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रविवार, 16 सितंबर 2012

विवेक निराला की लम्बी कविता



विवेक निराला की यह लम्बी कविता संस्कृति के चार खम्भों के दरकते जाने और स्वप्नों के एक निराश शोकगीत में तब्दील होते जाने की गाथा है. इतिहास के स्वर्णिम अध्यायों के स्वर्णलेप के उतरते जाने के बरक्स एक बेहतर भविष्य के निर्माण की चिंता में कविता युगों में आवाजाही करती है, भ्रमों को रेशा-रेशा खोलने की कोशिश करती है और इस प्रक्रिया में भविष्य के स्वप्न का निर्माण करती है.   



चार पुरूष और स्वर्ण युगों पर शोकगीत


(एक)

हम चार दोस्त थे,
बिल्कुल आवारालेकिन
संस्कृति के प्रश्नों को
अपने कन्धे पर उठाए
संस्कृतिकर्मी कहलाने को उत्सुक।

हम अपने इतिहास को
लेकर सिर धुनते
हम जीवन के ठाठ अनश्वर
बिनते-चुनते।

हम प्रश्नाकुल
दीवारों पर जगह-जगह
प्रश्नचिन्ह टांगें
हम भोले बचपन-से
अपने-अपने उत्तर मांगें।

सत्ता के गलियारों की
आपा-धापी में
अक्सर वन्दन अभिनन्दन
कीर्तन-भजन-पूजन।
हम निर्जन में जैसे बन्दी
बहुत अकेले
पांवों में चलने की सूजन।

परम विकट पथ चुना हुआ
अपना ही था
यह थकान-सुस्ती-ढीलापन
अपना ही था
रेशे-रेशे बिखरा जीवन
अपना ही था।

सन्नाटे में
प्रश्न-उत्तरों की उधेड़बुन
सभी शास्त्र-ग्रन्थों को पढ़-गुन
आगे बढ़ते अपनी ही धुन।

यूं तो संगी विरले मिलते हैं
फिर भी दोस्त बने थे चारों
कविकिस्सा-गो
इतिहासकार और खबरनवीस।

किस्सा-गोवह प्रथम पुरुष
बेलगाम घोड़ों पर
हर समय सवार
किधर जाएगाकिसे खबर ?

उसके हाथों में काठ की
दो तलवारें हैं
माथे पर दुश्चिन्ताओं
की सतरें हैं
खुद कहता है- शापित है
उसने भी मुट्ठी तानी थी
दुर्वासा के शाप से इतना थर्राया
अब एड़ियां घिसा करता है।

फूट रहा है कोढ़
इसलिए अंगौछा ओढ़
चिड़ीमार-सा
परिन्दे पकड़ता हैउड़ता है
अकेले में कुनमुनाता है
रोज एक नया किस्सा सुनाता है।

द्वितीय पुरुष -
वह कवि जिसने
आस्तीन में सांप की तरह
आंखों में सपने पाले हैं
उनमें से कुछ को ही
सच होते देखा।
कुछ सपने नाकामी के
कुछ भयावने
कुछ सपने
सपने तो क्यागड़बड़झाले हैं।

फिर भी नाउम्मीद नहीं है
उम्मीदों की फसल काटकर
अपनी खाली जेबों को भर
वह आगे बढ़ता जाता है।

अपने समय के जितना भीतर
उतना बाहर
वह वामन अपने छोटे क़दमों से ही
युग-युग को नापा करता है।
छन्दों को तोड़ता-जोड़ता
जीवन की लय
पकड़ता-छोड़ता
प्रियवाची काव्य-पुरुष।

तृतीय पुरुष -
इतिहासकार वह स्वतन्त्र।
बहुत अहिंसक
युगों-युगों की राख कुरेदता
सत्य-शोधक।

उसका जीवन अभिशप्त षिला
जिस पर नहीं लिखा गया
कोई लेख
कद-काठी का
गर्वोन्नत विजय स्तम्भ।
साम्राज्यों के उत्थान-पतन
की बातें करता
राज-व्यवस्थाओं का
वह विश्लेषक
अपनी झोली में
जब भी हाथ डालता है
एक नायाब चीज़ निकालता है।
काले-लाल-धूसर मृदभाण्ड
सोनेचांदीचमड़े के सिक्के
कटी-फटी प्रतिमा
अथवा अन्नादि के जले हुए कण।

