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सोमवार, 15 अक्तूबर 2012

हम दोनों के बीच हारमोनियम एक चरखे की तरह है - हेमंत देवलेकर






हेमंत देवलेकर
की ये कवितायें मुझे प्रिय मित्र नीलोत्पल के मार्फ़त मिलीं. इनसे पहले हेमंत भाई को मैं एक सक्रिय रंगकर्मी के रूप में ही अधिक जानता था. उनके सद्य-प्रकाश्य संकलन से ली गयीं इन इन कविताओं से गुजरते हुए आपको उस रंगकर्म के लम्बे अनुभव का असर दिखेगा भी. उनकी कविताओं का संसार बहिष्कृत जनों से बनता है. मालगाड़ी उसका बड़ा प्रतीक बन कर आती है, जिसके आने से स्टेशन पर कोई हलचल नहीं होती. मध्यवर्गीय  स्त्रीविमर्श के इस दौर में उन्होंने अपनी कविता के लिए कामवाली बाई के रूप में निम्नवर्गीय किरदार चुना है.  हेमंत की कविताओं का शिल्प तो सधा हुआ है ही, साथ में जो बिम्ब वे चुनते हैं वे बेहद आकर्षक और नए हैं जहाँ हारमोनियम एक 'चरखा' है, दरवाजे मानसून की ख़ुशी में 'फूले' हुए हैं और मछलियाँ नदी को सिलने वाले 'धागे'  हैं. असुविधा पर हेमंत भाई का स्वागत...





मालगाड़ियों का नेपथ्य

रेल्वे स्टेशनों की समय सारिणी में
कहीं नहीं होतीं वे नामज़द।
प्लेटफार्म पर लगे स्पीकरों को
उनकी सूचना देना कतई पसंद नहीं।
स्टेशन के बाहर खड़े
सायकल रिक्शा, आटो, तांगेवालों को
कोई फ़र्क नहीं पड़ता उनके आने या जाने से।
चाय-नमकीन की पहिएदार गुमठियाँ
कहीं कोने में उदास बैठी रह जाती हैं
वज़न बताने की मशीनों के लट्टू भी
क्या उन्हें देख धड़का करते हैं?
आधी नींद और आधे उपन्यास में डूबा
बुकस्टाल वाला अचानक चौंक नहीं पड़ता
किताबों  पर जमी धूल हटाने के लिये।

मालगाड़ियों के आने जाने के वक़्त
पूरा स्टेशन और क़रीब-क़रीब पूरा शहर
पूरी तरह याददाश्त खोए आदमी सा हो जाता है
और इस सौतेले रवैये से
घायल हुई आत्मा के बावजूद
अपनी पीड़ा को अव्यक्त रखते हुए
वे तय करती रहती हैं तमाम दूरियाँ।

भारी-भरकम माल असबाब के साथ
ढोती हैं दुनिया की ज़रूरतें
और ला-लाकर भरती हैं हमारा ख़ालीपन।

पैसेंजर ट्रेनों से पहले चल देने की
गुस्ताख़ी कभी नहीं करेंगी वे
पीढ़ियों की दासता ने उन्हें
इतना सहनशील और ख़ामोश बना दिया है।

दो प्लेटफार्मों के बीच छूटी सुनसान पटरियों पर
अंधेरे में आकर जब चुपचाप गुज़र जाती हैं
तब उनकी ज़िंदगी
दुनिया के तमाम मज़दूरों की कहानी लगती है
एक-सी अनाम
एक-सी उपेक्षित
और एक सी इतिहास के पन्नों से
खारिज


पेड़ों का अंतर्मन

कल मानसून की पहली बरसात हुई
और आज यह दरवाज़ा ख़ुशी से फूल गया है

खिड़की दरवाज़े महज़ लकड़ी नहीं हैं
विस्थापित जंगल होते हैं

मुझे लगा, मैं पेड़ों के बीच से आता-जाता हूँ,
टहनियों पर बैठता हूँ
पेड़ों की खोखल में रहता हूँ किताबें
मैं, जंगल में घिरा हूँ
किंवदंतियों में रहने वाला
आदिम ख़ुशबू से भरा जंगल

कल मौसम की पहली बारिश हुई
और आज यह दरवाज़ा
चैखट में फँसने लगा है
वह बंद होना नहीं चाहता
ठीक दरख़्तों की तरह

एक कटे हुए जिस्म में
पेड़ का खून फिर दौड़ने लगा है
और यह दरवाज़ा बचपन की स्मृतियों में खो गया है

याद आने लगा है
किस तरह वह बाँहें फैलाकर
हज़ारों हथेलियों में समेटा करता था
बारिश को
और झूमने लगता था

