इस्लाम का इतिहास


नॉटनल डॉट कॉम (notnul.com) एक तरह का नवोन्मेष है जहाँ इसके कर्ता-धर्ता नीलाभ श्रीवास्तव हिन्दी की महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं के साथ किताबें भी सॉफ्ट वर्ज़न में ला रहे हैं और बेहद कम दामों में युवा पीढ़ी को उनके मोबाइल्स और लैपटॉप पर हिन्दी का श्रेष्ठ साहित्य उपलब्ध करा रहे हैं. आज असुविधा पर वहीँ से आई एक ज़रूरी किताब जिसे आप यहाँ जाकर पढ़ सकते हैं. 




किसी भी काल, समूह, सभ्यता के इतिहास का अध्ययन क्षेत्र केवल फ़ेस वैल्यू पर स्रोतों के परीक्षण और उनकी व्याख्या पर निर्भर नहीं करता बल्कि इतिहास की समझ के साथ एक ‘historical method’ का रास्ता इख़्तियार करना पड़ता है जिसमें अध्ययनकर्ता को विशेष पाबंदियों के समुच्चय के साथ अपनी विचारधारा के सीमित दख़ल-अंदाज़ी की इजाज़त होती है। कहते हैं कि गुज़रा हुआ ज़माना आता नहीं दुबारा, लेकिन ‘ज़माना’ को पुनः विभिन्न माध्यम से पेश किया जा सकता जैसे पुस्तक, चलचित्र, लेख आदि, लेकिन वास्तिवक घटनाओं के द्वारा नहीं। ज़माना या काल के प्रस्तुतीकरण में असातीरी (MYTHOLOGICAL) और MYSTIFYING तत्वों के सामवेश से बचाव के लिए अक्सर जो संरचना सामने आती है वह बनवाटी प्रतीत होती है और इतिहास deconstruct हो जाता है। इतिहास लेखन में प्रमुख समस्या Presumptive-Study की आती है कि अध्यनकर्ता पूर्व में ही कोई नतीजा सोच लेता है और उसी के अनुसार अपने स्रोत का चुनाव करता है।

मौजूदा हालात में इस्लाम पर तथ्यात्मक और आलोचनात्मक लेखन का कार्य किसी चुनौती से कम नहीं है। हिंदुस्तान में इस्लाम से हमारा संबंध दमन, सहयोग, शक, ग़लतफ़हमी और आदान-प्रदान का रहा है। इस्लाम से पूर्व हिंद-अरब संबंधों पर काफ़ी मात्रा में अभिलेखीय साक्ष्य मौजूद हैं, उसके अतिरिक्त एक धर्म, सभ्यता और संस्कृति के रूप में इस्लाम दक्षिण के रास्ते हमारी ड्योढ़ी पर अपने आरम्भिक काल में ही आ गया था। किंतु ग्यारहवीं सदी में पश्चिम के मार्ग से तुर्कों का राजनैतिक शक्ति के रूप में प्रवेश एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है जिसने हिंद के उत्तर-पश्चिम भूभाग को राजनैतिक  दृष्टिकोण से प्रभावित किया जिसके दूरगामी परिणाम सामने आए। सम्पूर्ण घटना क्रम का अगर सही परिपेक्ष्य में मूल्यांकन किया जाए तो यह हज़ारों वर्षों की ऐतिहासिक प्रक्रिया है और इसमें कोई विशेष बात नज़र नहीं आएगी सिवाए इसके कि इन आक्रमणकारियों का धर्म इस्लाम था। हिंदुस्तान में मुसलमान कई दिशाओं, विचारधारों, परंपराओं और आस्थाओं के साथ कई क़िस्तों में विभिन्न कारणों से आये। इस आगमन से सभ्यता और संस्कृति के स्तर पर एक नए दौर का सूत्र-पात्र हुआ और संयुक्त संस्कृति और सभ्यता के जल-स्त्रोत से नयी धाराएँ प्रवाहित हुईं। अट्ठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध से ईस्ट इंडिया कम्पनी का राजनैतिक वचर्स्व शुरू हुआ जिसकी परणिति 1857 में एक संयुक्त विद्रोह के रूप में होती है, जिसके क्रूरतापूर्ण दमन के बाद धार्मिक वैमनस्य के पैदा करने और राज्य करने की नीति के अंतगर्त मध्य काल के इतिहास को विकृत करने का कार्य किया गया। जिसका परिणाम यह हुआ कि मध्यकाल प्राचीन काल का क्रमागत अंग ना होकर सभ्यताओं के मध्य संघर्ष के रूप में प्रचारित हुआ और यह व्याख्या जहाँ ब्रिटिश साम्राज्य के हित में थी वहीं अतिवादीयों के लिए भी स्वीकार्य थी।

