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गुरुवार, 27 अक्तूबर 2011

कुमार अम्बुज का नया संकलन - अमीरी रेखा


हिन्दी के अत्यंत महत्वपूर्ण कवि कुमार अम्बुज का नया कविता संकलन 'अमीरी रेखा' अभी हाल में ही 'राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली' से छपकर आ गया है. 'किवाड़', 'क्रूरता' और 'अतिक्रमण' जैसे कविता संकलनों और 'इच्छाएं' जैसे बिल्कुल अलग तरह के कहानी संकलन से हिन्दी में एक विशिष्ट स्थान बनाने वाले अम्बुज जी का नया संकलन उनकी सतत सक्रियता का पता देता है. 'असुविधा' की ओर से उन्हें हार्दिक बधाई के साथ प्रस्तुत हैं इस संकलन से कुछ कविताएँ. 

किताब यहाँ से प्राप्त की जा सकती है.



अमीरी रेखा

मनुष्य होने की परंपरा है कि वह किसी कंधे पर सिर रख देता है
और अपनी पीठ पर टिकने देता है कोई दूसरी पीठ
ऐसा होता आया है, बावजूद इसके 
कि कई चीजें इस बात को हमेशा कठिन बनाती रही हैं

और कई बार आदमी होने की शुरुआत
एक आधी-अधूरी दीवार हो जाने से, पतंगा, ग्वारपाठा 
या एक पोखर बन जाने से भी होती है
या जब सब रफ्तार में हों तब पीछे छूट जाना भी एक शुरुआत है
बशर्ते मनुष्यता में तुम्हारा विश्वास बाकी रह गया हो

नमस्कार, हाथ मिलाना, मुसकराना, कहना कि मैं आपके
क्या काम आ सकता हूँ-
ये अभिनय की सहज भंगिमाएँ हैं और इनसे अब
किसी को कोई खुशी नहीं मिलती
शब्दों के मानी इस तरह भी खत्म किये जाते हैं
तब अपने को और अपनी भाषा को बचाने के लिये 
हो सकता है तुम्हें उस आदमी के पास जाना पड़े
जो इस वक्त नमक भी नहीं खरीद पा रहा है 
या घर की ही उस स्त्री के पास 
जो दिन-रात काम करती है 
और जिसे आज भी सही मजदूरी नहीं मिलती

बाजार में तो तुम्हारी छाया भी नजर नहीं आ सकती
उसे चारों तरफ से आती रोशनियॉं दबोच लेती हैं
वसंत में तुम्हारी पत्तियाँ नहीं झरतीं
एक दिन तुम्हारी मुश्किल यह हो सकती है
कि तुम नश्वर नहीं रहे

तुम्हें यह देखने के लिये जीवित रहना पड़ सकता है
कि सिर्फ अपनी जान बचाने की खातिर
तुम कितनी तरह का जीवन जी सकते हो

जब लोगों को रोटी भी नसीब नहीं
और इसी वजह से साठ-सत्तर रुपये रोज पर तुम एक आदमी को
और सौ-डेढ़ सौ रुपये रोज पर एक पूरे परिवार को गुलाम बनाते हो
और फिर रात की अगवानी में कुछ मदहोशी में सोचते हो,
कभी-कभी घोषणा भी करते हो-
मैं अपनी मेहनत और काबलियत से ही यहाँ तक पहुँचा हूँ।
0000


नयी सभ्यता की मुसीबत

नयी सभ्यता ज्यादा गोपनीयता नहीं बरत रही है
वह आसानी से दिखा देती है अपनी जंघाएँ और जबड़े
वह रौंदकर आयी है कई सभ्यताओं को
लेकिन उसका मुकाबला बहुत पुरानी चीजों से है 
जिन पर लोग अभी तक विश्वास करते चले आये हैं
उसकी थकान उसकी आक्रामकता समझी जा सकती है