वह स्मृतियों में फिर हरा हुआ है।




हम दोनों के बीच एक हारमोनियम है 

हम दोनों के बीच एक हारमोनियम है

हारमोनियम के उस तरफ़
सुरों को अपनी उंगलियों की थापों से
जगाती हुई तुम बैठी हो
और इस तरफ़
तुम्हारे सुरों में नाद भरने
पर्दे से हवा धोंकता हुआ मैं
हारमोनियम-
किलकारियां भरता, हाथ पैर चलाता
एक नया नवेला बच्चा है लगभग छः महीने का
हम दोनों उसे खिलाने में लगे हुए हैं
हम दोनों के बीच एक हारमोनियम है

मेरे तुम्हारे दरम्यान एक बरसाती नदी है
जिसमें राग अनंत लहरें उठाते हैं
हम डूबते हंै उस नदी में
तैरते हैं और गोते लगाते हुए
पकड़ते हंै संतरंगी मछलियों को
हारमोनियम हम दोनों के बीच उस नदी की तरह है

लेकिन क्या तुमने
’यमन’ की सरगम याद करते हुए
कभी ग़ौर से देखा है हारमोनियम को
क्या वह तुम्हें पुल की तरह दिखाई नहीं देता
जिस पर से दौड़-दौड़कर
हम एक-दूसरे के करीब तक पहुँचते हैं
और छुए बिना ही भीग-भीग जाते हैं

हम दोनों के बीच एक हारमोनियम है
उसमें शब्द नहीं हैं तो क्या
वह वही भाषा बोलता है
जो मेरी है, तुम्हारी है

हम दोनों के बीच हारमोनियम एक चरखे की तरह है
जो बुन रहा है
बहुत महीन और मुलायम धागे


बाई

शहर की सड़कों पर आजकल
दिखाई देती हैं पीली बसें
नहीं दिखाई देती है तो बस
एक बूढ़ी सी औरत

बिखरे सफेद बालों और
कमर में खोंसी हुई
मैली-कुचैली साड़ी की परवाह न करते हुए
बढ़ती हुई उन घरों की ओर
जहाँ अनमने ढंग से तैयार बच्चांें को
पाठशाला भेजना होता।

बच्चों के वास्ते क्या कुछ नहीं थी वह
सहेली, दादी, मेडम
ऊटपटांग, हरकतोंवाला जोकर
और हिफ़ाज़तदार पुलिस भी

पिटारे में उसके क्या-क्या नहीं होता
गाने, नाच, पुचकारें,
झिड़कियाँ, धमकियाँ, नसीहतें

भीड़-भाड़ से बचाते हुए
बच्चों को एक क़तार में रखने का करिश्मा
उसे आता था
चलते रास्ते बच्चों का पहला पीरियड वही लेती थी।

स्कूल न जाने की ज़िद पर अड़े बच्चों को
बलात् खींचकर ले जाने लगती
तब वह विकराल जाूदगरनी लगती
और जब कभी स्कूल से लौटने में
होती थोड़ी भी देर
तो कई शंकाएँ उस पर उठतीं।

दूर दराज़ रहते अपने नाती-पोतों की कल्पना
वह उन्हीं बच्चों में करती
और भूल जाती रत्ती भर पगार का असंतोष और अकेलापन

ज़िंदगी की बहुत सी पुरानी
और भूली जा चुकी चीज़ों की फ़ेहरिस्त में
शायद उसका पता मिले
वह केवल ‘बाई’ नहीं
एक सभ्यता थी
जो सड़क किनारे की मिट्टी में
गहरे लुप्त हो गई है।


झील

1.

पानी पर एक रास्ता बनाती हुई
गुज़र गई बोट
एक फव्वारा-सा उसका पीछा रहा करता

एक आवाज़ जो उस रास्ते पर
चलकर पहाड़ियों के पीछे
हुई अदृश्य

सिग्नल पर रुकी भीड़-सा
पानी कुछ देर रहा ठहरा
फिर झील में गया मिल

पानी के निचाट सूनेपन में
वह एक बोट
याद की तरह छूट जाती है

2.

पहाड़ी
कालीन की तरह बिछी है झील पर
डबल रोटी के टुकडे़ उछाले जाते हैं
कालीन के नीचे तहख़ानों से
सिर उठाती हैं मछलियाँ
तैरती डबलरोटी टुकड़ों में बिखर जाती है
झील के होंठ मुस्कुराहट की तरह फैलते हैं

3.

झील पर तैरती एक दोपहर

मछलियाँ
अपने सिरों पर
रोशनी के जवारे उगाए
नाचती हुई
चल रहीं

सूर्य के विसर्जन का
यह चल समारोह

4.

