आशीष त्रिपाठी की तीन कविताएँ


पेशे से अध्यापक और मिजाज़ से कवि आशीष ने कविता से अधिक नाम आलोचना में कमाया है. लेकिन इस नाम कमाने में बेहतर या बदतर लिखा जाना नहीं शामिल, मुझे तो वे हमेशा मूलतः कवि लगे हैं, यह अलग बात है कि कवि होने के लिए कविता लिखने से इतर जो शर्तें हैं शायद वह उन पर उतना खरे नहीं उतरते.

बड़ी मुश्किल  उनसे तीन ताज़ा कविताएँ मिली हैं, पढ़िए...




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कलयुग


यह उस युग की बात है
जब भाषा से
सौम्यता,उदारता और विनम्रता जैसे शब्दों का लोप हो गया था

सहनशीलता और सहिष्णुता - बस राजनैतिक अनुष्ठानों में बाकी थे

हर आदमी के हाथ में
एक पुरातन लोकनायक का धनुष था,
जिसकी प्रत्यंचा तनी हुई थी

'भय से उपजती है प्रीत' - समाज का
आदर्श वाक्य था

प्रेम पर नैतिक पाबंदियां थीं
सहनशीलता कमज़ोरी का लक्षण
रौद्र और वीर सबसे प्रमुख रस
शृंगार छिछोरेपन का सूचक
उदारता दोमुंहेपन का लक्षण मान ली गयी थी

सिर्फ पुरस्कार के लिए
कवितायेँ लिखने वाले कवि राजकवि थे
फिर भी 'कविता' पर संदेह किया जाता था
क्योंकि उसमें भाषा के रूपक और अनेकार्थता के गुणों का उपयोग करने की शक्ति शेष थी

कलावंतों में सिर्फ संगीतज्ञ थे जो चांदी काटते थे

जनता की भाषाओँ को मार देने की ख़ुफ़िया परियोजनाएं जारी थीं

लोकतंत्र में संख्याबल ही एकमात्र कसौटी था
राजनीति पारिवारिक जायदाद
जाति और धर्म
मरी हुई खाल पर चिपके आभूषण

प्रवचन उद्योग सबसे बड़ा उद्योग

कुछ खास संगठनों की सदस्यता देश प्रेम
कुछ खास कंपनियों का सामान खरीदना नागरिक ज़िम्मेदारी

जनता को मुफ्तखोर बनाने के लिए
लखमुखी योजनाएं

यह उस युग की बात थी
जब अपराधी का साथ सुरक्षा की गारंटी था
हत्यारे नायक माने जा रहे थे
सामूहिक नरसंहार के रचयिताओं ने
इतिहास से महानायकों को बेदखल कर दिया था

इस बखान से कहीं आप
फिक्रमंद तो नहीं हो गए
चिंता मत कीजे हुज़ूर
वह कलयुग बीते सदियां बीत गयीं हैं

अभी तो सतयुग चल रहा है


मेरी नींद

अभी मेरी नींद का रंग है
गहरा स्लेटी
काले की ओर झुकता धीरे- धीरे

मेरी नींद की देहरी पर खड़ा है
जुनैद का हमशक्ल
जलती भट्टी की दीवार सा है उसका रंग
उसकी आँखों में करुण अंगारी धधक है
नींद की देहरी के भीतर मैं उसे छूने बढ़ता हूँ
कि उसके चेहरे से
झांकने लगता है
अयूब का सख़्त कर्मठ चेहरा
और पार्श्व से गूंजती है
जुनैद की महतारी के रुदन को ओवरलैप करती अयूब की बहन की आवाज़

मेरी नींद हामिद के साथ
जुनैद के गांव के ईदगाह में भटकती है
ईदगाह आया हर बच्चा डरा हुआ है
नमाज़ के बाद किसी ने
दूसरे को मुबारकबाद नहीं दी है

मेरी नींद में कहीं गहरे अंधेरे से आती है
नज़ीर की आवाज़
कि अचानक
नींद में दौड़ती आती हैं पहलू खान की गायें
बंबाती हुई
उनमें से एक की शकल
मतवारी से मिलती है हूबहू
बचपन में मेरे घर की सबसे दुधारू गाय

नींद का रंग कालिख हुआ जाता है

एक बड़ी सैकड़ों दरवाजों वाली बड़ी हवेली में
भटकती है नींद
जिसका हर दरवाज़ा बाहर से बंद है

हवेली के भीतर
दुनिया का सबसे बड़ा रेगिस्तान
धूप में तप रहा है

भयानक लू के बीच
भीतर एक कमरे में बंटते हैं हत्यारे कर्ज़
आत्महत्या कर चुके सभी किसान खड़े हैं सामने
पर सामने कर्ज़ लेने के लिए
लगी है लंबी लाइनें
जिनके भाइयों ने आत्महत्या की
वे किसान भी खड़े हैं
जिनके पिताओं ने फांसी लगाई ,उनके बेटे
खड़े हैं पंक्ति में चुपचाप
उनकी आंखों में पसरी है
भयानक ठंडी राख ठंडी चिता की

मेरी नींद का रंग
गीले कत्थे सा था अभी

नींद में लाखों दृश्य
एक दूसरे को ठेंलते चले आते हैं
कि अचानक चारो ओर छा जाती है महचुप्पी

पीछे की सब आवाज़ें चुप हैं
और बेआवाज़ रुदन का महाकोरस
दृश्य में चलता है

मेरी नींद
लाखों आंखों में राख सी उड़ती है

बिना तेल की बाती सी भभकती है
जलती है अंधी
मेरी नींद

गड़ासे सा तना है समय मेरी गर्दन पर

सनातन सिर्फ़ संस्था का नाम नहीं है

हत्यारे मानुष से ख़तरनाक हैं
हत्यारे विचार
अहिंसा मानने का भरम देने वालों के दिमागों में
चलती रहती हैं
नरसंहार की योजनाएं
वीरता के नाम पर
वे हिंसा के कारखाने चलाते हैं

समन्वय की मीठी गोली देने वाले
घूमते हैं त्रिशूल लेकर
उनके भगवान के प्रत्येक भाले पर है
एक विरोधी का कटा हुआ सर

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21 सितम्बर, 1973 को मध्य प्रदेश के एक गाँव जमुनिहाई (जिला सतना) में जन्म। इन दिनों काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के हिन्दी विभाग में रीडर।
कम उम्र से ही कविता में रुचि। पहली कविता सन् 1986 में प्रकाशित। 1994 से निरंतर कविताओं का प्रकाशन। एक कविता संग्रह ‘एक रंग ठहरा हुआ’ तथा एक आलोचना पुस्तक ‘समकालीन हिन्दी रंगमंच और रंगभाषा’ प्रकाशित।

सम्पर्क: एल-7, वार्डेन आवास, जोधपुर कॉलोनी, बी.एच.यू.,  वाराणसी-221005 (उ.प्र.)।

टिप्पणियाँ

Onkar ने कहा…
सटीक रचनाएँ

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