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मंगलवार, 30 अगस्त 2011

मैं एक सपना देखता हूँ


(कई दिनों से मन बेहद बेचैन था....जब सारी बेचैनी समेटने की कोशिश की तो यह सब प्रलाप दर्ज हुआ...पहला ही ड्राफ्ट आप सबसे शेयर करने को बेचैन हूँ और आपकी बेबाक राय का मुन्तजिर)


मैं एक सपना देखता हूँ


मैं एक सपना देखता हूँ
रात के इस तीसरे पहर जब सपनों को सो जाने के आदेश दिए जा चुके हैं
जब पहरेदारों ने कस दिए हैं मस्तिष्क के द्वार
जब सारे सपनों के हकीक़त बन जाने की अंतिम घोषणा की जा चुकी है
उन्माद और गुस्से की आखिरी खेप के नीलाम हो जाने की खुशी में बह रही है शराबें
शराबों की ज़हरीली महक से बेपरवाह
मैं एक सपना देखता हूँ....

मैं एक सपना देखता हूँ
जिसमें बिल्कुल सचमुच के इंसान है
खुशी, दुःख और गुस्से से भरे हुए
जब होठों और मुसकराहट के बीच फंसा दिए गए हैं तमाम सौंदर्य प्रसाधनों के फच्चर
मैं उन लहूलुहान होठों से झरते गीतों की रुपहली आवाज़ सुनता हूँ

मैं देखता हूँ इस निस्सीम विस्तार के उस पार
मैं देखता हूँ इस भव्य इमारत का झरता हुआ पलस्तर
मैं रास्ते में गिरे हुए चेहरे देखता हूँ
मैं देखता हूँ लहू के निशान, पसीने की गंध, आंसूओं के पनीले धब्बे
मैं इस शव सी सफ़ेद सड़क से चुपचाप बहती पीब देखता हूँ
मेरा देखना एक गुनाह है इन दिनों
मैं सपने में इन गुनाहों की तामीर देखता हूँ

वहाँ दूर उस तरफ एक बागीचा है जिसमें अब तक बचा हुआ है हरा रंग, वह निशाने पर है
वहाँ एक बावडी है पुरानी जिसमें अब तक बचा हुआ है नीला पानी, वह निशाने पर है
वहाँ एक पहाड़ है जिसमें अब भी बची हुई है थोड़ी सी बर्फ, वह निशाने पर है
वहाँ एक नदी है जिसके सीने में अब भी बची हुई हैं थोड़े सीपियाँ, वह निशाने पर है
वहाँ एक घर है पुराना जिसकी रसोई में बची हुई है थोड़ी सी आग, वह निशाने पर है
और ऐसे में अपने बचे हुए सपनों के साथ मैं घूमता हूँ इस बियाबान में अपने डरों के श्वेत अश्व पर सवार


मैं अपराधी हूँ इस शांत, इकरंगे समय के आक्षितिज फैले विस्तार का
मेरे सपने इस पर बिखेर देते हैं राई के दानों सी रपटीली असुविधा
क्षितिज पर जाकर चुपचाप देख आते हैं सीमाओं के पार का धूसर मैदान
रात को रौशन कर आते हैं चुपचाप और जलते हुए दिन पर तान देते हैं बादल का एक टुकड़ा
एक लुप्तप्राय शब्द का अभिषेक कर आते हैं अपनी खामोशियों से
और हजार मील प्रति घंटा दौडती रेल में बैठे एक मनुष्य के माथों के बलों के बीच खींच देते हैं   सुनहरी रेखा

मैं देखता हूँ सपने और हवाओं में घुले ज़हर में घुलने लगती है आक्सीजन
मैं देखता हूँ सपने और विकास दरों के रपटीले पर्वतों में दरारें उभरने लगती हैं
गहराने लगता है नदी का नीला रंग
पर्वतों पर पसरने लगती है बर्फ
चूल्हों में सुलगने लगती हैं लुत्तियाँ...  

व्हाईट हाउस से जुड़े संसद भवन के बेतार के तार के बीच
किसी व्यवधान की तरह घुसती हैं मेरी स्वप्न तरंगें
मैं ठठा कर हंसता हूँ किसी उन्मादी की तरह और मेरी चोटिल देह से झरते हैं सपने
मैं देखता हूँ उनकी आँखों में पसरता हुआ डर 
और क्या बताऊँ फिर किस उमंग से देखता हूँ कैसे-कैसे सपने

34 comments:

प्रेमचंद गांधी Prem Chand Gandhi ने कहा…

बहुत विचलित कर देने वाली कविता. यह सपनों के बहिष्‍कृत कर दिए जाने का समय है, जिसमें दुस्‍वप्‍न ही उभरते हैं।

प्रेमचंद गांधी Prem Chand Gandhi ने कहा…

सपनों के बहिष्‍कृत कर दिए जाने के इस निर्मम समय में बहुत विचलित कर देने वाली है यह कविता, इसका और विस्‍तार किया जा सकता है।

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

कविता नहीं भावों का आवेग...

