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शनिवार, 25 सितंबर 2010

मैं कैसे उन्हें दीवाना कह दूं…



ये किन हाथों में पत्थर हैं?
(अख़बार में छपी इस तस्वीर को देखकर)

ये कौन से हाथ हैं पत्थरों में लिथड़े
ये कैसे चेहरे हैं पथराये हुए
ये कैसी आंखे हैं नीले पत्थर की
कौन सी मंज़िल है
आधी सदी से बदहवास चलते
इन पत्थर पहने पावों की

यह कौन सी जगह है
किसकी है यह धरती
किस देश का कौन सा हिस्सा
किसकी सेना है और जनता किसकी
कि दोनों ओर बस पत्थर ही पत्थर
ये कौन अभागे लोग कि जिनके लिये
दिल्ली का दिल भी पत्थर है…

किसका ख़ून है यह पत्थरों पर
जो बस अख़बारों के पहले पन्ने पर काला होकर जम जाता है
किनकी लाशें हैं ये जिनसे होकर दिल्ली का रस्ता जाता है
मैं किस रस्ते से इन तक पहुंचूं
किस भाषा में इनसे पूछूं
कैसा दुख यह जिसका मर्सिया आधी सदी से ज़ारी है
यह कौन सा गुस्सा कौन सी ज़िद है
जो ख़ुद अपनी जान पे भारी है

मैं कैसे उन्हें दीवाना कह दूं…
जिनकी आंखों का पानी जमकर सूख गया है
जिनके होठों पर बोल नहीं बस एक पथरीला गुस्सा है
जिनके हाथों का हुनर कसा है बस एक सुलगते पत्थर पर
वह पत्थर जिसकी मंजिल भी बस पत्थर पहने सिर है एक

मै कैसे उन्हें दीवाना कह दूं…


14 comments:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

rachna me dhadhakte ehsaas hain ...

प्रभात रंजन ने कहा…

कविता कई अनुत्तरित सवालों के मौन छोड़ जाती है. बधाई.

ravikumarswarnkar ने कहा…

मैं कैसे उन्हें दीवाना कह दूं...

पत्थरों को कविता में ढ़ालने का...
कविता को पत्थर बना देने का हुनर...

लाजवाब...

गौतम राजरिशी ने कहा…

उफ़्फ़्फ़्फ़....कविता की लय में ढ़ला हुआ कवि का दर्द, कवि की असह्य पीड़ा एकदम से जैसे धुन बनकर उठी है और मैं गुनगुनाने लगा हूँ कविता को कि इस दर्द को कई-कई बार प्रत्यक्ष रूप से झेला है।

बड़े दिनों बाद इस कदर लय में ढ़ली हुई दर्द उकेरती कविता पढ़ने को मिली है। शुक्रिया अशोक भाई...ईश्वर आपकी लेखनी को चरम पे ले जाये !

mukti ने कहा…

ये वो सवाल है जो संवेदनशील दिलों को झकझोरते हैं... पथराई आँखें जाने किस का रास्ता निहार रही हैं? जाने इस राह की मंजिल कहाँ है? सच में एक कवि का दर्द पिघलकर इस कविता में ढल गया है.

janmejay ने कहा…

congratulation ashok ji. aapki kavita padhkar laga ki sahitya abhi tak apni bhumika bakhubi nibha raha hai. ummeed is kavita se hamare kashmiri bhai kuchh prerana awasya lenge.

शरद कोकास ने कहा…

पत्थर का अर्थ केवल पत्थर नहीं होता । यह पत्थर इतिहास की भी परत दर परत खोलता है । यही पत्थर जब हमारे उस आदिम पुरखे के हाथ में था तो उसने इससे औज़ार बनाये , अब यह हथियार की तरह काम आ रहा है ,तुम्हारी यह बेहतरीन कविता मेरे भीतर भी एक कविता को जन्म दे रही है ।इसे और विस्तार दो ।

सुनील गज्जाणी ने कहा…

patthar jab neev me lage to unchi uchi imarte khadi ho jaati hai jab samvedanaon se takraye to bavaal mach jaata hai .

अजेय ने कहा…

कुमार विकल और सुरजीत पातर एकसाथ याद आते हैं. ......

याद रह जाने वाली कविता.

neera ने कहा…

पत्थर हो चुके लोगों के हाथों में पत्थर... उनसे प्रश्न कवि ने पिघालने वाले पूछे हैं हर सुलगती मोमबत्ती का दर्द रिस रहा है कविता में...पत्थर के पिघलने की उम्मीद अभी बाकी है....

प्रज्ञा पांडेय ने कहा…

शरद कोकास जी कि टिपण्णी बहुत अच्छी लगी .. ऐसा ही मेरा भी सोचना है कि ..पहले औजार गढे गए .. अब हथियार क्यों ?

अजेय ने कहा…

और मैं सोचता था औज़ार उर्दू शब्द है हिन्दी हथियार के लिए.

अपूर्व ने कहा…

पत्थर ही शायद इंसान का प्रारब्ध है.इसी साइकिल मे घूमते हैं हम...एक पाषाण काल से निकल कर दूसरे मे प्रवेश कर जाते हैं बस..

अजेय ने कहा…

मैंने दोनो वर्जन बार बार पढ़े हैं. सच में, फेस बुक वाला वर्जन अधिक असरदार लग रहा है.

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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