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शनिवार, 22 नवंबर 2014

मैं एक औरत हूँ और एक लेखक हूँ-

(यह साक्षात्कार नया ज्ञानोदय में छपा है. अनुवाद ख़ाकसार ने किया है. अब यहाँ आनलाइन पाठकों के लिए)






जब उपन्यासकार और कहानीकार नादिन गार्दिमेर को साहित्य के लिए 1991 के नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था तो वह पिछले 25 सालों में पहली और अब तक कि केवल सातवीं महिला थीं जिन्हें यह सम्मान मिला था. उनका जन्म 1923 में जोहांसबर्ग के बाहरी इलाक़े के ईस्ट रेंड नामक खनिक क़स्बे के ट्रांसवाल के स्प्रिंग्स में एक प्रभावशाली परिवार में हुआ था.  इस माहौल ने 1953 में प्रकाशित उनके पहले उपन्यास के लिए भाव भूमि प्रदान की. अपनी माँ द्वारा, जो हमेशा सोचती थीं कि उनका दिल कमज़ोर है, अक्सर घर में ही रखे जाने वाली गार्दिमेर ने नौ साल की उम्र में लिखना शुरू कर दिया. उनकी पहली कहानी ‘कम अगेन टुमारो’ जोहांसबर्ग की पत्रिका फोरम के बच्चों के खंड में तब प्रकाशित जब वह केवल 15 साल की थीं. बीस से तीस के साल की उम्र के बीच उनकी कहानियाँ तमाम स्थानीय पत्रिकाओं में छप चुकी थीं. 1951 में न्यू यार्कर ने उनकी एक कहानी स्वीकार की और तबसे वह उन्हें लगातार प्रकाशित कर रहा है.
कम उम्र में ही गार्दिमेर ने दक्षिण अफ्रीका के अड़ियल रंगभेदी शासन में अल्पसंख्यक अश्वेतों के प्रति अन्याय और दमन पर सवाल उठाने शुरू कर दिए. जोहांसबर्ग आ जाने के बाद से गार्दिमेर रंगभेद के खिलाफ संघर्ष में लगातार मुब्तिला होतीं गयीं और अफ्रीकी नॅशनल कांग्रेस की मजबूत समर्थक बनी रहीं. वह दक्षिण अफ्रीकी लेखकों की कांग्रेस के संस्थापक सदस्य थीं और उनके लेखन का बड़ा हिस्सा नस्ली आधार पर बंटे उनके देश के नैतिक और मनोवैज्ञानिक तनावों की बात करता है. बाद के वर्षों में दक्षिण अफ्रीका में प्रतिबंधित होने के बावजूद नादिन गार्दिमेर ने कभी निर्वासन में जाने के बारे में नहीं सोचा और फेस टू फेस (1949), द लाइंग डेज़ (1953), अ स्पोर्ट आफ नेचर (1987), अ गेस्ट आफ आनर (1970), द कंजर्वेशनिस्ट (1974), बर्जर्स डाटर (1979) और द पिक अप (2001) जैसे मील के पत्थर उपन्यासों से रंगभेदी शासन के अंतर्गत जीवन को प्रदर्शित करती रहीं. उनके अन्य कामों में टेलीविजन डाक्यूमेंट्रीज शामिल हैं, जिनमें से सबसे उल्लेखनीय अपने बेटे ह्यूगो कैसिरेर के साथ टेलीविजन फिल्म चूजिंग जस्टिस : एलेन बोसेक है.
1948 से गार्दिमेर जोहान्सबर्ग में रह रही हैं और साठ तथा सत्तर के दशक में उन्होंने अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाया है. नोबेल सम्मान के अलावा उन्हें मिले अन्य सम्मानों में  फ्रांस सरकार द्वारा दिया गया कमान्देर दे आर्दे दे आर्ट्स एट दे लेटर्स और येल, हारवर्ड और कोलंबिया सहित दर्ज़न भर अन्य विश्वविद्यालयों से मिली मानद डिग्रियाँ शामिल हैं.
नार्दिन गार्दिमेर ने अपने लेखन और जीवन में प्रभावी सामजिक चेतना को गहन साहित्यिक मेधा से जोड़ा है.
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एक स्त्री होने और एक लेखक होने को लेकर आप कितनी आत्मविश्वास से भरी और कितनी सतर्क हैं?

