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शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

जवाब दो फरीदा… उस भयावह भूल का हिसाब दो!








( वैसे तो कुछ भी ख़ास नहीं है तेईस दिसंबर को…बस दो साल पहले इस दिन गुजरात में था…मोदी की दुबारा जीत हुई थी और उस दिन के अनुभव के आधार तीन कवितायें लिखी थीं जो आज आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूं)



गुजरात 2007


(एक)


वे अब नहीं बोलते ऊंची आवाज़ में
सिर झुकाये निकलते हैं अपनी बस्तियों से


ईद पर मिलते हैं गले जैसे दे रहें हों दिलासे
शोकगीतों की तरह बुदबुदाते हैं प्रार्थनायें

इतनी कच्ची नींद में सोते हैं
कि जगा देती है अक्सर घड़ी की टिक टिक भी
बदल गये हैं उनके शब्दकोषों में
हक़ और इंसाफ़ के मायने
मौत अब नहीं रही उतनी बड़ी ख़बर


दिल्ली की परिचर्चाओं से अनजान
वे समझ चुके हैं बख़ूबी अल्पसंख्यक होने का मतलब
अपनी बस्तियों में अब किसी का नहीं उन्हें इंतज़ार
दांतो के बीच जीभ की तरह रहना सीखते हुए
नहीं बची दांतो के अंत की कोई सांत्वना!

पुलिस की फाईलों में दर्ज़ उनकी अर्जियों से
शब्द झड़ गये हैं सारे
मुक़दमों की भीड़ में गड्डमड्ड हो गईं हैं धारायें
केंचुलों से उतर गये हैं सारे भ्रम
और विश्वास तो भष्म हो ही गया था गुलबर्गा की आग़ में

अब नहीं बचा इस विशाल भूमण्डल में उनका अपना कोई देश
आकाशगंगा के किसी तारे से नहीं बची कोई उम्मीद
कविता की आखि़री पंक्तियों जितनी भी नहीं

जीत की खुशी- हार का ग़म
कुछ नहीं बचा उनके पास

उदास कांधों पर जनाज़े की तरह ढोते सांसे
ये गुजरात के मुसलमान हैं या लोकतंत्र के प्रेत?

(दो)


अब नहीं होंगे यहाँ दंगे

विकास के जगमगाते फ्लाईओवर तले
चुपचाप कुचल दी जायेगी एक बस्ती


धड़धड़ाती हुई आयेंगी मशीने
और मछुआरों से छीन लेंगी समुद्र

दरका दी जायेगी नियमो की नींव
और भरभराकर गिर पड़ेंगे मदरसे

हाथ में त्रिशूल लिये आयेंगे न्यायधीश
और सिटपिटा जायेंगे गवाह

बस थोड़ी देर से आयेगा डाक्टर
और कम हो जायेगा एक और मुसलमान

निश्चिंत रहें विद्वतजन
शांति की गारंटी है यह चुनाव परिणाम!



(तीन)



बोलो फरीदा जवाब दो **


नाट्यशाष्त्र के पारंगत अभिजनों के
तीर से तीक्ष्ण प्रश्नों का
भयभीत खंजन नयनों की भाषा
सिर्फ़ नाटक मे पहचानते हैं ये
जो पोथियां नहीं पढ़ीं तुमने
जाओ ढ़ूढ़ो उन्हें पुस्तकालयों के घने जंगलों में
राजधानी के नाट्यगृहों में तलाशो सिद्धान्तों के अस्त्र

आंसूओं से नहीं चलेगा काम
बोलो फरीदा - जवाब दो

एक दृश्य ही तो था नाटक का
हाथों में तलवार लिये एक शिशु के वध को उद्धत
अद्भुत चपल कलाकार ही तो था वह
मां की भूमिका में बस चीखना था तुम्हें
और ढ़ेर हो जाना था उस शव पर
पटकथा में तो कहीं नहीं था वह दारूण विलाप
कब कहा था निर्देशक ने कि हत्यारे के पैरों पर गिर मांगो दया की भीख
याचना तो थी ही नहीं दृश्य में न विलाप
बस चीख कर हो जाना था ढेर

और गिरते ही यवनिका के शिशु को ले चले आना था नेपथ्य में
और यही तो करती आई थी अभी तक अभ्यास में

फिर?