अपने औजारों से वह
हथियारों को परखा करता
लिए हुए एक सन्दूकची
चलता-फिरता
सभ्यता का सांस्कृतिक अजायबघर।

चौथा पुरुष - पत्रकार
स्कूप तलाशता
दौड़ता-भागता
सम्पादकों पर लानतें भेजता
मालिक को गरियाता।
चोरी-डाका-दुराचार
थाना-कचहरी-तहसीलदार
सबको साधते पस्त
लोकतन्त्र का चौथा पाया।

अपने समाज का वह प्रहरी
समझा करता है
सत्ता की
सब चालें गहरी।
पूर्वजन्म के नारदोचित
संस्कारों से
जगह परसमय पर उपस्थित।

       (दो )
हम थे चार पुरुष
आपस में लड़ते-झगड़ते
स्वर्णयुग का हर यूटोपिया
हमको आकर्षित करता था।
कुत्ते की तरह हांफते हुए
हम उस तक
किसी भी सूरत में
पहुंच जाना चाहते थे।

बदहाललगभग मनुष्य विरोधी
स्थितियों में
अपने जीवन को झेलते
अपने एक जैसे जीवन को काटते।

हमने अपने को ही खाकर
भूख मिटाई
हमने अपना लहू चाटकर
प्यास बुझाई
खुद को समिधा मानकर
हमने आहुति दी
तिल-तिल
देह गलाते गए
अन्तस् को जलाते गए।

हमने तक़लीफों को छूकर
महसूस किया
पीड़ा को सीने में धरकर
समझा है
जो कुछ भी देखा और जाना
जितने अंशो तक
हमने सत्य को पहचाना
उतने तक
वैसा कहने के खतरे उठाए।

अपने समय को
नपुंसक कहकर
हम किसी स्वर्णयुग की
जालिम कल्पना में तल्लीन थे।
अपने सीमित और भोंथरे
हथियारों पर
हम बहुत गर्व करते थे।

हम लड़ाकू थे
एकदम मौलिक
विचारों की लड़ाई में
समान रूप से निपुण
हम चारों
पीठ पीछे वार नहीं करते थे
हम प्रतिपक्ष को
पूरा मौका देते थे,
इसलिए अपने को नैतिक कहना
हमें अधिकार की तरह लगता था।

हम विचार को
विचार से परास्त करना
चाहते हुए भी
बार-बार खुद हार जाते थे
क्योंकि प्रतिपक्ष
विचारों की लड़ाई को
अपने कूड़ेदान से शुरू करता था
और चाकू पर
लाकर खत्म कर देता था।

दरअसल
मायावी था हमारा शत्रु
वह नए रूप धरता जाता था
और उसकी शिनाख़्त मुश्किल थी।

अपने सबसे अच्छे समय
के हम लोभी
मरुस्थल में गिरते-पड़ते
कितनी ही आंखों में गड़ते
हर सूर्योदय के बाद
जब हम निकलते
तो यह सोचकर कि लेकर
आएंगे कोई न कोई स्वर्णकाल
या तो मौत हमें वापस
एक साथ मिलने नहीं देगी।

इस तरह हमने
उन तमाम लोगों को बेवज़ह
डरा दिया था
जे हमें कुछ दिन और
जीवित देखना चाहते थे।
वे लोग
अपने अच्छे दिनों के
न आने से खीझे हुए
पोलियो के कारण
दोनों पांव की ताक़त खोये
रोगी की तरह
अपने हाथों में
हवाई चप्पलों के साथ
घिसट रहे थे।

बेहद छरे हुए खभ्भड़
वे सिर्फ़
इस देश का नागरिक
बने रहने की
जद्दोजहद कर रहे थे।
वे एक अदद
मतदाता पहचान-पत्र
हासिल करने के लिए
बार-बार फोटो खिंचा रहे थे
परन्तु हर बार उनकी मानवाकृति
बैल में बदल जाती थी।

वे सब
हमारे ही प्रियजन थे
और हमारा
अवांछित भविष्य हो सकते थे।

कुछ लोग बिल्कुल चुप थे
जिन्होंने कई बार
नाजुक मौकों पर हमें
आत्महत्या का परामर्श दिया
वे सब आत्म-वध को भी
क्रान्ति मान चुके लोग थे।

