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रविवार, 19 दिसंबर 2010

दुःस्वप्न

दुःस्वप्न

जबसे जाना पिता को
लगभग तबसे ही जानता हूँ
कि एक दिन नहीं होंगे पिता
जैसे नहीं रहा उनका वह क्रोध
जैसे चला गया धीरे-धीरे उनका भय
और चुपचाप करुणा ने भर दी वह जगह
जैसे ख़त्म होती गयीं उनसे जुड़ीं आदतें तमाम

कितना क्रूर यह सोचना
कितना कठिन इसे लिख पाना
मैं लिखता हूँ
कि एक दिन नहीं रहेगी पृथ्वी
एक दिन टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर जायेगा सूर्य
और एक दिन मैं भी नहीं रहूँगा यहाँ

21 comments:

वंदना शुक्ला ने कहा…

एक कटु सत्य ....बहुत अच्छी कविता !
बधाई और शुभकामनायें
वंदना

नवनीत पाण्डे ने कहा…

और चुपचाप करुणा ने भर दी वह जगह.
जैसे खतम होती गयी उनसे जुडी आदतें तमाम

बहुत ही गहरी अनुभूति अशोक जी!

नवनीत पाण्डे ने कहा…

और चुपचाप करुणा ने भर दी वह जगह.
जैसे खतम होती गयी उनसे जुडी आदतें तमाम

बहुत ही गहरी अनुभूति अशोक जी!

प्रभात रंजन(मॉडरेटर) ने कहा…

बहुत मार्मिक. जीवन के गहरे बोध से भरा.

Travel Trade Service ने कहा…

बहुत अच्छी पक्तियां अशोक जी ....शास्वत सत्य है
Nirmal Paneri

Aparna Manoj Bhatnagar ने कहा…

ek gambheer rachna .. antim panktiyan ekdam chhu gayin man ko.

त्रिपुरारि कुमार शर्मा ने कहा…

जैसे बहते हुए दरिया से
ओक में भर कर
कुछ पानी
यहाँ रख दिया आपने !

बहुत गहरे में उतर जाती है,
ऐसी कविताएँ !

समीर यादव ने कहा…

"एक दिन मैं भी नहीं रहूँगा यहाँ"…सत्य...इतनी सहजता से व्यक्त हुआ और मर्मस्पर्शी बन गया.

neera ने कहा…

छोटी सी कविता का सच भीतर तक हिला देता है... यह सच बस दू:स्वपन ही रहे...

Rahul Singh ने कहा…

किमाश्‍चर्यम्.

' मिसिर' ने कहा…

यह कविता क्या उनतक पहुचेगी ,जो अधाधुंध धन बटोर रहे हैं ,खुद भी गिर रहे हैं और दूसरों को भी गिराने पर आमादा हैं !
वो लोग जो दुनियां का सब कुछ खरीद लेना चाहते हैं ,इसलिए हर चीज़ को बिकाऊ बनाने पर तुले हैं ! क्या वे नहीं मरेंगे ?!

सागर ने कहा…

पिता पर हाल ही में एक सीरिज मैंने भी लिखी थी.. लेकिन आपका पहला पैराग्राफ ही सब पर भारी पड़ रहा है... कविता मुकम्मल कैसे होती है, इसका लक्ष्य क्या है इसको लेकर अक्सर कुछ बात करने का मन होता है... आपने थोडा तो इशारा दिया है...

Anuj Kumar Singh ने कहा…

बहूत खूब अशोक भाई

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

(बज़ से) kumar ambuj - अशोक,
इस कविता में मार्मिक और प्रभावी पंक्तियां हैं। पिता और मां पर लिखना कठिन है क्‍योंकि इन पर इतना ज्‍यादा और बार-बार लिखा गया है कि चुनौती बनती है, दोहराव से बचना भी जरूरी होता है।

rashmi ravija ने कहा…

कितना क्रूर यह सोचना
कितना कठिन इसे लिख पाना

पर अपने लिख डाला...सचमुच जैसे सोते से जगा देनेवाली कविता है...कुछ भी ज़िन्दगी में शाश्वत नहीं

असीम ने कहा…

अदभुत..अशोक ये कविता नहीं सत्य है..तुम्हारी ये रचना मुझे बहुत पसंद आई..इस विषय पर मैं तुमसे बात करूँगा फुर्सत में..देखो वो कब मिलती है

परमेन्द्र सिंह ने कहा…

आपका वैराग्य करुणा से भर गया। इसी भावभूमि पर मैंने भी एक कविता लिखी थी कभी, उत्साहित होकर उसे काव्य-प्रसंग पर लगा रहा हूँ, देखियेगा।

mridula pradhan ने कहा…

bhawon se paripurn karun kavita.

Domain For Sale ने कहा…

बहुत अच्छी कविता

बाबुषा ने कहा…

..और ये भी जान लें कि दरअसल कोई कहीं नहीं जाता ..सब यहीं रहते हैं ..बस..आते जाते रहते हैं..अलग- अलग कपड़ों में .. किसी के बताने से न जानें ..खुद ही जानें अपने अनुभव से !
दूसरी कविताएँ भी पढ़ीं ..मज़ा आया 'असुविधा' में ..!

leena malhotra ने कहा…

धीरे-धीरे उनका भयऔर चुपचाप करुणा ने भर दी वह जगहजैसे ख़त्म होती गयीं उनसे जुड़ीं आदतें तमाम.. बेहद मार्मिक पंक्तिया.जो जैसा है उसके लिए वैसी ही धारणा स्थान नीयत हो जाता है जीवन में. लेकिन फिर जब टूट जाता है क्रोध जाता रहता है प्रभुत्व तो करुना ही उपजती है जो जैसा है उसे वैसा ना पाकर . मुझे तो आपकी सभी रचनाएं पसंद आती है. उनमे यह भी है...

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