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सोमवार, 26 सितंबर 2011

मलयालम के सुप्रसिद्ध कवि वैलोपिल्ली श्रीधर मेनन की जन्म शताब्दी पर


मलयालम के सुप्रसिद्ध कवि वैलोपिल्ली श्रीधर मेनन (1911-1985) की जन्म-शताब्दी
यह मलयालम के सुप्रसिद्ध कवि वैलोपिल्ली श्रीधर मेनन (1911-1985) का जन्म-शताब्दी वर्ष है। उनका जन्म 11 मई, 1911 को केरल के एरणाकुलम जिले के कलूर नामक ग्राम में हुआ था। वे पेशे से विज्ञान के अध्यापक थे तथा हाई स्कूल के हेड मास्टर के रूप में सेवा-निवृत्त हुए। विज्ञान के अध्यापक होने के कारण उनकी सोच में वैज्ञानिकता थी और उन्होंने अपनी कविताओं में इसी सोच को प्रतिपादित किया। वे मलयालम साहित्य के घोर छायावादी युग में यथार्थवादी कवित्ताएं लिखने वाले श्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। उन्होंने अपनी एक कविता में कहा है कि वे जीवन के समुद्र को अपनी कविता लिखने वाली स्याही से भरी दवात मानते हैं। उनकी कविताओं में आधुनिक सौन्दर्य-बोध की स्पष्ट छाप थी। उनकी पंक्तियाँ, “चोरातुडिक्कुम चेरुकैय्युकले, पेरुका वन्नी पन्तङ्ङल” (फड़कते रक़्त वाली बाजुओं, चलो, आकर संभालो ये मशालें) केरल में आज भी किसी भी जनांदोलन में सबसे प्रमुखता से इस्तेमाल किए जाने वाले एक नारे के रूप में हर ज़ुबान पर रटी हुई हैं। उनकी 1952 में प्रकाशित लंबी कविता कुडिओषिक्कल के लिए उन्हें वर्ष 1969 का सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार प्राप्त हुआ। उन्हें कय्पवल्लरी कविता-संग्रह के लिए केरल साहित्य अकादमी तथा विडा कविता-संग्रह के लिए केन्द्रीय साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी मिला। उन्होंने साहित्य प्रवर्तक सहकारी संघ के बोर्ड तथा केरल साहित्य अकादमी के सदस्य के रूप में भी कार्य किया। ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता कवि श्री ओ एन वी कुरुप्प का मानना है कि उनकी लम्बी कविता कुडिओषिक्कल मलयालम की सर्वश्रेष्ठ काव्य-रचना है। उनकी बाल-कविता माम्पषम केरल के विद्यालयों में लम्बे समय से पाठ्यक्रम में शामिल रही है और मलयालम की एक सर्वाधिक लोकप्रिय कविताओं में शुमार की जाती है। यहाँ जन्म-शताब्दी वर्ष में कवि को श्रद्धांजलि-स्वरूप उनकी कविता माम्पषम का छंद-बद्ध् हिन्दी-अनुवाद प्रस्तुत है।

आम
  • मूल (मलयालम) वैलोपिल्ली  श्रीधर मेनन
  • हिन्दी-अनुवाद उमेश चौहान

आंगन के नए आम्र-तरु से पहला फल जैसे ही टपका,
अम्मा के दृग से वैसे ही चू पड़ा गरम आँसू ढल कर।

जब चार महीनों के पहले बहुतेरा इन्तज़ार करके,
इस बाल आम के पौधे में फूलों से अमियां उपजी थीं।
तब अम्मा का प्यारा बेटा इक आम्र-मंजरी तोड़, हाथ
में जली फुलझड़ी सी थामे आह्लाद मचाता आया था।
अम्मा गुस्सा होकर बोलीं, “यह क्या? नटखट बच्चे! तूने
सुंदर अमियों की डाली को बरबाद कर दिया व्यर्थ आज!
जब यही आम पक कर गिरते तब तू ही दौड़ बीन लेता,
तू पिटा नहीं, इस कारण ही यह पुष्प-मंजरी नोच रहा।
बालक का भाव तुरत बदला, मुरझाया उसका कमल-वदन,
वे निष्कलंक आँखें उसकी पल भर में अश्रु-तड़ाग बनी।
वह सुंदर बौर आम का झट मिट्टी में फेंक दिया उसने,
हठ से बोला, “अब नहीं कभी वह आम बीनने जाएगा ।

शब्दों का उच्चारण तक जो ना सीख सके, ऐसे बच्चो!
तुम ही तो हो देवज्ञ, कराते हमें  दीर्घ-दर्शन हैं जो!

