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रविवार, 25 अगस्त 2013

प्रशांत श्रीवास्तव की नई कविता

अपने कवि होने को लेकर ज़रुरत से ज़्यादा गंभीरता से लेने वाले कवियों के बीच प्रशांत की 'प्रशांत' उपस्थिति आश्चर्यचकित करने वाली है. अंशु मालवीय, चेतनक्रांति और प्रभात जैसे कवियों की तरह यह कवि भी अपने कविकर्म को गंभीरता से और कवि होने को यथासंभव अगम्भीरता से लेने वालों में है. यह कविता उसने कोई दो महीने पहले भेजी थी और मैं अपनी आदत के अनुसार इसे भूल गया था. आज अचानक कुछ याद करते हुए इसकी याद आई और इसे दुबारा पढ़ा. 

यह कविता आज बिना कुछ कहे....
ब्रुक्स की यह पेंटिंग इंटरनेट से 
सोचने में होना ---------------

सोचने में बहुत छोटा लगता अपना होना खुद की उपस्थिति से भी छोटा जैसे किसी दु:स्वप्न में निगल लिया जाता अपनी बौनी इच्छाओं के अजगर से चमकीले दिनों और उजली रातों में अतीत के झंखाड़ों के बीच कुछ खोजती-सी किसी सदी के चंद दशकों में फ़ैल जाती अपनी रूह समेटने में हाथ आता एक रीता हुआ पात्र अपने सोचने में रह जाता एक भरपूर खालीपन एक रंग होता एक रंग होता जिसमें लगभग छिप जाते सारे रंग वो प्रेम होता या भय का रंग वो इंतजार का रंग होता या आत्मदाह से उपजी राख का उसमें ही ढंका होता किसी परछांई का रंग अपने होने में, सोचने में, सारे रंगों का मेल धूसर होता ताप से फैलता पारे-सा अपना होना ठोस नहीं होता सोचने में तो हरगिज़ नहीं हजारों मुंह से आती अपनी आवाज अपनी आवाज अपनी नहीं रहती हम लाख चाहते पर अनंत से टकरा कर भी हमारी खामोशी की प्रतिध्वनि में लौटती एक चुप्पी हमारी देह में भरा होता दूसरों का खून हमारे माथे से टपकता पसीना किसी और का अपनी याद बचती उतनी ही कुछ सौ-पचास लोगों के जेहन में जितना बचा है अनदेखे पुरखों का नाम एक बूंद में सिमट आती अपनी पूरी नींद एक क्षाणांश में कौंध उठते सारे सपने सोचने में बहुत छोटा लगता अपना होना अपनी लघुता में समाता तुममें निर्द्वंद, निःस्वार्थ, अबोध खंडित प्रतिमा-सा तुम्हारी ओट में सुरक्षित पूरा नहीं होता अपनी सबसे उम्दा कविता की तरह अधूरा अपने सोचने में, अपना होना कभी मुकम्मल नहीं होता.
------------------------- प्रशांत की कुछ और कवितायें यहाँ

7 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि का लिंक आज रविवार (25-08-2013) को पतंग और डोर : चर्चा मंच 1348
में "मयंक का कोना"
पर भी है!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

शंशांक शुक्ला ने कहा…

अशोकजी आपको बहुत-बहुत धन्यवाद-प्रशांत जी की कविता भेजने के लिए। अपनी लधुता का बोध होना गहरे आत्मनिरिक्षण के पश्चात ही संभव है। व्यापक रूप में यह युग बौनों का युग है।

Onkar ने कहा…

सुन्दर रचना

गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने कहा…

अपनी तलाश, अपने होने का अहसास एक दुर्लभ प्राप्य है । इसी को पाने के लिये आदमी ताउम्र भटकता रहता है । काफी अच्छी लगी यह ताजगी भरी कविता ।

मोहन श्रोत्रिय ने कहा…

"अपनी लघुता में समाता तुममें निर्द्वंद, निःस्वार्थ, अबोध खंडित प्रतिमा-सा तुम्हारी ओट में सुरक्षित पूरा नहीं होता अपनी सबसे उम्दा कविता की तरह अधूरा अपने सोचने में, अपना होना कभी मुकम्मल नहीं होता." अर्से बाद प्रशांत की कविता पढ़ी है.अपनी उपस्थिति से भी छोटा होना, अपना होना. क्या बात है ! सही है, कभी मुक़म्मल नहीं होता अपना होना. बधाई, प्रशांत को.

बेनामी ने कहा…

आदरणीय नमस्कार

आपके यहाँ रचनाये कैसे भेजी जा सकती ई-मेल दिजीयेगा

pur_vyas007@yahoo.com

अपर्णा मनोज ने कहा…

गम्भीर स्वर है प्रशांत का .अच्छी कविता के लिए उन्हें बधाई .

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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