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रविवार, 27 अक्तूबर 2013

रितेश मिश्र की कविताएँ


रितेश मिश्र की कविता से मेरा पहला परिचय हुआ था माँ पर लिखी उनकी एक कविता से. तब चौंका था. हिंदी में और दूसरी भाषाओं से भी जो माँ पर जो कविताएँ पढ़ी थीं उनमें एक अजीब सी भावुकता और अपराधबोध अक्सर ही पाया था. रितेश की उस कविता में यह दोनों ही तत्व सिरे से ग़ायब थे, बल्कि वह एक प्रश्नवाचक चिह्न के साथ उपस्थित थे और असुविधा पैदा करने वाली वह कविता मन को आद्र करने की जगह मष्तिष्क को उद्वेलित करती थी. उसके बाद से ही मुझे रितेश की कविताओं की तलाश रहने लगी लेकिन उन्हें अपने कवि होने को लेकर अक्सर लापरवाह और निस्संग ही पाया. कहना न होगा कि आत्ममुग्धता के इस दौर में यह एक दुर्लभ दुर्गुण है. पेशे से पत्रकार रितेश देश विदेश की कविताओं के बड़े कठोर आलोचक और दीवाने पाठक तो हैं ही साथ में एक पत्रकार के रूप में भी खुद को उन्होंने धंधेबाज होने या रुटीन रिपोर्टिंग में उलझाने की जगह लगातार एक जनपक्षधर हस्तक्षेप का प्रयास किया है. उनकी एक कविता हमने दखल और प्रतिलिपि की साझी पहल पर प्रकाशित पुस्तिका 'बेरोज़गारी की कविताएँ' में भी शामिल की है.  आज असुविधा पर उनकी कविताएँ प्रस्तुत करते हुए मुझे एक ख़ास तरह के संतोष का अनुभव हो रहा है.





कुत्तों का पुनर्जागरण

किसी भाषा के सीमित लक्ष्य से उपजा/ एक जानवर 
कुत्ता 
हज़ारों वर्षों तक/ बस पारंपरिक अपशब्दों के इर्द-गिर्द घूमता रहा 
सूंघता रहा उस भाषा का मल
और खाता रहा जूठन 
दौड़ता रहा/ नोचता रहा 
भाषा के ठेकेदारों को !
लड़ता रहा /हर काल के/ हर जीव से 

और एक दिन
एक दिन किसी एक पार्क के, एक कोने में
एक प्रेमिका ने एक प्रेमी से / लाड में कहा
भक्क ! कुत्ते ..!!

सुनो की कुत्तों का पुनर्जागरण
प्रेमिकाओं ने किया
और खासकर उन् प्रेमिकाओं ने
जिन्हें अपने प्रेमियों से उम्मीदें नहीं थीं
और ईश्वर
ईश्वर
पिल्लों की तरह उनके मुंह चाटता रहा !



 अपनी  इसी कुर्सी पे बैठे हुए

अपनी इसी कुर्सी पे बैठे हुए मैंने लिखे थे
कुछ जनगीत
राज़ तो  रहेगा ही ये सत्य
की कितना छली था मैं
रोग के तरह लग  जाता  है कभी-कभी
क्रांति का वो एक  वाक्य

..अरे मार्क्स तुम्हे ज़बरदस्ती पढ़ा गया !!

हटाओ यार !!
मैं दाढ़ी और सिगरेट वाला जीव
आम कहाँ रहा ?
यहाँ-वहां अपने नाम को इत्र की तरह  छिड़कने वाला
'मैं'
कुछ शातिर जुमले लेके घूमता हूँ
सावधान ..!!
शुद्ध दोभाषिया
'लोक' लेता हूँ पीड़ा
'झोंक' देता हूँ तुम्हे मार्क्स
वहां
जहाँ मुझे मालूम है की वजीर कभी नहीं मरेगा !!

अपनी इसी कुर्सी पे बैठे हुए 
मैंने अपने जूते अपने सर पे रख लिए..!!


