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शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

विशाल श्रीवास्तव की कविताएँ


इन कविताओं का रचना समय अलग-अलग है। एक कविता बिल्कुल नयी है, शेष पहले लिखी गयी हैं। इधर हाल की घटनाओं ने मुझे भीतर तक आहत किया है। आज के समय में एक बार पुनः साम्प्रदायिक उभार सामने आ रहा है और साथ ही विचारधारा के सतत स्खलन ने न सिर्फ वैचारिकता के मायने बदल दिये हैं बल्कि एक खतरनाक चुप्पी भी चिंतन क्षितिज पर दिखती है। हिंसा और घृणा से भरे इस समय में पता नहीं क्यों लगता है कि शायद इन कविताओं को फिर से पढ़े जाने की ज़रूरत हो।
                                                                                                                   विशाल श्रीवास्तव




आग लगाने वाले

कंदराओं और पहाड़ियों को
पार करके नहीं आते आजकल
आग लगाने वाले
वे यहीं हैं
ठीक हमारे बीच
उन्हें पहचानने की कोशिश करो
देखो वे हमसे अलग नहीं हैं चेहरे मोहरे में
रक्त भी हमारे जैसा ही है उनका
हमारे ही जैसा स्वेद

नहीं हैं वे
पुराने अच्छे दिनों के खलनायकों की तरह भी
जिन्हें देखते ही पहचान सकते थे हम
उनके चेहरे, कपड़ों या आंखों में बसी क्रूरता से
वे जो करना चाहते थे वह दिखता था उनकी भंगिमा में
हिंसा उनके लिए गर्व का विषय थी
शराफत का कोई ओवरकोट नहीं था उनके पास

आजकल आग लगाने वाले बड़े विनम्र हैं
सुसंस्कृत और सभ्य हैं
अच्छी फिल्में देखते हैं
सुनते हैं अच्छा संगीत
परिष्कृत रुचियों से लैस हैं
आजकल आग लगाने वाले

मुश्किल यह है कि अब वे दूसरी तरफ नहीं
इधर ही खड़े हैं ठीक हमारी ही तरफ

आग लगाते हैं वे
शब्दों से
चुप्पी से
शब्दों के बीच के अंतराल से
कभी कभी तो
पानी से भी आग लगाते हैं वे

आग लगाते वक्त
गिरोहबंदी कर लेते हैं वे
हिंसक हो जाते हैं
मिमियाते रिरियाते है
भावुक होकर रोते है
अपनी पूंछ दबाकर
फिर लपकते हैं सियार की तरह

जबड़ों से रिसते खून को
छिपाने की कोशिश करते हुए
मातमपुर्सी को पहुंच जाते हैं
आगजनी की जगह पर
और देते हैं उदात्त दार्शनिक प्रवचन

वे जब भी उब जाते हैं
प्रगतिशीलता की जकड़न से
तो पिकनिक मनाने के लिए
आग लगाते हैं
और फिर चुपचाप आकर
बैठ जाते हैं हमारे ही शिविर में

मृत्युगंध गयी भी नहीं होती
उनकी काया से
और वे हमें ही सिद्ध करते हैं
हत्यारा

सोचो कि कैसे बचना है इस आग से
रहते हुए इसके बीच
हवा की तरह
पानी की तरह



डाल्टनगंज के मुसलमान

कोई बड़ा शहर नहीं है डाल्टनगंज
बिल्कुल आम क़स्बों जैसी जगह
जहाँ बूढ़े अलग-अलग किस्मों से खाँसकर
ज़िन्दगी का क़ाफिया और तवाज़ुन सम्भालते हैं
और लड़के करते हैं ताज़ा भीगी मसों के जोश में
हर दुनियावी मसले को तोलने की कोशिश

छतों के बराबर सटे छज्जों में
यहाँ भी कच्चा और आदिम प्रेम पनपता है
यहाँ भी कबूतर हैं
सुस्ताये प्रेम को संवाद की ऊर्जा बख्शते

डाॅल्टनगंज के जीवन में इस तरह कुछ भी नया नहीं है
यहाँ भी कभी - कभी
समय काटने के लिए लोग रस्मी तौर पर
अच्छे और पुराने इतिहास को याद कर लेते हैं।

