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बुधवार, 22 मई 2013

नीलेश रघुवंशी की कवितायें



नीलेश रघुवंशी की कविताएँ समंदर के बीच किसी पोत पर बैठकर बनाए गए रेखाचित्रों सी हैं, तूफ़ान के बीच से बयान तूफ़ान की कहानी सी और गहरे अँधेरे के बीच से रौशनी की तरह बिखरती आवाज़ों सी. जीवन के  गहरे और त्रासद अनुभवों के बीच भी नीलेश उम्मीद और उल्लास के स्वर ढूंढ लेती हैं. उनकी कविताएँ एक तरफ गहन अनुभूति की कविताएँ हैं तो दूसरी तरफ जीवन की कुरूपता के ख़िलाफ़ प्रतिबद्धता की भी. स्त्री विमर्श के तुमुल कोलाहल में मुझे ये कविताएँ एक स्त्री की नज़र से जीवन के विविध पक्षों को सहज द्रष्टव्य के उस पार जाकर देखने की बेचैन कोशिश लगती हैं.

हमारे आग्रह पर उन्होंने ये कविताएँ 'असुविधा' के लिए उपलब्ध कराईं जिसके लिए हम आभारी हैं. साथ ही हाल में ही उन्हें मिले 'स्पंदन कृति सम्मान' के लिए हमारी बधाईयाँ भी.  




          चक्रः ग्यारह कविताएँ
  
 भूख का चक्र

सबके हिस्से मजदूरी भी नहीं अब
शरीर में ताकत नहीं तो मजदूरी कैसे ?
छोटे नोट और सिक्के हैं चलन से बाहर
पाँच सौ के नोट पर छपी
पोपले मुँह वाली तस्वीर भी
कई दिन से भूखी है !    


प्यार का चक्र

उछालती जब उसे बाँहों में
दिल काँपता था मेरा
उसकी दूध की उल्टी से
सूखता था मेरे भीतर का पानी
एक वृक्ष की तरह
उसकी जड़ें भीतर फैलती चली गईं !
सोचती
जब अठारह का हो जाएगा
छोड़ दूँगी घने जंगल में
बर्फीले पहाड़ों के ऊपर होगा उसका मचान
अन्तहीन आकाश में उड़ते देख
पीठ फेर लूँगी !

बदलती दुनिया जोखि़म रोमांच से प्यार
बड़ी लम्बी उछाल है उसकी
जाने क्या होता है अब मेरे भीतर
फड़फड़ाती हूँ उसे उड़ते देख
अपने हाथों को ढाल बना
उड़ना चाहती हूँ उसके संग
प्यार का ये चक्र
घूमकर आ ठहरता है उसी जगह
जहाँ...मैं सोचती हूँ बस एक बरस और...!

फैशन का चक्र 
कितना दूर रहती हूँ
दूर और पास को देख चलती नहीं
अगर चलती तो
फैशन नाम क्यों होता फिर !

हर घर का दरवाजा खटखटाना
गिड़गिड़ाहट को विनम्रता की तरह वापरना
क्रोध भय और स्वाभिमान को गिरवी रख
उत्पाद को न चाहते हुए भी बेचना
बदलते फैशन का मिजाज
भाँप सको तो
सेल्समेन और सेल्सगर्ल के चेहरे पर भाँपो...!

झूठ का चक्र

एक झूठ बोला
बचते बचाते दो चार झूठ और बोले
एक नहीं सौ नहीं हज़ारों हज़ार झूठ बोले
आखिर में लड़खड़ाती जुबान में
थक हारकर सच बोला... !

सच धैर्य नहीं खोता
झूठ की मृत्यु की प्रतीक्षा भी नहीं करता
झूठ करता है वो सब कुछ
जिसे करने की सच सोचता भी नहीं
तर्क में नहीं कुतर्क में घुटता है दम झूठ का...! 

मौसम का चक्र

थोड़ा थोड़ा सब कुछ लेने के फेर में
नहीं मिलता कुछ भी 
मौसम बदलता है तो बदलती है सोच
अपने चरम पर पहुँचता
हर चार माह में बदलता
मौसम भी बनाता है हमें निकम्मा !



  रोने का चक्र

तुमने जन्म लिया तो रोए
भूख लगी तो रोए
मन की कोई चीज न मिली तो रोए
अपनों से बिछुड़ने पर रोए खूब रोए !

खुशी में फूट फूटकर नहीं रोए कभी
आँखें गीलीं हुईं और तुमने कहा
ये आँसू खुशी के आँसू हैं..!