 रंजीत के साथ मत खेला करो
 
बहुत कुछ टूट गया
खून मेरे प्रश्नों की तरह
कहीं कहीं बह रहा है
और कहीं थक्का बांध गया है
आँखें,
मानोकिसी नशेड़ी ने दिन भर कोई नशा  किया हो
पंजे दोनों तने हुए
जैसे क्रोध उतारने की कोई कला हो
होंठ बुदबुदा रहे हों जैसे
मैं ने तो कुछ नहीं कियाआख़िर मेरी गलती कहाँ है ? "
आवाज़ आई
नेपथ्य सेवही आवाज़
कितनी बार कहा है
रंजीत के साथ मत खेला करो "





 'सोजहू

थक जाना एक पहाड़ से नीचे आते हुए
और रुक न पाने का दुःख
की चढ़ते वक्त सांस तो ले सकते थे !
बहुत पुराना माई( दादी ) के किस्से का एक पात्र
'सोजहू' ( सीधा आदमी ) एकाएक पैदा होता है मेरे भीतर
की उतरना चढ़ने से ज्यदा कठिन होता है दोस्त
उतरते वक्त रुकने की कोई ख़ास वजह नहीं होती शायद !!










ग्राम : बिसानी / पोस्ट : अलहदादपुर


कभी मैं लौट जाऊँगा 
अपने गाँव 
एक-बजवा गाडी से  
बस किताबों से भरा एक बक्सा 
छोड़ के सारे कपडे
जो तुम्हारे बाज़ारों से खरीदे 

और भाषा 
भाषा तो तुम्हे लौटा के ही  जाऊंगा 
कि वहां दो चार ठेंठ शब्दों से काम चल जायेगा
जिसमे एक शब्द शायद 'राम' होगा 

अरे ! कितना बिगाड़ दिया  तुमने इस शब्द को 
माई  की तो  बस पहली  संख्या 'राम' थी 

क्या क्या नहीं बिगाड़ा तुमने 
अपने अस्तित्व  के भूखंड को हथियाने में 
रातें.. दोपहरें... शामें 

मैं लौट जाऊंगा अपने गाँव 
शाम लिए ..

  
शीर्षकहीन

पहुँच से बाहर नहीं है मेरे कुछ भी
लेकिन जब मैं पहुँच जाता हूँ वहां
तो बाहर हो जाता हूँ उस कुछ भी से

अपने आप स्वप्न कुछ नहीं होता
मगर कुछ भी हो जाता है मेरे लिए एक स्वप्न !

अपने लिए कोई सटीक उदाहरण तलाशता मैं भटक जाता हूँ जान बूझकर
उस प्रसन्न अवस्था में जाने से पहले
धीरे से एक ठुनगी मार कर गिरा लेता हूँ अपना बना - बनाया घर
मारे डर के कि कहीं मैं बेरोजगार न हो जाऊं

उन दिनों मैं कुछ ठहर सा गया था
किसी एक बहुत साधारण लेकिन सुरक्षित काल में
 और एक दिन मेरे कान के बहुत पास कोई चिल्लाया
 " डरपोक ! तू बेरोजगार है, मानसिक मंदी का शिकार है "

फिर घर, घर कहाँ होते हैं आजकल
कालिख पोतने और पोंछने की जगह बनके रह गए हैं...
बस घर बनाने वालों की शान में बाहरी दीवारे बिल्कुल साफ रखी जातीं है
छज्जों पर बैठे कबूतरों को गोली मार दी जाती है
इसीलिए मैं एक ठुनगी में गिरा देता हूँ अपना घर
कि न कालिख पोती जाये न पोछी जाये न कबूतरों को गोली मारी जाये
और उसमे मेरा निहित निजी स्वार्थ ये
कि मैं बेरोजगार न होने पाऊं

हम बिना घर वाले लोग ठीक - ठाक होते है
हालाँकि हमारे हाथ कुछ भी लग जाये तो वो कुछ भी नहीं रहता
हम अच्छी तरह समझते है कि हमारे पहुँच के बाहर कुछ भी नहीं है घर भी नहीं
लेकिन हम, हम बेरोजगार नहीं होना चाहते |

माँ एक संक्रामक प्रत्तयय 

माँ
मैं क्यों कह दूँ तुम्हें
देवी -?
क्यों ?'

