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रविवार, 29 अगस्त 2010

प्रतिभा कटियार की कवितायें

काफी आग्रहों के बाद प्रतिभा कटियार ने अपनी कवितायें भेजीं भी तो मेल का विषय लिखा- एक अकवि की कवितायें… लेकिन उनकी कवितायें और आलेख पढ़ते हुए मुझे तो वह हमेशा ही एक आदमक़द रचनाकार लगी हैं। आप भी पढ़िये और बताईये…

वही बात

उनके पास थीं बंदूकें
उन्हें बस कंधों की तलाश थी,
उन्हें बस सीने चाहिए थे
उनके हाथों में तलवारें थीं,
उनके पास चक्रव्यूह थे बहुत सारे
वे तलाश रहे थे मासूम अभिमन्यु
उनके पास थे क्रूर ठहाके
और वीभत्स हंसी
वे तलाश रहे थे द्रौपदी.
उन्होंने हमें ही चुना
हमें मारने के लिए
हमारे सीने पर
हमसे ही चलवाई तलवार
हमें ही खड़ा किया खुद
हमारे ही विरुद्ध
और उनकी विजय हुई हम पर.
उन्होंने बस इतना कहा
औरतें ही होती हैं
औरतों की दुश्मन, हमेशा...

बंद रहने दो दरवाजा

मत खोलो उस दरवाजे को
मैं कहती हूं मत खोलो
देखो न हवाएं कितनी खुशनुमा हैं
और वो चांद मुस्कुराते हुए
कितना हसीन लग रहा है.

अभी-अभी गुजरा है जो पल
तुम्हारे साथ
भला उससे सुंदर और क्या होगा
इस जीवन में.
ना, देखो भी मत
उस दरवाजे की ओर
ध्यान हटाओ उधर से
इस खूबसूरत इमारत को देखो
इसके मेहराब, रंग
इसकी बनावट
मुश्किल है कहीं और मिले.

आओ यहां, बैठो
यहां से दुनिया बहुत हसीन दिखती है
वो तस्वीर, उसके रंग
किस कदर खिले हैं ना.

नीला...यही रंग पसंद है ना तुम्हें
आकाश सा नीला...समंदर सा नीला...
नीला ही रंग है इस तस्वीर का
हां, उधर भी देखो वो नया-नया सा
फूल खिल रहा है बगीचे में
उसका रंग ही नहीं, खुशबू भी बहुत अच्छी है
तुम्हें पसंद है ना...?

वो आसमान देखो,
कितना विस्तार है उसके पास
कोई अंत नहीं इसका
हमारी इच्छाओं की तरह,
हमारे सपनों की तरह.
मत देखो उस दरवाजे की ओर...
उस दरवाजे के पीछे
हम स्त्रियों ने छुपा रखा है मौन,
सदियों से सहेजा हुआ मौन
जिसके बाहर आते ही
आ जायेगा तूफान इस दुनिया में.
टूटेगा जब यह मौन,
तो मच जायेगा हाहाकार
ढह जायेंगी खूबसूरत इमारतें,
विकृत होने लगेंगे सुंदर चेहरे.
फूल सारे गायब हो जायेंगे कहीं और
कांटों का बढऩे लगेगा आकार.
आकाश और समंदर नहीं,
जख़्म ही नीले नज़र आयेंगे तब.
आह के समंदर में बह जायेगी धरती,
तो मान लो मेरी बात
रहने दो इस धरती को सुरक्षित.
बचा लो खुशियां अपनी
और छुपा रहने दो मौन
उस दरवाजे के पीछे,
मत खोलो उस दरवाजे को.
हालांकि उस दरवाजे के
टूट जाने का वक्त तो आ ही चुका है.
फासलों के बीच प्रेम

न आवाज़ कोई, न इंतजार
वैसे, इतना बुरा भी नहीं
फासलों के बीच
प्रेम को उगने देना
अनकहे को सुनना,
अनदिखे को देखना
फासलों के बीच भटकना.

आवाजों के मोल चुकाने की ताकत
अब नहीं है मुझमें
न शब्दों के जंगल में भटकने की.
न ताकत है दूर जाने की
न पास आने की.
बस एक आदत है
सांस लेने की और
तीन अक्षरों की त्रिवेणी
में रच-बस जाने की.
तुम्हारे नाम के वे तीन अक्षर...
खतरा प्रेम से

किस कदर उलझे रहते हैं
वे एक-दूसरे में,
किस कदर तेज चलती हैं
उनकी सांसें
किस कदर बेफिक्र हैं
वे दुनिया के हर खौफ से
कि दुनिया को उनसे
ही लगने लगा है डर,
कि उन पर ही लगी हैं
सबकी निगाहें
वे कोई आतंकवादी नहीं,
न ही सभ्यताओं के
हैं दुश्मन
न उनके दिमाग में है
कोई षडयंत्र
फिर भी दुनिया को लग रहा
उनसे डर.