नार्दिन गार्दिमेर : मैं वास्तव में यह नहीं कह सकती कि इस बात को लेकर मैंने परेशानी उठाई है कि मैं एक औरत हूँ और एक लेखक हूँ, और मैं इस चीज़ के लिए आपकी तारीफ़ करती हूँ कि आपने “महिला लेखक” नहीं कहा. यह कोई नहीं कहता कि “पुरुष लेखक” लेकिन लोग अक्सर यह कहते हैं कि “महिला लेखक” जो मुझे ऐसा लगता है जैसे एक ख़ास तरह का लेखन हो. वास्तव में गंभीर लेखक अंतरजात मनुष्य होते हैं ; जो किसी वजह से स्त्री या पुरुष के रूप में होते हैं, वे असल में दोनों ही हैं.

अपने लेखन में आप रंगभेद को व्यापक सामाजिक, मानवीय परिस्थितियों की चेतना में उसको रेखांकित कर भीतर से पर्दाफ़ाश करती हैं. एक उत्प्रेरक के रूप में रंगभेद आपके लेखन के लिए कितना महत्त्वपूर्ण था?

नार्दिन गार्दिमेर : मुझे लगता है सभी लेखक अपने सामाजिक ढांचों से गहरे प्रभावित होते हैं. यदि यह संघर्ष में उलझा समाज हो तो यह निश्चित तौर पर निजी जीवन पर बहुत करीब से प्रभाव डालता है जिससे लेखक दोनों चीजों को देखता है – क्या भीतर हो रहा है और बाहर से पड़ने वाले दबाव को भी. इसलिए मैं कहूँगी रंगभेद का बहुत मज़बूत असर था लेकिन मैंने इसे अपनी कहानी पर प्रभाव डालने की अनुमति कभी नहीं दी. मैंने अपनी कल्पना की आज़ादी हमेशा बरक़रार रखी क्योंकि चाहे जितने भी आवेग से जुड़े हों आप लेकिन अपने उद्देश्य के लिए अपनी भावनाओं को खुद को मत प्रचारक बना देने की अनुमति दे देना घातक होगा. राजनीतिक प्रचार का हर तरह की राजनीतिक निर्मिति में, खासतौर से बड़े संघर्षों वाले, एक स्थान है, लेकिन  अन्य लोग हैं जिनका काम राजनीतिक प्रचार सामग्री लिखना है. मेरे जैसे कल्पनाशील लेखक के लिए ऐसा करना बिल्कुल ग़लत है, क्योंकि तब आप सत्य का बोध खो देते हैं. वे लोग जो राजनीतिक रूप से आपके समानधर्मी हैं, देवता बन जाते हैं और दूसरे शैतान. और लिखने का कुल उद्देश्य किसी सच की तलाश है, और मनुष्य जो कि अस्थिर होता है उसके बेहद अव्यवस्थित उद्देश्य होते हैं.

आपकी किताबें 1958 से 1991 तक प्रतिबंधित रहीं. क्या यह प्रतिरोध की और इस तरह प्रचारक न बनने की एक सचेत प्रक्रिया थी?

नार्दिन गार्दिमेर : मुझे लगता है मेरे साथ यह स्वाभाविक रूप से हुआ क्योंकि मैंने बेहद कम उम्र से लिखना शुरू किया जब मैं यह भी नहीं जानती थी कि राजनीति क्या है. मैं तब एक खनिक क़स्बे के उस संकरे, श्वेत परिवेश में रह रही थी जहां आप अपने शिष्टाचार और नैतिकताएं अपने बड़ों और अपने माँ-बाप से सीखते हैं. मैं तब अपनी किशोरावस्था में थी जब मैंने खुद से यह पूछना शुरू किया – ऐसा क्यों है कि स्कूल में सारे लोग श्वेत हैं? ऐसा क्यों है कि जब मैं शनिवार की शाम फिल्म देखने जाती हूँ  तो वहाँ कोई अश्वेत बच्चा नहीं होता? शुरू शुरू में आप इसे स्वाभाविक मान कर स्वीकार कर लेते हैं, जैसे कि यह कोई ऎसी चीज़ हो जिसे बड़ों ने निर्धारित किया है और इसलिए यह अच्छी ही होगी. धीरे धीरे मैं खुद से सवाल करने लगी, किसी राजनीतिक सिद्धांत की वज़ह से नहीं, बल्कि जो मैं अपने चारों ओर देख रही थी उस वज़ह से. मैंने देखना शुरू किया कि अश्वेत लोगों के साथ वास्तव में क्या हो रहा है, खासतौर से प्रवासी खान मज़दूरों के साथ जो हमारे इर्द गिर्द रहते थे.

