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सोमवार, 3 अगस्त 2015

अमित उपमन्यु की कविताएँ


आज के आपाधापी वाले युवतर कविता संसार में अमित अपनी तरह का अलमस्त कवि है. संगीत, रंगमंच, खेल, विज्ञान और फ़िल्मों में अपनी गहन रूचि के बीच उसकी कवितायें तमाम स्रोतों से अपने पाथेय ग्रहण करती बहुत तफसील से भीतर और बाहर की दुनिया की यात्रा करती हैं. इन कविताओं को पढ़ते हुए आप देखेंगे कि वह अर्थ नहीं अभिप्राय का कवि है और अभिप्रायों में अव्यक्त को व्यक्त करने की मुश्किल कला उसने बहुत शुरुआत में सीख ली है. न यहाँ प्रेम का कोई कोरा भावुक प्रलाप है और न ही सैद्धांतिक रुक्षता से भरा अतिकथन. कुछ पत्रिकाओं और कई ब्लाग्स में छप चुके अमित की कवितायें असुविधा पर आप पहले भी पढ़ चुके हैं. इस सीरिज के साथ अमित को ढेरों शुभकामनाएं.
इस पोस्ट के बाद मैं कुछ और बेहतर युवा कवियों की कविताएँ लगातार पोस्ट करने की कोशिश करूँगा.



गति के नियम


(एक)

मैं साथ घूमती पृथ्वी की सांसों में घुल गया हूं
अमित उपमन्यु 

पर्वतों की अनंत ऊँचाई...
महासागर की नीम गहराई...
समगति हो विसर्जित हुआ मेरा वेग उसके व्योम में
थम गये हम एक-दूसरे में स्पर्श की महीन ऊष्मा होकर


पृथ्वी के गर्भ में एक फूल बोया मैंने  
गति की महक 
स्थिरता का सौंदर्य होगा जिसमें

सिमटी हुई है धरती मेरे निःशब्द में बेतरह 
मैं चल रहा हूं थामे उसकी नर्म हथेलियाँ अनंत यात्रापथ पर 
ठहरे हैं हम अपनी समगति के निस्तब्ध मौन में
आकाशगंगा देखती है हमारी गतियों का साहचर्य


(दो)

नदी के बीच खड़ा हूँ नदी दूर जा रही है
नदी में हूँ नदी मुझसे दूर जा रही है
विरक्त है नदी
जहाँ रहती है वहां नहीं रहती
खुद से होकर बहती है खुद में नहीं बहती


(तीन)

साथ चलने का नुकसान है तुम मुझे अब मुड़कर नहीं देख सकतीं
तुम्हारी नर्म हथेलियों की नमी में भींज जाता हूं
हाथों की रेखाएं जुड़कर ठहरी झील की सतह पर  कमसिन लहरों सी मुस्कुराती हैं
पीछे मुड़कर ढूंढतीं थी तो आंखों में
फिक्र का तूफान होता था जैसे कुछ खो गया हो...
मुड़कर देखतीं और हमारी नज़रें मिल जातीं तो एक मुस्कुराहट होती थी होठों पर मामूली सी जैसे फिर से पा लिया तुमने मुझे और यह बात मुझ तक न पहुंचे...

खोना और पाना मसला नहीं है दरअसल
मुड़ना अधूरेपन का अहसास था एक-दूजे बिन
वह अहसास जरूरी है हथेलियों को नर्म और मुलायम रखने के लिए
कभी रह जाना पीछे भी बुरा नहीं साथ चलने का हुनर कायम रखने के लिए

(चार)

रात मुड़ती है भोर से एक आंगन पहले फिर से रात हो जाती है
लौट आते हैं सारे भीड़ भरे ख्वाब सन्नाटों से उठकर
रो रही है एक भीड़ हँस रही है एक भीड़ सो रही है
ख्वाबों में सोना तो कुफ्र है!

फिर मुड़ती है रात एक बार कहीं शाम न हो जाए और रात होने से पहले सो जाती है
तीन घर हैं तुम्हारे जहां मेरी कल्पनाएँ पहुंचती हैं तुम्हें ढूंढते हुए तुम कहीं नहीं मिलतीं
तुम घर में नहीं रहती हो
मेरी कल्पनाओं में नहीं रहती हो
भूल गई हो कहीं रहना अपना होना भूल गयी हो

आज आधे चांद की रात है और तुम्हारी भारी सांसों की आवाज़ मुझ तक नहीं पहुंच रही है
मैं बाकी के उदास-अधूरे-अंधेरे चांद पर बैठा इंतजार में हूं कि तुम्हारी सांसों पर चलकर तुम तक पहुंचूं
चांद की कोई गलती नहीं वह सांस नहीं लेता तो पी जाता है तुम्हारी सांसें और चुपचाप सिसकियाँ
कुफ्र तुम्हारा है जो ख्वाबों में सो जाती हो अपने
तीन घर और अनगिनत कल्पनाओं के बावजूद बस एक चांद मिलता है तुम्हें सांस लेने के लिए 

(पाँच)

अमूमन कुछ भूलता नहीं हूं मैं
पर कभी भूलता रहता हूँ भ्रम बनाये रखने के लिए
कि भूल सकता हूं कभी कुछ बहुत जरूरी जिसे खोना नहीं चाहिये विस्मृति में
भ्रम गांव की झोंपड़ी है विस्मृति आकाशगंगा का एक छितराया हुआ टुकड़ा
उस टुकड़े की सरहद पर मेरा एक समंदर है जिसमें पवित्र गंगा गिरती है
इकट्ठा होती हैं सारी अधभूली आत्माएं वहां

मुझे भ्रम था प्रेम का जिनसे वे झोंपड़ी में हैं
जिनसे है प्रेम उनका सागर में घर है
स्मृति का नाम समंदर है
वह मंदाकिनी की विस्मृति में रहती है
सब भूलते हैं वहां याद जलती है मेरी सागर को आसमान करने
और यूं कि जलती ही रहती है
मैं समय हूं
भूली हुई यादें मेरा घर हैं

याद में भूल जाना मेरा खेल है
विस्मृति में बसी स्मृति मेरी जेल है 









4 comments:

sheshnath pandey ने कहा…

अपने में बसा लेनी वाली कविताएं. कमाल अमित. ऐसे ही कमाल करिते रहिये. बधाई आपको.

ओम निश्‍चल ने कहा…

अमित उपमन्‍यु की कविताएं अच्‍छी लगीं। कुछ बात तो है। कुछ अनुभूतियां ऊन की तरह उलझी भी होती हैं पर यह उलझाव कविता में सौदर्यधायक भी होता है। अमित की कविताएं इस वैशिष्‍ट्य की हकदार हैं।

Upasna Siag ने कहा…

bahut badhiya ...

Dr. Monika S Sharma ने कहा…

उम्दा कवितायें

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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