इन सारी बासी और ठहरी चीज़ों के जमाव के बावजूद
डाॅल्टनगंज के बारे में जानने लगे हैं लोग
अख़बार आने लगा है डाॅल्टनगंज में
डाॅल्टनगंज में आने लगी हैं ख़बरें
आखिरकार लोग जान गये हैं
पास के क़स्बों में मारे जा रहे हैं लोग

डाॅल्टनगंज का मुसलमान
सहमकर उठता है अजान के लिए
अपनी घबराहट में
बन्दगी की तरतीब और अदायगी के सलीकों में
अकसर कर बैठता है ग़लतियाँ


डाॅल्टनगंज के मुसलमान
सपने में देखते हैं कबीर
जो समय की खुरदरी स्लेट पर
कोई आसान शब्द लिखना चाहते हैं

तुम मदरसे क्यों नहीं गये कबीर
तुमने लिखना क्यों नहीं सीखा कबीर
हर कोई बुदबुदाता है अपने सपनों में बार-बार

कस्बे के सुनसान कोनों में
डाॅल्टनगंज के मुसलमान
सहमी और काँपती हुई आवाज़ में
खुशहाली की कोई परम्परागत दुआ पढ़ते हैं

डाॅल्टनगंज के आसमान से
अचानक और चुपचाप
अलिफ़ गिरता है।




जतिन मेहता एम ए

जतिन मेहता एम ए
अपने अँधेरे कमरे में
पीली रोशनी से भरा कोई काग़ज़ पढ़ रहा है
और उससे थोड़ी दूर दीवार पर
एक अधेड़ मकड़ी पूरी मेहनत से
इतिहास का सघनतम जाला बुन रही है

अभी-अभी कमरे की खिड़की पर
पंखों पर गहरे कत्थई दाग़ वाली
एक तितली आकर बैठ गई है
वह किसी पेट्रोल कम्पनी के
लुभावने विज्ञापन से भाग आई है
जिसे समूचे विश्व के अधिनायक द्वारा दिये
शान्ति-सन्देश के बाद दिखाया जा रहा था
खबरें बता रही हैं
ठीक अभी कुछ समय पहले
बसरा के किसी उपनगर में
मार दिये गये हैं कुछ अनाम लोग

बाहर मुहल्ले की संकरी गली में
कोई पुराने हारमोनियम पर
किसी मर्सिए के पहले टुकड़े जैसी
भारी और उदास धुन बजाने की कोशिश में है
और दूर अहमदाबाद की किसी निचली अदालत में
सहमी हुई कोई लड़की अपना बयान बदल रही है
अपनी फीकी और बदरंग ओढ़नी में
न्याय के नाम पर समेट रही है
गीला और साँवला दुःख

पीली रोशनी से भरा हुआ यह काग़ज़
शोक-प्रस्ताव जैसा दिखने वाला एक सन्धि-पत्र है
आइए इसकी सयानी बारीकियों को समझें -
तुम तो बे्रष्ट और नेरुदा को समझते हो जतिन
इस काग़ज़ को किसी रूखे शासनादेश की तरह नहीं
किसी मोनोग्राफ या निबन्ध की तरह
पूरी सहजता और भरोसे के साथ पढ़ो
पढ़ो और समझो कि हमने गढ़ा है
निर्ममता का सम्भ्रान्त शिल्प
लोगों के मर जाने के पीछे हमने
सुलझे हुए और गहरे वैज्ञानिक तर्क दिये हैं
तुम्हें सबकुछ दिखाया है सजीले माध्यमों के जरिये
तो यह सारा कुछ गम्भीरता से देखो
और बस यहीं
मार्मिक होने से पहले कृपया थोड़ा रुको
दुखी होने से पहले
अपने शोक और विषाद की मात्रा को
बाज़ार जैसी ज़रूरी व्यवस्था को तय करने दो

जतिन मेहता एम ए
पीली रोशनी से भरे काग़ज़ को
गुलाबी चिट्ठियों के बीच सम्भालकर रख रहा है
उसे पढ़ने लिखने मे मुश्किल हो रही है अब


क्या हमारे भीतर कहीं आग बची है?

लक्षित नहीं होता है पर
जीवन के ठंडे और धूसर
राखभरे अवसाद के नीचे
क्या हमारे भीतर कहीं आग बची है?