आपकी पहली कहानी तब छपी जब आप केवल 15 साल की थीं. इसलिए ज़ाहिर तौर पर यह बहुत आरंभिक संवेदनशीलता थी जो आपके चारों ओर के वातावरण की प्रतिक्रिया में थी. इस वातावरण ने आपके साथ कैसा व्यवहार किया जब आपने इस यथास्थिति पर सवाल उठाने शुरू किये?

नार्दिन गार्दिमेर : देखिये, यह एक अंदरूनी सवाल जवाब था. मेरे माता पिता खुद को अराजनीतिक समझते थे, हालांकि हम सब जानते हैं कि यह एक विशिष्ट राजनीतिक पक्षधरता है. मेरी माँ अश्वेत लोगों को लेकर व्याकुल होती थीं और परोपकार की गतिविधियों जैसे, अश्वेतों की बस्ती में दवाखाने या नर्सरी स्कूल खोलने में शामिल होती थीं. तो उनमें कुछ इस तरह की भावना थी कि कुछ ग़लत हो रहा है, लेकिन उन्होंने इसे इतनी गंभीरता से कभी नहीं लिया कि सरकार के ढाँचे पर कोई सवाल खड़ा करें. मुझे यह समझने में कुछ वक़्त लगा कि परोपकारी होने और लोगों के साथ मनुष्यों की तरह व्यवहार करना काफी नहीं था. आपको सबसे ऊपर बैठी सत्ता का विरोध करना पड़ेगा. आपको समूचा ढाँचा बदलना पड़ेगा, और मैं जैसे जैसे बड़ी होती गयी वह और बदतर होता गया. रंगभेद संस्थानीकृत हो गया, यथार्थवाद संस्थानीकृत हो गया.

रंगभेद को लेकर आपकी प्रतिक्रिया कब एक अधिक दृढ़ कार्यकर्ता की प्रतिक्रिया में बदल गयी?

नार्दिन गार्दिमेर : यह 1950 के दशक में हुआ जब मैं जोहांसबर्ग में थी, जो एक बड़ा शहर था. इसलिए मेरी स्वाभाविक प्रकृति, जो तमाम कलाकारों और लेखकों की तरह किसी एक निश्चित ग्रुप के विचारों से पूरी तरह मेल नहीं खाती थी, अपनी खोल से बाहर आई. वहां मैं ऐसे अफ्रीकियों और भारतीयों से मिली जिनके साथ उस खनिक क़स्बे के, जहाँ लोग गोल्फ खेलते थे और शनिवार रात के नृत्य की प्रतीक्षा करते थे, मेरे दोस्तों की तुलना में मेरे विचार अधिक मिलते थे. इस तरह का जीवन मुझे पसंद आया क्योंकि यहाँ मैं विचारों का वह आदान प्रदान कर सकती थी जो मैं उस छोटे से क़स्बे में मिस करती थी.
फिर साठ के दशक में जब राजनीतिक संघर्ष चारों तरफ फ़ैल गया अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस बेहद सक्रिय हो गयी, और हम गांधीवादी अहिंसक विरोध से आगे एक ऐसी संघर्ष की ओर बढे जो अधिक मज़बूत था. जिन लोगों को मैं जानती थी वे और अधिक राजनीतिक हो गए और मुश्किलात में फंस गए. फिर यह एक तरह से दोस्ती की परीक्षा बन गे, उनको छिपाना और वह बनना जो हम सब बने, झूठे. आपको उन लोगों से झूठ बोलना पड़ता था जो आपके दोस्तों के बारे में पूछताछ करते थे और इस तरह आप इसमें और उलझते जाते हैं. यह था जिससे मैं इसमें शामिल हुई. तब मैंने राजनीति और और अधिक सैद्धांतिक दृष्टिकोण से देखना और अपने देश में पूंजीवाद और नस्लवाद का सम्मिश्रण को समझना शुरू किया.

