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शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

कुमार अनुपम की ताज़ा कवितायें

कुमार अनुपम की कवितायें आपने असुविधा पर पहले भी पढ़ी हैं. वह कुछ उन कवियों में से है जिनके यहाँ कविता एक रुटीन की तरह नहीं घटना की तरह घटित होती है. इसीलिए उनके यहाँ विमर्शों की आपाधापी नहीं बल्कि समकालीन विडम्बनाओं का गहरा मानवीय चित्रण होता है. यहाँ इन दो कविताओं में जल है...जल जो जीवन भी है, प्रलय भी...पानी भी और काला पानी भी. अधिक कहना कविता में अनावश्यक हस्तक्षेप होगा तो मैं आपको इन दो कविताओं की संगत में अकेला छोड़ता हूँ...

सर जान एवर्ट मेलास की एक आयल पेंटिंग यहाँ से 



जल 

एक तिहाई पृथ्वी है
 खेतों का स्वेद 

उसी की गन्ध से
 साँस की सुवास 

उसी की आवाज़ से
 रक्त में पुकार 

उसी की चमक से
 रिश्तों में प्रकाश 

उसी के स्वाद से
 नमक में मिठास 

उसी के स्पर्श से 
​है ​दुनिया सहलग। 
https://mail.google.com/mail/ca/u/0/images/cleardot.gif


काला पानी

कुछ ही देर बाद
सिलवटें साफ़ करती उठ जाएगी रात 
ख़ामोशी 
पत्थर की तरह तपते हुए टूट जाएगी 

चिड़ियाँ उठेंगी 
और छोड़ देंगी अपना नीड़ 

सपने 
नींद की प्रतीक्षा में 
पुनः स्थगित हो जाएँगे 

अँधेरा फिर भी नहीं हटेगा उन पुतलियों से 
जिनमें बाढ़ का पानी 
ख़तरे के निशान को डुबाता जा रहा है 

एक हाथ उठेगा कहीं से 
और लुप्त हो जाएगा    एक चिराग बुत्त 

वह हाथ किसका है 
जिसकी उँगलियों में 
पुरखों की विघ्नहारी अंगूठियाँ

बहन कलपेगी 
बप्पा हेराने 
बचाते क्यों नहीं
देखो डूब रहा है 
भाई
​​
अम्मा को सम्हालो गई दादी की फूल बटुली भी गई 
​नन्हे तो बोल भी नहीं सकता
भाई फसल तो गई
 

मेरी आवाज़ पानी से भर रही है 
गरू है यह काला पानी 

इसी पानी से नहाना जैसे नियति है हमारी 
और सुबह काम पर जाना है प्रफुल्लित मुख लिये 
थकान की ख़ुराक अभी कम है शायद 
उस नींद के लिए 
जिसमें सुन्दर सुन्दर सपने रहते हैं।   ​
   


22 comments:

' मिसिर' ने कहा…

गहरी संवेदना की प्रभावशाली कवितायेँ ! 'काला पानी' की मार्मिकता से ह्रदय भीग गया ! कुमार अनुपम को बधाई !

आनंद कुमार द्विवेदी ने कहा…

वाह भाई, काला पानी तो वाकई बहुत मार्मिक कविता है, अनुपंम जी को बधाई !

vandana gupta ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(27-7-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
सूचनार्थ!

परमेश्वर फुंकवाल ने कहा…

काला पानी से उपजी संवेदनाओं की बाढ़ में मन गहरे डूब जाता है..कितने हैं जिनके लिए काल की यह निर्मम थकन ही एक सहारा है एकाध कोई स्वप्न जी लेने के लिए..आपका धन्यवाद इन कविताओं से रूबरू कराने के लिए और अनुपम जी को बधाई अर्थपूर्ण सृजन के लिए..

hridyanubhuti ने कहा…

ह्रदय स्पर्शी रचनाएँ !!

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

जल हो, मिट्टी हो, हवा हो, आग हो या फिर आकाश सभी में जीवन है और मुत्यु भी। कलम में ताकत हो तो आशा और संवेदना दोनो ही अभिव्यक्त हो सकते हैं जैसा कि 'जल' और 'कालापानी' में हुआ है।

Kamal Choudhary ने कहा…

Laajavab!!! Ati maarmik aur samvedansheel . Kedaarnath Singh jee ke Shabdon mein ' Acharya Ramchandra Shukla ki muchhon ke pichhe chhupee hansi... see kavitain... Bahut Bahut Badhai bhai Kumar Anupam jee.

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन १४ वें कारगिल विजय दिवस पर अमर शहीदों को नमन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

ravikant ने कहा…

Kala pani anupam ki ab tak ki sabse shandar kavitaon me se ek lagi. Jal kavita me 'namak me mithas'ka adbhud prayog hai !

kathakavita ने कहा…

फेस बुक ने जैसा सोचा है वैसा है नहीं इस वाल पर ...
यहाँ तो एक कवि की गहन सम्वेदना का रचाव है
दुखों को जड़ करता 'काला पानी' -पुतलियों से न हटता अँधेरा' यहाँ सपने बार बार स्थगित होने के लिए अभिशप्त हैं
'अनुपम' का 'जल' है 'रिश्तों में प्रकाश को भरता ' एक तिहाई प्रथ्वी है खेतों का स्वाद' है ....वाह ... बधाई भाई

kumar anupam ने कहा…

आप सभी का आभारी हूँ कि मेरा उत्साहवर्धन किया। कुछ और लिखने के लिए यह ईंधन बहुत ज़रूरी रहा है हर बार, कम से कम मेरे लिए. पुनः धन्यवाद आप सब को और अशोक कुमार पाण्डेय जी को.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

गहरी संवेदनशील रचनाएं ... काला पानी ने सोक्स्हने को विवश कर दिया ... छूती है दिल को ...

Yashwant Mathur ने कहा…

कल 28/07/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद!

गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने कहा…

दोनों ही कविताएं दो अलग भावभूमि पर उगी हुई । खूबसूरत और मार्मिक । दूसरी कविता तो द्रवित कर देने वाली है ।

Anita (अनिता) ने कहा…

अतिसंवेदनशील रचना......

~सादर!!!

Triloki Mohan Purohit ने कहा…

बहुत ही बढ़िया कवितायें . संवेदना के धरातल पर संकेतों में संवाद कराती कविताओं ने मन मोह लिया . कुमार अनुपम जी को बधाई.

Triloki Mohan Purohit ने कहा…

बहुत ही बढ़िया कवितायें . संवेदना के धरातल पर संकेतों में संवाद कराती कविताओं ने मन मोह लिया . कुमार अनुपम जी को बधाई.

लीना मल्होत्रा ने कहा…

अनुपम की कविताएँ एक गहरा असर छोडती हैं । पानी पर लिखी उनकी कविता ३ डी में एक दृश्य दिखाती है जिसमे बाढ़ में डूबते आप स्वयम को असहाय महसूस करते हैं । अनुपम को पढना हमेशा नये अनुभवों से रु ब रु होना है . बधाई

Premchand Gandhi ने कहा…

सघन संवदानाओं वाली कविताएं हैं दोनों। अनुपम को बधाई।

sushma 'आहुति' ने कहा…

बेजोड़ भावाभियक्ति....

kumar anupam ने कहा…

आप सभी का आभारी हूँ.

बेनामी ने कहा…

I could not resist commenting. Exceptionally well written!

Also visit my weblog: Foot Supination

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