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

Santosh Kr. Pandey ‎Ashok Kumar Pandeyमैं चुप रहूँगा भाई ! कविता के कई हिस्से मेरे सर के ऊपर से गुजर गए ! लागत है बहुत मेहनत करनी पड़ेगी ऐसी कविताओं का पाठक बनने के लिए ! खैर, कुछ हिस्से समझ में आये और वो बढ़िया हैं ! बधाई आपको !

(Santosh Kr. Pandey ‎Ashok Ji:ब्लॉग कमेन्ट नहीं ले रहा है ! इसलिए यहीं कमेन्ट चिपका दिया !)

विमलेश त्रिपाठी ने कहा…

अशोक भाई, सच कहूं और सच ही कहूंगा। आपकी यह कविता मुझे बहुत-बहुत अच्छी लगी। आजकल मैं भी कुछ बेचैनी और उदासी में हूं... और जैसे लगा कि आपने मेरी बेचैनी को शब्द दिया है..यह आपके कवि की जीत है। कविता में आई कई पंक्तियां लाजवाब हैं.... बहुत सुंदर कविता के लिए ढेर सारी बधाईयां ग्रहण करें...और इसी तरह की अच्छी-अच्छी कविताएं लिखते रहें ताकि हमारी बेचैनी और छटपटाहट को स्वर मिलता रहे....

आशुतोष कुमार ने कहा…

उपमाओं और रूपकों की भरमार के सामने वैचारिक तत्वों की कमी महसूस होती है .भाषा पोएटिक कम 'पोएटिकल' ज़्यादा है , और इसीलिये शब्दबहुल .( जैसे- 'बिल्कुल सचमुच के इंसान').एक ही कथ्य को कई बार दुहराने की प्रवृत्ति शुरू से ले कर आखिरी टुकड़े तक दिखती है. शायद कुछ सख्ती से कह गया हूँ , सो इस लिए कि आप उन युवा कवियों में है , जिन से समकालीन कविता को नया तेवर देने की उम्मीद है . इसे आलोचक की नहीं दोस्त की टिप्पणी समझिये .

' मिसिर' ने कहा…

जैसे गर्म जलधारा का विक्षुब्ध प्रपात , वाष्पित ,फेनायित, ऊर्धोच्छल भावधारा ! प्रभावशाली तेज़ रसायन सी कविता ! सराहनीय !

बेनामी ने कहा…

कठिन समय की सच्चाइयों और चुनौतियों को पहले ही डाफ्ट में आपने उम्दा कविता में दर्ज कर लिया है. प्रेमचंद गांधीजी के शब्‍दों का ही सहारा लेता हूं, विचलित कर देने वाली कविता - प्रदीप जिलवाने

अजेय ने कहा…

मैं अपराधी...... के बाद वाले हिस्से पर ज़रा काम किया जाए , ........

बेचैनी को को शब्द देती अद्भुत कविता .

ये एक लम्बी कविता भी बन सकती है .

नीरज गोस्वामी ने कहा…

अद्भुत...क्या कहूँ ? मौन कर दिया आपकी रचना ने...

नीरज

tarav amit ने कहा…

इस कविता की सबसे बड़ी शक्ति इसका खूब बोलना है। खूब बोलने के बावजूद बहुत ज़बर्दस्त कविता है। लोग कुछ भी कहते रहें ये कविता मे बोलने का समय है। अब नहीं बोलेंगे तो कब बोलेंगे? अब तो हर प्रतिबद्ध लेखक सपने मे भी बोलने की बीमारी से ग्रस्त हो चुका है!

chandan yadav ने कहा…

सुलगती बैचैनी से भरी तीखी कविता। कविता के कई हिस्‍से विचलित कर देने वाले हैं।

मोहन श्रोत्रिय ने कहा…

यह समय सच में सपनों को बहिष्कृत कर देने का समय है. दुस्वप्नों के समय में वे सपने आ ही नहीं सकते जो उत्साह से भर दें. जब समय विचलित कर देने वाला है, तो इन दुस्वप्नों को झेलने को भी अभिशप्त हैं हम. पर इसी बेचैनी और सचेतनता के बीच से ही निकलेगी कोई गली, जो बदल देगी इन स्वप्नों का चरित्र. कविता को कभी-कभी बेचैनी बढ़ाने का काम भी करते रहना ही चाहिए. बेचैनी पर क़ाबू पाने का प्रयत्न कहां से जन्म लेगा, ऐसा न होने पर? बिम्बों और प्रतीकों को बेहद ढंग से साधा है. बधाई.अपने समय पर यह प्रभावी टिप्पणी है, पर कविता के मुहावरे में.