आप अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस की सदस्य तब भी बनी रहीं जब इसे ग़ैरक़ानूनी घोषित कर दिया गया और जब इसने अपनी रणनीति गाँधीवादी अहिंसा से एक अधिक सक्रिय दिशा में बदल दी. आप इस बदलाव के साथ सहज थीं?

नार्दिन गार्दिमेर : हाँ, मैं सहज थी, क्योंकि उस समय तक मैं नेताओं को जानती थी, और जैसा कि अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के पहले अध्यक्षों में रहे लुथुली ने एक बार कहा था, “हम इतने लम्बे समय से पिछले दरवाजे पर धैर्यपूर्वक दस्तक दे रहे थे. किसी दरवाज़े से कोई उत्तर नहीं आया.” साथ ही, साठ का दशक पूरी जनसंख्या को बड़े पैमाने पर हटाने का दशक था. इसलिए जब यह सोफिया नाम के कसबे में हुआ जो जोहांसबर्ग से दो एक मील की दूरी पर ही था, मैं उन चीज़ों को बिलकुल आमने सामने से देख पा रही थी जो लोगों के साथ हो रही थीं और मुझे लगता है कि यह आपका राजनीतिकरण करता है और आपको एक कार्यकर्ता में तब्दील कर देता है.

आपने पूँजीवाद और रंगभेद के बीच के रिश्ते का ज़िक्र किया है. दक्षिण अफ्रीका में जो कुछ हो रहा था आपको उस पर बाक़ी दुनिया के देशों ने जो स्टैंड लिया उसका किस हद तक असर दिखता है? या यह मुख्यतः एक आतंरिक प्रक्रिया थी?    

नार्दिन गार्दिमेर : दुर्भाग्य से पश्चिमी दुनिया की प्रतिक्रिया अत्यंत धीमी थी. तमाम वर्ष थे जब लोगों को व्यापक पैमाने पर हटाया गया, जो लगभग युद्ध जितना ही भयावह था. उन वर्षों में अमेरिका और इंग्लैण्ड ने अफ्रीका के श्वेत शासन से अपने सम्बन्ध बनाए रखे और हमारे निर्वासित नेताओं, जैसे डा डाडू और ओलिवर ताम्बो से मिलने तक से इंकार कर दिया. उन दिनों में आप किसी भी व्यक्ति को, यहाँ तक कि ब्रिटिश शासन के किसी कनिष्ठ मंत्री को भी इन लोगों से मिलने के लिए उपलब्ध नहीं पा सकते थे. वे विद्रोही और ग़ैरक़ानूनी थे. इसे बदलने में बहुत लंबा समय लगा , लेकिन धीरे धीरे यह बदला. और ज़ाहिर तौर पर प्रतिबंध सबसे महत्त्वपूर्ण चीज़ बन गए – कला पर प्रतिबंध और आर्थिक गिरावट, काले बाज़ार और दुनिया के सबसे बड़े धूर्तों से तेल के क्रय की लागत. और दूसरी तरफ़ आप देखते हैं अश्वेत लोगों का बढ़ता साहस, आत्मविश्वास और दबाव. अफ्रीका में जो एक तरह से शानदार और अद्वितीय था वह था अफ्रीकी लोगों, भारतीयों और तमाम श्वेत लोगों के बीच का सहकार. गांधी जी के यहाँ प्रवास के दिनों से ही भारतीयों ने राजनीतिक जिम्मेवारी ली. उन्होंने अपनी पूरी ताक़त लगा दी जबकि रंगभेदी क़ानून उनके लिए कम कड़े थे. तो इस तरह भारतीय कांग्रेस, अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस और ट्रेड यूनियनों के बीच एकता स्थापित हुई.

समकालीन दक्षिण अफ्रीका पर गांधी जी के प्रभाव के बारे में आपके क्या विचार हैं?

नार्दिन गार्दिमेर : ओह. उनका प्रभाव बेहद मज़बूत है और वास्तव में, कुछ बहुत युवा लोग यह जानते भी नहीं हैं कि उन्होंने गांधी जी का दर्शन अपना लिया है. मुझे लगता है कि यह पूरे दौर में एक शानदार और तैयार करने वाला सांचे में ढालने वालाप्रभाव है. क्योंकि, संघर्ष को अपरिहार्य रूप से हिंसक आन्दोलन में परिवर्तित होने के बावजूद हिंसा  कभी बड़े पैमाने पर नहीं हुई. बड़े पैमाने पर हिंसा राज्य द्वारा हुई.