कई चीजों के विकल्प नहीं हैं 
जैसे पत्थर, आग या बारिश
तो यह असफल होना नहीं है 
हमें पूर्वजों के प्रति नतमस्तक होना चाहिए
(उन्हें जीवित रहने की अधिक विधियाँ ज्ञात थीं
जैसे हमें मरते चले जाने की ज्यादा जानकारियाँ हैं)
ताड़पत्रों और हिंसक पशुओं की आवाजों के बीच
या नदी किनारे, घुड़साल में, पुआल पर
जन्म लेना कोई पुरातन या असभ्य काम नहीं था
अपने दाँत मत भींचो और उस न्याय के बारे में सोचो
जो उसे भी मिलना चाहिए जो माँगने नहीं आता

गणतंत्र की वर्षगाँठ या निजी खुशी पर इनाम की तरह नहीं
मनुष्य के हक की तरह हर एक को थोड़ा आकाश चाहिए
और खाने-सोने लायक जमीन तो चाहिए ही चाहिए
माना कि लोग निरीह हैं लेकिन बहुत दिनों तक सह न सकेंगे 
स्वतंत्रता सबसे पुराना विचार है सबसे पुरानी चाहत
तुम क्या-क्या सिखा सकती हो हमें
जबकि थूकने तक के लिए जगह नहीं बची है

तुम अपनी चालाकियों में नयी हो 
लेकिन तुम्हारे पास भी एक दुकानदार की उदासी है
जितनी चीजों से तुमने घेर लिया है हमें
उनमें से कोई जरा-सा भी ज्यादा जीवन नहीं देती
सिवाय कुछ नयी दवाइयों के
जो यों भी रोज-रोज दुर्लभ होती चली जाती हैं
और एक विशाल दुनिया को अधिक लाचार बनाती हैं
हँसो मत, यह मशीन की नहीं आदमी की चीख है 
उसे मशीन में से निकालो
घर पर बच्चे उसका इंतजार कर रहे हैं

हम चाहते हैं तुम हमारे साथ कुछ बेहतर सलूक करो
लेकिन जानते है तुम्हारी भी मुसीबत
कि इस सदी तक आते-आते तुमने 
मनुष्यों की बजाय
वस्तुओं में बहुत अधिक निवेश कर दिया है।



तानाशाह की पत्रकार-वार्ता

वह हत्या मानवता के लिए थी
और यह सुंदरता के लिए 

वह हत्या अहिंसा के लिए थी
और यह इस महाद्वीप में शांति के लिए 

वह हत्या अवज्ञाकारी नागरिक की थी
और यह जरूरी थी हमारे आत्मविश्वास के लिए

परसों की हत्या तो उसने खुद आमंत्रित की थी
और आज सुबह आत्मरक्षा के लिए करना पड़ी 

और यह अभी ठीक आपके सामने 
उदाहरण के लिए!



15 comments:

विजय गौड़ ने कहा…

कुमार अम्बुज महत्वपूर्ण कवि हैं। नये संकलन पर उन्हें बधाई। अशोक कविताओं का चयन माकूल है जो लगाई गईं।

बेनामी ने कहा…

विचारणीय.

बेनामी ने कहा…

hamare samay ki krur sachchaiyo se jujhati in kavitao ko padhkar man vyathit ho jata hai ki ham sabhyata ke kis muhane par aakar khade ho gaye ...?..is tarah chalte-chalte ham kaha tak pahuchenge...? ramji tiwari , ballia, u,p.

Farid Khan ने कहा…

बहुत प्रभावकारी। कुमार अंबुज जी को नये काव्य संकलन के लिए बधाई।

शिरीष कुमार मौर्य ने कहा…

swaagat. ambuj bhai se ham jaison ko abhi bahut kuchh seekhna hai. is agraj ko salaam aur sanklan ki badhai unhein aur hamein bhi.

' मिसिर' ने कहा…

कमाल की कवितायेँ ! बात कितनी मारक हो सकती है और शब्द कितने धारदार ,कवितायेँ इसका उदहारण हैं ! आभार अशोक जी , कुमार अम्बुज को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं !

शरद कोकास ने कहा…

कुमार अम्बुज जी को इस संग्रह के लिये अनेकानेक बधाइयाँ और अशोक तुम्हे इस प्रस्तुति के लिये धन्यवाद ।

Umesh ने कहा…

विचारपूर्ण अच्छी कविताएं, जिनमें आस-पास की जिन्दगी के सार्थक विम्ब हैं और असुरक्षित व अलग-थलग पड़े लोगों के प्रति सहानुभूति। कुमार अंबुज जी को बधाइयाँ और प्रस्तुति के लिए 'असुविधा' को आभार।

दर्पण साह ने कहा…

धारदार,
ख़ास तौर पे :
"शब्दों के मानी इस तरह भी खत्म किये जाते हैं तब अपने को और अपनी भाषा को बचाने के लिये हो सकता है तुम्हें उस आदमी के पास जाना पड़े जो इस वक्त नमक भी नहीं खरीद पा रहा है या घर की ही उस स्त्री के पास जो दिन-रात काम करती है और जिसे आज भी सही मजदूरी नहीं मिलती"

मुझे अब भी लोगों का "कैसे हो भाई सा'ब" कह के उत्तर सुने बिना आगे बढ़ जाने से कोफ़्त होती है, दरअसल हम ऊँचे लोगों को ही सुनते हैं, और नीचे लोगों द्वारा ही सुने जाते हैं.
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"एक दिन तुम्हारी मुश्किल यह हो सकती है कि तुम नश्वर नहीं रहे
तुम्हें यह देखने के लिये जीवित रहना पड़ सकता है कि सिर्फ अपनी जान बचाने की खातिर तुम कितनी तरह का जीवन जी सकते हो"

और तब तक...
"कुछ हाथ लगेगा न कोई साथ जाएगा,
क्या बात है फ़िर क्यूँ कभी हसरत नहीं जाती."

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"उन्हें जीवित रहने की अधिक विधियाँ ज्ञात थीं जैसे हमें मरते चले जाने की ज्यादा जानकारियाँ हैं"
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"अपने दाँत मत भींचो और उस न्याय के बारे में सोचो जो उसे भी मिलना चाहिए जो माँगने नहीं आता"
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Really awesome and thought Provoking. पर हम लोगों कि विडम्बना है कि हम बस सोच भर के रह जाते हैं. और खुश होते हैं कि कम-से-कम सोच तो रहे हैं...
..ये कुछ उसी तरह का एक्स क्यूज़ है जैसे:
"कभी-कभी घोषणा भी करते हो- मैं अपनी मेहनत और काबलियत से ही यहाँ तक पहुँचा हूँ।"

mridula pradhan ने कहा…

ekdam teer ki tarah.....sateek bhi sunder bhi.

suren ने कहा…

ये कवितायेँ अपने उद्देश्य में इन अर्थो में सफल है की हम कविता पढ़कर मुसकुरते नहीं है बल्कि कसमसाकर स्वयं का परिक्षण करने को ,पुँर्विचार करने को बाध्य हो जाते है ...ये बाध्यता ही इन कविताओं की सार्थकता सिद्ध करती है ..जो भी बिम्ब लगाये गए है वे स्वतः स्फूर्त से नज़र आते है ,संभवतः इसीलिए मारक और पैने है ...अशोक जी पहली दो कविताये शानदार लगायी है ...अम्बुज साब को नए संकलन के लिए बधाई .

suren ने कहा…

ये कवितायेँ अपने उद्देश्य में इन अर्थो में सफल है की हम कविता पढ़कर मुसकुरते नहीं है बल्कि कसमसाकर स्वयं का परिक्षण करने को ,पुँर्विचार करने को बाध्य हो जाते है ...ये बाध्यता ही इन कविताओं की सार्थकता सिद्ध करती है ..जो भी बिम्ब लगाये गए है वे स्वतः स्फूर्त से नज़र आते है ,संभवतः इसीलिए मारक और पैने है ...अशोक जी पहली दो कविताये शानदार लगायी है ...अम्बुज साब को नए संकलन के लिए बधाई .

Onkar ने कहा…

सोचने को विवश करने वाली कविता

प्रदीप कांत ने कहा…

नये संकलन पर अम्बुज जी को बधाई

कविताओं का चयन भी अच्छा है

डॉ.मीनाक्षी स्वामी ने कहा…

कुमार अंबुज जी को नये काव्य संकलन के लिए अनेकानेक बधाई। प्रस्तुति के लिये "असुविधा" को आभार ।

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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