मंच पर सैकड़ों दर्शकों के समक्ष क्यूं किया यह?
बोलो फरीदा - जवाब दो

क्या हुआ कि तुम्हारे विलाप के साथ
बह उठे सैकड़ों नेत्रों से विगलित अश्रु
शिशुओं को भींच सिसक उठी मातायें
प्रथम पंक्ति में आसीन आलोचकों की क्रुद्ध भंगिमा नहीं देखी
तुमने नहीं देखा किस तरह विचलित हो उठा तुम्हारा सहकलाकार
दुनिया को बदलने के नाटक कर रहे हमलोग
भावनायें नहीं तर्क समझतें हैं मात्र

और कहीं यह मात्र आत्मप्रदर्शन तो नहीं तुम्हारा?
कहो फरीदा - जवाब दो

23 दिसम्बर की शाम की उस भयावह भूल का
हिसाब दो फरीदा-
कहो फरीदा - जवाब दो!


** फरीदा अहमदाबाद की संवेदन संस्था से जुड़ी नाट्यकर्मी है और 2002 की विभीषिका की साक्षी हैं।

36 comments:

vijay gaur/विजय गौड़ ने कहा…

अच्छी कविताएं हैं अशोक। साम्राज्यवादी मंशाओं के साथ धर्म का गठजोड़ कैसा है, कविताओं में उसे पकड़ने की एक सार्थका कोशिश हुई है।

प्रदीप जिलवाने ने कहा…

गॉंधी का गुजरात अब साम्‍प्रदायिकता के प्रतीक के रूप में जाना जाने लगा है, जहॉं 'मौत अब नहीं रही उतनी बड़ी खबर'. विभीषिका को मार्मिकता से उभारती हैं आपकी ये कविताएं. मेरी बधाई स्‍वीकारें.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

बहुत मजबूत कविताएँ हैं।

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
शिरीष कुमार मौर्य ने कहा…

फरीदा वाली कविता क्लासिक है भाई....

कुमार मुकुल ने कहा…

दर्द को जबां दी हैं आपने...

रंगनाथ सिंह ने कहा…

मार्मिक काव्य-संदवेदना है। कविता अंदर तक प्रभावित करती है।

रवि कुमार, रावतभाटा ने कहा…

उफ़...
बेहतर कविताएं...

संवेदनाओं को नये सिरे से मथती हैं...

अजेय ने कहा…

मुझे लाउड कविता पसन्द नहीं. लेकिन इस विषय पर और भी लाउड हुआ जाए , तो कहीं पहुँचेगी बात. यह कोमल सम्वेदनाओं का ज़बरन पैदा किए गए शोर में दब जाने का समय है.इतनी ऊँची आवाज़ यहाँ जच रही है.क्या कहूँ, मार्मिक. ऐसे और भी मेल्ज़ का इंतज़ार रहेगा. थेंक्स.

neera ने कहा…

इन कविताओं ने गुजरात के मुसलमानों के दर्द को जुबान दी है ... खून के सैलाब पर तैरती इंसानियत की लाश के बारे में पढ़ा बहुत था ..लेकिन उसे इतने नज़दीक से देखा और महसूस पहली बार किया है ...

Suman ने कहा…

nice

साहिल ने कहा…

बहुत अच्छी कवितायें हैं अशोक भाई, खासकर "जवाब दो फरीदा".

"ये गुजरात के मुस्लमान हैं या लोकतंत्र के प्रेत?"

कितनी भयावह है ये तस्वीर जो हमारी संवैधानिक व्यवस्था और सर्व-धर्म-समभाव जैसी तथाकथित ऐतिहासिक परंपरा की खिल्ली उड़ाती है. और लोकतंत्र ......... रथ यात्राओं और विकास यात्राओं के पहियों में कब का रौंदा जा चुका है.

भोजशाला विवाद के दौरान कुछ पंक्तियाँ लिखी थी, जो इन कविताओं को पढ़कर फिर से जीवंत हो गई हैं -



"है बाबरी कभी तो भोजशाला कभी है

यही तो तीर सजे हैं उनकी कमान में



कहने के बाद कुछ मतलब कुछ और बताएं

कमाल जादू है देखिये उनकी जुबान में"



मुझे कई बार बड़ा अफ़सोस होता है ये सोचकर कि तमाम कानूनों, विरोध और प्रयासों के बावजूद लोग धर्म कि अफीम बड़ी ख़ुशी से खाते हैं.