एक तरह से खुद अपने ख़िलाफ़ खड़े होने में आपको किस तरह के बलिदान करने पड़े?

नार्दिन गार्दिमेर : मैं बढ़ा चढ़ा के पेश करना नहीं चाहती. तमाम लोग थे जो मुझसे कहीं अधिक बहादुर थे. लेकिन जैसे जैसे समय बीतता गया, वह बिंदु जहाँ से लौटा नहीं जा सकता और दूर होता चला गया और लोग भयभीत हुए. आप जोखिम लेते हैं और आप केवल अपने ऊपर जोखिम नहीं लेते आप अपने परिवार को भी जोखिम में डाल देते हैं. मैं इस तरह एक जुआ खेल रही थी कि जैसे जैसे एक लेखक के रूप में मुझे और बेहतर तरीके से पहचान मिलेगी, वह मुझे शायद कुछ सुरक्षा प्रदान कर सकेगा. यह सुरक्षा इस अर्थ में थी कि मेरा पासपोर्ट मेरे पास था और इसकी वजह से मुझे यहाँ वहां जाने से रोका नहीं जाता था. लेकिन मैं जानती थी कि इसमें शामिल हर किसी की तरह मेरे घर पर निगाह रखी जा रही थी. असली चरमोत्कर्ष तब आया जब गद्दारी का एक बड़ा मुक़दमा चल रहा था और जिनके ऊपर मुक़दमा चल रहा था उन्होंने मुझसे एक अपील करने और उनके पक्ष में मुक़दमा लड़ने को कहा. जब उन्होंने मुझसे कहा तो मैं बहुत भावुक हो गयी, और अभियोग पक्ष के वक़ील के सामने मुझे बहुत मुश्किलात हुईं क्योंकि अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस पर प्रतिबंध लगा हुआ था और गुरिल्ला आर्मी एक ऎसी चीज़ से जिससे आप कोई सम्बन्ध नहीं रख सकती थीं. अभियोजक ने पूछा, “ क्या नेल्सन मंडेला आपके नेता हैं?” और मैंने कहा, “हाँ, वह हैं.” यह बेहद खतरनाक चीज़ थी, लेकिन मैं यह कहकर बच गयी. जब परिवर्तन आया, मुझे ख़ुशी हुई कि मैं निर्वासन में नहीं गयी; कि मैं यहाँ रुकी और मैंने कुछ किया. हालांकि मंडेला और उनके जैसे लोगों से जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी का बड़ा हिस्सा जेलों में गुज़ार दिया, तुलना करते हुए आप कभी यह महसूस नहीं कर सकते कि आपने पर्याप्त काम किया है.  

आपने अफ्रीकी लेखकों के कांग्रेस की स्थापना की. साहित्य ने इस संघर्ष में क्या भूमिका निभाई?

नार्दिन गार्दिमेर : हमने कहा संस्कृति संघर्ष का एक हिस्सा है और हालांकि यह एक पिष्टोक्ति (क्लीशे) जैसा लगता है, वास्तव में यह सच था. यह खासतौर पर थियेटर के संदर्भ में था क्योंकि सरकार ने अपनी ताक़त का वास्तविक से कम आकलन किया था. बड़े शहरों में कुछ जगहों पर लोगों ने उस नियम का उल्लंघन किया जिसके अनुसार श्वेत और अश्वेत लोग एक नाटक में साथ में काम नहीं कर सकते थे या हाल साझे तौर पर उपयोग नहीं कर सकते थे. हम किसी तरह इसमें शामिल हो गए और लोगों ने अपने नाटकों की वर्कशाप लगानी शुरू कर दी बजाय वेस्ट एंड या कहीं और के नाटकों की, जैसा कि श्वेत लोग करते थे. और इस तरह लोग अपनी खुद की जिंदगियों पर नाटक बना रहे थे. उन्होंने उन घटनाओं का उपयोग किया जो उनकी जिंदगियों में हो रही थीं और जब लोगों ने देखा उन्होंने सारी भावनाओं को और कुंठाओं को और भय को देखा और इसने लोगों को साहस दिया. एक हद तक यही हमारे लेखन के साथ हुआ.