वैश्विक स्तर पर मुस्लिम साम्राज्यवाद और पश्चिम के मध्य भी दमन, सहयोग, शक, ग़लतफ़हमी और आदान-प्रदान पर आधारत संबंध रहे हैं लेकिन अट्ठारहवीं सदी के बाद वैश्विक स्तर मुस्लिम राजनैतिक हस्तक्षेप कमज़ोर होता गया और वर्तमान में पश्चिम से किसी भी प्रकार की प्रतिस्पर्धा की कोई गुंजाइश नहीं है। गत 40 वर्ष में शीत युद्ध के दौरान पूँजीवादी साम्राज्यवाद द्वारा साम्यवाद के विरुद्ध इस्लामी अतिवाद का सफल इस्तेमाल किया गया इसके अतिरुक्त ईरान-क्रांति, सलमान रशदी प्रकरण हटिंगटन के सिद्धांत का प्रतिपादन और नाइन इलेवन, चार्ली हेबडो हत्या कांड, सीरीया समस्या, दाईश का वीभत्स उदय आदि वह घटनाएँ हैं जो मुख्यतः वैश्विक स्तर पर इस्लाम से बदगुमानी का कारण बनी और एक बर्बर, हिंसक, प्रतिक्रियावादी और असिहष्णु धर्म, दर्शन और विचारधारा के रूप में इसकी छवि सामने आयी। इसके समांतर मुस्लिम कट्टरवाद ने भी अपने पैर पसारे अपनी विरासत पर गर्व तो किया लेकिन पतन के मूल कारणों को समझने में असफल रहे।