मुट्ठी की नसों को मार गया है लकवा
प्रशान्त विनम्रता और धैर्य में निहुरे-निहुरे
रीढ़ में बस गया है एक नाजु़क स्थायी लोच

केवल जिन पर अपना बस चलता है
रात के कुछ उन बिल्कुल अपने घण्टों में
अपने रोग शोक ग्रस्त सपनों में
हम क्रान्ति जैसा कोई वर्जित शब्द काँखते हैं

हमारे जर्जर शब्दकोशों के दीमक खाये पन्नों
में प्रतिरोध जैसे तमाम शब्दों पर
गिर गयी है प्रसन्न स्याही की कोई बूँद

_____________________________________________________________


सुपरिचित कवि. कविता के लिए अंकुर स्मृति सम्मान. 
जनवादी लेखक संघ से सम्बद्ध तथा सम्प्रति फैजाबाद 
में एक महाविद्यालय में अध्यापन.

संपर्क : ई मेल - vis0078@gmail.com

18 comments:

रामजी तिवारी ने कहा…

पहली कविता लाजबाब है ...और बाकी भी अच्छी हैं ...बधाई विशाल जी को

पंकज मिश्र ने कहा…

आग लगाने वाले... कविता , जतिन मेहता एम ए तक आते आते पूरी होती है ....दंगो के भीतर , दंगाइयों के भीतर , आम आदमी , बुद्द्धिजीवियों सबके भीतर झांकती कवितायें .......बधाई विशाल को

Santosh ने कहा…

पहली कविता "आग लगाने वाले " की सभ्य (?) भाषा और शैली बहुत कुछ कहती है ! दरअसल ये शुद्धतावादियों और कट्टर वामपंथी (?) नाम के एक मजहब का उदार और वामपंथी रुझान वालों पर सीधा प्रहार है और उन्हें जमात से छाटने की प्रक्रिया का एक अंग ! वैसे ये छाटने की प्रक्रिया और बाहर निकलने के ये प्रयास नए नहीं हैं ! जब से वाम पंथ इस भारतीय धरा पर आया है तब से ये प्रयास चल रहा है और देखिये न छांटते छांटते और बाहर निकलते निकालते खुद ये कट्टरपंथी अल्पमत में घूम रहे हैं ! ये भूल गए हैं---आज आर्थिक से लेकर राजनैतिक मोर्चों तक पे इनका कोई वजूद नहीं बचा और कारण बहुत स्पष्ट है--ये अपने पाषाणबना कर , सैन्य परेड करा कर, असहमति को दबा कर ( उसके लिए सबसे बढ़िया तरीका --सीधे सांप्रदायिक होने का आरोप लगा दो ) आदि आदि रूपांतरण करने के बाद ही अपने में शामिल करते हैं ! साम्प्रदायिकता के दो मुहें सांप के एक फन को प्यार से पालने वाले और शह देने इन तथाकथित शुद्धता वादियों की परवाह भी कौन करता है ? इनकी महफ़िल से बढ़िया वो महफ़िल है जहाँ --- इंसान को उसी रूप में स्वागत होता है जैसा वो है, जहाँ सच को सच कहा जाता है, जहाँ आदर्श और व्यवहार में दोगलापन नहीं है ! वैसे ---कविता बहुत अच्छी है ! शब्दों के बीच से असल भावार्थ और आग्रह छलक के बाहर आता खूब दीखाई दे रहा है ! विशाल जी को बधाई ! अशोक जी का आभार !

' मिसिर' ने कहा…

साम्प्रदायिकता,दंगाई मानसिकता के पीछे के कारणों और दंगाग्रस्त कस्बों के बिगड़े हुए माहौल पर प्रभाशाली विश्लेषण-परक कवितायेँ ! विशाल जी को बधाई !

A.H.Khan ने कहा…

सचमुच विशाल श्रीवास्तव जी की कविताओं ने मन मस्तिषक को झिजोड कर हिर्दय में आग लगा दी है,बहुत ही मार्मिक कवितायेँ हैं,अशोक पण्डे जी धनवाद.

Ashok Kumar Pandey ने कहा…


Ashok Kumar Pandey काश की सिर्फ इतना होता? मैंने यहाँ तमाम ऐसे लोग देखे हैं जिन्होंने प्रगतिशीलता से हर संभव फायदे लेने के बाद अब 'अच्छे आदमी' का लिबास ओढ़ लिया है. अव वे प्रगतिशीलता की जकडन से ऊब पिकनिक के तौर पर आग लगा रहे हैं...दुष्यंत बहुत याद आते हैं...सच के इतने चेहरे देखे हैं कि क्या कहा जाय (एक सच गुरुमूर्ति भी देख रहे थे गडकरी का) ..कई बार सच के दावे भी बड़े भ्रामक होते हैं...भयावह होते हैं.