हमसे पहले भी आए थे
सब सच-सच कहने वाले
दुनिया को अपना
शोधा सच बतलाने वाले
दुःख है तो
दुःख का कारण समझाने वाले
समतल धरती को
गोल-गोल दिखलाने वाले।
    
(तीन)

वसन्त की पहली सुबह
जब हम जागे
हमें सामने खड़ा मिला
एक दिव्य पुरुष ।
ऐसा जिसे देखते ही
उमड़ पड़े श्रद्धा।

उसकी लाल-लाल आंखों
के भीतर एक साथ
चारों ने झांका
और किसी सम्मोहन में
बंधकर बैठ गए
अपने से वंचित।

उसने हमसे कुछ भी न कहा
इस तरह हमारे साथ रहा
उतने समय में भीतर-बाहर
कि हम आतंकित होने लगे थे।

उसका होना
एक तड़प का होना था
एक छटपटाहट
उसके साथ चली आई थी
हमारे भीतर
इसीलिए भय था।

हम चाहते थे कि बने रहें
हम जैसे हैंवैसे ही
तो क्या हर्ज़ है ?

लेकिनवह न तो हमें
और न दुनिया को
इस तरह देख सकता था।
वह मौन में भी
सिर चढ़ कर बोलता जैसे
वह बोलता तो
श्रोता बेचैन हो उठते
वह अदृश्य होता
तो और गहरा जाता उसका एहसास।

वह महात्मा नहीं
ज्ञानी नहीं वह
नास्तिक नहीं
अभिमानी नहीं
कोई नजूमी नहींवह प्रियंवद।

वह चाहता था
कि हम जिएं उसकी तरह
मगर वैसे हम जी नहीं सकते थे
वह चाहता था
कि हम सोचें उसकी तरह
मगर वैसे हम सोच नहीं सकते थे
वह चाहता था
कि हम हो जाएं उसकी तरह
मगर हम उसकी तरह
व्याप्त नहीं हो सकते थे।

अपनी छोटी-छोटी
सीमाओं के हम कै़दी
उसका कहा नहीं मान पाये अभी।
हमने हृदय से
उसके अभिनन्दन किये
असहायता की सारी लाचारी के साथ
फिर मिलने के आश्वासन पर
हम चारों
अलग-अलग दिशाओं में चले।

          (चार )

हम चार दोस्त
चार दिशाओं में
बीते कल की डोर पकड़ कर
अतीत के कुण्डों में
डुबकियां लगाते
काश! हाथ आ जाए
कोई स्वर्णयुग।

प्रथम पुरुष ने
कूच किया सरयू की ओर
किस्सा-गो वह
रामराज के किस्से में
डूबा-उतराया
कई माह सरयू के तट पर
कभी-कभी
जल भीतर घुस कर
रहा खोजता एक स्वर्णयुग।


उसे एक स्त्री मिली
स्वर्ण प्रतिमा में बदली हुई
अपनी मांग में
किसी राजा के नाम का सिन्दूर भरे हुए
उसके दोनों ओर
दो बच्चे थे मरे हुए।
एक ऋषि  मिले
अपने श्वेत केश खुजलाते
और लगभग शाप की तरह
मिली हुई लम्बी उम्र पर पछताते।

उसे एक हिरणी मिली
किसी राजकुमार की छट्ठी में
सीझे हुए
अपने हिरण की गन्ध से व्याकुल
इधर-उधर भागती
उसे एक धोबन मिली
सब दाग़ धोती
रात-रात भर रोती-जागती
विगत कल मेंसरयू जल में।

होता तो मिलता
न स्वर्णयुग राम का।

कनक भवन की परिक्रमा कर
मक़तूल शम्बूकों से डर
सरयम से मुंह मोड़
अपना अंगौछा छोड़ वह भागा।

सरयू में गोते खाकर
जाना उसने अवध में जाकर
रामराज स्वर्णयुग होता
तो सरयू भर पानी में
क्यों डूब मरते भगवान ?