फिर
तुमसे कहा गया
बात बात पर रोना अच्छी बात नहीं
रोने से नहीं मिलता कुछ भी
तुमने
अपने भीतर आँसूओं का कुआँ बना लिया
जो मारे ठंडक के जम गया
बहुत दिन से नहीं रोए सोचकर
अचानक तुम रोए खूब रोए....!

जीवन में रोने से नफरत करना भी
एक रोना है....!  





हँसने का चक्र

हँसने हँसाने का दूसरा नाम है जीवन  !
लेकिन जाने कब कैसे और क्यों
हँसना छोड़ दिया हमने
हँसी को छोड़ दौड़ के पीछे लग गए
धीरे धीरे हँसी सेल्समेन सेल्सगर्ल
क्रेडिट कार्ड बेचने वालों की हो गई
हँसी को शिष्टाचार के संग रोजगार बनाया उन्होंने
ठगे जाने के भय से न हँसे न मुस्कुराए
रो भी न सके हम !

हँसना जरूरी है निरोगी काया के लिए
हँसी क्लब में प्रवेश के लिए मोटी फीस भरी
हँसने के नाम पर
कैसी डरावनी आवाजें निकालने लगे हम
हमेशा बुरा माना जाता है बिना वजह दाँत दिखाना !

नदी किनारे मिलती है सच्ची हँसी
नदियों को हमने जाने कब का बेच दिया
हँसने का कोई चक्र नहीं
बिकने की कोई उम्र नहीं...! 
सोचने का चक्र

जब
महानगरों को देखा
चकाचौंध में उनकी घिग्गी बँध गई मेरी
भाषा ने साथ छोड़ दिया
खुद की भाषा को छोड़
लपलपाने लगी दूसरे की भाषा में
स्वचालित सीढ़ियों से डरते
पानी को बिकते खुद को फिकते देख
अपनी जगह लौट आई

लौटकर
गाँवों नगरों को महानगर में बसाने का सोचने लगी
नगर उपनगर गाँव देहात कस्बे महानगर
चकाचौंध धिग्गी लपलपाहट सनसनाहट
नींद ने मेरा साथ छोड़ दिया
नींद को बुलाने के लिए
एक से हज़ार तक गिनती गिनने लगी
गिनते हुए गिनती के बारे में सोचने लगी..!

यात्रा का चक्र

बंजर जिंदगी को पीछे छोड़ देना
बारिश को छूना चाँद बादलों से यारी
नंगे पाँव घास पर चलकर ओस से भीग जाना
खाना-बदोश और बंजारों के छोड़े गए घरों को देखना
खुद को तलाशना उन जैसा हो जाना
न होने पर ईर्ष्या का उपजना.....

प्राचीन इमारतों के पीछे भागना
स्थापत्य मूर्तियों को निहारना
एक पल में कई बरस का जीवन जी लेना
ट्रेन का छूट जाना जेब का कट जाना
किसी के छूटे सामान को देखकर
बम आर.डी.एक्स. की आशंका से सिहर जाना
घर पहुँचना और पहुँचकर घर को गले लगा लेना
यात्रा का पहला नाम डर दूसरा फकीरी  !

बहुत दिनों से जाना चाहती हूँ यात्रा पर
लेकिन जा नहीं पा रही हूँ
एक हरे भरे मैदान में
तेज बहुत तेज गोल चक्कर काट रही हूँ
यात्रा के चक्र को पूरा करते
खुद को अधूरा छोड़ रही हूँ..


नींद और स्वप्न का चक्र

नींद के गुण दोष स्वप्न के गुण दोष हैं !
अनिद्रा की शिकार नहीं
फिर भी
नींद नहीं मेरे पास !
कहती है नींद
खुद के लिए जियो
स्वप्न कहते हैं
औरों के लिए जियो !
न जागती हूँ न रोती हूँ
नींद से भरी
स्वप्न की पगडंडी पर चलती हूँ..!

 
जीवन का चक्र

एकदम घुप्प अंधेरे में
चाक को चलते देखा
अंधेरा इतना ज्यादा
न कुम्हार दिखता न दिखता था आकार !

दुख ही सुख है
यही चक्र है जीवन का...! 

