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शनिवार, 7 अप्रैल 2012

नवीन सागर - हमारी कृतघ्नतायें खत्म क्यूं नहीं होतीं!

जन्म 1948 -  मृत्यु-2000
नवीन सागर का नाम अक्सर कवियों की सूची में शामिल नहीं किया जाता. दशकों के खेल से भी बाहर ही देखा है उन्हें. इंटरनेट और विज्ञापन के इस दौर में आपने भी पता नहीं यह नाम सुना भी होगा या नहीं. मैंने सबसे पहले को सात-आठ साल पहले अशोकनगर में एक शाम हरिओम राजोरिया भाई साहब के घर एक उदास रात में उनके ही मुंह से सुना था. उनके चेहरे पर पसरा दुःख आज भी मुझे याद है...आज भी वह उदासी बेधती है मुझे . आज जब उनका संकलन निकाला पढ़ने के लिए तो सुबह-सुबह  उस उदासी का एक कतरा मुझसे भी गुजर गया. फिर जब उसे फेसबुक पर पोस्ट किया तो कुछ बातें और निकलीं. ब्लॉग जगत में उन पर कम ही बातें हुई हैं तो मुझे लगा कुछ चीजें एक साथ रख देना बेहतर होगा. तो यहाँ उनकी कुछ कविताएँ उनके मरणोपरांत प्रकाशित काव्य संग्रह "हर घर से गायब" से और कुछ गिरिराज किराडू, राजकुमार केसवानी और कविता कोष (कविता कोष का लिंक ऊपर नवीन सागर के नाम के साथ)  के सौजन्य से ...शायद असुविधा नाम को चरितार्थ इससे अधिक किसी पोस्ट ने न किया होगा!



१- देना !

जिसने मेरा घर जलाया
उसे इतना बड़ा घर
देना कि बाहर निकलने को चले
पर निकल न पाये .

जिसने मुझे मारा
उसे सब देना
मृत्यु न देना .
जिसने मेरी रोटी छीनी
उसे रोटियों के समुद्र में फेंकना
और तूफान उठाना .

जिनसे मैं नहीं मिला
उनसे मिलवाना
मुझे इतनी दूर छोड़ आना
कि बराबर संसार में आता रहूं .

अगली बार
इतना प्रेम देना
कि कह सकूं : प्रेम करता हूं
और वह मेरे सामने हो .

२-
संदिग्ध
इस शहर में
जिनके मकान हैं वे अगर
उनको मकानों में न रहने दें
जिनके नहीं हैं
बहुत कम लोग मकानों में रह जायेंगे.

जिनके मकान हैं
वे मजबूती से दरवाजे बंद करते हैं
खिड़की से सतर्क झांकते हैं
ताले जड़ते हैं
सुई की नोक बराबर ज़मीन के लिए लड़ते हैं

जिनके मकान नहीं हैं
वे बाहर से झांकते हैं
दरवाजों पर ठिठकते हैं
झिझकते हुए खिड़कियों से हटते हैं

जिनके मकान नहीं हैं
वे हर मकान के बाहर संदिग्ध हैं
वे हर मकान को अपने मकान की याद में देखते हैं.
 
३- मैं तो नागरिक
 मरने से डरता हूँ एक दिन
तो बड़ी हिंसा हो जाती है दूर-दूर

पर मैं तो नागरिक

नींद के पाताल में चलता
बच-बच के घर की तरफ़
गुण्‍डों को नमस्‍कार करता।

आता है वह अक्‍सर कहने को

मरने से डरता हूँ एक दिन
तो बड़ी हिंसा हो जाती है दूर-दूर।

वह दोस्‍त मेरा

कहता है डर अकेले का घर है
चलो बहुत लोगों में
सब कुछ हो जाएगा
आने को हैं अपने बच्‍चे इस दुनिया में
समतल मैदान करो खेलेंगे।
पर मैं तो नागरिक
दोस्‍त को नुक्‍कड़ तक छोड़ता
लौटता
गुण्‍डों को नमस्‍कार करता।
४-अच्छी सरकार
 
यह बहुत अच्छी सरकार है
इसके एक हाथ में सितार दूसरे में हथियार है
सितार बजाने और हथियार चलाने में
तजुर्बेकार है
.
इसका निशाना अचूक है
कानून की एड़ियों वाले जूते पहनकर
सड़क पर निशाना साधे खड़ी है
उसी सड़क से होकर मुझे
एक हत्या की गवाही के लिए जाना है .
मुझसे पहले
दरवाज़ा खोलकर मेरा इरादा
बाहर निकला
तुरंत गोली से मर कर गिरा .
मैने दरवाज़े से झांककर कहा
मुझे नहीं पता यह किसका इरादा रहा
इस तरह
मैं एक अच्छा नागरिक बना
फिर मैने झूम-झूम कर सितार सुना .

५- इस घर में
 
इस घर में घर से ज़्यादा धुआं
अन्धेरे से ज़्यादा अन्धेरा
दीवार से बड़ी दरार.
इस घर में मर्तबा बहुत
जिसमें से सांस लेने की आवाज़ लगातार
आलों में लुप्त ज़िन्दगियों का भान
चीज़ों में थकान.
इस घर में सब बेघर
इस घर में भटके हुए मेले
मकड़ी के जालो से लिपटे हुए
इस घर में
झुलसे हुए रंगों के धब्बे
सपनों की गर्द पर बच्चों की उंगलियों के निशान .
इस घर में नींद से बहुत लम्बी रात. 


