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मंगलवार, 18 अक्तूबर 2011

एक देश है निरुदेश्य है जो अपने नागरिकों के सामने


हल्द्वानी में रहने वाले अमित श्रीवास्तव की कविताएँ सबसे पहले अनुनाद में पढीं थीं. उनके पास अपने जीवनानुभव के साथ उनसे प्रश्नाकुल एक ऐसा कवि व्यक्तित्व है जो उनके पार देखने की कोशिश लगातार करता है. इस आकुलता भरी कोशिश में बिखराव भी हैं, उलझाव भी. लेकिन वह आकुलता इन सबसे टकराती हुई उनसे लगातार सार्थक कवि-कर्म कराती है. असुविधा में उन्हें पहली बार प्रस्तुत करते हुए यह उम्मीद करता हूँ कि आगे भी हमें उनकी कविताएँ नियमित तौर पर पढ़ने को मिलेंगी.

एक........ है


एक डॉक्टर है
जो हफ्ते के एक दिन गुरुवार को संभवतः
मुफ्त इलाज करता है गरीब का
वो जो आश्वस्त है अपने ठीक होने को लेकर और मरीज है तीसरा
कुछ नहीं क्योंकि कुछ हो भी नहीं सकता
डॉक्टर अपनी डॉक्टरी भाषा और पढीस लिखावट मे
कुछ फैक्ट्स मिस कर देता है डिस्चार्ज स्लिप से...
शायद जानबूझ कर
जो भयानक बदकिस्मतियों से ही पता चलते हैं
बदकिस्मती मरीज की उसकी मौत पर
तिस पर बदकिस्मती डॉक्टर की उसका पोस्ट मॉर्टम होने पर।

एक देश है
जो पाठ पढ़ाता है
कम से कम पांच साल की रूरल प्रैक्टिस का
उस समय मे भी जब पूरी दुनिया को एक गांव के शक्ल की दरकार है
गो कि उसके मालिक अब यही चाहते हैं।

एक वकील है
जो मानवाधिकार की बात करता है
आतंक वातंक की नहीं
विथ ड्यू प्रोसेस ऑफ लॉ एण्ड प्रोसीजर स्टैब्लिश्ड बाई लॉ
बेल तो बनती है मेरे क्लाइन्ट की
उसका पेशेवर होना उसकी सबसे बड़ी दलील है।

एक देश है
जो आंखों पर पट्टी बांधता है
बिना वजह
संविधान की बात करता है
कानून की ओर दिखाता है
भूल जाता है
दशाश्वमेघ घाट के पास बम विस्फोट से बचा खुचा आदमी
संविधान की प्रस्तावना पढ़ते पढ़ते
ढेर हो जाता है।

एक पत्रकार है
पेशे से
वैसे तो अजीब किरदार है
होना नहीं चाहिये लेकिन इसका अपना एक विचार है
वो हर घटना को विचार की तरह पढ़ता है
फिर पढ़े जाने के हिसाब से घटना और
घटना के हिसाब से विचार मे
( एक जरूरी सूचना- आज भी सबसे बड़े विचार दक्षिण और वाम पंथ ही हैं
ज्ञात अज्ञात टी आर पी के आजू बाजू )
सनसनाता है
दारू पैसा मुर्गा
मुर्गा दारू पैसा
किसी पगलाई नींद सा बड़बड़ाता
सुबह होने के पहले ही मैनेज हो जाता है।

एक देश है
जो समाज को अखबार की तरह गढ़ने की
सारी सियासी तरकीबें भिड़ाता है
और अधिकारों की सूचना दबा जाता है
दो दो चार चार सीढ़ियां लांघने की हड़बड़ी मे।

एक लेखक है
जो इस तरह का लिक्खाड़ है
कि लिखना ही उसका आखिरी काम है
लेकिन भाषा की खुरदरी जमीन पर
नंगे पांव चलने से डरता है
सुविधाजनक रूप से लेखक एक कवि भी है
जो कविता लिखता है तो कविता से बचता है
कविता मे पाथता है गोबर
और गोबर मे कविता नथता है
फिर श्वेत धवल नख शिख नवल
गोबर से बचता है
सिद्ध हस्त गुरु घंटाल
कविता मे बचता है कविता से।