आपकी किताबें दक्षिण अफ्रीका में प्रतिबंधित थीं जबकि सारी दुनिया में बिक रही थी. लिखते हुए आप उस पाठक वर्ग को लेकर कितना सचेत थीं?  

नार्दिन गार्दिमेर : जब आप भारत या दक्षिण अफ्रीका या किसी भी जगह पर लिख रहे होते हैं तो आप ऐसे कुछ सन्दर्भ देते हैं जो परिचित नहीं होते, लेकिन जिस क्षण आप उनकी व्याख्या करनी शुरू करते हैं लेखक की भूमिका शुरू हो जाती है. एक लेखक को लेखन की दक्षता हासिल करनी होती है ताकि लोग किसी तरह सन्दर्भ को समझने और उससे जुड़ने में सक्षम हो सकें. बहरहाल अगर वे कोई बारीक चीज़ कभी कभार नहीं पकड़ पाते तो आप कुछ नहीं कर सकते. मैंने एक उपन्यास पढ़ा बुर्जुआजीज़ डाटर  जिसमें जो मुख्य पात्र है वह कई जगह एक घटना को सुनाती है या दूसरे पात्र बताते हैं कि वह उन्हें कैसा लगा. तो हर बार यह एक अलग कहानी लगती है. अब जब उसे अपने पिता के बारे में एक विवेचन देने की बारी आती है जो एक क्रांतिकारी हैं और जो जेल में थे तो सिर्फ इतिहास पर एक अध्याय लिख देना शायद पाठकों को आकर्षित नहीं करता. तो मैंने इस समस्या पर और ऐसे ही अन्य लोगों पर जिन्हें मैं जानती थी बहुत देर तक और दूर तक सोचा. अगर उनकी मृत्यु हो जाती या वे निर्वासन में चले जाते तो कोई न कोई होता जो उनके बारे में लिखना चाहता, और वे अपनी बेटियों के अलावा कहाँ जाते? तो उसने मुझे यह महसूस करने का एक अवसर दिया कि बेटी को अपने पिता की चिट्ठियों को देखना और जो चीजें हुईं उन पर सोचना  शुरू करना पड़ेगा

क्या आप हमसे लिखने की प्रक्रिया को साझा कर सकती हैं? क्या आप एक आउटलाइन के साथ उपन्यास की योजना बनाती हैं या आप सिर्फ लिखना शुरू कर देती हैं और फिर इसे प्रवाह में बहने देती हैं?

 नार्दिन गार्दिमेर : मैं कभी अध्याय दर अध्याय की योजना नहीं बनाती. कुछ लोग ऐसा करते हैं, लेकिन मैं ऐसा नहीं करती. मेरे लिए एक शुरुआत है और एक अंत है. और फिर रास्ते में रुकने के लिए, कहा जा सकता है कि कुछ स्टेशन हैं. जब मैं शुरू करती हूँ तो मैं यह नहीं जानती कि किन रास्तों से जाना है लेकिन अंत तय होता है. जब मैं शुरू करती हूँ तो हमेशा मुझे अंत का पता होता है और मैं अक्सर शीर्षक जानती हूँ. लोगों को अक्सर इस पर आश्चर्य होता है. मेरे लिए जब तक मुझे शीर्षक न पता हो मैं वास्तव में यह नहीं जानती कि मुझे लिखना किस बारे में है क्योंकि शीर्षक को कहानी का सार होना चाहिए. लेकिन मैं खुद को एक धीमी लेखक मानती हूँ. एक उपन्यास लिखने के लिए मैं तीन से चार साल ले सकती हूँ, कभी कभी और अधिक.

इसमें वरीयता किसे मिलती है – कथावस्तु, वह दिशा जिस पर उपन्यास चलेगा  जाएगा या कोई और चीज़ जो आप कहना चाहें.