पंचायतों की हिल गई हैं चूलें
पसीने आ रहे हैं
समाज के मसीहाओं के
कैसे रोकें वे उन दोनों को.
कैसे उलझायें उन्हें दूसरे कामों में
कि उनकी दिशायें ही बदल जायें
कौन से जारी किये जाएं फरमान
कि खत्म हो सके उनका प्रेम
कितने खतरनाक हैं
वे इस दुनिया के लिए, सचमुच?

- प्रतिभा कटियार

21 comments:

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

प्रतिभा जी की कविताओं में प्रतिभा जी की प्रतिभा भरपूर झलकती है। एक-एक बिम्‍ब अनोखा है। इन कविताओं को जितनी बार पढ़ा जाता है, उतनी बार और बेहतर लगती हैं।

राजेश उत्‍साही ने कहा…

बहुत संभव है प्रतिभा जी अपने को कवि न मानतीं हों,पर उनकी कविता बहुतों की कविता को अ‍कविता बनाने के ताकत रखती है। वे अपनी बात को जिस अंदाज में रख रही हैं वह गहरे तक भेदती है। और कविता का काम यही है। चाहे वह कोई अकवि करे या फिर कवि।

राजेश उत्‍साही ने कहा…

बहुत संभव है प्रतिभा जी अपने को कवि न मानतीं हों,पर उनकी कविता बहुतों की कविता को अ‍कविता बनाने की ताकत रखती है। वे अपनी बात को जिस अंदाज में रख रही हैं वह गहरे तक भेदती है। और कविता का काम यही है। चाहे वह कोई अकवि करे या फिर कवि।

रवि कुमार, रावतभाटा ने कहा…

वाकई बेहतरीन कविताएं...

अजेय ने कहा…

dam daar.

dimple ने कहा…

प्रेम से खतरा...कितने खतरनाक है वो दुनिया के लिए..यही दुनिया है तो ऐसी ये दुनिया क्यूँ है...सही में बेहतरीन मोती है ये कविताएँ

सुनील गज्जाणी ने कहा…

pratibha jee
namaskar !
sunder abhivyakti . badhi
pandey jee ka bhi aabhar hum tak pahuchane ke liye .
punah badhai
saadar !

अनिल कान्त : ने कहा…

पहले भी उन्हें कई बार पढ़ा है.....उनकी रचनाएँ बेहतरीन होती हैं

MANAV ने कहा…

सुंदर कवितायें....
धन्यवाद

पारूल ने कहा…

bahut acchhi kavitaen hain.PRATIBHA

डा.सुभाष राय ने कहा…

aadamee aur usake sapanon ke khilaph kiye ja rahe shadyantro ko khoalatee hui Pratibhaa kee kavitaaye^ anubhav kee ek nayee jameen kee or kheench le jaane kee taakat rakhatee hain. unhen badhaai.Ashok o unhen yahan prastut karane ke liye badhai.

Dr. Mukul Srivastava ने कहा…

प्रतिभा जी एक अपने नाम को सार्थक करती हुई एक प्रतिभाशाली कवियत्री हैं ये अलग बात है की इसे मानने में उन्हें गुरेज़ है पर उनकी कवितायेँ दिल पर नहीं दिमाग पर वार करती हैं आभार

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

अच्छी हैं जी.

pratibha ने कहा…

आप सभी का आभार!

neera ने कहा…

वही बात तो बिलकुल सही बात... सही जगह आघात करती है...
कब तलक बंद रखें दरवाजा?
फासलों के बीच कितना सारा प्रेम!
ख़तरा प्रेम से ... हर यूग में खौफ खाती रही है दुनिया प्रेम से...
सुन्दर अभिवय्क्ती!!

sidheshwer ने कहा…

प्रतिभा जी को पढ़ता रहा हूँ और हमेशा कुछ कहने से बच निकलता हूँ किन्तु आज नहीं !
सचमुच आदमकद!

Sonal ने कहा…

behtreen kavitayein.....

A Silent Silence : Mout humse maang rahi zindgi..(मौत हमसे मांग रही जिंदगी..)

Banned Area News : Movie Review: 'Mallika'

Aparna Manoj Bhatnagar ने कहा…

जीवन अकविता अधिक है .. और वही यहाँ झांकता नज़र आ रहा है ...
बेहतरीन रचनाएं .

वंदना शुक्ला ने कहा…

अकवि नहीं ....आप सर्वश्रेष्ठ हैं प्रतिभाजी !

वंदना शुक्ला ने कहा…

अकवि नहीं ....आप सर्वश्रेष्ठ हैं प्रतिभाजी !

priyanka ने कहा…

mam aap bahut achi poem likhi hai aap humare liye bhagwan ka diye amulya uphar ho.

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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