द्वितीय पुरुष-कवि
चला गया उज्जयिनी
महाकाल के मन्दिर में गिरा
वह जाकरगश खाकर।

मालवा के आकाश में
उसने मेघों से होड़ लगाई
भटकता रहा बहुत दिनों तक
कालिदास की उज्जयिनी में
मेघदूतयक्ष अथवा
विरहिणी प्रिया को
न पाता हुआ कवि
लौटा महाकाल के पास
न वैसी उज्जयिनी
न वैसे चन्द्रगुप्त न कालिदास।

स्वर्णयुग भी वह क्या भला
जिसमें कोई
सिसकियां भर-भर रोता हो
कोई गान भी गाता हो
तो दुःख से फट पड़ते हों मेघ
कोई भीतर-भीतर जलता हो
और बढ़ जाता हो
पूरी पृथ्वी का तापमान।

बिना किसी तर्क
आगत और विगत का फर्क़
इस सोने का
इस युग का हो बेड़ा गर्क़
हाय कितना विष
कैसा नर्क !

कवि बेहद निराश हुआ
और पहले से ज़्यादा
उम्रदराज़ दिखता हुआ
वहां से लौटा।

अपने सुख और श्री से वंचित
गंवा कर अपना
सब कुछ संचित
भीख मांगते मिले
कवि-कुल-गौरव कालिदास।

तृतीय पुरुष
उस इतिहासकार ने
मुस्कुराते हुए अग्नि में प्रवेश  किया।
स्वर्णयुग लाने की खातिर
वह खुद गोया कुन्दन बन
जाना चाहता था
यह था पूर्ण समर्पण उसका।

अग्निद्वार पार कर
पहुंचा यमुना-तट पर
मुग़ल काल में।

कहां गया वह मुगल स्वर्णयुग
ढंूढ़ा फिरा वह
दीन-ए-इलाही
मगर मिली बस उसे तबाही।

मिले उसे
छोटी-सी कुटिया में
लगभग अज्ञातवास झेलते
मानस पर जमा
धूल की परतें
पोंछ-पांछ कर साफ करते
जर्जर तुलसी।

विनय पत्रिका का अकाल
इतिहासकार को
पहली बार दीखा।

पहली बार ही उसने जाना
जैसे मिट्टी की
परतों के नीचे और परत
वैसे ही इतिहास के नीचे
एक और इतिहास।

कह ही दिया जाता है अकथ्य।
एक सत्ता के समानान्तर
दूसरी सत्ता
सत्य कीसाहित्य की।

अबुल फजलअल बरूनी
स्मिथहेगटाॅड वगैरह
जब लिखते हैं इतिहास
मुस्कुराते हैं स्वर्णयुग।

कोई स्वर्णयुग
जब मक़बरे में तब्दील
होता है
तब सिरहाने के पत्थर पर
चीखता है झूठा समाधिलेख।

हताश इतिहासकार
वह तृतीय पुरुष
सीकरी के
एक लाल पत्थर
पर सिर पटक कर
रोने लगा।
उड़ चले खून के छींटे
टूट गया विश्वास
उसके फटे हुए सिर के साथ।

समय के शिलालेख पर
दर्ज़ हो शायद कभी
एक टूटा हुआ इतिहासकार
और उसके रक्त से
हुआ और गहरा वह लाल पत्थर।

खून से भीगा
इतिहासकार
डूबते सूर्य की तरह लौटा।

चौथा पुरुष
लोकतन्त्र का चौथा पाया थामे
हवा को सूंघता
और वायु के साथ ही
पहुंचा नेहरू के युग में।

आधुनिक भारत के
स्वर्णयुग की तलाश में
टकराया भूल से
किसी की छाती में
गड़े त्रिशूल से।

छूरों और कटारों से
लुकता-छिपता वह भागा
खुली आंख
स्वर्णयुग ढूँढा
तभी दीखा कोने मे
हे राम ! कहता एक बूढ़ा।

अचानक दृश्य बदला
और उसने देखा
खून की एक गहरी लकीर
जहां बांट रही थी
इस महादेश को
ठीक वहीं
गोली चली
और मारा गया इतिहास-पुरुष,
अकाल-पुरुष वह वृद्ध।

उसकी आंखे
कीचड़ से चिपचिपी हो चलीं
उसके नथुनों में
प्राणवायु के साथ
घुसने लगी सड़ रही लाशों की दुर्गन्ध।