एक देश है
जो विचारधाराओं का अवांछित निबाह है
जो ‘चाउर औ किनकी’ को एक ही तराजू से तौलता है
जो हुक्मराना पेशेवर पुरस्काराना बर्ताव मे
किनकियों के हक मे टेनी मार देता है।

एक नेता है
जो एक अरब चालीस लाख माथों पर
इबारतें उकेरता है
आपकी दुआओं की फजल से उसे ये रुतबा हासिल है
देश के सारे वैज्ञानिक
इन्जीनियर तत्वज्ञानी
योगी वकील शिक्षक
अफसर नौकर
चोर उठाईगीर लम्पट
घूसखोर उद्योगपती
कुल मिलाकर इससे थोड़ा कम ही जानते हैं
ये मामूली गैर मामूली चीजों का देवता
ये एक आकाशवाणी है
इससे बिजली है पानी है सड़क है
और नहीं है
यही भविश्यवाणी है
हो न हो यही शासनादेश है आज का।

एक देश है
जो समाजवादी है
जो पंथ निरपेक्ष है
जो प्रजातन्त्र है
जो गणतंत्र है
ऐसा सातवीं कहीं कहीं आठवीं बहुत हद तक दसवीं तक
पढ़ा जाता है
समझ की किताब से ये शब्द उड़नछू हो चुके हैं
अब नए व्याकरण के साथ
समाजवाद को ‘प्रोलोंग इमर्जेन्सी’ की तरह पढ़ें
पन्थ निरपेक्ष को ‘गोधरा चाहे मालेगांव’ की तरह लें
प्रजातंत्र को ‘लाल लंगोटी वाला भूत’ समझ़ें
और गणतंत्र को ‘जब सईंया भए कोतवाल तब डर काहे का’ पढ़ लें
कुछ फर्क नही पड़ता।

एक अफसर है
असफल आशिकों की भाषा मे जो थोड़ा ऊंचे दर्जे का बाबू है
जो कृते है
जो सेवा मे है
आज्ञा से भी वही है
जिसकी कोई शक्ल ही नही है
किरदार भी नही
जो विकास की अनुज्ञप्तियों मे
प्रतिनियुक्ति सा आता है
फिर चला जाता है।

एक देश है
जो सो कर उठता है कागजों मे
फिर सूचकांगो मे सीढ़ियां चढ़कर
टेबलों पहाड़ों चार्टों को बेल्ट मे खोंसे खोंसे ही
मेज पर लेट जाता है एक त्रिप्त डकार के साथ ( जो अभी अभी आए आर्थिक सर्वेक्षण के
ताजे आॅंकड़ों मे दिहाई के पाले को छूकर आने की बावजह पीठ ठोंकू अश्वस्ति से फूट ही पड़ती है )।

एक नागरिक है

एक देश है
जिसमे एक विधायिका है
जिसमे एक कार्यपालिका है
जिसमे एक न्यायपालिका है
और अनुपूरक मांगो की तरह एक मीडिया भी है
जो अब मुख्य बजट के सबसे बड़े हिस्से का दावेदार है

देश की विधायिका
विधायन करती है
भाषड़ों आश्वासनों
कभी कभी आरोपों प्रत्यारोपों
गालियों फब्तियों नारों का
वैसे सैद्धांतिक तौर पर पूर्ण सक्षम है विधायिका

देश की कार्यपालिका
व्यावहारिक तौर पर पूर्ण सक्षम है
काम करके बेहया सफाई से उत्तम काम ना करने की राजनीति हुआ करती है

देश की न्यायपालिका के खिलाफ कुछ भी कहना
कन्टेम्प्ट ऑफ कोर्ट की जद मे आता है
एक नामुराद चुप्पी ही न्याय का आखिरी फैसला है

देश का चैथा खम्बा
उस छत को ही टेढ़ा किये दे रहा है
जिसमे जन आन्दोलनो से घबराकर अक्सर देश
छुप जाया करता था

एक देश है
जो निरुदेश्य है
अपने नागरिकों के सामने
निरुपाय
नंगा खड़ा है
नई सदी के पहले दशक मे !!