वन्दना ने कहा…

अद्भुत व बेहतरीन प्रस्तुति।

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

बहुत सुंदर संवेदनशील भाव समेटे हैं अद्भुत

गीता पंडित ने कहा…

खौलता हुआ लावा जैसे शब्दों में बह रहा हो और फिर धीरे-धीरे शांत हो बन् गया नीले जल की धाराएं, दे गया चूल्हे के लियें फिर से आग...क्षुब्ध मन फिर से लालायित हो चल पड़ा गंतव्य स्थल की और....बधाई अशोक जी.... इसीलियें मैंने पहले भी कहा था ' कविता जीवन है '....एक कविता फिर से प्राणों का संचार कर गयी....

आभार

सस्नेह
गीता पंडित

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

Alka Singh · Allahabad University
अशोकजी के ये कविता हमारे सामने कई दृश्य पैदा करती है. कुछ निराशा के तो कुछ ख़ुशी के. कुछ विजय के तो कुछ विचार के. अनव जीवन के कई द्वन्द और उम्मीद का स्वाद देती ये कविता सोचने को मजबूर करती है. जब वो कहते हैं -
मैं एक सपना देखता हूँ.
जिसे सचुच के इंसान हैं.
ख़ुशी दुःख और गुस्से से भरे हुए -------
बहुत बेचैन करने वाली रचना है जो काफी साया तक झकझोरती है.

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

Himanshu Pandya यह कहने से कोई फर्क नहीं पडता कि यह पहला ड्राफ्ट है . जब कवि को लगे कि कविता पूरी हो गयी तो पहला हो या एक सौ तीसवां , यह अप्रासंगिक है.
'मेरा देखना एक गुनाह है इन दिनों
मैं सपने में इन गुनाहों की तामीर देखता हूं '
ये पंक्तियाँ अविस्मरणीय हैं ...और ये जिन बिम्बों के तत्काल बाद आयी हैं ,झरता पलस्तर , बहती पीब...देखने का गुनाह और गुनाहों की तामीर बेहद अर्थपरक हो उठते हैं.'लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे ' हमारे दौर के बड़े कवि ने क्या खूब लिखा था -'तुम्हारी आँखें हैं या दर्द का उमडता हुआ समंदर / इस दुनिया को जितनी जल्दी हो सके बदल देना चाहिए '
कविता का आवेग / तनाव कहीं भी कम नहीं पडता है और कुछ बिम्ब तो इअतने अदभुत हैं जैसे -इकरंगे समय का आक्षितिज फैला विस्तार ' ऐसे बिम्ब 'व्यवस्था' के अमूर्तन को भेदते हैं और कवि के 'सपनों' का आकार प्रकार समझने में मदद करते हैं. ध्यान दें कि इससे पहले 'निशाने पर' जो है- बर्फ, पानी, हरा रंग और सबसे बढ़कर आग , उनके लक्षनार्थ तो जाहिर है, हैं ही पर अभिधा में भी सटीक हैं.
हाँ एक बात है , बावडी , पहाड़ , नदी के साथ स्त्री का होना पुरुष-प्रकृति के परम्परागत प्रतिमान को पुख्ता कर रहा है ( और फिर 'स्त्री की ' रसोई भी ! ) जो ध्यान से देखने पर मुझे असुविधाजनक लगा . दूसरा , भाषाई प्रश्न - क्या सीपी पुर्लिंग होता है ?
मेरा आशुतोष जी से उलटा विचार है ( बुरा हो अन्ना का - आजकल सब उनसे उलटा हो रहा है ! :) ) 'सचमुच के इंसान' के पहले 'बिलकुल' का प्रयोग ही उसे कविता बनाता है . वही तो उसकी जान

mahesh ने कहा…

mukammal kavita. apane kathya or shilp dono main apani or khichati hui....khair khot nikalane ke liye to bahut sare nikale ja sakte hain vah bahut aasan kam hota hai par mujhe usaki jaroorat nahin lagati.....bahut sargarbhit kavita....yahna pathak ke liye bhi bahut kuchh rachane ki gunjais hai.

mahesh ने कहा…

mukammal kavita. apane kathya or shilp dono main apani or khichati hui....khair khot nikalane ke liye to bahut sare nikale ja sakte hain vah bahut aasan kam hota hai par mujhe usaki jaroorat nahin lagati.....bahut sargarbhit kavita....yahna pathak ke liye bhi bahut kuchh rachane ki gunjais hai.

leena malhotra rao ने कहा…

kavita me hariyali neele pani aur seepiyon ka nishane par hona aaj ki sachchai ko byaan karta hai.. ye panktiya yaad rahegi.. abhaar.