रुझान होना और किसी सिद्धांत को सांगोपांग ग्रहण करना दो अलग-अलग चीजें हैं. रुझान नेहरू का भी था..लेकिन जब तिलंगाना में लड़ाई छिड़ी तो वह अपने वर्ग मित्र के पक्ष में वामपंथियों को कटवाने में नहीं चुके...ऐसे कितने किस्से दर्ज हैं इतिहास की किताबों में. सिद्धांतों से समझौता करके बहुमत बन जाने से बेहतर है, सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए अल्पमत हो जाना. बहुमत तो इन दिनों साम्प्रदायिक कट्टरपंथी हैं..तो क्या उनमें शामिल हो जाया जाय?


Pankaj Mishra Santosh Kr. Pandey...उस पूरे विवाद में मेरी कोई एक हिस्सेदारी नहीं थी हालांकि सरसरी तौर से उन पोस्तो से गुजरता रहा .......मुझे लगता है इस वक़्त भी तुम कविता के बजाए कवि को पढ़ रहे हो ...जो इस पोस्ट के लिहाज़ से उचित नहीं है

Santosh Kr. Pandey फायदा ?? कैसा फायदा अशोक जी ! आज तक हम जैसे चूतियों को कोई फायदा तो नहीं मिला ! Ashok Kumar Pandey हम लोग तो झंडा उठा के चलने वाले लोग हैं ! वैचारिक शुद्धता कहाँ से आयेगी ! भूल-चुक लेनी देनी ! वैसे पंकज भाई की बात सच है..मैं कवि को ज्यादा पढने बैठ गया था ! चलिए! मैं बहस से अब आफ़ होता हूँ ! विशाल जी को पुनः बधाई , इन सुन्दर कविताओं के लिए !

Ashok Kumar Pandey ज़ाहिर तौर पर. आप क्या फायदा लेंगे? आप अपने मेहनत की खाते हैं संतोष भाई...

यहाँ बात उन अन्दर के लोगों की है जिन्होंने जनवाद से सारे फायदे लिए, साहित्य से लेकर जीवन में प्रतिष्ठित हुए...और अब वाम को गरिया ही नहीं रहे बल्कि हवा का रुख बदलते देख रंग भी बदल रहे हैं. गौर से देखिये यह कविता उन्हीं के ऊपर प्रहार करती है जो हमारे घरों में ही अपने बन के रहते रहे.

Santosh Kr. Pandey ओह...फिर तो मुआफी !लगता है मैं भी पूर्वाग्रह में बह गया ! आखिर इंसान हूँ ! :( ठीक तो है ---ऐसे लोगों को चिन्हित करना ही चाहिए !

Anand Dwivedi ने कहा…

इन सारी बासी और ठहरी चीज़ों के जमाव के बावजूद
डाॅल्टनगंज के बारे में जानने लगे हैं लोग
अख़बार आने लगा है डाॅल्टनगंज में
डाॅल्टनगंज में आने लगी हैं ख़बरें
आखिरकार लोग जान गये हैं
पास के क़स्बों में मारे जा रहे हैं लोग..
......
वे जब भी उब जाते हैं
प्रगतिशीलता की जकड़न से
तो पिकनिक मनाने के लिए
आग लगाते हैं
और फिर चुपचाप आकर
बैठ जाते हैं हमारे ही शिविर में

सुंदर कविता है विशाल जी की ....विशाल जी इस बार के अंकुर स्मृति समारोह में भी दिल्ली आये थे मिलने का सौभाग्य भी मिला था |

neera ने कहा…

मानसिकता में लगी दीमग और उसके घिनोने रूप की तहों को उजागर करती हैं उत्तम कवितायें ...

क्या हमारे भीतर कहीं आग बची है?