जरायमपेशा लोगों का
पूरा जमघट लगा हुआ था।

आश्चर्य और सन्ताप
के मिश्रण से
वह भरभरा कर गिर पड़ा।

खुदाई खिदमतग़ारों की
मदद से किसी तरह
एक रेलवे स्टेशन
पहुंचकर उसने पाया
कि यह शहर चंडीगढ़ था
और उसका
प्रेस-पास’ कहीं गिर चुका था।

वायु-गमन के बाद
रेल से पहली बार बिना टिकट
यात्रा में
पकड़े जाने के भय से
वह गन्तव्य स्टेशन से पहले ही
आउटर पर
चलती ट्रेन से कूद पड़ा
और अपने हाथ-पांव तुड़वा बैठा।

           (पांच)
हम चार पुरुष
चार दिशाओं में
जलनभअग्नि और वायु
से आत्म-लज्जित
खाली हाथ लौटे हुए
जब मिले
तो एक दूसरे से गले लग-लग
खूब देर तक रोते रहे।

शिशिर की घोर रात में
कांपते हुए
चार पुरुष हम
उस वसन्त का स्मरण करते
जिसमें मिला था दिव्य-पुरुष।

यह अंधेरी रात थी
और हम सब शीत  से आतंकित
तभी हमें ईशान कोण से
आता हुआ
जलती हुई मशाल-सा
दीखा वह दिव्य-पुरुष ।

उससे हमने अपने सब
दुखड़े कह डाले
अपना-अपना आंखों देखा
सच बतलाया
हमने अपने घाव दिखाये
अपने भयावह अनुभव
उससे बांटते-बांटते
हम चारों
एक बार फिर रो पड़े।

विलाप और करुणा के बीच
सिगरेट सुलगाते हुए
दिव्य-पुरुष घूमा।

एक लम्बा कश खींचकर
हमारी ओर पीठ कर
जोर से बोलना शुरू किया उसने
वक्तव्य दे रहा हो मानो
संबोधित करते हुए पूरा हिन्दुस्तान-
‘‘किसी स्वर्णयुग के
दमकते हुए सोने की
नक्काशी के भीतर
अगणित घाव
अनवरत रक्तस्राव।

सबसे जोखिम है इतिहास
में उत्खनन।

सिंहासनों पर
बदलते हैं शासक जैसे-जैसे
सल्तनतें बदलती हैं
वैसे-वैसे निष्ठाएं
और काल के पत्र पर
सरकारी मुहर के साथ
अंकित हो जाता है
अंगार के समान चमकता एक स्वर्णयुग।

किसी भी कालखण्ड के
ज़ख्म कभी नहीं भरते
वक़्त भर भी नहीं सकता
कोई ज़ख्म
किसी युग के ज़ख्मों स
रिसता हुआ लहू
इतिहास से ज़्यादा
साहित्य में दाखिल होता है।

किसे कहते हो स्वर्णयुग-
जिसमें जागता है कवि
रात-रात भर
या वह जिसमें
रातें नागिन-सी डसा करती हैं
वह कौन सा स्वर्णयुग
जिसमें कोई फरियादी
निरन्तर रोने और
कभी भी नींद भर न सोने
की शिकायत करता है।

कौन वह स्वर्णिम काल
जहां दुर्भिक्ष-अकाल
फटता है धरती का कलेजा
एक भूमिजा स्त्री
हार कर फिर
धरती में समा जाती है।
अथवा समानता की मांग पर
एक दलित
क़त्ल कर दिया जाता हो जिसमें।

इतिहास से बाहर
एक कविता
कै़द कर लेती है
इतिहास-पुरुषों के
जूतों तक के निशान।

इतिहास में सुरक्षित होंगे
अशोक महान् हो कर
वहींकहीं आस-पास
समुद्रगुप्तविक्रमादित्यअकबर
कितने शककितने हूण
कनिष्क के साथ कितने कुषाण
मंगोलचोलचन्देल
परमारसिसोदिया और चौहान

लेकिन वह कौन स्वर्णिम अतीत
जब कोई कुचलवा दिया जाता है
उन्मत्त हाथी के पांवों तले
किसी का हाथ
काट लिया जाता है।