(नवीन सागर की मुख्य कृतियाँ हैं - नींद से लम्बी रात (कविता संग्रह), आसमान भी दंग                         ( बाल-कविताएँ); उसका स्कूल (कहानी-संग्रह).  एक कविता संकलन "हर घर से गायब"  सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर से आया है. संपर्क है - e mail - suryaprakashan@gmail.com) 


* इस पोस्ट को पढकर हिन्दी के एक  वरिष्ठ कवि ने एक पत्र लिखा है जिसमें उनका आरोप यह है कि मैंने यह पोस्ट कोई श्रेय लेने के लिए लिखी है और इसमें नवीन सागर पर हुए कामों का ज़िक्र नहीं किया है. मैं अपने पाठकों से क्षमा चाहूँगा अगर उन्हें ऐसा लगा तो. मेरा उद्देश्य सिर्फ ब्लॉग के पाठकों का नवीन जी से परिचय कराना था. नवीन जी पर ब्लॉग जगत में उपलब्ध सामग्रियों का लिंक ऊपर दिया ही गया था . इसके पहले कथादेश ने श्री रामकुमार तिवारी के संपादन में उन पर केंद्रित एक विशेषांक निकाला था और प्रकाश मनु ने  उन पर एक कहानी  भी लिखी है, जो 'कहाँ हो नवीन भाई' शीर्षक से इसी नाम की किताब में छपी है. इसे यहाँ से प्राप्त किया जा सकता है.


18 comments:

Vipin Choudhary ने कहा…

behtereen kavita shukariya ashok neveen jee kee en kavitaon ko sanjha karney ke leye

अपर्णा मनोज ने कहा…

पहली बार नवीन सागर जी को पढ़ा . पहली कविता देना और संदिग्ध ख़ास पसंद आयीं . हो सके तो कुछ अन्य कविताएँ भी साझा कीजिये . आभार अशोक .

mridula pradhan ने कहा…

vaise to sabhi achchi hain ....par pahliwali kuch khaas hai.

राजेश उत्‍साही ने कहा…

नवीन सागर भले ही कवियों की सूची में न दिखाई देते हों, पर वे हर सचेत पाठक की नजर में रहे हैं। बच्‍चों के लिए लिखीं उनकी कविताएं चकमक में 1985 से लेकर उनके रहने तक और बाद में भी छाया सागर से अनुमति लेकर हमने प्रकाशित की हैं। यहां उनकी ये कविताएं देखकर अच्‍छा लगा।

प्रदीप कांत ने कहा…

बह्ले ही नवीन का नाम कवियों में शुमार न किया जाता हो किंतु नवीन की कविताएँ उनके कवि ही नहीं, एक बेहतरीन कवि होने की गवाह हैं। उनका पहला संग्रह 'नींद से लम्बी रात' मेरे पास है।

पारुल "पुखराज" ने कहा…

बेहद अच्छी…

Anurag Chanderi ने कहा…

नवीन जी की रचनाये बहुत आकर्षक एवं सार्थक है , इतनी प्यारी रचनाये पढ़ाने के लिए अशोक पाण्डेय जी आपको धन्यवाद .

नीरज गोस्वामी ने कहा…

उफफ्फ्फ्फ़...बेजोड़ रचनाएँ हैं...बहुत देर तक इन्हें पढने के बाद स्थिर नहीं रह सका...

नीरज

ramji ने कहा…

बेहतरीन हैं कविताएं ....आज पहली बार इन्हें पढ़ा , और अब पूरा संग्रह पढ़ने की ईच्छा है ...कैसे मिलेगा..

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

ऊपर इ मेल दिया है रामजी भाई...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

दो-तीन दिनों तक नेट से बाहर रहा! एक मित्र के घर जाकर मेल चेक किये और एक-दो पुरानी रचनाओं को पोस्ट कर दिया। लेकिन मंगलवार को फिर देहरादून जाना है। इसलिए अभी सभी के यहाँ जाकर कमेंट करना सम्भव नहीं होगा। आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!

विकल्प-मंच परिवार ने कहा…

बड़ी सहजता से बड़ी बात कहती शानदार कवितायेँ हैं. धन्यवाद.

Udan Tashtari ने कहा…

पहली बार ही पढ़ा...अद्भुत रचनायें हैं. आपका आभार.

Kailash Sharma ने कहा…

उत्कृष्ट रचनाएँ !

प्रमोद ताम्बट ने कहा…

नवीन जी को बेहद करीब से देखा है, आपने याद ताज़ा कर दी।

addictionofcinema ने कहा…

नवीन सागर को पहले भी पढ़ा है, वे एक शानदार कवि ही नहीं एक बेहतरीन कहानीकार भी रहे हैं और उनकी कहानियां बेहतरीन किस्सागोई और सहजता का नमूना हैं.

Amit sharma upmanyu ने कहा…

धीमे ज़हर सी कवितायें हैं! अद्भुत!

कुमार अम्‍बुज ने कहा…

इस तरह के पुनराविष्‍कार जरूरी होते हैं। यह पलटकर देखने का एक अनिवार्य मानवीय कर्म भी है।
नवीन सागर अपने आप में हमेशा ही एक अलग कवि की तरह दिखते रहे हैं।

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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