शरद कोकास ने कहा…

गुजरात से हम कैसे बाहर निकल सकते हैं हमारे मानस में जो गुजरात है वह यही है ..लाख दावे कर लें विकास के पक्षधर जो कुछ घटित हुआ उसे भुला सकना असम्भव है । यह कवितायें नहीं हैं हकीकत है ..और मै ऐसी ही कविताओं के पक्ष में हूँ ..।

प्रदीप कांत ने कहा…

बेहतरीन कविताएँ।

रागिनी ने कहा…

aadarniy ashok ji sabhi kavitaaein bahut achchhee hain par jawaab do fareeda to laajawaab hai.

sanjaygrover ने कहा…

"...दांतो के बीच जीभ की तरह रहना सीखते हुए.."

तीनों कविताएं इस दर्द को पूरी शिद्दत से बयां करती हैं।

वीरेन्द्र जैन ने कहा…

ये कवितायें हमारी बेबसी का बयान करती हुयी हमारे संकल्पों पर धार धरती हैंअ\ मुकुट बिहारी सरोज के शब्दों में कहूं
सब प्रश्नों के उत्तर दूंगा लेकिन आज नहीं
आज इसलिये नहीं कि तुम मन की कर लो
बाकी बचे न एक, खूब तबियत भर लो
आज बहुत अनुकूल ग्रहों की बेला है
चूको मत अपने अरमानों को वर लो
कल की साईत जो आयेगी
सारी कालिख धो जायेगी
इसलिये कि अँधियारे की होती उम्र दराज़ नहीं
सब प्रश्नों के उत्तर दूंगा लेकिन आज नहीं

गौतम राजरिशी ने कहा…

ब्लौग में और नेट पर उपलब्ध कुछ बेहतरीन कविताओं में शुमार की जा सकती हैं ये तीनों कवितायें....

बेनामी ने कहा…

bichalit kar dene wali kavitayen hain.
is tarah sach ko aap hi kah sakate hain Ashok ji ........

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

धन्यवाद बेनामी जी
बस एक अनुरोध है…अपने परिचय और नाम के साथ आईये मित्र। कुछ और नहीं बस विश्वसनीयता के लिये

निर्मला कपिला ने कहा…

बस थोड़ी देर से आयेगा डाक्टर

और कम हो जायेगा एक और मुसलमान


निश्चिंत रहें विद्वतजन

शांति की गारंटी है यह चुनाव परिणाम!
कितनी निर्भीकता से ये अभिव्यक्ति की है दाद देती हूँ । फरीदा वाली रच्ना तो दिल को छू गयी बहुत सही तस्वीर खींची है आपने आज साम्प्रदायिक ताकतें कैसे हथकन्दे अपना कर मानवता को शर्मसार कर रही हैं । बहुत सुन्दर कवितायें हैं धन्यवाद और शुभकामनायें

Travel Trade Service ने कहा…

बहुत मार्मिक परेद्र्स्य जी आप ने जीवंत किया एक मानव में अलग से चरित्र को !!!!!!!!!!!!!!!बधाई आप को...Nirmal Paneri

जया पाठक श्रीनिवासन ने कहा…

bahut nirbheekta se aapney is vishay par sach kaha hai, jisey jaldi sveekaar karna hi loktantra ke hit mein hai. dhaarmik unmaad se kisi ka bhala nahi ho sakta.
aapki kavitayein bahumulya hain!

Jaya Pathak Srinivasan

अनूप भार्गव ने कहा…

तीनो कविताओं ने मन को भीतर तक छुआ ।

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

....मन फिर से भारी हो
हरे हो गए जख्म
दूर कहीं बज रहा है
विजय का शंखनाद
बहुत कुछ बाकी है अभी !

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

....मन फिर से भारी हो गया

अनिल गुप्ता ने कहा…

ज्या पाठक जी आपसे निवेदन है की पाण्ड्य जी से कहीये की, भारत का बटवारे, १९८४ के सिख दंगे, भोपाल गेस त्रासदी और गोधरा में जिन्दा जला दिए गए हिन्दुओ पर भी ऐसी निर्भीकता से कलम चलाये....

दीपक बाबा ने कहा…

mujhe samajh nahin aata ki 1984 ke katleaam par jankavi chup kyon rahte hain.

dusre gujrat mein kanoon ne apna kaam kiya doshiyon ko saja mili...

1984 par system kyon chup raha, kyon nahin doshiyon ko saja mili.