किस काल में होता है प्लावन
पोत में बचाए जाते हैं
किसी तरह बीज-ज्ञान
कब फटते हैं ज्वालामुखी
भूमि कब होती है कम्पायमान।

सब कुछ निषिद्ध
होता है किस समय
खत्म हो जाते हैं
सारे अधिकार
शेष रह जाते हैं बस कर्तव्य।

आप समझते होंग
वह कौन-सा समय होता है
जब अंधेरा
जीवन का
बीजशब्द बनता जाता है
हिंसक पशु
खुलेआम घूमा करते हैं।

स्वर्णयुग
जो तुमनेे चाहे
मेरे लेखे
वह कठिन समयवह बुरा समय।

स्वर्णयुग के लिए
पीछे मत लौटो मेरे बच्चों
आगे बढ़ो
तुम्हारे बिना
कोई स्वर्णयुग होगा कैसे ?
तुम अपने भावी सपनों
का निर्माण करो
मायावी अतीत कारा है
इससे बाहर निकलो।’’

इतना कह उस दिव्य-पुरुष ने
अपने बांए हाथ को झटका
सिगरेट
बुझ चुकी थी अब तक
जिसे उसने मसल कर फेंका।

इससे पहले
कि उसके लम्बे वक्तव्य से
बाहर आ हम
कुछ कह पाते
वह कांपते हुए
एक प्रकाशवृत्त में बदला
और फिर गुम हो गया।

        (छह )
कई-कई दिनों के जागे
हम चारों जो विफल अभागे
निश्चिन्त  हो कर सोये
बहुत दिनों तक खोए-खोए
भावी जीवन के स्वप्नों में
उठे तो फिर भूख के साथ।

हम अपने समय से
खाये हुए लात
करना चाहें अब
नए दिनों की बात
मगर अब भी मुश्किलें बहुत थीं।

गांधी अब महज़
एक मजबूरी का नाम था
ब्रह्मचर्य-नहीं वर्य
नपुंसक बनाता जो
अहिंसा के नाम पर
कनपटी पर तमाचे
ऐसे में कौन अब
गांधी को बांचे।
मजबूरी का नाम था
पूरा विचार ही
लाचार और बेकाम था।

अब उसके नाम पर
डोलता नहीं पत्ता
घिस-घिस कर नाम उसका
चोंथ-नोच डाली सत्ता
ये बदलाव के दिन
अलबत्ता...।

शक्तिपात
समय आपात
संवैधानिक अधिकार ही
करते आघात।

लोहिया और जयप्रकाश
अंधकार में हारे
व्यर्थ हो चुके जैसे
चिन्तक सब लस्त-पस्त
संगठित आन्दोलन
हुए पथभ्रष्ट न्यस्त।

नक्सलबाड़ी के
शहीद मजदूर-किसान
आत्महत्या को विवश नौजवान
अधूरे ही रहे ख़्वाब
हर बार हर सवाल
रह जाता लाजवाब।

शासक और सन्त
एकमेक हो गए
करते हुए घोषणा-
इतिहास का अन्त
विचारों का अन्त
हा हन्त! हा हन्त!
कपिता का अन्त
प्रभु-महन्त !

जब ईश्वर बौराया
जंगल-जंगल भटके
जब आतंकी हत्यारे
उसके पीछे दौड़ें
जब ईश्वर को भी
मुश्किल से जान बचानी हो
जब भक्तों ने ही
तख्तों की हठ ठानी हो
वह कठिन समयहमारा समय।

चमकता हुआ बाज़ार
लपलपाते हुए हथियार
लील लेने को तैयार
समूचा संसार।

मरता हुआ मेसोपोटामिया
घुटता हुआ कोरियाईरान
लातीन अमरीकादक्षिण अफ्रीका
भूखा इथोपिया
क्यूबावियतनाम
ऐसे ही कितने नाम।

अतीत से बाहर
हमारा वर्तमान कितना भयावना
साम्राज्यवादी कर
गहते केश
गिरवी होता जाता
हमारा प्यारा देश।

स्पेशल इकानामिक जोन
लखटकिया कार
मोबाइल फोन
चिन्ता से बाहर
आटाकिरासिननोन
स्पेशल इकनामिक जोन।