पानी को सिलती रहती हैं मछलियाँ
इसलिये पानी कभी उधड़ता या
फटता नहीं
और मछलियों को पता नहीं चलता
कि वे कब धागे बन गई हैं।

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 परिचय



जन्म           : 11 जुलाई 1972

शैक्षणिक योग्यता : 12वीं उत्तीर्ण प्रथम श्रेणी (उच्चगणित विज्ञान)

रंगकर्म का अनुभव: 1995, शिप्रा संस्कृति संस्थान उज्जैन द्वारा आयोजित ग्रीष्मकालीन  नाट्य शिविर से रंगकर्म की          शुरुआत। 2006 तक शिप्रा संस्कृति संस्थान में अभिनय और रंगमंच की अन्य विधाओं में सक्रिय भूमिका
                 

 नाटक : अनोखा वरदान, एक था गधा, पांचाली ये वो नहीं, कबीरा खड़ा बजार में, मीरा, मृच्छकटिक, विठ्ठला, अमर शहीद     बलराम जोशी (टेलीफिल्म),  श्री विनोद मातवणकर के निर्देशन में मराठी नाटकों में अभिनय जुलाई 2006, संगीत नाटक अकादेमी, नई दिल्ली द्वारा एक माह की युवा रंगकर्मी कार्यशाला पचमढ़ी में देश के सुप्रसि़द्ध रंग आचार्यो के मार्गदर्शन में सघन प्रशिक्षण प्राप्त 2007 से प्रसिद्ध वरिष्ठ रंग निर्देशक श्री अलखनंदन के नाट्य समूह में अभिनय और अन्य           विधाओं में सतत् अनुभव. भगवदज्जुकम्, धूर्तसमागम, महानिर्वाण, अजातघर,चारपाई, ताम्रपत्र, काव्यरंग,                  (रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविताएं ) में मंच पर और मंच परे, 


जून 2008 संगीत नाटक अकादेमी दिल्ली द्वारा द्वितीय चरण हेतु सेंट्रल झोन की 75 दिवसीय युवा रंगकर्म कार्यशाला में विशिष्ट अध्ययन. सर्वश्री के0एन0 पणिक्कर, रतन थियम, एच0 कन्हाईलाल, सावित्रिजी, सतीश आनंद,कमलेश दत्त त्रिपाठी आदि सुविख्यात रंग गुरुओं के मार्गदर्शन में। कार्यशाला में प्रतिभागियों की परीक्षा-प्रस्तुती में दो नाटकों में संगीत निर्देशन ग्रीष्मकालीन बाल नाट्य शिविरों में मार्गदर्शन गोंडी बोली में प्रस्तुत बाल नाटक डाकघर में गीत लेखन और संगीत निर्देशन
                  
 जुलाई 2010 में स्वराज संस्थान, भोपाल द्वारा आयोजित आजाद बांसुरी बाल नाट्य समारोह हेतु नाटक बिरसा मुंडा का लेखन और भारत भवन में मंचन

साहित्यिक गतिविधियां: विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन

वर्तमान में         : स्वतंत्र रचनाकर्म

स्थायी पता        : 17, सौभाग्य, राजेन्द्र नगर, शास्त्री नगर के पास, नीलगंगा, उज्जैन, पिनकोड- 456010 (म0प्र0)
                         मोबाईल - 090398-05326




21 comments:

शिरीष कुमार मौर्य ने कहा…

यार अशोक मैं तो बिलकुल बंधा रह गया हूं इन कविताओं से। नीलोत्‍पल ने कितना सुकून दिया है इस पोस्‍ट से....उसे शुक्रिया। हिंदी की युवा कविता अपने सामर्थ्‍य को इस तरह प्रकट करती है....भरपूर विनम्रता और हिम्‍मत के साथ। हेमन्‍त के भीतर बड़ा कवि है... जैसा कि मेरे साथ होता है बिना मिले सिर्फ़ इन कविताओं के सहारे उससे मित्रता का सम्‍बन्‍ध बन गया है....हेमन्‍त, मेरे अनदेखे दोस्‍त तुम खूब दिख रहे हो अपनी कविताओं में।

इस पोस्‍ट को कम से कम एक हफ्ता रहने देना दोस्‍त।

mukti ने कहा…

बहुत अच्छी लगीं कविताएँ. विशेषकर पहली और आख़िरी. पहली इसलिए कि वह बचपन की याद दिलाती हैं, मेरा बचपन रेलवे कालोनियों और स्टेशनों पर बीता है...रेलवे स्टेशन अजीब उदासी से भर देता है...आती-जाती गाड़ियों के बीक ठहरा हुआ सा.
अंतिम कविता बड़ी सादी है. सादगी से अपनी बात कहती है.

kailash ने कहा…

बेहतरीन ....बहुत ही अच्छी कविताएं .