कि तुम मेरे पहले गुरू थे
जबकि मैं तुमसे उन सब के लिए लड़ा
जिनके लिए मैं अब भी लड़ पड़ता हूँ
तुम पहली और आखिरी थी
जिसने जोर से पकड़ी थी
मेरी लगाम
और तुम्हारे साथ ही पहली बार हुआ था
सत्ता के विरुद्ध संघर्ष

माँ तुम्हे याद हैं
ये जो शब्दों की लड़ाई है न ये तुमसे ही शुरू हुई थी
जिसे तुम जुबान लड़ानाकहती थी

मैं ये नहीं कहता
कि तुमने मुझे प्रेम नहीं किया
अथाह किया !
न ये -
कि मैं तुमसे प्रेम नहीं करता
बस मैं ये कहना चाहता हूँ
कि तुम मेरे प्रथम गुरू नहीं थे

गुरू कि मेरी अपनी परिभाषा है माँ !
नीर- क्षीर विवेक वाली !
तभी तो तुम्हारे कई सिध्दांतों
कई उपदेशों
पर मैं लड़ पड़ता हूँ ;अब भी
और तुम भी तो मुझपर अबतक
अपना थोपना चाहती हो !

मैं ये भी जानता हूँ
कि जितना तुमने इस समाज से एक्सट्रेक्ट (extract) किया
उतना ही इंजेक्ट किया
तुम उस समाज कि अनुकृति मात्र हो
उसी समाज की
जिससे मेरे कुछ शील
लेकिन गंभीर विरोध हैं
इसलिए ही तुम सामाजिक देवी होगी
पर मैं तुम्हें देवी नहीं मानता !!

और प्रेम _?
कसम से माँ..
जब भी तुम्हे याद करता हूँ
एक अदम्य स्फूर्ति आती है
धमनियों का रक्त नृत्य करने लगता है
स्वाध्याय का सूत्र खोजने लगता हूँ
स्वीकार्य की चेतना जागृत हो जाती है

तुम्हारे चश्में की पीछे वाली
आँखों ने
कितनी बार
मुझमें कितनी बार
ज्ञान की भूख जागृत की

ये तुम्हारा प्रेम ही तो है माँ
कि मैं कह सकता हूँ
कि तुम देवी नहीं हो
ये तुम्हारा मेरा भीतर होना ही है
कि मैं ये भी कह सकता हूँ
कि तुम मेरे प्रथम गुरू नहीं थे

क्यों _मानती हो न ?

मै अक्सर सोचता हूँ
सार्वभौमिकता के बारे में
वो जो कहतें हैं कि तुम
सार्वभौमिक देवी हो
तब कैसे बन गया वो अपशब्द
जिसमें तुम आते हो
कभी किया उसका संधि -विच्छेद
क्या विश्व कि कोई ऐसी देवी है
जिसके नाम की गाली दी जाती हो ?
जो मै भी बक देता हूँ

माँ ये तुम्हारे नाम की
अँधेरी खोह
बना दी गयी है
ये मर्दों ने बनायी है
ये स्त्री की पूर्णता का
एक भुतहा घर है
जिसमें कुछ आदि मंत्रो के द्वारा ही
घुसा जा सकता है
में वो मंत्र कभी नहीं पढूंगा माँ !
किसी के कहने पर नहीं


20 comments:

Dr. Amar Jyoti ने कहा…

मैं वो मंत्र कभी नहीं पढूंगा माँ !
अद्भुत और सशक्त अभिव्यक्ति!

नवनीत पाण्डे ने कहा…

यहाँ-वहां अपने नाम को इत्र की तरह छिड़कने वाला
'मैं'
कुछ शातिर जुमले लेके घूमता हूँ

' मिसिर' ने कहा…

कमाल की कवितायेँ हैं | कवि का फक्कडपन कविताओं में भी उतर आया है | बहुत बहुत बधाई रीतेश को |

मोहन श्रोत्रिय ने कहा…

"सुनो की कुत्तों का पुनर्जागरण
प्रेमिकाओं ने किया
और खासकर उन् प्रेमिकाओं ने
जिन्हें अपने प्रेमियों से उम्मीदें नहीं थीं
और ईश्वर
ईश्वर
पिल्लों की तरह उनके मुंह चाटता रहा !" यह कविता ही बता देती है कि यह युवा कवि अपने समवयस्कों से अलग तरह की कविताई करता है. "मां" निस्संदेह बहुत अच्छी कविता है. ज़रा फिर से देखें भाषा थोड़ा संपादन मांगती है. एक अन्य कविता में घर-प्रकरण भी अच्छा लगा. कुल मिलाकर, एक प्रीतिकर अनुभव रहा, इन कविताओं से गुज़रना.