लेखक- राकेश मिश्र 


इन तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में श्री राकेश मिश्र ने इस्लाम के वृहत इतिहास का अध्ययन किया और एक श्रृंखला की शुरुआत की ताकि इस्लामी सभ्यता और संस्कृति के इतिहास इसके योगदान और पतन के कारणों का सही संदर्भ में विश्लेषण हो सके। प्रस्तुत पुस्तक में आंदोलन के रूप में इस्लाम को विशेष परिस्थितियों में समझने का प्रयास किया गया है। इस्लाम के उदय से पूर्व तथा इसके उदय एवं मुकम्मल तौर पर स्थापित हो जाने के बाद इसकी सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक संस्थाओं, बुनयादी विशेषताओं, सीमाओं और कमज़ोरियों के साथ समझना कोई आसान काम नहीं है। किसी भी धर्म के विषय में राय क़ायम करने से पूर्व हमें पूर्वग्रह को त्यागना होगा, या ऐसा भाव तो देना चाहिए की हम निष्पक्षता से बात करना चाहते हैं। इस्लाम की तत्कालीन क़बिलाई व्यवस्था को समझना ही चुनौती है। 1400 वर्ष से अधिक का समय, विभिन्न धाराओं में विभाजित इतिहास, राजनैतिक प्रतिद्वंदिता और मूल स्रोतों से परिचय ना होना। सबसे बड़ी बाधायें हैं। इस्लाम के मानने वाले और विरोधी, दोनों के अपने हथियार हैं जिसमें मुख्यता वह समझ है कि इस्लाम शून्य में पैदा हुआ। क़बिलाई माहौल पर भी प्रकाश डालने की ज़रूरत है क्योंकि मक्का एक मेट्रोपालिटिन वित्त व्यवस्था का केंद्र था जिसे किसी भी केंद्रित राज्य शक्ति के अधीन होना स्वीकार नहीं हो सकता था। इसके अतिरिक्त एक घोर आदिम क़बीलाई समाज और भी था जिसे बद्दु कहा गया है और इस्लाम ने इस समाज की मानसिकता पर अक्सर चोट की है। इस्लाम ने सार्वजनिक जीवन में क़बीलाई व्यवहार को निरपेक्ष बनाने पर बल दिया जो एक प्रकार की सामाजिक क्रांति थी। रोम और ईरान जैसी महाशिक्तयों के विरुद्ध जब अरब ने साम्राज्यवादी नीतियों को अपनाया तो सैन्य रूप से inferior होने के बावजूद सामाजिक क्रांति ने उन्हें एक Edge दे दिया था। इस्लाम के Unverslalism ने एक संदेश दिया कि सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक क्षेत्र में नियमों की एकसामानता को सब जगह लागू किया जाना चाहिए जिसका नतीजा यह हुआ कि चमत्कार का धर्म से connection नहीं रहा और यूनान की तर्ज़ पर वैज्ञानिक सोच पर आधारित एक समाज के विकसित होने की राह के आसार पैदा हो गए। श्री राकेश मिश्र जी अपने अध्ययन में उपरोक्त को सामने रखा है। ऐसा इसलिए भी है कि इस्लाम के मानने वाले और इसके विरोधी दोनों ही तर्कहीन कठमुल्लेपन, रुझानों और मनोवैज्ञानिक पक्षपात से ग्रसित हैं। श्री राकेश मिश्र ने दर्शन, विज्ञान, संस्‍कृति, कला और जीवन-मूल्यों के क्षेत्र में इस्लाम के योगदान का परीक्षण करने के बाद परस्तुतिकरण में विस्तार सहित ईमानदारी से उल्लेख किया है जो एक तटस्थ पाठक को मज़ीद अध्यन पर मजबूर कर देता है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने इस्लाम के उदय, विकास और पतन का तार्किक विश्लेषण किया है लेकिन श्री राकेश मिश्र ने अपनी पुस्तक में दो बातों को मज़बूती से पेश किया है, प्रथम यह कि पैग़म्बर ने ऐसे किसी राज्य-सत्ता का नज़रिया पेश नहीं किया जिससे धर्म का रजिनीती में हस्तक्षेप का रास्ता खुला रहे। यह दावा कि इस्लाम धर्म और राजनीति के मध्य एक harmony है, आधुनिक सोच है, जिसका सुराग़ इस्लामी इतिहास में नहीं मिलता। ‘इस्लामी राज्य’ का मुहावरा बीसवीं सदी की देन है।

दूसरे यह कि वैचारिक और बौद्धिक धरातल पर विश्व का नेतृत्व करने के बाद मुसलमानों के पतन का कारण केवल सैन्य शक्ति में कमज़ोर होना नहीं है बल्कि अनेकों कारणों में मुख्य कारण चौदह सौ पूर्व की मान्यताओं को बदलते परिवेश में किसी भी प्रकार के बदलाव का विरोध करने की प्रवृत्ति में निहित है। आज हम जिस दौर से गुज़र रहे हैं उसमें विभिन्न धर्मावलंबियों के बीच सार्थक संवाद की बहुत आवश्यकता है और निश्चय ही श्री राकेश मिश्र जी का यह प्रयास इस दिशा में महत्वपूर्ण क़दम है।

टिप्पणियाँ

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (30-07-2019) को "गर्म चाय का प्याला आया" (चर्चा अंक- 3412) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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