जेठ माह की भीषण गरमी में आमों की हरी झुमकियाँ,
पक, सुगन्ध से सराबोर हो स्वर्णिम हो जाने के पहले,
आम रसीले टपक सकें इसकी भी बिना बाट जोहे,
वह माता की प्यारी कोयल तज नीड़ चली परलोक गई।
वह स्वर्गवासियों का प्रिय बन दुनिया से उदासीन हो कर,
बीतते समय के साथ-साथ लीला-रस में हो गया लीन।

आंगन के नए आम्र-तरु से पहला फल जैसे ही टपका
अम्मा के दृग से वैसे ही चू पड़ा गरम आँसू ढल कर।

निज बेटे को अमृत देने नीचे टपका वह स्वर्णिम फल
अब बिना किसी की चाहत के बस पड़ा हुआ है प्रांगण में।
उत्साह भरे वे आस-पास के छोटे-छोटे बच्चे सब,
उस आम्र-वृक्ष की छाया में रच रहे घरौंदे मिल-जुल कर।
हे गिलहरिया! धारी वाली! दे आम हमें!’’ यह कह-कह कर
वे लार चुआते, ललचाए से, जोर-जोर से गाते हैं।
वे टपके मीठे आमों को सब दौड़-दौड़ कर बीन रहे,
कोलाहल उनका गूँज रहा मंगल-ध्वनियों से भरा हुआ।
वे मना रहे वासंत महोत्सव किन्तु, हाय! उस माता की
उन अश्रु-पात से अँधराई आँखों में वर्षा-ॠतु छाई।
दरवाजे पर निस्तब्ध खड़ी कुछ देर रही, लेकिन उसने
अपना दुर्भाग्य-स्वरूपी फल फिर उठा लिया जाकर सत्वर।
अपने प्यारे से बच्चे की सुंदर काया की दफ़न जहाँ,
उस मिट्टी में ही गाड़ दिया धीमे से ऐसे कह कर के,
बेटे के हाथ बिने जाने, उसके मुँह खाने के हित ही
आया यह मीठा आम यहाँ, सच्चाई से अनभिज्ञ निरा।
बच्चे! तू निष्ठुर भाव लिए यूँ मुझे छोड़ कर चला गया,
अब इसको खाने से ही तो अम्मा कि खुशियाँ लौटेंगी।
तू चला गया है रूठ मगर जब तुझे बुलाती हूँ मैं तो
तू नख़रे दिखा-दिखा कर के फिर खाने को आता है ना?
आ जा! इन आँखों से ओझल मेरे प्यारे कान्हा आ जा!
अब इसे स्वाद से खा ले तू माता का बस नैवेद्य मान!’’

अमराई की मृदु-मंद-पवन आ पास समाई तो जैसे
प्यारे बेटे की आत्मा ने माँ को आलिंगन-बद्ध किया।



उमेश चौहान. हिन्दी और मलयालम के विद्वान तथा जाने-माने कवि. हमारे अनुरोध पर उन्होंने ये कविताएँ उपलब्ध कराईं हैं. उम्मीद है कि उनके माध्यम से मलयालम की और भी कविताएँ हमें पढ़ने को मिलेंगी.

5 comments:

arun aditya ने कहा…

“चोरातुडिक्कुम चेरुकैय्युकले, पेरुका वन्नी पन्तङ्ङल” (फड़कते रक़्त वाली बाजुओं, चलो, आकर संभालो ये मशालें)
.....
ऐसे शानदार कवि से परिचय करवाने के लिए आभार.

रवि कुमार, रावतभाटा ने कहा…

आकर संभालों ये मशालें...
अच्छी प्रस्तुति...

उमेश महादोषी ने कहा…

महान कवि की कविता महान तो होगी ही, पर आजकल इस तरह की छंद-बद्ध कवितायेँ पढ़ने को कहाँ मिलती हैं! आपने इस कविता के माध्यम से ह्रदय की गहराइयों से कवि को श्रद्धांजलि अर्पित की है.

Onkar ने कहा…

dil ko chhoo lene wali kavita

सुनील गज्जाणी ने कहा…

नमस्कार ! एक उम्दा कवि से परिचय करवाने के लिए शुक्रिया . और उमेश जी को बधाई साधुवाद कि उनके द्वारा हम तक एक नायब हस्ती का सृजन पढ़ने का अवसर मिला .
सादर

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