9 comments:

' मिसिर' ने कहा…

अच्छी,बहुत-कुछ को अपने भीतर समेटती हुई ,जबरदस्त,विचारोत्तेजक कविता! अमित श्रीवास्तव जी को बधाई ! प्रस्तुति के लिये अशोक जी का आभार !

दीपाली ने कहा…

Bahot khoob... New and innovative... Antim me likhi panktiya mn pe chhap chhotdati hai...

Mahesh Chandra Punetha ने कहा…

bahut kuchh ek sath dekhati or kahati hui kavita. poore parivesh ki gahari samjhadari yahna vyakt hui hai.vivaranon main bhi kavita hoti hai is bat ka udahran hai yah kavita.

मोहन श्रोत्रिय ने कहा…

एक अनुभव को विस्तार देकर इतने बड़े पैमाने पर फैला ले जाना, और कुशलतापूर्वक निभा भी लेना बड़ी कुव्वत की मांग करता है. कहने की ज़रूरत नहीं कि यहां, इस कवि में यह कुव्वत दिखती है, भरपूर. अंत तक आते-आते, यह कविता पाठक को हिला कर रख देती है. मैंने इनकी यह पहली कविता पढ़ी है, इसलिए इस तक ही अपने आपको सीमित रखते हुए, यह कहना चाहूँगा कि यह सामर्थ्य यदि कवि ने बनाए-बचाए रखी तो इनका भविष्य बहुत उज्ज्वल है, कवि के रूप में. बधाई, अशोक को ज़्यादा कि उन्होंने कविता की ताक़त पर कवि के महत्त्व को पहचाना.

leena malhotra ने कहा…

सत्य को रेखांकित करती यह कविता मुझे बहुत भाई.. तीखे तेवर होने के बावजूद कविता ने अपनी कोमलता नही खोई... आभार.

Shyam Bihari Shyamal ने कहा…

जीवन्‍त... कविता का यह नया चेहरा उम्‍मीदों से दमक रहा है... स्‍वागत... अनन्‍त शुभकामनाएं अमित जी...

आशुतोष कुमार ने कहा…

मानवाधिकारों के वकीलों के खिलाफ एक तीखा बयान.विचारधारा और आतंकवाद दोनों को एक ही अंदाज़ में निपटाता हुआ. मानवाधिकार की चर्चा को आतंकवाद का कानूनी सुरक्षा कवच बताता हुआ.

'असुविधा' पर इस का प्रकाशन ही एक 'सुखद' (?) आश्चर्य है . कौन कहता है मार्क्सवादी लोग विरोधी विचारों के प्रति असहिष्णु होते हैं.

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

‎Ashutosh भाई...वैसे तो इस टीप के साथ 'ईमानदार आर एस एस वाले' के पक्ष में दिए बयान का आप द्वारा शेयर किया जाना भी 'सुखद' (?) आश्चर्य जैसा ही कुछ था, लेकिन इस कविता के बारे में आपके आब्ज़र्वेशन से सहमत होना मुश्किल है. मानवाधिकार वाली पंक्ति के ठीक बाद 'संविधान' वाली पंक्ति के साथ जोड़े बिना उन पंक्तियों का पाठ एकांगी ही है. मेरी दिक्कत यह है कि मैंने 'अकादमिक' तरीके से कविता पढ़ना सीखा ही नहीं. हिन्दी का विद्यार्थी जो नहीं रहा कभी. मैं कविता को बिना अर्थ की तलाश किये कई बार पढ़ना पसंद करता हूँ और इस प्रक्रिया में उसका एक समग्र भाव जो अंकित होता है उससे ही कविता को जज करता हूँ. इस तरह पढ़ने पर यह कविता मुझे 'मार्क्सवादी' तो नहीं लेकिन मनुष्यता के पक्ष में और व्यवस्था के विरोध में ज़रूर खडी लगी.

tarav amit ने कहा…

बहुत दिनो से इस पोस्ट को देख नहीं पाया।...उत्साह वर्धन के लिये सभी लोगों का बहुत बहुत धन्यवाद।

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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