रवि कुमार, रावतभाटा ने कहा…

मैं ठठा कर हंसता हूँ किसी उन्मादी की तरह
और मेरी चोटिल देह से
झरते हैं सपने
मैं देखता हूँ उनकी आँखों में पसरता हुआ डर...

उन्मादी हंसी पर, डर हावी हुआ है...
लगा कि डर पर उन्मादी अट्टहास को भारी पड़ना चाहिए था...
एक बेहतरीन कविता...

प्रदीप कांत ने कहा…

यह निशाने पर
वह निशाने पर
सब कुछ निशाने पर

___________________


यह समय ही ऐसा है जो विचलित कर रहा है ...., भीतर से बाहर तक सब कुछ।

यह कविता भी विचलित ही करती है और अगर कुछ विचलित करता है तो वह सार्थक है।

अब रही कविता की बात तो अजेय की बात से सहमत हूँ कि अपराधी वाले हिस्से में कुछ विस्तार सा लगता है।

pankaj mishra ने कहा…

pata nahin kaise log sapano ke bahishkaar ki baat kah/kar rahe hain .jahaan tak mujhe lagta hai ye sapano ke bahishkaar ki kavita to kum z kum nahin he hai..

pankaj ने कहा…

pata nahin kaise log sapano ke bahishkaar ki baat kah/kar rahe hain .jahaan tak mujhe lagta hai ye sapano ke bahishkaar ki kavita to kum z kum nahin he hai..

पुष्पेन्द्र वीर साहिल ने कहा…

chikne logon aur chikni batone ke daur mein sapnon ki khuduri haqeekat.... dhanyavad.

neera ने कहा…

कवि की बैचनी, आक्रोश, संवेदनशीलता पाठकों को विचलित कर दे कविता ड्राफ्ट में हो क्या फर्क पड़ता है...वो जो सब निशाने पर है ना... हरा रंग, बर्फ, सीपियाँ, आग..इन पंक्तियों में प्रक्रति दोनों हाथ उठा हेल्प -हेल्प चिल्लाती नज़र आती है और मनुष्यता विवशता और बेबसी से भरपूर अपने हाथ बांधे उसकी पुकार को नज़रंदाज़ करती...

induravisinghj ने कहा…

भावों का अद्भुत प्रदर्शन,मन मस्तिष्क पर छाप छोड़ती आपकी रचना...

प्रेम सरोवर ने कहा…

प्रबल भावों के बीच घिरी कविता अच्छी लगी । मेरे पोस्ट पर आप आमंत्रित है । धन्यवाद ।

manisha ने कहा…

bahut paripakv kavita Ashok. Bahut prabhavit karne wali. Manisha kulshreshtha

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

अशोक जी
नमस्कार
बहुत देर से आपकी इस कविता को पढ़ रहा हूँ , ये तो जैसे मेरा ही एक सच है . आजकल मन में जो बैचेनी है , ये कविता उसी का extension है . बहुत दिनों बाद आना हुआ , लेकिन आना व्यर्थ नहीं हुआ. काश कि मैं इस तरह कि कविताये लिख पाता . आपकी लेखनी को सलाम .
बधाई !!
आभार
विजय
-----------
कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

अशोक जी , पिछली बार करीब एक साल पहले आपने बताया था कि आपने कुछ किताबे लिखी है . मुझे वो किताबे चाहिए थी .. मुझे बहुत खुशी होंगी अगर आप मुझे वो किताबे भिजवा दे.

धन्यवाद
मेरा पता है :
V I J A Y K U M A R S A P P A T T I
FLAT NO.402, FIFTH FLOOR,
PRAMILA RESIDENCY; HOUSE NO. 36-110/402,
DEFENCE COLONY, SAINIKPURI POST,
SECUNDERABAD- 500 094 [A.P.].



Mobile: +91 9849746500
Email: vksappatti@gmail.com

Santosh Kuamr Maurya ने कहा…

बहुत ही अच्छी कविता. जन, जल, जंगल, जमीन से जुडी हुयी...

अपर्णा मनोज ने कहा…

vichar aur samvedna saath-saath chalte hain aur vichlit karte hain .. badhai! vandana ka vishesh aabhaar ki usne ye kavita yahaan pahunchvai ...

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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