एक भावुक सा राग-शोक - कुमार अंबुज


उत्तराखंड मे विरोध सरकार का था। हक़ है सरकार का विरोध करने का विपक्ष को। पर मारा गया उस निरीह घोड़े को जिसे मनुष्यों ने सभ्यता के आरंभ मे ही गुलाम बनाया और उसकी सारी त्वरा उसकी चपलता उसका सौंदर्य मनुष्यों की सेवा मे लग गई। मनुष्यों की लड़ाई मे वह शहीद हुआ। मनुष्यों की ईर्ष्या मे उसे जहर दिये गए। और आज एक और बार मनुष्यों की लड़ाई मे वह घायल हुआ। उसका घायल होना जैसे हमारे समय की एक व्यंजना बन कर सामने आ गया है। वरिष्ठ कवि कुमार अंबुज ने इस घटना से व्यथित हो यह लेख सा लिखा था अपनी फेसबुक वाल पर....उनसे पूछे बिना कॉपी कर असुविधा के लिए ले लिया है... 




एक भावुक सा राग-शोक
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वह इतना सुंदर है कि उससे केवल मोह या प्रेम हो सकता है। वह स्वप्न के, कल्पना के किसी भी अश्व से भी अधिक अश्व है। उसके बल, आयुष्य और सौंदर्य की बेहतरी के लिए कोई भी सहज कामना कर सकता है। इसकी तो रंचमात्र आशंका ही नहीं की जा सकती कि कोई उस पर प्रहार करे। उसके जीवन को हानि पहुँचा दे। उसके प्राकृतिक श्रेष्ठ अश्व होने के गौरव, उन्नत मस्तक और उसकी अतुल्य गरिमा को चोट पहुँचाने का ख्याल भी कोई कर सकता है, यह भी कल्पना से परे है। ऐसा दुस्वप्न भी कोई नहीं देखना चाहेगा।
लेकिन यह यथार्थ है। हमारे समय का, हमारे समाज का क्रूर यथार्थ।
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और वह व्यक्ति जो निरीह के साथ हिंसा करे। किसी के अस्तित्व की सुंदरता के प्रति जो निर्मम हो जाए। जिसने कभी अहित न किया हो, उसके प्रति क्रूरतम व्यवहार करे। किसी भी प्रकार की दया जिसमें न हो। और न ही अपने अधम कार्य के प्रति लेशमात्र प्रायि‍श्चत हो।
राक्षस इन्हीं प्रवृत्तियों को धारण करनेवाले के लिए एक विशेषण हो सकता है।
पशुता शायद इससे बेहतर हो।
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यह कार्य वही कर सकता है जो नराधम है। और इस मनुष्यत्‍वहीन काल में जिसे यह भरोसा है कि वह कुछ भी अनिष्ट कर सकने में सक्षम है और सबसे बड़ा उसका यह विश्वास कि वह भीषण अपराध करके भी बच सकता है।
यह भरोसा उसे कहाँ से मिला है। नि‍श्चि‍त ही किसी न किसी ‘गाॅडफादर’ से, जो हमारी समकालीन राजनीति का अधि‍क नया परिव़िर्द्धत, अमानवीय संस्करण है। यह राजनीतिक सामर्थ्य और गर्राहट का सबसे क्रूर उदाहरण है।
इतना निर्मम, आततायी और संवेदनहीन व्यक्ति किसी भी जनता का प्रतिनिधि कैसे हो सकता है? वह तो मनुष्य होने का भी उदाहरण नहीं है।
अपराध करके बचने का यह अटूट, अदम्य विश्वास हमारे समाज को कहाँ ले जाएगा, इस पर विचार करने की जरूरत है। जब राजनीति अपराधियों की, क्रूर दिमागों और आततायियों की शरणस्थली बनती ही चली जाए तो उस समाज का भविष्य धूमिल ही नहीं, भयावह हो सकता है। अब तो वर्तमान भी कुहासे से भर गया है।
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मैं बहुत दुख के साथ भर्त्सना के ये शब्द लिख रहा हूँ और उस धवलता, सौंदर्य, शक्ति‍ और गर्व के प्रतीक निर्दोष अश्व के लिए मेरे पास ऐसा कोई शब्द नहीं है कि जो मनुष्य समाज की ओर से संवेदना की सही अभिव्यक्ति दे सके।
सामुहिक दुख और लज्जा के पास अकसर ही ऐसे शब्द नहीं होते हैं।
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टिप्पणियाँ

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (19-03-2016) को "दुखी तू भी दुखी मैं भी" (चर्चा अंक - 2286) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
Haridas Vyas ने कहा…
घोड़े शक्तिमान को विधायक गणेश जोशी ने भले ही डंडा नहीं मारा पर विधायक द्वारा डंडा फटकारने से घोड़ा दर कर पीछे हटा और उसका पिछ्ला पैर सड़क पर गाड़े गए लोहे के गर्डर में फँस कर टूट गया ।
विधायक को जेल मिलनी ही चाहिए पर कोई सवाल नहीं उठा रहा है कि सड़क के बीचोंबीच क्यों गड़ा था लोहे का गर्डर ? स्थानीय प्रशासन के उस अधिकारी को भी ज़ेल भेजा जाना चाहिए । अपनी राय दें कृपया ।
Anand Krishan ने कहा…
हजारों गायें हर रोज़ मारी जा रही हैं । उनके लिए आपके पास संवेदना के भी शब्द नहीं हैं ।

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