नार्दिन गार्दिमेर : यह लोगों से शुरू होता है और जिसका वह समाज में प्रतिनिधित्व करते हैं वह व्यक्तित्व. मुझे लगता है मैं इसी तरह लिखती अगर मैं ऐसी किसी जगह पर भी रहती जहाँ इस तरह का प्रचंड संघर्ष नहीं है. लेकिन ज़ाहिर तौर पर मैंने अक्सर यह देखना पसंद किया है कि रंगभेद जैसी व्यवस्था ने लोगों के साथ कैसे एक बच्चा पैदा होता है जैसे उनके सबसे वैयक्तिक संबंधों को प्रभावित करता है.जब वह पैदा होता है तो जन्म नली से गुज़रता है और यहीं मष्तिष्क आकार लेता है. मुझे लगता है कि दक्षिण अफ्रीका में आपके दिमाग में जो है वह एक बार फिर रंगभेद के दबाव से, छोटे छोटे पूर्वाग्रहों से, अविश्वास से और ऐसी ही चीजों से निर्मित होता है.

जब आप उपन्यास लिख चुकी होती हैं तो किसकी प्रसंशा की आपको सबसे अधिक दरकार होती है? क्या एक बार पूरा हो जाने के बाद प्रक्रिया ख़त्म हो जाती है या फिर तब जब इन्हें वे लोग पढ़ चुके होते हैं जिन्हें आप देती हैं?

नार्दिन गार्दिमेर : मुझे लगता है यह किसी की भावनाओं जैसा है. केवल मैं जानती हूँ कि मैं क्या करना चाहती थी. इसलिए मैं अपनी खुद की आलोचक हूँ. कई बार यह उससे अलग और थोड़ा बेहतर निकल कर आ सकता है जैसा मैंने सोचा था. कई बार मैं उन चीजों को देखती हूँ जो छूट गयी हैं. जो हालिया उपन्यास मेरा प्रकाशित हुआ, नन टू एकम्प्नी मी जब मैं पीछे मुड़ के देखती हूँ तो मुझे महसूस होता है कि जो धावक है उसका चरित्र किसी तरह धुंधला होता जाता है. हालांकि वह एक भगोड़ा पुरुष है, उसे और अधिक उपस्थित होना चाहिए था और यह करना लेखक का काम है.

अब जबकि दक्षिण अफ्रीका के वातावरण का सामाजिक सन्दर्भ बदल चुका है, दस साल पहले की तुलना में आप किन उत्प्रेरणाओं से संचालित होती हैं?

नार्दिन गार्दिमेर : मेरी हालिया किताब नन टू एकम्प्नी मी  में, जो संक्रमण के समय में स्थित है,  एक अंतर है. कुछ चीजें जो अब मुझमें कौतुहल जगाती हैं वे हैं राजनीतिक निर्वासितों का घर लौटना, वह स्वप्न कि जैसा घर को होना था और घर जिस तरह से बदल गया है. लोगों को व्यापक पैमाने में फिर से बसाया गया था तो शायद घर वहाँ अब था ही नहीं, वह कुछ और बन गया था. दोस्त और परिवार भारी भगदड़ में शहरों में चले गए थे जैसा कि हर देश में हुआ. हर तरह की विचित्र परिस्थितियाँ थीं. उदाहरण के लिए इस किताब में जो किसी एक चरित्र में सामान्य चीज़ थी वह उन दम्पत्तियों में बहुत सामान्य थी जो विदेशों में बिताये अपने वर्षों में  माँ बाप बने. ये बच्चे इंग्लैण्ड या स्वीडन के स्कूलों में पढने गए और अपनी दूसरी भाषा के रूप में जैसे स्वीडिश बोलते थे लेकिन कोई अफ्रीकी भाषा नहीं जानते थे. अब ये बच्चे वापस आये और उनके कोई सम्बन्ध नहीं थे और उनके लिए बस पाना बेहद मुश्किल था. फिर दूसरे लोग थे – युवा मित्र और युवा लेखक जिनका सपना उन बस्तियों से निकल आना था. लेकिन जब वे जोहांसबर्ग के और बेहतर हिस्सों में रहने आये तो उन्हें पता चला कि सभी पडोसी जा चुके हैं. अब आप यह नहीं कह सकते कि “क्या आप हमारे बच्चे को संभाल लेंगे, हम आज रात बाहर जाना चाहते हैं.” तो ये लिखने के लिए ग़ज़ब की चीजें थी और तनाव भी.

अब आप दक्षिण अफ्रीका के भविष्य को लेकर कितना आशान्वित महसूस करती हैं?