तिथि दानी ने कहा…

बहुत शानदार, संवेदनशील और तार्किक धरातल पर खरी उतरती कविताएं। शुभकामनाएँ....

neelotpal ने कहा…

शुक्रिया असुविधा, शुक्रिया अशोक भाई.

हेमंत जिस मनोयोग से कविता लिखता है वह इतना बेसबब है कि आप उसमें झाँक कर देख सकते है वह अपनी उम्मीदों के रंग छोड़ता नहीं...
बस यह बेफिक्री है, पानी का उदात्तपन या अपने होने की सीमाहीन गति.....

हेमंत के विलक्षण बिम्ब उसकी कविताओं का नैरन्तर्य धेर्य और प्रकृति के प्रति सहज प्रेम है.

प्रेम हेमंत की मूल प्रकृति हैं.

Aharnishsagar ने कहा…

सारी कविताएँ बहुत प्रभावी हैं और गज़ब का सौन्दर्य बोध हैं हेमंत सर के पास .. खास कर "पेड़ों का अंतर्मन" बहुत पसंद आई
हेमंत सर को बधाई .. और आपका आभार

Rajesh Kumari ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार १६ /१०/१२ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चामंच पर की जायेगी ,आपका स्वागत है |

Premchand Gandhi ने कहा…

हेमंत भाई की इतनी शानदार कविताएं पढ़वाने के लिए हार्दिक आभार...

Arvind Jangid ने कहा…

बहुत अच्छा लगा कविताओं को पढकर.आपका आभार जो आपने इन्हें हम तक प्रस्तुत किया.

Digamber Ashu ने कहा…

बहुत अच्छी कवितायेँ हैं. विषय और अंदाज दोनों में नयापन है. धन्यवाद साथी.

Pummy ने कहा…

बहुत ही बढ़िया कवितायें...खासकर मालगाड़ी और बाई से तो जोड़ भी पा रही हूँ अपनेयाप को ....एक बार एक मालगाड़ी के ड्राइवर की व्यथा सुनी थी इसी तरह की....बधाई हेमंत जी को और शुक्रिया अशोक जी आपको....
सुनीता सनाढ्य पाण्डेय

ramji ने कहा…

वाकई ...शानदार

Jagjit ने कहा…

Jagjit Sidhu मालगाड़ियों का नेपथ्य kavita bahut umda hai...hemmant ji ko badhai...asuvidha ka hamesha abhaari ...

Amit sharma upmanyu ने कहा…

बेहद मर्मस्पर्शी कवितायें! शानदार, मानीखेज.. क्या-क्या न कहूँ! बहुत दिनों बाद दिल बाग़-बाग़ हुआ (तार-तार भी)

पंकज मिश्र ने कहा…

एक गाना है जिंदगी मेरे घर आना .....हेमंत ने बता दिया जिंदगी को बुलाने की जरूरत नहीं है ....तमाम चीज़ें जिन्हें हम निर्जीव समझते हैं कितनी जिन्दा है....... उनसे बातें , उनकी बातें
जो पढ़ पाते है वे ही ऐसी कवितायें रच सकते है ...............बेहद पसंद आई....आप दोनों को दिल से धन्यवाद .....

अनिरुद्ध उमट ने कहा…

mera swar shirish bhai ke swar me ghol ...kavi tk pahuncha den ....jitna vilamban me bhasha me rahenge utna hi .....kavita ke charkhe ko chalate rahenge .

जगजीत सिद्धू ने कहा…

मालगाड़ियों का नेपथ्य kavita bahut umda hai...hemmant ji ko badhai...asuvidha ka hamesha abhaari ...

जगजीत सिद्धू ने कहा…

खासकर मालगाड़ी ...लगता है जैसे मै ही हू ..

tarav amit ने कहा…

आजकल लिखी जा रही कविताओं की तरह विचारों को भर देने की, बहुत कुछ कह देने की जल्दबाजी से अलग बहुत तफ़सील के साथ लिखी गईं ये कवितायेँ बहुत सुकून दे रही हैं| ये उन्हें अवश्य पढनी चाहिए जो समकालीन कविता में कभी शिल्प के गायब हो जाने की शिकायत करते हैं तो कभी जीवन के उड़न छू हो जाने की| ये सबूत हैं एक पीढ़ी की कविता से पहचान की|

शिरीष कुमार मौर्य ने कहा…

आज 17 अक्‍टूबर के दिन असुविधा को अनुनाद की ओर से चार बरस का होने पर बहुत बहुत बधाई.....दोनों एक ही परिवार के ब्‍लाग हैं....और लगभग हमउम्र भी...अनुनाद गुज़री 3 को 5 का हुआ है।

शिरीष की ओर से अशोक को भी बधाई...

hemant deolekar ने कहा…

असुविधा, मित्र अशोक कुमार पांडे और सभी मित्रों का प्रेमपूर्वक आभार...

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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