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खिड़की खुलने के बाद

मुंडेर पर अनगिन चिड़िया
दूर कहीं
झुण्ड में उड़ते सफेद बगुले
पेड़ की डाल पर नीलकंठ
कूकती कोयल हरे भरे झूमते पेड़
ताज़गी से भरी सुबह
प्रकृति प्रेम हिलोरें मारता है मेरे भीतर
खोलती हूँ जैसे ही खिड़की
दिखते हैं

सड़क पर शौच करते लोग
कीचड़ में भैंसों के संग धँसते बच्चे
बिना टोंटी वाले सूखे सरकारी नल पर
टूटे फूटे तपेले में अपना मुँह गड़ाए
एक दूसरे पर गुर्राते कुत्ते
दिखता है
कूड़े और नालियों पर बसर करता
सडा़ँध मारता जीवन

देखना कुछ चाहती हूँ
दिख कुछ और जाता है
खिड़की खुलने के बाद.....

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 अखबार में फोटो

पीले पड़ चुके अखबार के पन्नों में छपे....

पहले फोटो में
श्रीनगर के हरीसिंह स्ट्रीट मार्केट में
हरी-भरी सब्जियाँ, कफ्र्यू में ढील ,उतावले जरूरतमंद लोग
चमकदार ताजी सब्जियों पर चमकती दहशत ।

दूसरे में अयोध्या में ग्राहक न आने की वजह से
चाँदी की दुकान में
मंदिर-मस्जिद से परे गहरी नींद में दुकानदार
बेफिक्री ऐसी कि लूट का डर नहीं और जमाने की परवाह नहीं ।

तीसरे में हैदराबाद में तेज बारिश के बाद
सड़क पर भर आए पानी से जूझते हुए लोग ।

चौथे में बाढ़ के पानी में डूबता यमुना मंदिर
एक भी फकीर नहीं आस-पास
पानी में डूबती-तिरती फकीरी नहीं, भव्यता की परछाई है ।


पाँचवे में वृंदावन के बाढ़ग्रस्त इलाके में
तोते को पिंजरे में लिए घुटनों तक डूबी महिला
फोकस करता एक फोटोग्राफर
जिसने तोते की फड़फड़ाहट को भी स्टिल कर दिया है

छठवें फोटो में
उफनती नदी से तबाह हुए घर को देखते किसान परिवार की तीन पीढ़ियाँ हैं
जिसमें बच्चे टीले पर चढ़े हुए
जवान नदी को ऐसे घूर रहे हैं, जैसे वे उसे लील जाएँगे
और वयोवृद्व हाथ जोड़ते हुए ।

कविता के लिए कितने सटीक विषय हैं ये
लेकिन इन पर कविता लिखना कितना मुश्किल... ?

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परिचय 
4 अगस्त 1969 को मध्य प्रदेश के गंज बासोदा में जन्मीं नीलेश के तीन कविता संग्रह 'घर निकासी' , 'पानी का स्वाद' और 'अंतिम पंक्ति में' प्रकाशित हुए हैं. इसके अलावा अभी हाल में उनका उपन्यास 'एक कस्बे के नोट्स' भी खूब चर्चित रहा है. उन्हें 'भारत भूषण सम्मान' सहित कई पुरस्कार और सम्मान भी मिले हैं




10 comments:

vandana gupta ने कहा…

सोच का पैनापन मन को छूता है।

Pratibha Katiyar ने कहा…

बेहतरीन !

गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने कहा…


। हँसने व रोने का चक्र आदि कविताएं काफी अच्छी लगीं ।

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन खुद को बचाएँ हीट स्ट्रोक से - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

neera ने कहा…

सच को रोपती चक्रों में उपजी कवितायें

sarita sharma ने कहा…

नीलेश का उपन्यास मुझे बहुत पसंद आया था.कवितायेँ भी शानदार हैं.मूल्यों के ह्रास पर चिंतित, मन में कस्बाई संवेदनशीलता संजोये हुए प्रकृति से लगाव वाली यादगार कवितायेँ.इनमें स्वयं और समाज के बीच तालमेल का अभाव झलकता है.

पंकज मिश्र ने कहा…

बेहतरीन कविताएं ........
बिलकुल आज की जो घर से बाहर निकलते ही साथ साथ सडक पर चलने लगे , किसी सहयात्रा में

peer educators ने कहा…

पकड़ कर झिंझोड़ देती हैं ये कवितायें !!
अनुपमा तिवाड़ी

Onkar ने कहा…

बहुत सुन्दर रचनाएँ

तुषार राज रस्तोगी ने कहा…

लाजवाब रचना | आभार

कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
Tamasha-E-Zindagi
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