कविता के माध्यम से एक बहुत जटिल चुनोती है सभी के लिए क्योंकि इसी आग के इंधन ने शायद अभी तक मनुष्यता को जीवित रखा है


विशाल जी को बधाई और अशोकजी का धन्यवाद!

kathakavita ने कहा…

और दूर अहमदाबाद की किसी निचली अदालत में
सहमी हुई कोई लड़की अपना बयान बदल रही है
अपनी फीकी और बदरंग ओढ़नी में
न्याय के नाम पर समेट रही है
गीला और साँवला दुःख.......
कवि मन आहत है ,उसका डाल्टनगंज जहां ' छतों के बराबर छतों में प्रेम पनपता है ' अब उस पर ' अचानक चुपचाप अलिफ़ गिर गया है ' समकालीन समाज का विखंडन हो रहा है ...विचारधारा से संघर्ष से कुछ सुविधाभोगियों का स्खलन, युवा प्रतिबद्ध को विचलित कर रहा है ' आग लगाने वाले हमारे अंदर ही हैं '. कवि साफ़ देख रहा है आज का खलनायक चिकनी - संवरी 'परिष्कृत रुचियों से लैस है' , आजकल ' उसके चहरे , कपड़ों या आँखों में बसी क्रूरता' पुराने खलनायक सी साफ़ नज़र नहीं आती है। इतने शातिर हैं यह सफेदपोश , ठीक हमारे बीच में ही धर्मान्धता जातीयता जैसे ज़हर भर देते है 'यहाँ तक की पानी से आग लगा देते हैं ' 'कवि अपने जगत ज्ञान द्वारा समूचे विश्व के अधिनायक द्वारा दिये
शान्ति-सन्देश ...' से ...'खबरें बता रही हैं ' सचेत करता है ' मृत्यु की गंध उनकी काया में बसी है '' क्या हमारे ..' राख भरे अवसाद के भीतर कहीं आग बची है ?'प्रश्न खडा कर हमें झझकोर रहा है . हमसे वह आग बचा लेने की तजवीज़ कर रहा है ताकि ........

वन्दना ने कहा…

आपका इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (10-11-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

वन्दना ने कहा…

आपका इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (10-11-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

शिरीष कुमार मौर्य ने कहा…

जतिन मेहता एम ए उन कविताओं में है, जिनके आधार पर विशाल को अंकुर मिश्र सम्‍मान के लिए चुना गया था.... मेरी प्रिय कविताओं में है। डाल्‍टनगंज के मुसलमान को अनुनाद के अब तक आए एकमात्र प्रिंट संस्‍करण में छापने का अवसर विशाल ने दिया था.... विशाल को कविता में अब आना होगा...ये पोस्‍ट शुरूआत हो सकती है इस वापसी की...

संतोष कुमार चौबे ने कहा…

अच्छी कवितायेँ .......कवि को बधाई

Amit sharma upmanyu ने कहा…

आग लगाते वक्त
गिरोहबंदी कर लेते हैं वे
हिंसक हो जाते हैं
मिमियाते रिरियाते है
भावुक होकर रोते है
अपनी पूंछ दबाकर
फिर लपकते हैं सियार की तरह

जबड़ों से रिसते खून को
छिपाने की कोशिश करते हुए
मातमपुर्सी को पहुंच जाते हैं
आगजनी की जगह पर
और देते हैं उदात्त दार्शनिक प्रवचन
...........वाह! सभी कवितायें अच्छी हैं आर पहली कविता तो बेहतरीन है!

pahli bar ने कहा…

विशाल की कवितायें हमारे समय के सच को उजागर करती हैं. दरअसल बाहरी दूश्मनों से ज्यादा खतरनाक हमारे अन्दर के छुपे हुए छद्म साथी ही होते हैं जो मौक़ा पाते ही पाला बदलने तक से नहीं हिचकते और हमें ऐसा घाव दे जाते हैं जिसकी टीस आजीवन बनी रहती है. 'आग लगाने वाले' ऐसे ही अवसरवादी तत्वों की पड़ताल करती कविता है. बाकी दो कवितायें भी बढियां लगीं. विशाल जी को बधाई एवं अशोक जी का आभार.

रघुवंशमणि ने कहा…

Achcha hai bhai. ek to purani hai. baki mauju hain. dhanyawad.

Prafulla Kolkhyan ने कहा…

विशाल जी कविताएँ पढ़ी ... अपने समय के बनते हुए वैशिष्ट्य में ठिठकती हुई संवेदना के प्रवेश का रचनात्मक उपयोग को लक्षित किया जाना चाहिए....

Onkar ने कहा…

बहुत सुन्दर लेखन

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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