अरुण शीतांश ने कहा…

यह कविता छू रही है ह्रदय को परिपक्वता के साथ ।चयन अच्छा है भाई वाकई ।बधाई मिश्र को ।

संतोष चौबे ने कहा…

यह कविता छू रही है ह्रदय को परिपक्वता के साथ ।चयन अच्छा है भाई वाकई ।बधाई मिश्र को ।

मनोज पाण्डेय ने कहा…

"नेपथ्य से, वही आवाज़
कितनी बार कहा है
" रंजीत के साथ मत खेला करो " इस रंजीत के साथ रह कर ही कवि माँ पर ऐसी कविता लिख पाया है. रितेश और अशोक का धन्यवाद बेहतरीन कविताएँ पढवाने के लिए.

तुषार राज रस्तोगी ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
कैलाश वानखेड़े ने कहा…

अशोक भाई शुक्रिया .एक पत्रकार ही माना था सरोकार वाला लेकिन यह रूप दिखाकर बहुत बड़ा काम किया है,आपने ...कविताएं माँ घर रोजगार के साथ कई सवाल उठाकर उन्हें बेहद बारीकी से तफ़सील करती हुई समाज और ईश्वर से लडती है .कई सपने कई हसरतें कई लड़ाइया है ,खुद से माँ और सड़े हुए ढांचे से ,वह सारी हमारे सामने जीवंत होकर दिखती है .हम अपने आपको उसमें शामिल पाते है और सोचते रह जाते है .... "रंजीत के साथ मत खेला करो,,,कभी मैं लौट जाऊँगा
अपने गाँव ...कल वक्त निकालिए जनाब .

Umesh ने कहा…

फक्कड़ी स्वभाव की अच्छी कविताएँ है … और लोग कहते हैं कि कविता मर चुकी है … कविता ही है जो अभी भी कुत्ते को कुत्ता कहने का दम रखती है … माँ वाली कविता में एक विशेष संवेदना है - "ये स्त्री की पूर्णता का/ एक भुतहा घर है/ जिसमें कुछ आदि मंत्रो के द्वारा ही
घुसा जा सकता है/ में वो मंत्र कभी नहीं पढूंगा माँ! किसी के कहने पर नहीं"

babanpandey ने कहा…

बड़ा ही अच्छा लगा रितेश मिश्र जी को पढना

vandana gupta ने कहा…

यूँ तो सभी कवितायें अच्छी हैं मगर माँ कविता की बात ही और है।

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

साहस की कवितायेँ

प्रशान्त ने कहा…

अपने परिवेश को एक नये नजरिये से देखती ये कविताएं...आकर्षित करती हैं..एक से अधिक बार पढ़े जाने की जरूरत पैदा करती हैं और तब सतह पर जो व्यंग्य, जो तंज है उसमें छिपा आक्रोश, अवसाद धीरे-धीरे रिस कर बाहर आने लगता है. अपने वक्त की नब्ज़ पर सही जगह हाथ रखा है रितेश ने...उम्मीद है ऐसी ही उम्दा कविताएं और भी पढ़वाएंगे. कवि को बधाई....आपका भी शुक्रिया.

Rajesh Kumari ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार २९ /१० /१३ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका वहाँ हार्दिक स्वागत है ।

गीता पंडित ने कहा…

माँ ये तुम्हारे नाम की
अँधेरी खोह
बना दी गयी है
ये मर्दों ने बनायी है
ये स्त्री की पूर्णता का
एक भुतहा घर है

....... सभी कविताएँ सहज और सरल ...अच्छा लगा पढ़ना.. बधाई..

Onkar ने कहा…

सशक्त कविताएँ

neera ने कहा…

रितेश की कविताओं में भड़ास है, आग है और लड़ने के लिए चुनौती है इनकी खासियत यह है कहीं भी आग का तापमान कम नहीं होता, कवि लगातार डटा हुआ है चाहे वो खुद का घर हो या समाज। रितेशजी को बधाई, उम्मीद है आगे भी पढ़ने का अवसर मिलेगा। अशोकजी आपका शुक्रिया

रामजी तिवारी ने कहा…

achchii kavitaayen hain bhai ..badhai

Triloki Mohan Purohit ने कहा…

बढ़िया रचनाएँ । पढ़ने के उपरांत विचारों का सहज उद्वेलन रचनाओं की सफलता है। बधाई।

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