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शनिवार, 5 मार्च 2011

दुख की हरियरी फसल


पेंटिंग यहां से साभार

दर्द



सिर्फ़ नसों में
पिन्हां नहीं होता दर्द

आंसुओं की उदास नमी में ही नहीं
हँसी की टटका धूप में भी
पनप सकती है
दुख की हरियरी फसल

समय को रस्सियों सी बटती
सख़्त हथेलियों की लक़ीरों में बसी कालिख सा
चुपचाप जगह बनाता है दर्द
हम खड़ी करते रहते हैं
पथरीली दीवारें चारों ओर
और एक दिन
चींटियों सा सिर झुकाये
चला आता दर्द चुपचाप

दवाईयों से दब जायें जो
दर्द नहीं
महज बीमारियाँ हैं वे!

12 comments:

neera ने कहा…

सही पहचाना है इसको अलग-अलग रूप में कहाँ-कहाँ नहीं रहता यह?
खूबसूरत बहाव, भाव और संवेदनशीलता को देख कर कविता के अंत से कुछः ज्यादा उम्मीदें बंध गई थी...

pratibha ने कहा…

दवाइयों से दब जायें जो
दर्द नहीं
महज बीमारियां हैं वे...

वाह!

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी कविता।

anupama's sukrity ! ने कहा…

चींटियों सा सिर झुकाये चला आता दर्द चुपचाप
दवाईयों से दब जायें जोदर्द नहींमहज बीमारियाँ हैं वे!



गहन अभिव्यक्ति -
बहुत सुंदर लिखा है .

Rahul Singh ने कहा…

दुख-दर्द को समझने वाली सक्षम भाषा.

Kailash C Sharma ने कहा…

गहन अभिव्यक्ति...बहुत सुन्दर

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

सही है, दर्द की फसल तो कहीं भी, कभी भी लहलहा सकती है. मौसम का भी उस पर कोई असर नहीं होता. सुन्दर है.

प्रशान्त ने कहा…

दर्द का बयां....सुंदर!

' मिसिर' ने कहा…

दर्द व्याप्ति का सही-सही आकलन किया है ,
कविता के माध्यम से ! प्रस्तुतीकरण -अतिसुन्दर !!

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति ने कहा…

बहुत सुन्दर है ..आपका सोचना अभिव्यक्त करना .. उम्दा.. वाह..

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

दवाइयों से दब जाये, वो दर्द नही...!

हम्म्म्....!!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

Bahut khoob ... dard aata hai bas ... jaata to insaan hai is duniya se ...

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