Ashok Kumar Pandey ने कहा…

जिसे समझ नहीं आता उसे समझाना आसान नहीं है. असल में बात तो यह है कि शायद वे समझना चाहते भी नहीं. एक अनिल गुप्ता है कोई जो गालियाँ दे रहा है. जिन्हें लगता है कि गुजरात में क़ानून ने काम किया है, उन्हें यह भी जानना चाहिए कि चौरासी के दंगों में भी क़ानून ने 'काम' किया है, और तमाम लोगों को सज़ा मिली है ...चौरासी हो कि दो हज़ार दो...फर्क दोनों में नहीं अक्सर हत्यारों की शक्ल भी एक जैसी ही थी. जिन्हें लगता है कि उस पर नहीं लिखा गया उन्हें अपनी आँखों से पट्टी हटानी चाहिए. एक अन्याय पर बात करते हुए दूसरे अन्याय का सवाल उठाना तर्क नहीं एक घटिया पलायनवाद है...क्या कहीं आपको मैं चौरासी का समर्थन करता दिखा?

prem lodhi ने कहा…

......साम्प्रदायिकता को निर्वस्त्र करती बेहतरीन कविताएँ!

Aftab Fazil ने कहा…

ये कविताये अहसास करा रही है कि इस देश में इंसान अभी मोजूद हैं जो किसी के दर्द को बेजुबानों कि ज़बान बन सकते है

Shamshad Elahee "Shams" ने कहा…

गांधीवादी पोली पोली भूमि में कमल का खिलना एक नैसर्गिक प्रक्रिया है, सामाजिक-राजनीतिक शास्त्रियों को इस विषय पर अब एक निर्णायक फ़ैसला कर ही देना चाहिये. यह भी साथ ही बताना चाहिये कि गांधीवाद से किसी भी सम्प्रदायिकता को नही लडा जा सकता, १९४० के दशक से आज तक की राजनैतिक परिघटनायें इस तथ्य को पुष्ट करती हैं...कवितायें युगान्तकारी हैं.

कुलदीप "अंजुम" ने कहा…

इन कविताओं पहले भी कई बार पढ़ा और ये सबसे पसंदीदा कविताओं में से हैं .....कहन और मज़मून दोनों को इससे बेहतर तरीके से भला क्या साधा जायेगा ....कविता धर्म सिखलाती /निभाती हुई कवितायेँ ....समाज में परिवर्तन लाने वाले साहित्य के खोज में आप इन कविताओं से ज़रूर गुजरेंगे ...बेहतरीन ,,,ये गुजरात के मुसलमान हैं लोकतंत्र के प्रेत !

आखिर में जौन का एक शेर इन कविताओं को नज़र

खून हर रंग में दाद तलब !
खून थूकूं तो वाह वाह कीजे !!

' मिसिर' ने कहा…

रोमांचकारी संवेदना से भारी हैं कवितायेँ !एक एक पंक्ति लहू में उंगलियाँ डुबोकर लिखी है !मार्मिक अभिव्यक्ति !

Siddhartha Baghel ने कहा…

अशोक जी आपकी कविताओं में सवेंदना झलकती है इसलिए कविताओं की बुराई कोई सवेदनशील इंसान कर ही नहीं सकता। फिर भी मैं इतना जरूर कहूँगा कि अब जबकि मुसलमान भाई भी मोदी प्रशाशन से उतने रुष्ट नहीं जान पड़ते, तब हम ऐसी कविताओं से क्यूँ उनके घावों को कुरेदकर हरा करें। अब इतिहास के पन्ने पलटकर बीती हुई बातों से क्या हासिल होगा? हम क्यूँ न आपसी भाईचारे को बढाने वाली रचनाएँ भविष्य के खाली पन्नों पर कुरेंदें ताकि स्वर्णिम भविष्य का निर्माण हो सके।(यह मेरा सुझाव मात्र है, पर-उपदेश मत समझिएगा)

Siddhartha Baghel ने कहा…

अशोक जी आपकी कविताओं में सवेंदना झलकती है इसलिए कविताओं की बुराई कोई सवेदनशील इंसान कर ही नहीं सकता। फिर भी मैं इतना जरूर कहूँगा कि अब जबकि मुसलमान भाई भी मोदी प्रशाशन से उतने रुष्ट नहीं जान पड़ते, तब हम ऐसी कविताओं से क्यूँ उनके घावों को कुरेदकर हरा करें। अब इतिहास के पन्ने पलटकर बीती हुई बातों से क्या हासिल होगा? हम क्यूँ न आपसी भाईचारे को बढाने वाली रचनाएँ भविष्य के खाली पन्नों पर कुरेंदें ताकि स्वर्णिम भविष्य का निर्माण हो सके।(यह मेरा सुझाव मात्र है, पर-उपदेश मत समझिएगा)

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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