मां दुखी है
कि मुझ पर रुक जायेगा ख़ानदानी शज़रा
वशिष्ठ से शुरु हुआ
तमाम पूर्वजों से चलकर
पिता से होता हुआ
मेरे कंधो तक पहुंचा वह वंश-वृक्ष
सूख जायेगा मेरे ही नाम पर
जबकि फलती-फूलती रहेंगी दूसरी शाखायें-प्रशाखायें
मां उदास है कि उदास होंगे पूर्वज
मां उदास है कि उदास हैं पिता
मां उदास है कि मैं उदास नहीं इसे लेकर
उदासी मां का सबसे पुराना जेवर है
वह उदास है कि कोई नहीं जिसके सुपुर्द कर सके वह इसे
उदास हैं दादी, चाची, बुआ, मौसी…
कहीं नहीं जिनका नाम उस शज़रे में
जैसे फ़स्लों का होता है नाम
पेड़ों का, मक़ानों का…
और धरती का कोई नाम नहीं होता…
शज़रे में न होना कभी नहीं रहा उनकी उदासी का सबब
उन नामों में ही तलाश लेती हैं वे अपने नाम
वे नाम गवाहियाँ हैं उनकी उर्वरा के
वे उदास हैं कि मिट जायेंगी उनकी गवाहियाँ एक दिन
बहुत मुश्किल है उनसे कुछ कह पाना मेरी बेटी
प्यार और श्रद्धा की ऐसी कठिन दीवार
कि उन कानों तक पहुंचते-पहुंचते
शब्द खो देते हैं मायने
बस तुमसे कहता हूं यह बात
कि विश्वास करो मुझ पर ख़त्म नहीं होगा वह शज़रा
वह तो शुरु होगा मेरे बाद
तुमसे !
25 टिप्पणियाँ:
उन नामो में हो तलाश लेती है वह अपने नाम ....वे नाम हैं उनकी उर्वरा के ...और फिर बेटी से ..
विश्वास करो मुझ पर खत्म नही होगा यह शजरा ...मार्मिक ...उदासी की कविता ..आखिर में आश्वस्त करती है ...बहुत खूब भाई ..
"जैसे फ़स्लों का होता है नाम
पेड़ों का, मक़ानों का…
और धरती का कोई नाम नहीं होता…"
बिल्कुल नई दृष्टि। बहुत ख़ूब। बहुत उम्दा। बधाई।
अंशुमाली: अशोक भाई, बहुत ज्यादा बौद्धिक कविताएं मैं नहीं पड़ता। न ही कविताओं पर प्रतिक्रियाएं देता हूं। पर, हां ऐसी कविता (जो कि अभी आपके ब्लॉग पर पढ़ी) को मैं बार-बार हर बार पढ़ना चाहूंगा। बहुत ही मार्मिक कविता है यह। शुभकामनाएं।
**अंशुमाली रस्तोगी मेल पर
खूबसूरत और बेहद मासूम कविता है, अशोक भाई |
कितनी सादगी से कह दी कितनी जटिल बातें, बड़ी सुंदर कविता
गजब की कविता है.
घुघूती बासूती
achhi kavita hai. betiyan behtr dhang se raushan kar rahi hain ab yah shzra...
aape naye kavita sanghrh ke prti lalasa is kavita ne badha di hai.
namaskar !
nav varsh ki aap sabhi ko bahut badhai ,
saadagi . maasoom , aur gahree bhaav waali kavita . sunder abhivyakti
saadar
नमस्कार !
अशोक जी !
नव वर्ष कि आप सभी को हार्दिक बधाई
खूबसूरत और बेहद मासूम कविता है,अच्छी कविता साधुवाद
आभार !
विश्वास करो मुझ पर ख़त्म नहीं होगा वह शज़रा
वह तो शुरु होगा मेरे बाद
तुमसे !
काश! यही विश्वास सबमे हो...
बेहतरीन कविता
Sach me bahut saadagi se bahut pyari baat kahee aapne....abhar!!
ek nimantran: mere blog pe aane ka:)
सुंदर भाव
बेहतर कविता
मानस को तर कर देती है
... kyaa kahane ... behatreen !!
bahut achchi kavita.shandaar!
अशोक जी ,सुन्दर कविता के लिए और नव वर्ष के सुखद आगमन की बधाई
बहुत ही सुंदर कविता...गहरे जज्बात के साथ ..
एकदम सही।
बढ़िया सटीक रचना ...बधाई
कविता में छिपा बेटा और पिता पाठक के दिल को छूता है...
bahut khub
umda rachna
kabhi yha bhi aaye
www.deepti09sharma.blogspot.com
उदासी मां का सबसे पुराना जेवर है, शायद मां के रूढियों विचारों जितनी उम्र हो इसकी।
अच्छी कविता सर।
एक अच्छी कविता के लिए आपको अशेष बधाईयां....
बहुत सुन्दर अशोक जी ! शजरा बेटे से नहीं तो बेटी से भी जारी रह सकता है!
अच्छा सन्देश देती है आपकी रचना ! बहुत बधाई !
जबरदस्त बात है यह, बहुत जबरदस्त.
यह विश्वास नियति तय करे
आभार
"और धरती का कोई नाम नहीं होता…" यहाँ पढ़ने से पहले कभी ख्याल भी नहीं आया था .....
बहुत बढ़िया कविता/बढ़िया बात
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