं यह अपराध

ख़ैर
अरसा हुआ दंगे नहीं हुए कानपुर में
तो ठीक ही होगी जो भी है अर्शिया
बशर्ते सावधान रही हो वह भी प्रणय निवेदनों से

[1] एक कम्यूनिस्ट क्रांतिकारी जिन्होने हिसप्रस के साथ काम किया, फिर पार्टी में शामिल हुए और अंततः नक्सलबारी आंदोलन में भी
[2] एक पत्रकार जिन्हें माओवादी होने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है

13 comments:

Satya.... a vagrant ने कहा…

अर्शिया के लिये आयत उल कुर्सी पढुंगा.
बहुत सुन्दर . कविता.
सत्य .

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बहुत दिनों के बाद झकझोरने वाली कविता पढी है. बधाई.

विजय गौड़ ने कहा…

इस सुंदर कविता के लिए बधाई।

rashmi ravija ने कहा…

तो ठीक ही होगी जो भी है अर्शिया
बशर्ते सावधान रही हो वह भी प्रणय निवेदनों से

बहुत कुछ कह दिया..एक तौलिये को जरिया बना
ग़मगीन कर गयी ये कविता....

neera ने कहा…

आह! तौलिये को माध्यम बना कितना कुछः कह डाला.... घेर लेता है एक मौन कवि की संवेदनाओं को छूकर ..

मुकेश कुमार तिवारी ने कहा…

प्रिय अशोक जी,

एक टिप्पणी तो मैं चिट्ठा चर्चा पर कर चुका हूँ, लेकिन "असुविधा" जो हमारे जीवन एक अभिन्न हिस्सा बन चुकी है उससे गुजरे बिना रहा नही गया।

बहुत कुछ याद......... दिलाती कविता।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

शिरीष कुमार मौर्य ने कहा…

achchhee kavita. aaj izzat aur hatya ke is qadar sath hone kee taraf ishara ...yahi to achook kavidrishti hai.

Yusuf Kirmani ने कहा…

आपने झकझोरकर रख दिया।

राजेश उत्‍साही ने कहा…

छोटी छोटी चीजें भी जिंदगी के बारे में कितना कुछ कह देती हैं,यह आपकी इस कविता से पता चलता है।

varsha ने कहा…

bahut se sawalon se roobroo karati hui sanjida kavita....

प्रदीप कांत ने कहा…

तो ठीक ही होगी जो भी है अर्शिया
बशर्ते सावधान रही हो वह भी प्रणय निवेदनों से

झक्झोरती कविता

रचना दीक्षित ने कहा…

तो ठीक ही होगी जो भी है अर्शिया
बशर्ते सावधान रही हो वह भी प्रणय निवेदनों से

बहुत सुन्दर कविता
इसी विषय पर अपनी एक प्रस्तुति आपको पढवा रही हूँ

" प्रपंच "

"दर्द की दीवार हैं,

सुधियों के रौशनदान.

वेदना के द्वार पर,

सिसकी के बंदनवार.

स्मृतियों के स्वस्तिक रचे हैं.

अश्रु के गणेश.

आज मेरे गेह आना,

इक प्रसंग है विशेष.

द्वेष के मलिन टाट पर,

दंभ की पंगत सजेगी.

अहम् के हवन कुन्ड में,

आशा की आहुति जलेगी.

दूर बैठ तुम सब यहाँ

गाना अमंगल गीत,

यातना और टीस की,

जब होगी यहाँ पर प्रीत.

पोर पोर पुरवाई पहुंचाएगी पीर.

होंगे बलिदान यहाँ इक राँझा औ हीर.

खाप पंचायत बदलेगी,

आज दो माँओं की तकदीर."

'

Addy ने कहा…

बहुत पहले पढ़ा था तौलिये को ...शायद उपेन्द्र नाथ अश्क ने लिखा था. पर आपने इस कविता के द्वारा तो बस वो सब याद दिला दिया जो कहीं छुट गया था. क्या आर्शिया और क्या आरज़ू सब एक ही कहानी हैं

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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