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शनिवार, 31 मार्च 2012

लैटिन अमेरिका से तीन कवितायें


 राबर्टो  सोसा का जन्म १९३० में होंडुरास के योरो शहर में हुआ. सोसा "प्रेजेंते" के संपादक, "होंडुरास जर्नलिस्ट युनियन" के अध्यक्ष और होंडुरास के राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में साहित्य के प्रोफ़ेसर हैं. कैलिग्राम्स, वाल्स, द सी इनसाइड, द पूअर, ए ब्रीफ स्टडी आफ पोएट्री एंड इट्स क्रियेशन, अ वर्ल्ड फार आल डिवाइडेड और 'द कामन ग्रीफ' इनकी प्रमुख रचनाओं में से हैं. विभिन्न भाषाओं में अनूदित इनकी कवितायें लैटिन अमरीकी समय और समाज का ज़िंदा दस्तावेज़ हैं. यहाँ प्रस्तुत अनुवाद मार्टिन एस्पादा द्वारा संपादित कविता पुस्तक "पोएट्री लाइक ब्रेड" से साभार.


साझा दुःख

हम
दुनिया भर की माँयें और बेटियाँ
यहाँ करती हैं
उनका इंतज़ार

सुनो हमें. उन्हें ज़िंदा ले गए थे वे, हम उन्हें ज़िंदा वापस चाहती हैं
गौर करो हम पर, गिरफ्तार और लापता बाप और बेटे और भाइयों के नाम पर

हम सर उठाये हुए करती हैं उनका इंतज़ार
एकसाथ यूं कि जैसे किसी घाव पर लगे हुए टाँके

कोई नहीं बाँट सकता
कोई नहीं अलगा सकता हमारे इस साझे दुःख को     


स्मृति संख्या १ और २

मेरी सबसे पुरानी स्मृति
शुरू होती है एक जल कर खत्म हो चुकी स्ट्रीटलाईट से
और खत्म होती है एक मुर्दा गली में बहते हुए
सार्वजनिक नल से

मेरी दूसरी स्मृति एक ताबूत से पैदा होती है
हिंसक रूप से मृत ताबूतों का एक जुलूस


अल्फांसो क्विजादा यूरिआस की एक कविता


खत

मैं दिलासा देता हूँ खुद को कि किसी दिन
किराने की इस बेचारी दुकान का मालिक
मेरे लिखे हुए पन्नों से कागज़ के ठोंगे बनाएगा
जिसमें भविष्य के उन लोगों को देगा काफी और शक्कर
जो ज़ाहिर वजूहात से
आज नहीं ले सकते काफी और शक्कर का स्वाद 

इसका एक और अनुवाद यहाँ पढ़ें.

12 comments:

आशुतोष कुमार ने कहा…

कवितायें उत्कृष्ट हैं और अनुवाद भी. यह देखना रोमांचक है कि हिंदी में उम्दा काव्यानुवाद अब संभव हो रहा है . इस काम को आआगे बढाइये. खत कविता तो अविस्मरणीय है .

शायक आलोक ने कहा…

आवाज़ लगाती कवितायें हैं ये ...हर देश काल में निकली होंगी ऐसी कवितायें किन्तु लैटिन अमेरिका का इतिहास और भूगोल जेहन में रखते हुए इन्हें पढ़ते हुए एक अलग अनुभव में हूँ अभी.. बहुत शुक्रिया साझा करने के लिए.. आपका अनुवाद भी ध्यान खींचता है ... 'अलगाना' और 'ठोंगा' जैसे देशज शब्दों को प्रयोग देकर आपने अनुवाद का सौन्दर्य बढाया है और अपने भाषाई सरोकार को प्रोत्साहन दिया है.. यह अंतिम एक बात तो बहुत मायने रखता है

प्रेमचंद गांधी ने कहा…

भाई अच्‍छी कविताएं हैं और अनुवाद भी बहुत अच्‍छा है। और पढ़ने की इच्‍छा हो रही है।

पंकज मिश्र ने कहा…

बेचारगी के अहसासों को दरकिनार करती , गहरी निराशा में उम्मीद के सुबूत सी दिखती , दिल पे असर करती ....कवितायें

' मिसिर' ने कहा…

कवितायें और अनुवाद दोनों अच्छे हैं ! कविता 'खत'जबर्दस्त है ,पहले भी कहीं पढ़ी थी !

अजेय ने कहा…

खत लाजवाब है. *पढ़ते पढ़ते* पर एक अलग अन्दाज़ मे इसे देखा था.

Vidhu ने कहा…

अनुदित कविताओं में कभी कभी भावार्थ टूटा सा रह जाता है लेकिन असरदार इन कविताओं मन में हलचल सी करती हेँ .....जैसे किसी घाव पर लगे हुए टाँके ...कविता दिल में उतरती है ...

ramji ने कहा…

kavitaye aur anuvaad dono lajbaab hain...sajha dukh kavita me aane wala "ghaon par tanko" wala vimb to kamal kaa hai ....khat kavita to behtareen hai hi ...badhayee aapko ...aage bhi ntjaar rahega ....

प्रदीप कांत ने कहा…

कविताओं में गुंथा यह जीवन भीतर से अलग नहीं हो पाता। अनुगूंज गहरे और देर तक है.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!
--
अन्तर्राष्ट्रीय मूर्खता दिवस की अग्रिम बधायी स्वीकार करें!

lokendra singh rajput ने कहा…

अच्‍छी कविताएं हैं और अच्‍छा अनुवाद.

Aarsi chauhan ने कहा…

अच्छी कविताएं पढ़वाने के लिए अशोक सर को धन्यवाद....

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