किसान बेज़मीन
अपने स्वत्व से हीन
होकर मांगते-फिरते मुआवज़ा
भीख की तरह।
भोगने को अभिशप्त सज़ा
लाठियांहत्याबलात्कार
व्यापक नरसंहार
और एक आतंककारी मौन
स्पेशल इकानामिक जोन।

रक्तपात और लूट
देख-देखटूट-टूट
फिर से एक बार जुड़े,
हम जैसे बहुत लोग
भागते-फिरते हैं छिपे
ऐसे ही लोगों की गही बांह
हम चारों दोस्तों को
सूझी एक नयी राह
हम चारों साथ मुड़े।

       (सात)
हम चार दोस्त
निकले वन की ओर।
वन दरोगा की आंख बचाकर
एक गिरे पेड़ को
खींचकर लाए।
बनाए उसे चीर कर चैले
फिर उपलों के ऊपर धरकर
चिता बनाई।

चौराहे पर
सिनेमा के पोस्टर
चिपकाने के लिए
रखी हुई बांस की सीढ़ी
को हमने लालच से देखा।

उसकी डांड़ों को तोड
कर हमने
उसे मूंज से बांधा
और टिकठी की शक्ल दी।

हम चार पुरुशों ने
उस पर
लिटा दिए
अपने-अपने अतीत के स्वर्णयुग।
हम चारों ने
अर्थी को अपने
पुनार्शक्तिसम्पन्न कन्धे दिये।
हमने अपने स्वर्णयुगों की
चिता जलाई
अपने-अपने मोह
को राख होते हुए देखा।

हम चार पुरुषों ने
हम चार दोस्तों ने
मृत स्वर्णयुगों पर
मिलकर गीत लिखा।

मोहभंग से
ऊपर उठकर
मानो हंसते हुए स्वयं पर
वह शोकगीत यहां
फिर से गा नहीं सकते।

                             

                            सम्पर्क सूत्र: निराला निवास, 265, छोटी वासुकीदारागंज,
                                     इलाहाबाद-211006  मोबाइल 09415289529

14 comments:

Sanat Singh ने कहा…

पढ़ा अशोक भाई... विवेक को बधाई...! पर आगे कुछ कह पाना अभी मुश्किल है.. चार-छः बार और पढूंगा....स्वर्ण युग की चिता में बार-बार आग लगाकर हमारी आँखे उससे ज्यादा बार नम होती रहती हैं... आप की तजबीज में इतना जोडूंगा कि यह कविता पढ़े जाने की नही बार-बार पढ़े जाने की मांग करती है....

Mahesh Chandra Punetha ने कहा…

jab mujhe link mila lambi kavita ke naam par thora thithaka.....jab parane laga to bus parata hi gaya....kahi koyi rukawat nahi....bus kavita bheetar utarati gayi......ek kahani sa aanand pradan karati huyi laga jaise apani hi kahani pad raha hun.....itihas,rajneeti,samaj ki anwarat yatra main le chali bahut door....ant main us samay main le aayi jisako ham roj dekh-sun-samajh rahe hain. hamare samay ke jwalant prashno se takarati or unake samadhan dudane ko prerit karati sundar kavita....shukriya dono ka....fir-fir padunga is kavita ko.

Mahesh Chandra Punetha ने कहा…

jab mujhe link mila lambi kavita ke naam par thora thithaka.....jab parane laga to bus parata hi gaya....kahi koyi rukawat nahi....bus kavita bheetar utarati gayi......ek kahani sa aanand pradan karati huyi laga jaise apani hi kahani pad raha hun.....itihas,rajneeti,samaj ki anwarat yatra main le chali bahut door....ant main us samay main le aayi jisako ham roj dekh-sun-samajh rahe hain. hamare samay ke jwalant prashno se takarati or unake samadhan dudane ko prerit karati sundar kavita....shukriya dono ka....fir-fir padunga is kavita ko.

Prafulla Kolkhyan ने कहा…

विवेक निराला की लंबी कविता को पढ़ा। कविता उपलब्ध करवाने के लिए धन्यवाद। अभी मुझे इतना ही कहना है कि इस समय सामने आ रही कविताओं से भिन्न आस्वाद, सलूक और प्रवाह की यह कविता है। इसे बार-बार पढ़ने जाने की जरूरत है.. मुझे लगता है हमारे समय का ऐसा शोकगीत (उस अर्थ में जिस अर्थ में किसी महत्त्वपूर्ण रचना को महाकाव्य कहा जाता है) मझे देखने को नहीं मिला है। अभी इतना ही..