नार्दिन गार्दिमेर : मुझे लगता है बाहर के देशों के लोग कुछ ज़्यादा ही निराशावादी हैं, और मुझे बहुत गुस्सा आता है. हमारे यहाँ 350 वर्षों का दमन रहा है और अभी दो साल भी नहीं हुए लोकतंत्र के और हमें लगता है इसमें सब कुछ हो जाना चाहिए था- सभी को नौकरी मिल जानी चाहिए थी, सभी के लिए घर बन जाना चाहिए था. इतने कम समय में ऐसा कर पाना बिलकुल असंभव है. फिर जाहिर तौर पर जब दमनकारी को उखाड़ फेंका जाता है तो जो निष्ठा लोगों को जोड़े रहती थी वह महत्त्वाकांक्षाओं और प्रतिद्वंदिताओं से टूट जाती है. और लोग मनुष्य ही हैं. मुझे लगता है कि अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस अद्भुत है. उन सभी राजनीतिक आन्दोलनों में से जिन्हें मैं जानती हूँ वे कभी विभाजित नहीं हुआ, किसी भी तरह से वे विच्छिन्न नहीं हुए. यह ओलिवर ताम्बो और दूसरे लोगों को शानदार श्रद्धान्जलि.

किन दूसरे लेखकों को आप पढ़ती हैं. क्या आपने अंग्रेज़ी में किसी भारतीय लेखक को पढ़ा है.

नार्दिन गार्दिमेर : मैं वह सब पढ़ती हूँ जो मेरे हाथ लग जाता है. मैंने कुछ भारतीय लेखकों को पढ़ा है हालांकि यह पर्याप्त नहीं है और काश मैं और अधिक पढ़ पाती. मैंने टैगोर जैसे क्लासिक्स और गीता तब पढ़े हैं जब मैं बहुत छोटी थी. मैं आर के नारायण को बेहद पसंद करती हूँ जो एक अपनी तरह के शानदार लेखक हैं, खासतौर पर जब आप गाँवों से गुजरते हैं और मालगुडी तथा अन्य के जादू के बारे में सोचते हैं. और ज़ाहिर तौर पर वे जो निर्वासन में हैं ; सलमान रश्दी मेरे दोस्त हैं. मैं उनकी स्थिति को लेकर बेहद दुखी थी और अब भी हूँ, क्योंकि वह उन मुट्ठी भर जीवित लेखकों में से हैं जो वास्तव में महत्त्वपूर्ण हैं. वह एक विलक्षण लेखक हैं लेकिन जो उनके साथ किया जा रहा वह एक तरह से सूली पर चढ़ाना है, जो कि भयानक है.

एक लेखक के तौर पर आपकी खुद को लेकर क्या महत्त्वाकांक्षाएँ हैं? 

नार्दिन गार्दिमेर : मैं हमेशा वही एक चीज़ सोचती हूँ – पिछली किताब से बेहतर किताब लिखना.
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(राजीव मेहरोत्रा की किताब “द स्पिरिट आफ द म्यूज” से)

4 comments:

GGShaikh ने कहा…

Gyasu Shaikh said:

एक बेहतरीन साक्षात्कार जो हमें बहुत कुछ दे जाए समृद्ध कर जाए !
नार्दिन गार्दिमेर का विज़न और उनकी सोच बहुत ही स्पष्ट है। हमारे स्थानीय वर्तमान और वैश्विक जीवन को लेकर की गयी चर्चा एक सही सकारात्मक दिशा बताए। हम लेखक हो या नागरिक सबके काम का है उनका चिंतन। नार्दिन गार्दिमेर बहुत समृद्ध है अपनी सोच में अपनी कथनी और करनी में। दक्षिण आफ्रिका की
परिस्थितियों को उन्हों ने बहुत क़रीब से देखा है, समझा है और अभिव्यक्त भी किया है और अपनी सकारात्मकता को भी बचाए रखा है। वहां उनकी भूमिका एक नियंतता की सी रही है। मनुष्य की कमज़ोरियों और स्वार्थी महत्वाकांक्षाओं का भी उन्हें एहसास है और जिसकी वजह से पेश आती अराजकता का भी वे आकलन कर पाती है।
उनके आकलन सुखद हैं !

थैंक्स अशोक जी…

शहनाज़ इमरानी ने कहा…

एक बेहतरीन साक्षात्कार .

Subuhi Nigar ने कहा…

Very good article .

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (24-11-2014) को "शुभ प्रभात-समाजवादी बग्घी पे आ रहा है " (चर्चा मंच 1807) पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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