SauRabh ने कहा…

कुछ अच्छा पढना; सच में अच्छा ही लगता है, और ये अनुभव भी कुछ ऐसा ही रहा.

' मिसिर' ने कहा…

यूँ मैं लम्बी कविता लिखने,पढ़ने से बचता हूँ लेकिन इसी को लम्बे विलाप से रोका तो नहीं जा सकता !अपने समय कि त्रासदी का रेशा-रेशा बयान हुआ है कविता में ! प्रस्तुति के लिए अशोक जी का आभार और विवेक जी को बधाई !

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

भाई विवेक जी आपकी लम्बी कविता बहुत ही उत्कृष्ट है |कविता लम्बी है पर पठनीय है उबाऊ नहीं निर्वाह भी गजब का है |अद्भुत |आभार |

rashmi rekha ने कहा…

अपने समय के यथार्थ को उसकी तमाम जद्दोजहद के साथ पकरने की कोशिश है,इतिहास और परम्परा की लम्बी यात्रा से गुजरते हुए.काविता मे प्रवाह भी है.कवि और आपको बधाई.

rashmi rekha ने कहा…

अपने सामय के यथार्थ को पकरने की सधी हुई कोशिश् इतिहास की यात्रा करते हुए/जिन्दगी की तामाम जद्दोजाहाद के साथ.बाधाइ

Shyam Bihari Shyamal ने कहा…

वाह... ऐसा संभवत: पहली बार हुआ है कि कि‍सी लंबी कविता को बिना रुके कथावेग के साथ जज्‍ब करता चला गया और अंतिम अंश तक आते-आते मन-मस्तिष्‍क अब महाकाव्‍य-सुख से भर गया है..। सशक्‍त और यादगार कृति। यह रचना अपने समय को बूझते और उससे जूझते हुए अपने वक्‍त के सवालों से एक-एककर जिस दुर्द्धर्षता के साथ संघर्ष करती है, इसका साक्षी-साझीदार होना यादगार अनुभव बना। अभी तो तत्‍काल इतना ही, जिसे कहे बगैर वस्‍तुत: यहां से हिलना भी संभव नहीं था। रचना पर अगले पाठों के बाद फिर कभी चर्चा का मौका पा सकूं, यह प्रयास रहेगा। बंधुवर विवेक जी को अनंत अंतरंग बधाई-शुभकामनाएं.. 'असुविधा' का आभार..

Shyam Bihari Shyamal ने कहा…

वाह... ऐसा संभवत: पहली बार हुआ है कि कि‍सी लंबी कविता को बिना रुके कथावेग के साथ जज्‍ब करता चला गया और अंतिम अंश तक आते-आते मन-मस्तिष्‍क अब महाकाव्‍य-सुख से भर गया है..। सशक्‍त और यादगार कृति। यह रचना अपने समय को बूझते और उससे जूझते हुए अपने वक्‍त के सवालों से एक-एककर जिस दुर्द्धर्षता के साथ संघर्ष करती है, इसका साक्षी-साझीदार होना यादगार अनुभव बना। अभी तो तत्‍काल इतना ही, जिसे कहे बगैर वस्‍तुत: यहां से हिलना भी संभव नहीं था। रचना पर अगले पाठों के बाद फिर कभी चर्चा का मौका पा सकूं, यह प्रयास रहेगा। बंधुवर विवेक जी को अनंत अंतरंग बधाई-शुभकामनाएं.. 'असुविधा' का आभार..

kalawanti singh ने कहा…

bahut hi badhiya.achchi kavita to gunge ka gud ka swad hoti hai.uski vyakhaya kaise karun.kalawanti singh

अनुपम परिहार ने कहा…

बहुत सुंदर!! बस पढता ही गया........एक दीर्घ निःश्वास के बाद समाप्त किया। कविता में बहा ले जाने की शक्ति है!!

बेनामी ने कहा…

शानदार। लय का निर्वाह और कथ्य का प्रवाह अपनी ओर खींचता चला जाता है। कवि की कामयाबी जश्न की हकदार है।

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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